Friday, 15 April 2016

संगीत से मेरा वास्ता .

संगीत से मेरा वास्ता :😊😊😊 #बनस्थलीडायरी 👌👌👌
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     बनस्थली डायरी : संगीत से मेरा वास्ता - ( भाग दो .) 😊😊 💐💐
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#sumantpandya

#बनस्थलीडायरी     #संगीतसेमेरावास्ता

पहले पहले साल मैं 14 अरविन्द निवास में रहा .  वहीं पीछे की लाइन में 28 नंबर  में संगीत के पटवर्धन साब रहा करते थे . रात कभी मैं चौक में निकलता तो उधर से पटवर्धन साब का गायन सुनाई देता था .
इसी सत्र में मेरा विवाह तो हो चुका था पर मैं पहले की तरह ही हरि भाई और भाभी के पास ही रह रहा था . मिसेज पटवर्धन बराबर से निकल कर जा रही होतीं और मैं घर के बाहरी बरामदे में बैठा होता तो वे मुझे टोकतीं :

" किसी की याद में खोए हुए हो? "

"स्वाभाविक है !"  मेरा उत्तर होता .

मेरा उत्तर सुनकर वो बहुत खुश होतीं .

लगभग तेरह महीन बाद  हरि भाई भाभी तो जयपुर आ गए . इस बीच मैं और जीवन संगिनी 44 रवीन्द्र निवास में आ बसे . हरि भाई और भाभी से  संबंधों की प्रगाढ़ता आगे जारी रखते हुए एक दिन पटवर्धन परिवार के सब लोग 44 रवीन्द्र निवास में हमारे घर आए . उनकी दोनों बेटियां - उषा और संध्या भी मां बाप के साथ आईं और उसके बाद तो वे लोग जब तक रहे बहुत आना जाना रहा .
जब पहली बार वे लोग हमारे घर आए तो जीवन संगिनी कहने लगी :

" मेरे पिता जी को भी संगीत में बहुत आनंद आता है , वो अलवर के श्रुति मंडल से जुड़े रहे हैं "
यह सब जानकर पटवर्धन साब बहुत खुश हुए और उसी दिन यह भी तय कर दिया कि जब भी माता पिता आएंगे वो इसी घर में संगीत का एक आयोजन रखेंगे .
जब तय ही था तो उनके आने पर संगीत का आयोजन रखा गया . पटवर्धन साब के साथ उनके सक्षम संगतकार भी आए , अड़ोसी पड़ोसी भी सुनने आए . पहली बार मैं जाना कि गायन कितनी बड़ी साधना है .
जिस रात गाना हो गायक को रात का भोजन तो रद्द ही करना पड़ता है .
देर रात तक संगीत की महफ़िल चली .
इस में मेरी भूमिका तो केवल सप्लाई लाइन सम्हालने की थी . यह कि नियत समय पर मैं कॉफी  और कुछ हलके स्नैक्स सर्व कर दूं .उसमें भी मेरी समझ कितनी थी यह आगे के वृत्तांत में... 
बहर हाल उस दिन की उनकी आखिरी बंदिश के बोल मुझे आज भी याद हैं:

"..करत ठिठोरी संग की सहेलियां...."

अनायास स्थगित ..
इति प्रातःकालीन सभा .
बनस्थली के आनंद दायक समय को
याद करते हुए .
☺☺☺☺☺☺☺☺☺☺
सहयोग और समर्थन : मंजु पंड्या . ( Manju Pandya )

सुमन्त
आशियाना आँगन, भिवाड़ी.
गुरुवार 16 अप्रेल 2015 .
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Wednesday, 13 April 2016

☺☺ " तसवीर बनाता हूं तसवीर नहीं बनती ...." 😢😢😢

☺☺☺☺☺
    
     😊😊” तसवीर बनाता हूं तस्वीर नहीं बनती .

          मुझसे तो मेरी बिगड़ी तकदीर नहीं बनती .”😢😢

  आत्म प्रलाप : 😢

 क्या  चक्कर है सुमन्त ?

