Showing posts with label दिल्ली डायरी. Show all posts
Showing posts with label दिल्ली डायरी. Show all posts

Tuesday, 5 June 2018

गोरा गोरा पप्पू : मीरां के साथ .

कल शाम मीरां को " गोरा गोरा पप्पू "  वाला गाना सुनाया था । गाने के ठीक पहले मीरां हमारे साथ नानी की गोद में ।
@  दिल्ली ६ जून २०१८.

Monday, 28 August 2017

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी और दिल्ली डायरी का संस्मरण .

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी  .🌷🌷

*********** ****************

#sumantpandya #स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी

कभी कभी जीवन में ऐसा भी होता है कि व्यक्ति को निराशा घेर लेती है और ये निराशा यदि लंबी अवधि तक बनी रहे तो घातक भी हो सकती है . लेकिन … लेकिन ये योगायोग की बात है कि कुछ अलौकिक घटनाएं ऐसी होती हैं कि निराशा अचानक छूमंतर हो जाती है और जीवनी शक्ति लौट आती है . ऐसे अनुभव सब के जीवन के होते हैं , घटनाओं के प्रभाव हर व्यक्ति के लिए उसके स्वभाव और प्रकृति के अनुसार अलग अलग होते हैं / हो सकते हैं .

 मैं तो अपनी बात बताता हूं जो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन से याद आ रही है , कई दिन से बताने का मन था पर एक तो उपकरण और संचार तंत्र ने कुछ साथ नहीं दिया और दूसरे दिल्ली में दो पारिवारिक शिखर सम्मेलनों में व्यस्त रहा जिसके चलते ये पोस्ट नहीं बन पा रही थी . देखते हैं अगर आज ये बात कुछ हद तक पूरी हो जाती है तो फेसबुक पर अपलोड कर देवूंगा . फिर आएगा शिखर सम्मेलनों की गतिविधियों का विवरण जो अलग पोस्ट का कलेवर बनेगा , देखिएगा जरूर .


दो महत्वपूर्ण व्रत : 🌷🌷

मेरे घर में दो व्रत शायद पीढ़ियों से चले आ रहे हैं और महत्त्वपूर्ण हैं - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और शिवरात्रि जिनमें छोटे छोटे बच्चे भी यथा शक्ति सम्मिलित होते रहे , बिना किसी दबाव के , स्वेच्छा से .

कोई कठोर व्रत नहीं होते थे व्रत के बहुत उदार नियम होते थे इन की सीख मैं जैसे घर में बच्चों को देता वैसे ही अपनी विद्यार्थियों को भी देता और इसका बनस्थली परिसर में भी सर्वत्र निर्वाह होता . जहां तक मेरे घर की विरासत का सवाल है मेरे घर में वैष्णव भक्ति की परम्परा और मेरे ननिहाल में शिव भक्ति की चली आयी परंपरा से इसका सम्बन्ध रहा हो , उसकी तफसील में मुझे अभी नहीं जाना .

अब ये और और बातें बंद कर मैं मुद्दे की बात पर आवूं जो कहने का आज विचार बनाया है …


वर्ष 2003 ईस्वी .

------------------ अचानक ये पता लगा कि मेरा शरीर डायबिटीज की गिरफ्त में है और अब आगे से चिकित्सक की निगरानी में पथ्य और परहेज से रहना होगा . क्या खाया जाय क्या न खाया जाय ये भी डाक्टर और डाइटीशियन तय करने लगे . ये सब तो स्वाभाविक था पर इससे अधिक जो बताने लायक है वो ये कि मुझे दुःस्वप्न सताने लगे . मुझे अपने वो सब निकट रिश्तेदार याद आने लगे जो जीवन के अंत समय में या तो आंख की रौशनी गंवा बैठे थे या डाइबिटिक फुट के रोग के चलते एक एक पैर कटा बैठे थे .

ये केवल इस बात को बताने के लिए दोहरा रहा हूं कि जीवन में कैसी निराशा ने मुझे घेर लिया था और इसके कारण अपने कमिटमेंट भी पूरे करने में मैं आनाकानी करता था . भोजन में मिठास लुप्त हो गया था और यों भोजन में रुचि भी कम हो गई थी . ऐसे समय में उसी वर्ष गोकुल यात्रा ने मेरी सोच किस प्रकार बदल दी वही बताता हूं .


