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Monday, 12 November 2018

ये घंटी क्या है 🔔🔔 ?

🔔 ये घंटी क्या है ? : भिवाड़ी डायरी 📙

**********

इधर जब से भिवाड़ी आए हैं हम लोग बाज पोस्ट में , न तो कमेंट में मैं ये घंटी की चिकसाणी ( निशान ) बणा देता हूं जिससे मेरे लिखे की पिछाण रहवे . आज ये ही सवाल उठाता हूं कि ‘ ये घंटी क्या है ?’


पहले एक बात 

-------------- ये एक अध्यापिका की बताई बात है जब वो एक प्रशिक्षण के लिए गईं तब हवाई जहाज से यात्रा करके आईं . पहली उड़ान का उनको कैसा अनुभव हुआ वही उन्होंने अपने रोचक अंदाज में बताया था , शेष सन्दर्भ छोड़कर सीधे मुद्दे पर आते हैं :


" जब प्लेन उड़ने लगा तो जाने कैसे कैसे हुआ ! पहले ऐसे ऐसे हुआ , फिर वैसे वैसे हुआ , जाने कैसे कैसे हुआ ! "


बस लगभग ये ही बात तो अपणे साथ है पहले ऐसे ऐसे होता है , फिर वैसे वैसे होता है , जाणे कैसे कैसे होता है और सुबह सुबह ये घंटी बज जाती है अपणे आप और नींद खुल जाती है वो भी अपणे आप .

तो मान लीजिए ये सिद्धांत :


" सुबह की जगार का प्रतीक है ये घंटी . 🔔🔔"


ये अपने आप ही बजती है , अंदर से बजती है और मैं सुबह उठ जाता हूं बस इत्ती सी बात है .

फिर सुबह सुबह की एक और टेक है :

" Good morning & private coffee done @ आशियाना. 🔔"


ऐसे संदेसे मैं चारों ओर भेजता हूं , ये ही मेरे जन जागरण के सन्देश होते हैं . दूर दूर से जगार के संकेत और सन्देश मिलने लगते हैं . जो किसी दिन इसमें चूक जाऊं तो लोग ये सवाल करने लगते हैं :

" Private coffee not yet done ? "

इस प्रकार ये घंटी और कॉफी का भी निकटवर्त्ती सम्बन्ध है .

तो सुबह सुबह के ये दो काम हैं :

१. घंटी बजती है . 🔔

२. कॉफी बणती है .☕️

और यहीं से होती है अपनी सोशल मीडिया पर उपस्थिति दर्ज .

आज यही प्रातःकालीन सभा का प्रस्थान बिंदु है ।

अभी हाल के लिए सभा स्थगित ….।

नमस्कार 


सुमन्त पंड्या .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

शुक्रवार ३ फरवरी २०१७ .

आज एक लम्बी खोज के बाद ब्लॉग पर प्रकाशित     @ जयपुर   १३ नवम्बर  २०१८ ल

Tuesday, 4 September 2018

अभी तो कुछ पढ़ा नहीं .

" अभी तो कुछ पढ़ा नहीं .....और एक पारी समाप्त भी हो गई ."


कल सोचा था शिक्षक दिवस पर शिक्षा जगत का पहला अनुभव साझा करूंग़ा पर सारा दिन राम रामी में ही बीत गया . दस बजने आए मेरे फ़्यूज होने का समय आ गया अब कुछ तो क़हूं रिटायर होने से पहले .


अक्षर ज्ञान और जोशी बाबा :

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चार बरस की उमर में जोशी बाबा के पास ले जाया गया था घर के ठीक सामने जंगजीत महादेव की छत पर ज़हां जोशी बाबा पढ़ाया करते थे . उन्होंने ही पूरी वर्णमाला और आरम्भिक गणित सिखाई . ये कक्षा एक मंदिर की छत पर जरूर होती थी पर ये कोई धार्मिक शिक्षा नहीं थी , सामान्य शिक्षा ही थी .

गए दिनों जीजी ने मुझे बताया , जीजी को तो मेरा बचपन याद है ही , कि अक्षर बनाने के लिए मेरे हाथ में पेंसिल किसी को सहारा देकर पकड़ना नहीं पड़ता था जोशी बाबा मुझसे ख़ुश रहते थे .