 चक्कर क्या है , एक ही चक्कर है  बच्चों से कह कहवा कर अपना एक ब्लॉग तो बनवा लिया पर जब भी कोई तसवीर जोड़कर कुछ पोस्ट करने की कोशिश करता हूं जवाब मिलता है ,” पोस्ट  फेल्ड “, और ये देखकर करम पीट लेता हूं .

अरे जब मेरे लिखे में कोई ऐतराज नहीं तो मेरी जोड़ी हुई तसवीर में भला क्या ऐतराज है , एक तो  घर में ही टोका टाकी से परेशान कि ये तसवीर क्यों लगा दी  मानो सारे भूचाल मेरे तसवीर लगाए से आते हैं और ऊपर से ये अड़ंगेबाजी , खैर अब जो है सो है .

😢😢😢😢😢😢😢😢😢

पर इस सब में एक उजला पक्ष भी तो देखा जा सकता है वो ही सोच सुमन्त , बात ये कि मैं कैमरा के चित्र की बजाय अपने लिखे से ही चित्र का भाव उत्पन्न करूं और बनाऊं स्मृतियों के चलचित्र .

आप  में से कई एक ने ये कहकर मेरा उत्साह बढ़ाया है कि मेरा लिखा पढ़ते हुए उन्हें  दृष्य  दिखाई देने लगते हैं , ऐसा अनुभव होता है जैसे घटना सामने ही हो रही है अगर ऐसा होता है तो मैं अपनी किस्सागोई में सफल हुआ . ये जताने के लिए आभार आप सब का .

तो अब हालात की मजबूरी के चलते अपना रवैया ये ही  रहेगा कि फेसबुक पर  चाहे कोई फोटो आ अवा जाए ब्लॉग पर तो फकत लिखा हुआ ही आएगा , न आई सही कैमरे की तस्वीर .

पर ऐसी बिगड़ी तकदीर कोई हमेशा नहीं रहने वाली , किसी दिन तो जय भैया मुझे ये सिखाने आएगा ही कि ब्लॉग लेखन के साथ तसवीर का मेळ  कैसे बैठाया जा सकता है ! देखे जाओ आप लोग  कि क्या क्या गुल खिलते हैं .

जय भीम .

भविष्य के प्रति आशान्वित ,

सुमन्त पंड्या

जयपुर

14 अप्रेल 2016 .

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Tuesday, 12 April 2016

😊😊😊" वेंड्यो ही रह्यो परताप सिंह ! "

 
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     😊😊  “ वेंड्यो ही रह्यो परताप सिंह ! “

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     #उदयपुरडायरी।     #sumantpandya

    मेवाड़ी का ये शब्द माने ,’ वेंड्या ‘ मुझे अतिरिक्त लुभावना लगता रहा है , ठीक  वैसे ही जैसे ढूंढाड़ी का शब्द ‘ बावळी ‘😊.

एक बार बावळी को ‘ बावळी ‘  कहकर मैं बुरा फंसा वो बात तो मैंने कभी बताई ही थी , आपको याद न आए तो फिर किसी दिन दोहराऊंगा .

अब आते हैं तब के उदयपुर के  प्रताप सिंह के मामले पर जो हमारे माता पिता का गृह सेवक  हुआ करता था जब हम तीन भाई माता पिता के साथ भूपालपुरा में रहा करते थे , वर्ष 1962 - 63 की बात .

भोला सा प्रताप सिंह बोलचाल की भाषा में परताप सिंग बन जाता था और एक उसकी जानकार डोकरी  तो जाने क्यों उसे मनोहर सिंग बोलती थी  उसका स्नेहसिक्त निमंत्रण तो मुझे आज दिन तक याद है , “ 😊 आजे रै मनोर सिंग  , आजे !” माने मनोहर सिंह आना .  इस डोकरी और परताप सिंह ने कभी डाक्टर दौलत सिंह कोठारी के घर साथ साथ काम किया था , दोनों में आत्मीयता थी .