गोकुल यात्रा : निमित्त और अनुभूति 🌷

 --------------------------------------- इसे मैं एक सुखद संयोग ही कहूंगा कि हमारे साथी सुरेन्द्रपाल मिश्रा के बेटे प्रदीप का विवाह नियत हुआ था और बरात गोकुल जानी थी . मेरा विवाह में जाना पहले से तय था पर अब अपने बारे में नए रहस्योद्घाटन के बाद मैं साथ जाने में आनाकानी कर रहा था . मिश्रा जी मानने को कत्तई तैयार नहीं थे और आखिरकार साथ ले जाकर ही माने और इस प्रकार संभव हुई गोकुल यात्रा .

वैसे बृज प्रदेश की यात्रा मैंने पहले भी की थी अपने दोनों भाइयों के साथ पर इस बार साक्षात गोकुल पहुंचा था जो कृष्ण का गांव था और एक मांगलिक अवसर जिसमें अपने साथियों का साथ मिला था .

उस रात की बात याद करता हूं जब भोजन में अरुचि के चलते मैं जनवासे में अनमना सा लेटा था और सुरेन्द्र मिश्रा मेरी खोज खबर लेने आए थे , आखिर वो अपनी जिम्मेदारी पर मुझे साथ लिवा ले गए थे . वो वर के पिता थे , नेगचार के बीच भी समय निकाल कर आये थे मैंने कुछ नहीं खाया जानकर मुझे भवन के ऊपरी तल पर लिवा ले गए . वहां कढ़ाव में दूध ओट रहा था जो कुल्हड़ भर कर मुझे पीने को दिया गया . बगैर चीनी के भी गोकुल की गायों का दूध कितना स्वादिष्ट हो सकता था ये मैं उस रात ही जाना .

गोकुल की सडकों गलियों में मैं बारात के साथ भी घूमा और अगले दिन रवानगी के पहले भी . भवन , भित्तिचित्र , लोक व्यवहार और परस्पर अभिवादब में भी मैंने भगवान् श्रीकृष्ण को वहां लगातार उपस्थित पाया .

अधिक विस्तार में न जाकर मैं तो यही कहूंगा कि प्रदीप का विवाह और मिश्रा जी का साथ चलने का आग्रह निमित्त बन गए थे वास्तव में मेरा मन बदलने को मेरी सोच सकारात्मक बनाने को भगवान श्रीकृष्ण ने ही मुझे गोकुल बुलाया था उस बार .


मैं नहीं जानता कृष्ण इतिहास का विषय हैं या कवियों का घड़ा हुआ मिथक हैं पर गोकुल जाकर मैंने तो कृष्ण के रूप में एक वास्तविकता को अनुभव किया था .

बनस्थली के समय और साथियों को याद करते हुए ….

गोकुल यात्रा को याद करते हुए ..

सायंकालीन सभा स्थगित .।


संध्या वंदन 🌷

सुमन्त पंड्या 

सोमवार 29 अगस्त 2016 .

आज ये संस्मरण ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूं  .

भिवाड़ी   २९ अगस्त २०१७ .


Sunday, 25 June 2017

बोका की मां आवै ही छी ए  ..   : राजस्थानी बोध कथा :

राजस्थानी बोध कथा :


राजनीति में शिखर पुरुष की डेमोक्रेसी देखकर ही ये बोध कथा याद आई ।

क्या है बोधकथा ?

लीजिए ----


सासू मां का राज पाट तो पहले ही छिन गया था अब उनकी उपेक्षा भी होने लगी थी । खिन्न मनस्थिति में वो घर के बाहर चबूतरे पर जा बैठी और दिन भर बाट जोहती रही कि कोई न कोई तो उनकी सुध लेगा , उन्हें मनाने आएगा ।

दिन बीत गया , कोई न आया अब अंदर वापिस भी कैसे जाएं ?

जब कोई उपाय न सूझा तो घर की बकरी , जो जंगल से चर कर लौट आ रही थी , उसके सींग में अपना पल्लू फंसाकर कुछ इस तरह बुद बुदाती हुई घर में घुसी :


" बोका की मां मैं तो आवै ही छी ए , पण म्हारो मान कौनै ! "


ऐसा लग रहा था मानो बकरी उन्हें मनाकर घर के अंदर ला रही है ।

-------------------------------

नमस्कार ।

संध्या वंदन ।

इसे मेरी नान पॉलिटिकल पोस्ट के रूप में स्वीकार कीजिए ।


गुलमोहर , जयपुर ।

शनिवार २४ जून २०१७ ।


ब्लॉग पर प्रकाशित 

जयपुर 

२६ जून २०१७ ।

------------------------------------------


Friday, 12 May 2017

गुनाह बेलज्जत : गुड मॉर्निंग पोस्ट : दिल्ली से 😎

 गुनाह बेलज्जत : सुप्रभात पोस्ट 

            **************************************

एक ही झक्क है , सुबह उठना कॉफी पीना और फेसबुक पर कुछ न कुछ मांड देना जिस पर बात चले , संवाद चले और ऐसे लगे कि दूर दूर बैठे अपने लोग भी अपने साथ हैं , वे यहीं कहीं हैं और अपनी चौपाल जैसी लगी है .