मंदिर की छत पर जाने आने के लिए थोड़ी ऊँची और बेढ़ब सीढ़ियाँ थीं , मैं शारीरिक रूप से कमज़ोर बच्चा था , और बच्चे ज़हां कूदते फाँदते ये सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आ जाते जोशी बाबा मेरा तो विशेष ख़याल रखते और आख़िर में जब वे छत से उतरते तो मुझे उनके हाथ की ऊँगली पकड़कर नीचे आना होता .

कक्षा का समापन प्रतिदिन समूह के साथ पहाड़े बोलकर ही होता .


इस तरह मुझे पहला दिन और पहली कक्षा आज तलक याद है .


रात्रि क़ालीन सभा अनायास स्थगित ....।।।


भिवाड़ी 

५ सितम्बर २०१७ .

गए बरस की आज की स्टेटस ब्लॉग पर साझा   @ जयपुर  ५ सितम्बर  २०१८. 



Sunday, 12 August 2018

संसद का पराभव : वादविवाद प्रतियोगिता .

वाद विवाद प्रतियोगिता :  संसदकापराभव


" पक्ष औ प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं ,

बात इतनी है कि कोई पुल बना है . "

                   - दुष्यंत कुमार .


कल परिस्थिति ने बहुत अनुमति नहीं दी इस लिए संसद की पूरी गतिविधि तो सजीव नहीं देख पाया पर रात मीडिया पर जो झलकियां देखीं उनसे कोई ख़ुशी नहीं हुई . 


कई दिनों के बाद तो संसद बैठी बात करने को और बात हुई भी कल तो कैसी कैसी बातें हुईं वो मुझे दोहराने की आवश्यकता नहीं . भाषण कला में तो सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों अपने को पारंगत दिखा रहे हैं पर मूल प्रश्न से सब कोई कन्नी काट रहे हैं .


ऐसा लगता है कि सांसद सामने आए सवालों को टाल कर भोली जनता को रिझाने के लिए संसद के मंच का उपयोग करने लगे हैं .


संसद के पराभव को लेकर आम नागरिक की चिंताएं वाजिब हैं .

ये वे ही चिंताएं जो उस समय से ही शुरु हो गईं थी जब जेम्स ब्राइस ने दो खण्डों में मॉडर्न डेमोक्रेसीज नामक कृति लिखी थी . अब तो वे चिंताएं बढ़ने लगी हैं .


पहले संसद में कैमरा नहीं जाया करता था , अब कैमरा जाता है तो सारा देश देख रहा है कि ये हो क्या रहा है ?


अभी अभी मुझे बताया गया कि आज लैफ्ट हैँडर्स डे भी है . इस अवसर पर अपने सभी बांये हाथ वाले साथियों को सलाम करता हूं .

मैंने तो जो सूझा बांये हाथ से ही मांड दिया है अभी के लिए .

सह अभिवादन : Manju Pandya


आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

13 अगस्त 2015.

लैफ्ट हैंडर्स डे .

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण  १३ अगस्त २०१८.


Wednesday, 8 August 2018

बाज़ार से निकला हूं ख़रीदार नहीं हूं : जूता पुराण 

बाजार से निकला हूं खरीदार नहीं हूं .....


     ये तो कभी सुनी हुई ग़ज़ल का मतला है जो वैसे ही याद आ गया सो शीर्षक के रूप में मैंने डाल दिया क्योंकि बात बाजार की करने जा रहा हूं . जाने सही भी बैठेगा कि नहीं , अब आगे देखी जाएगी .

हमारे कंवर साब भारत भूषण जी ने एक बड़ी मार्के की बात बताई थी वो आज जन हित में प्रकाशित किए देता हूं :


" ..... जब आप आज के जमाने की किसी दूकान में कदम रखते हैं तो दूकानदार पहले पहल आपके जूतों पर नजर डालता है कि आपने जूते कितने मंहगे पहने हैं . अगर आपने मंहगा जूता पहना है तो यह तय हो जाता है कि आप लायक खरीदार हैं. "


गरज ये है कि जूते और बाजार का बड़ा नजदीकी रिश्ता है .

अपना आलम ये है कि मंहगा जूता पैर में काटता है . जूता बेचारा तो अपनी जगह है जूता नहीं पैसा काटता है , ये कहना ज्यादा सही होगा .


अंगरखी और पगरखी .