अब ख़ास वाकये पर आते हैं 😊 जिसका संकेत शीर्षक में आया है  :*******************************************************

नागोरी साब काकाजी के दफ्तर याने उदयपुर ट्रेजरी में बाबू थे और दफ्तर का कोई काम लेकर फ़ाइल लेकर हमारे घर आ रहे थे पर यहां शायद पहली बार आए थे और उन्हें ठीक से मकान की लोकेशन का पता नहीं था . बेचारे नागोरी साब ने मकान और गली के आस पास पांच सात चक्कर लगाए पर मकान मिला नहीं खैर थोड़ी देर में घूम फिर कर यहां आ पहुंचे नागोरी साब पर इसमें मजेदार बात ये रही कि  नागोरी साब को हर बार घर के आस पास से निकालकर जाते परताप सिंह ने देखा पर बाहर निकल कर टोका नहीं के आखिर वो बार बार इस घर के आस पास चक्कर भला क्यों लगा रहे हैं ? और जब नागोरी साब फाइनली घर आ गए तो ये और बोला :

   “ मूं आप नै देख्या हा .😊😊”

 माने मैंने आप को इधर चक्कर लगाते देखा था  .

और तब ललाट को हाथ से स्पर्श कर नागोरी साब बोले :

     “ वेंड्यो ही रह्यो परताप सिंह … मूं साब रै घर न आतो तो कुणी रै जातो ?” 😊😊😊😊

माने वो यहां नहीं तो और कहां जाते और ये पगला कुछ समझा ही नहीं . नागोरी साब घर के आस पास चक्कर लगाते रहे और इसने टोकना मुनासिब नहीं समझा .

उस दौर की और बहुत छोटी छोटी बातें हैं वो फिर कभी .

Saturday, 9 April 2016

😊😊😊 मेरा यार राम निवास : भाग एक .😊😊😊

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          बनस्थली डायरी : मेरा यार राम निवास . #sumantpandya

***************    *******************    #बनस्थलीडायरी

आदि बनस्थली में दो प्रकार के कार्यकर्त्ता हुआ करते थे - प्रथम श्रेणी कार्यकर्त्ता और स्थानीय कार्यकर्त्ता . पहली श्रेणी वाले खादी पहना करते थे , दूसरी श्रेणी वाले कोई भी कपड़ा  पहन सकते थे पर अधिकांश ये लोग कमीज और धोती पहने देखे जा सकते थे . इसी दूसरी श्रेणी में से एक था स्थानीय पूसवाड़ी ढाणी का राम निवास जिससे मेरी दोस्ती इस श्रेणी भेद  से परे थी . आज उसी के बारे में .....

मैत्री का  उद्भव और विकास :

  जब मैंने काम करना शुरु किया तो कालेज के सामने एक पेड़ के नीचे स्टाफ के लिए कुछ मुढ्ढ़े रखे होते थे , जिन पर रिक्त कालांश में हम लोग बैठते , प्रिंसिपल डाक्टर रामेश्वर गुप्ता भी एक डैस्क लगाकर वहां से अपना दफ्तर चलाते . वहीँ पास चौकीदार की झोंपड़ी थी जो गुप्ता साब के घंटी बजाने पर दौड़ा आता . वहीँ पानी का एक मटका रखा रहता , एक लकड़ी के फंटे से ढका हुआ जिससे हम लोग भी पानी पी लेते .  

कालान्तर में इस व्यवस्था में कुछ बदलाव आया और मटका हट गया क्योंकि उसकी वहां हिफाजत नहीं थी . बदली व्यवस्था में कोई न कोई जल घर से लाकर हम लोगों को पानी पिला देता .

इस बदली व्यवस्था में एक दिन मैंने छोगा को अपने लिए पानी लाने को कहा . कहा था छोगा को और पानी लेकर आया राम निवास . मुझे इसमे छोगा की टालू वृत्ति लगी, उसे भी बुलवाया और कारण जानना चाहा तो वो बोला :

"म्हारा हाथ को तो कोई पाणी ही कोनै पीवै  ."