तो इस में दिक्कत क्या है ? करो न अपने मन की !


दिक्कतें कई हैं , मन करता है पोस्ट के साथ फोटो हो तो बात पर ध्यान जाएगा और फोटो जोड़ी जाए पर कभी तकनीकी बाधाओं के चलते होते छते फोटो नहीं जुड़ पाती , कभी सेंसर बोर्ड की मनादी आ जाए और कभी कभी तो फोटो के मायने ही बदल जाएं . जैसे कल की ही बात परसों की तैयार की फोटो कल छानै सीक जोड़ी तो उसमें गुस्सा दीखने लगा . अब बोलो गुस्सा करना तो मैं कभी का छोड़ चुका पर अपनी ही शकल अपने से ही बिगाड़ ली , ये क्या बात हुई .


सेंसरबोर्ड यों तो बड़ाई भी करे औरों के सामने ," तुम्हारे काका " , " तुम्हारे फूफाजी "," तुम्हारे जीजाजी "

 करके लेकिन इधर अपुन को जब चाहे लताड़ देवे . कभी कभी तो स्मार्टफोन का स्पर्श भी दंडनीय अपराध बन जावे . ऐसे में प्रातःकालीन सभा की ये थोड़ी सी फुरसत ही बच रहे जिसका लिखा ही होवे ," जो बिंध गया सो मोती " ✍🏼


और ये नैट साथ देवे तो देवे न देवे तो लिखा उड़ जावे और किया कराया बट्टे खाते .

ऐसे में ये है आज का " गुनाह बेलज्जत पोस्ट स्टेटस " इसके साथ जोड़ूंगा ढूंढ ढांढ कर कोई एक सेल्फ़ी .

******

सुप्रभात.

समीक्षा प्रभार Manju Pandya

सुमन्त पंड्या .

@ आशियाना आंगन , भिवाड़ी

  शुक्रवार 13 मई 2016 .

******************

आशियाना आँगन भिवाड़ी में गए बरस लिखी थी ये पोस्ट । कमोबेश यही स्थिति आज है । आज दिन मुखर्जी नगर , दिल्ली से प्रकाशित कर रहा हूं ये पोस्ट । 

दिल्ली 

शनिवार १३  मई २०१७   ।

------------------------------------------

Wednesday, 10 May 2017

ख़ुश रहा करो  ! दिल्ली डायरी 

कल रात विनीत ने पूछा मेरी पार्क में संगत के बारे में तो मैंने बताया कि आनन्द तो आता है इन प्रातःक़ालीन सभाओं में । आज के ज़माने में ज़हां आदमी के पास फ़ुरसत का टोटा है कोई लोग तो हैं जो एक दूसरे की सुनते हैं इन सभाओं में ।


बातें तो बहुत तरह की होती हैं पर मुझे ये अच्छा लगा कि इन लोगों ने मेरी कही बातों को सुनने का समय दिया जो अब प्रायः राजनीति से इतर होती हैं हालांकि वो मेरा विषय रहा पढ़ने पढ़ाने का ।

अब सुनिए छोटी सी बात । अग्रवाल साब जो अमूमन सभा की सदारत करते हैं मुझे नेक सलाह दे बैठते हैं :

" ख़ुश रहा करो ।"

इस अच्छी सलाह को मानते हुए मैंने उन्हें भरोसा दिलाया कैना ख़ुश ही रहता हूं । तज़ुर्बेकार लोग बात में नुक़्ता ढूँढ ही लेते हैं उनने भी दूंढ लिया , बोले :


" ख़ुश रहते तो ऐसे न होते ?"  