       - आज भी मुझे ये अंगरखी और पगरखी का पहनावा बहुत आकर्षित करता है और मैं अपने बाबा मदन जी महाराज का चित्र देखकर अभिभूत हो जाता हूं कि क्यों अपन अपना पहनावा भूल गए ,इस पश्चिमी वस्त्र विन्यास के पिछलग्गू हो गए . क्यों इस बाजार में आ गए जिसने एक से एक बढ़िया उपाय किए हुए हैं जेब खाली करने के .

इस जूतों से सजे बाजार में बच्चे नए जूते दिलाने को आमादा रहते हैं और मैं कह पड़ता हूं :

" अब मुझे जूते और दिलाओगे क्या ?"


जूतों का व्यापार :

- भिवाड़ी में मुझे एक सज्जन जूतों का व्यापार करते मिले , उनकी बिरादरी का नाम कुछ ऐसा था जो जूतों के व्यवसाय से मेल नहीं खा रहा था और इसी बेमेल बात की मुझे वो कैफियत दे रहे थे , उन बेचारों को मैं क्या समझाता कि मैं तो हाथ के कारीगर की इज्जत करता हूं चाहे वो बनस्थली का पोखर हो या जयपुर में मेरे पड़ोस का मनसा राम .

पोखर से तो अब जाने कब मिलना होगा पर जयपुर पहुंच कर मनसा राम का साक्षात्कार प्रकाशित करूंगा.

पर चलो ये बदलाव तो आया नए जमाने में कि जो बिरादरी के नाम पर अपने को बड़े मानते थे वे भी जूता व्यवसाई बन गए .

बात थोड़ी अटपटी और अस्पष्ट तो रही पर आज का एकालाप इतना ही 

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

समीक्षा : Manju Pandya

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

9 अगस्त 2015 .

Photo credit . Pragnya Joshi

ब्लॉग पर प्रकाशन  ९ अगस्त २०१८.

सप्लीमैण्ट :

पोस्ट तो २०१५ में लिखी थी भिवाड़ी में , फिर २०१६ में जोड़ी थी एक भूमिका , आज फिर से साझा और साथ में ब्लॉग लिंक :


आशियाना से सुप्रभात ☀️

Good morning .


अभी फेसबुक खाता खोलने पर मेरा यंत्र बीते समय की ये पोस्ट दिखा रहा है जिससे कई एक पुरानी पुरानी बातें याद आने लग गईं . आज उन में से कुछ एक बातें यहां साझा किए देता हूं .


  पैरों में ये देशी जूता जोड़ी मेरे लिए बनस्थली में रहवास की यादगार है , ख़ास तौर से उस दौर की जब रवीन्द्र निवास में मेरे घर के आस पास बबूल का जंगल हुआ करता था और इस बात का खतरा बना रहता था कि नाजुक जूता या चप्पल पहन कर अगर घर के बाहर कदम रखा तो पैर में गहरा शूल चुभ जाएगा .. । ऐसी जूता जोड़ी ने मेरे पैरों की हमेशा रक्षा की .


2

हालांकि ऐसी जूता जोड़ी पहनने वाला नव सभ्य समाज में गंवार समझा जाएगा पर मुझे हमेशा से ही गंवार समझा जाना पसंद है बनिस्पत हाई सोसाइटी का समझे जाने के .

आज जब आयातित जूतों से बाजार अटा पड़ा है इंसान की हैसियत जूतों से ही तय होती है . कभी कभी तो मुझे लगता है जूता और पैसा पर्यायवाची हैं .


3

एक हल्की फुल्की : 😊

--------------------

भाभी जी को चप्पल में घूमने जाते देख श्रद्धा ने कहा था :


" मैं ... आप को जूते दिलाऊंगी 😊"


मेरी जैसी आदत मैंने तो इस पर यही टीका की


".... के अब ये ही कसर बाकी रही है 😊......."


4 .


अब मुझे अधिक कहने की आवश्यकता नहीं कि मुझे मंसाराम से क्यों इत्ता लगाव है .

अगर देश की राजनीति का ये ही आलम रहा तो आगे से ऐसी देशी जोड़ी तो आपको देखने को न मिलेगी कहे देता हूं .

मेरे थोड़े कहे को अधिक समझना .


5.


उमड़ घुमड़ कर कई बातें याद आ रही हैं पर प्रातःकालीन सभा के लिए उपलब्ध समय बीता जा रहा है . आगे जारी रहेगी #बनस्थलीडायरी और #स्मृतियोंकेचलचित्र . अभी भी पोस्ट लिखकर जी हल्का नहीं हुआ और चलाऊंगा बात आगे .