अर्थात मेरे हाथ का तो कोई पानी ही नहीं पीता .

खैर उस दिन तो मैंने राम निवास को लौटा दिया था और छोगा से ही मंगवा कर पानी पीया था . पर पानी पिलाने का जिम्मा राम निवास का ही हुआ करता था और उसने  मेरे चार दशक के सेवा काल में कितनी बार कितने किलो  लीटर पानी मुझे पिलाया होगा इसका कोई हिसाब नहीं .

राम निवास मेरी क्लास में भी स्थाई आमंत्रित हुआ करता था , जब चाहे रामझारा लेकर चला आए , मैं एक  मुहुर्त्त भर को रुक कर पानी पीवूं और आगे बोलने लगूं .

इस चर्चा को अगली पोस्ट में आगे बढ़ाऊंगा .

आदि बनस्थली के स्वर्णिम काल को याद करते हुए ,

अभी हाल के लिए इति .

वैचारिक सहमति : मंजु पंड़्या  .

सुप्रभात .

Good morning

सुमन्त.

आशियाना आँगन . भिवाड़ी .

9 अप्रेल   2015 .

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अपडेट : ये संस्मरण गए बरस भिवाड़ी में बैठे  लिखा था मैंने . आज फेसबुक के याद दिलाए से फिर याद आया मेरा यार राम निवास . पोस्ट कहीं खो न जाए ऐसा सोचकर इसे अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित किए दे रहा हूं .

चाहे तो यहां देख लीजिए चाहे तो वहां

ओवर टू ब्लॉग .

प्रकाशित  करता हूं  इसे ब्लॉग पर 

२० फ़रवरी २०१७ .

Wednesday, 6 April 2016

☺☺"...... ये बिजली कहां गिरेगी ? " ☺☺☺

            “  …. बिजली कहां गिरेगी ? “😊😊😊😊😊

     *******************************************   #बनस्थलीडायरी     #sumantpandya

 इतिहास और भूगोल का विवरण :

  -----------------------------------   कोई छोटी घटना बताने के लिए भी मुझे पुरानी बातें बतानी पड़ती हैं अतः किस्से पे आने से पहले थोड़ी पृष्ठभूमि  बताता चलूं तो आप उस दृष्य प्रपंच को बेहतर समझ पाएंगे जो मैं बताने जा रहा हूं .

जब मैंने बनस्थली में काम करना शुरु किया तो होम साइंस केवल एक विषय (subject )  हुआ करता था और सुधा नारायणन ये विषय पढ़ाया करती थी  , पढ़ाने वालों का टोटा था . एक टीचर के लिए काम थोड़ा ज्यादा पड़ता था , पढ़ाई और सिलेबस का एक हिस्सा फिजियोलॉजी था तो मेडिकल ऑफिसर के रूप में काम कर रहे हरि भाई  ( Dr. H B Pandya )को ही ये पढ़ाने का काम बता दिया गया था  ये एक समाधान हो गया था .😊  मेरे विषय की शब्दावली में इसे कहते हैं ,” सब्स्टिट्यूटेबिलिटी ऑफ रोल्स “मने एक समय ऐसा था , एक समय क्या वो समय ऐसा था कि मैं और हरि भाई  एक ही कॉलेज में पढ़ाया करते थे , मैं रहता उनके पास था ये तो समय समय पर मैं बताता ही रहता हूं .

थोड़ी स्थिति तब बदली जब एक युवती और होम साइंस डिपार्टमेंट में आ गई  जिनका नाम था रीता यादव ,  इनके आने से सुधा जी का भार कुछ कम हुआ .  इधर हरि भाई भी  तब जयपुर आ गए थे आगे किसी डाक्टर ने होम साइंस डिपार्टमेंट में फिजियोलॉजी पढ़ाई हो मुझे याद नहीं  पड़ता .