उन्होंने दाएँ बाएँ ऊँगली हिलाकर मेरी दुबली काया को इंगित किया । मैंने मुद्दा घड़ लिया और संगत के विचारार्थ रख दिया कि अग्रवाल साब ख़ुशी और मोटापे का अनिवार्य सम्बन्ध मान बैठे हैं । 


इस फ़्रण्ट पर तो मात खाए बराबर ही थी अपनी स्थिति कि एक उपाय से हो गई मेरी बचत । पार्क के कुछ एक चक्कर लगाकर जीवन संगिनी वहाँ आ निकली मुझे साथ लेने को और मैंने सबसे सशक्त तर्क इस्तेमाल कर दिया , कहा :


" आप देखते नहीं खुशी तो मैं साथ लेकर घूमता हूं !"

मेरी इस बात को सुनकर सब कोई बहुत ही ख़ुश हुए और जीवन संगिनी का सबने स्वागत अभिवादन किया ।


जो संवाद हुआ वही कहा है । अब अपडेट ये है कि वहां न जा पावूं तो अगले दिन ये लोग कहते हैं कि कल आपको मिस किया ।


जितने दिन दिल्ली में हैं मिलता रहे पार्क में जाने का अवसर , ये ही कामना है ।


दिल्ली 

गुरुवार ११ मई २०१७ ।

संलग्न : बीती रात का हमारा फ़ोटो बच्चों  साथ ।

-----------------------------


Monday, 13 February 2017

मिली के नहीं ' गर्ल फ्रैंड ' ...? 😊

मिली के नहीं आपकी गर्ल फ्रेंड ?

वैलेंटाइन डे पर विशेष . ~~~~~~~~~~#sumantpandya

ये सवाल पूछा बड़े धीर गंभीर महेंद्र भाई साब ने  जब हम लोग नई दिल्ली के होटल उप्पल में डायनिंग हाल से बाहर आ रहे  थे और  मैं  सवाल का आगा पीछा  न समझ पाने से असमंजस में था कि क्या जवाब दूं . भाई साब थोड़ा ऊंचा सुनते हैं  इसलिए  जुबान से प्रतिप्रश्न करने के  बजाय मैंने ललाट पर सलवट डाले और  जताया कि महेंद्र भाई साब क्या ? पूछ रहे हैं आखिर पता तो चले . वो बोले  : " अभी आप कह रहे थे न कि मेरी गर्ल फ्रैंड के पास  जा रहा हूं ."  तब जाकर समझ  में आई बात  और मैं बोला कि भाई साब मैंने  " गवर्नमेंट " बोला था जिसे आप कुछ और समझ बैठे .

असल में महेंद्र भाई साब और भाभीजी डायनिंग टेबल पर पहले से बैठे थे और मुझे भी उन्होंने साथ आ बैठने का न्योता दिया था  उस वक्त जब मैं ब्रेकफास्ट के लिए अपनी  प्लेट लगा कर टिकाव का स्थान  खोज रहा था  और मैंने कहा था ," उधर गवर्नमेंट आगे गई है मैं उसे खोज रहा हूं ."भाभी जी ने ठीक  सुना  था और भाई साब ने कुछ और सुन लिया था . भाभी जी ने जो ठीक  सुना  था उसकी उन्होंने तस्दीक भी कर  दी .

कौन गवर्नमेंट ?

जब तक अम्मा थी  हम दो भाई अम्मा के लिए ' गवर्नमेंट ' शब्द का प्रयोग कर लिया करते थे  , अम्मा का कहा शासनादेश के समान मानते  जो थे . अम्मा  न रही तो भी हम कोई शासन  विहीन परिवार न रहें , छोटे एकांश में यह पद जीवन संगिनी को मिल गया .इतना स्पष्टीकरण काफी है यह बताने को कि मैं इस उमर में अपने को गवर्नमेंट सर्वेन्ट  क्यों कहा करता हूं

उस दिन बात साफ़ हो जाने के बाद भी दिन में दुबारा मिलने पर महेंद्र भाई  साब  खेद जताते रहे कि  ऊंचा सुनने की वज़ह से वो  मुझे कुछ उलटा कह बैठे और इस पर मेरे बड़े भाई नरेंद्र कहने लगे "  : खेद किस बात का ? ईट्स ए  कॉम्प्लीमेंट , कि इस उमर में वाइफ किसी की गर्ल फ्रेंड हो ! "

मैंने भी इस बात को समर्थन दे दिया और कहा : " आपने जो कुछ कहा था बहुत सही कहा था , मेरी तो गवर्नमेंट ही मेरी गर्ल फ्रेंड है ."

गवर्नमेंट ; Manju Pandya

सुप्रभात

Happy Valentine's Day .

सुमन्त

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर . जयपुर . 14  फरवरी 2015 . #गवर्नमेंट