ये सब तो मैंने बताए होम साइंस के साथ अपने ऐतिहासिक सम्बन्ध  . अब आता हूं रीता यादव  के व्यक्तित्व बखान पर .

युग बदला :  सुधा नारायणन संन्यास लेकर चली गईं और रीता यादव  अकेली विभाग का नाम लेवा रह गईं . होम साइंस का वर्तमान विस्तार तो बाद की बातें हैं . एक समय रीता यादव अपने पति के साथ जर्मनी भी हो आईं  थीं और उनके सुर्खाब के पर लग गए थे . जिस प्रसंग की ओर मैं धीरे धीरे बढ़ रहा हूं वो उसी दौर का है . मेरा बोला चाला सुधा जी से भी था और रीता यादव से भी , ये उसी दौर की तो बात है जब सब का सब से बोला चाला होता था परिसर में .

संवाद स्थल  :😊

**********     ये उन दिनों की बात है जब बनस्थली का पोस्ट ऑफिस शांता कुञ्ज में हुआ करता  था और हम लोग तो रहे पक्के क्वार्टरों में . गर्मियों की दोपहर का समय जब सड़क सूनी थी मैं घर से चलकर पोस्ट आफिस जा रहा था पैदल पैदल कि सामने से अपने दुपहिया पर आ रही थीं रीता यादव  , वो मुझे दूर से आती दिखीं और लगभग शांता भवन  की सीध में  आड़े आकर मैंने उन्हें ऎसे रोका जैसे ट्रैफिक पुलिस वाले रोकते हैं और जाने मुझे क्या सूझी , मैं छूटते ही बोला :

“....... अजी ये बिजली कहां गिरेगी ..? “ 😊

शायद उन्हें लगा हो कि मैं उनकी साज सज्जा  को इंगित कर रहा हूं , हालांकि मुझसे ऐसी उम्मीद तो नहीं ही रही होगी , पर वो थोड़ा अचकचाईं और ,” जी सर , हाँ सर  “  जैसा कुछ बोलीं भी .

तभी मैंने उनके दुपहिया की हैड लाइट की ओर इंगित किया जो भर दुपहरिया में जल रही थी  और उस वीराने में ठहाका लगा हम दोनों का .

न जाने अब कहां होंगी रीता यादव , देश में या विदेश में , जाने उन्हें ये वाकया याद होगा के न होगा मुझे तो ये याद है तो इसे मैंने दर्ज कर दिया #बनस्थलीडायरी के अंतर्गत .

नमस्कार .

सुमन्त पंड्या

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

 गुरूवार 7 अप्रेल 2016 .

Tuesday, 5 April 2016

डी . प्रेमपति .

   
    😊😊 बनस्थली के वे दिन : प्रेमपति के बारे में .

जिन दिनों मैं बनस्थली में काम करने लगा अंग्रेजी विभाग में डी. प्रेमपति भी हुआ करते थे . वे  बिलासपुर , मध्यप्रदेश से आये थे और कुछ समय वहां ठहर कर दिल्ली चले गए थे . उन्हें पत्रकारिता और अध्यापन का बहुत अच्छा अनुभव था . उन दिनों की उनकी कही एक बात अब भी यदाकदा याद आ जाती है वही आज बताता हूं :

एक दिन  अपनी मौज में प्रेमपति कहने लगे :

" सुमंत , मैं जब अपनी एकेडमी  बनाऊंगा तो उसमे दो सब्जेक्ट्स पर बैन लगाऊंगा - संगीत और संस्कृत ."

अब भला ये तो कोई बात नहीं हुई . इतने महत्वपूर्ण विषयों के बगैर एकेडमी क्या बनेगी , मेरी तो समझ से परे थी यह स्थापना .

पर इन विषयों के सहपाठियों से उनकी जो शिकायत थी वही इस धारणा के मूल में थी .

प्रेमपति कहने लगे :

" मैं जब बनारस में पढता था और अंग्रेजी में एम ए कर रहा था , रात को हॉस्टल  में  अपने कमरे में पढ़ने  बैठता तो ये संगीत वाले बराबर के कमरों में अभ्यास शुरु कर देते , पक्का गाना गाने लगते . ये मेरे पढने में विघ्न डालते  हमेशा .

और ये संस्कृत वाले चार मंजिल के होस्टल में सुबह चार  बजे  से ,जब मेरे सोने  का बखत होता , स्नान ध्यान करने खड़ाऊ पहन कर मंत्रोच्चार करते हुए उतरते और मुझे चैन से सोने नहीं देते . अब बोलो ..."

आज फिर डी. प्रेमपति की याद आ गई इस लिए थोड़ी झिझक के साथ ये बात मैंने बताई है .

ये बात भी उन दिनों की ही कही हुई है जिन दिनों बनस्थली में भी कालेज की इमारत में पीछे की ओर बनी  झोंपड़ियों में हमारी एम ए की क्लासें चलती थीं और पड़ोस की झोंपड़ी में से आता संगीत का स्वर भी सुनाई देता रहता था .

डिस्क्लेमर :  ये विचार एक सन्दर्भ में व्यक्त विचार मात्र हैं , इनसे मेरी कोई सहमति नहीं है .

बनस्थली की पुरानी यादों के साथ : सुप्रभात . Good morning .

सह अभिवादन :

सुमन्त

आशियाना आँगन, भिवाड़ी .

5 अप्रेल 2015 .

बनस्थली के वे दिन : प्रेमपति के बारे में .

जिन दिनों मैं बनस्थली में काम करने लगा अंग्रेजी विभाग में डी. प्रेमपति भी हुआ करते थे . वे  बिलासपुर , मध्यप्रदेश से आये थे और कुछ समय वहां ठहर कर दिल्ली चले गए थे . उन्हें पत्रकारिता और अध्यापन का बहुत अच्छा अनुभव था . उन दिनों की उनकी कही एक बात अब भी यदाकदा याद आ जाती है वही आज बताता हूं :

एक दिन  अपनी मौज में प्रेमपति कहने लगे :

" सुमंत , मैं जब अपनी एकेडमी  बनाऊंगा तो उसमे दो सब्जेक्ट्स पर बैन लगाऊंगा - संगीत और संस्कृत ."

अब भला ये तो कोई बात नहीं हुई . इतने महत्वपूर्ण विषयों के बगैर एकेडमी क्या बनेगी , मेरी तो समझ से परे थी यह स्थापना .

पर इन विषयों के सहपाठियों से उनकी जो शिकायत थी वही इस धारणा के मूल में थी .

प्रेमपति कहने लगे :

" मैं जब बनारस में पढता था और अंग्रेजी में एम ए कर रहा था , रात को हॉस्टल  में  अपने कमरे में पढ़ने  बैठता तो ये संगीत वाले बराबर के कमरों में अभ्यास शुरु कर देते , पक्का गाना गाने लगते . ये मेरे पढने में विघ्न डालते  हमेशा .

और ये संस्कृत वाले चार मंजिल के होस्टल में सुबह चार  बजे  से ,जब मेरे सोने  का बखत होता , स्नान ध्यान करने खड़ाऊ पहन कर मंत्रोच्चार करते हुए उतरते और मुझे चैन से सोने नहीं देते . अब बोलो ..."

आज फिर डी. प्रेमपति की याद आ गई इस लिए थोड़ी झिझक के साथ ये बात मैंने बताई है .

ये बात भी उन दिनों की ही कही हुई है जिन दिनों बनस्थली में भी कालेज की इमारत में पीछे की ओर बनी  झोंपड़ियों में हमारी एम ए की क्लासें चलती थीं और पड़ोस की झोंपड़ी में से आता संगीत का स्वर भी सुनाई देता रहता था .

डिस्क्लेमर :  ये विचार एक सन्दर्भ में व्यक्त विचार मात्र हैं , इनसे मेरी कोई सहमति नहीं है .

बनस्थली की पुरानी यादों के साथ : सुप्रभात . Good morning .

सह अभिवादन :

सुमन्त

आशियाना आँगन, भिवाड़ी .

5 अप्रेल 2015 .

☺☺ ☺☺☺☺👍👍

Monday, 4 April 2016

☺ होली आदि बनस्थली की : बनस्थलीडायरी के अंतर्गत .☺☺☺☺☺

#बनस्थलीडायरी   #sumantpandya

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  होली आ रही है  तो बातें आदि बनस्थली की होली की :

    ये तब की बातें हैं जिन्हें जानने समझने वाले अब कम लोग बचे हैं पर अभी हाल हैं  . कल को तो ये बातें केवल जन श्रुतियों में रह जाएंगी कि उस छोटे से जन समुदाय में कैसी पारस्परिक आत्मीयता थी , कैसी पारिवारिकता थी , कैसी समता थी , कैसा कार्यकर्त्ता भाव था . बनस्थली की शुरुआत पंडित हीरा लाल शास्त्री की समाज सुधार की ललक के चलते हुई थी अतः शिक्षण संस्था बन जाने के बाद भी बजाय कर्मचारी के कार्यकर्त्ता शब्द प्रचलित था , ऐसे ही समय की एक होली के दिन की महा मूर्ख सम्मेलन की बात है , तो सुनिए :😊

सभा में से आवाज आती है अगले प्रस्तोता  के लिए फर्माइश :

“गौड़ साब , गौड़ साब ! “

अब सभा में दो गौड़  बैठे हैं  - एक कार्यालय के मदन मोहन गौड़ और दूसरे अर्थशास्त्र विभाग के श्याम नाथ गौड़ ( बाद में तो श्याम नाथ ने सर नेम छोड़ ही दिया था । ) खैर ..

भाई साब मदन मोहन गौड़ पूछते हैं :

“ कौन सा गौड़ चाहिए ? हल्का के भारी ? “

सभा में से आवाज आती है ,” भारी .”

और वो उठकर सामने चले जाते हैं . असल में हल्के गौड़ से वे वय में बड़े थे और और उनका गायन और लेखन अद्वितीय था . वो गए और उन्होंने जो गीत गाया उसके बोल थे :

“ होगा तू भगवान् किसी का  , मेरा तू भगवान् नहीं है .”

 मदन मोहन गौड़ असमय और न जाने की आयु में चले गए , इधर श्यामनाथ का आखिरी ग्रीटिंग कार्ड मॉरीशस से आया था आगे वो ट्रेसेबल नहीं हुए .

पर वे दिन और वो लोग मेरे लिए नॉस्टेलजिया की वजह है .

आज के लिए इतिहास के संग्रहागार से बनस्थली का और भी पुराने समय का एक चित्र जोड़ता हूं जब सरदार पटेल बनस्थली आए थे . चित्र मुझे जे एन यू के एक  गंभीर अध्येता गणपत ने ये सोचकर भेजा है कि ये मेरे काम का होगा .

आभार और आशीर्वाद - गणपत

सुप्रभात .

सहयोग और समर्थन :

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सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

सोमवार 14 मार्च 2016 .

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आज का अपडेट :

गए बरस आज के दिन लिखी थी ये पोस्ट और इसे ब्लॉग पर भी दर्ज किया था  । बहुत से लोगों ने इसे अपनी अपनी दीवार पर साझा किया था कोई कोई ने कापी पेस्ट भी किया इसे अपना गढ़ा क़िस्सा बनाकर । तब उस बार कसर ये रह ग़ई थी कि ये फ़ोटो ब्लॉग पर नहीं लग पाई थी , कारण तकनीकी अनभिज्ञता । आज ये भी सम्भव हो गया है ।

इबारत ज्यों की त्यों रखते हुए आज इस क़िस्से को फ़ोटो सहित ब्लॉग पर अंकित करता हूं .

आप सब को रंग पर्व की  बधाई । 🌹

सुमन्त पंड़्या 

@ जयपुर 

मंगलवार १४ मार्च २०१७.

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