नौ अगस्त के ऐतिहासिक महत्त्व और शहीद दिवस को याद करते हुए ...

शहीदों को नमन.........

---------------

--सुमन्त पंड्या .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

मंगलवार 9 अगस्त 2016 .

@जयपुर ९ अगस्त २०१८.


Thursday, 2 August 2018

सुबह का अपडेट : ठाले बैठे .

आज सुबह का अपडेट :


सुबह उठकर क्या देखता हूं कि इंटरनेट तो है ही नहीं मोबाइल की भी बैटरी शून्य हो गई है और कोई ज़रिया सोशल मीडिया से संदेश अवाक जावक का बचा नहीं । अब न तो न सही , हो ओ अपने क्या है । अब कुछ न कुछ ऑफ़ लाइन लिखा जाए जो काम आए तो आए और न आए तो कुछ अभ्यास किया ये संतोष तो होएगा कम से कम ।


अब स्मृतियों के चलचित्र 

जब मैं पहली बार जोशी बाबा के पास पढ़ने गया था , मेरे लिए ये ही पढ़ाई की शुरुआत थी , तब सलेट और खड़िया की पेंसिल साथ लेकर गया था । उस घड़ी का विस्तृत संस्मरण लिखा जाना अभी बाक़ी है । आज अब नए ज़माने में ये जो आई पैड मिनी मेरे हाथ में है , ये है अब नए ज़माने की सलेट और अब अपण हैं इस विधा के नव साक्षर । जब तक सामग्री डिस्पैच न हो जाए ख़ूब लिखो और ख़ूब बुझाओ । लिखे जाओ , चाहो तो रखो , चाहो तो मिटाओ । नए ज़माने की इस सलेट पर लेखन अभ्यास चलता रहे , चलता रहे और क्या ?


फिर वही बात : वर्ड में लिखना है .

     पहले भी शाणे लोगों ने मुझे ये राय दी थी पर तब मैं मूरख़ समझा नहीं था ।  

क्यों न समझा था ?

ऐसे छोटे छोटे अक्षर बण जाते जो मुझे आसानी से दीखते ही नहीं । अब जब ट्राई किया तो पता लगा के उस लिखे को तो ज़ूम करके फ़िट टू साइज़ किया जा सकता है । अब तो कोई दिक़्क़त ही नहीं । हो गई दिक़्क़त दूर । पर लिखने को कोई बात , कोई क़िस्सा भी तो होना चाहिए तब ही तो बने कोई इबारत ।  

मैं कोई क़िस्सा गढ़ता नहीं । जो भी कोई घटना होती है , जिसका मैं भागीदार या साक्षी होवूँ , उसी को बयान कर देता हूं और ये ही मेरी किस्सागोई होती है । मुझे क़िस्सा कहकर अच्छा लगता है और अगर आपको क़िस्सा पढ़ सुनकर अच्छा लगता है तो यही मेरा परम सौभाग्य है ।

हालांकि अभी कोई क़िस्सा नहीं जुड़ा इस पोस्ट में पर क़िस्सों का ज़िक्र तो आया ही है कम से कम । क़िस्से भी लिखूंग़ा वर्ड फ़ारमेट में और जोडूंग़ा अपनी प्रोफ़ाइल पर ।


अब ये ठाले बैठे आफ लाइन लिखते रहने में हुई तैयार एक इबारत । अब इसे सलेट पर लिखा मानकर बुझाणने से तो क्या मतलब है । किसी को दिखेगा तो ये ही तो समझेगा कैना लिखने की प्रैक्टिस की है और लिखना सीख लिया है जैसे तैसे ।


अब जब मिलेगा इंटरनेट

तब होगी ये पोस्ट डिस्पैच 


आशियाना आँगन , भिवाड़ी 

गुरुवार ३ अगस्त २०१७। 

ब्लॉग पर प्रकाशन  ३ अगस्त २०१८. 


Wednesday, 1 August 2018

फ़्रैंडशिप डे :भिवाड़ी डायरी 

आज का एजेंडा ::फ़्रैंडशिप  डे 

 

   आज जैसे ही फेसबुक खोला एजेंडा तो फेसबुक ने ही सुझा दिया कि आज " फ्रेंडशिप डे " है . और तो और फेसबुक ने सारे फेसबुक वासियों की ओर से मेरा आभार भी व्यक्त कर दिया इत्ता अच्छा दोस्त होने और दोस्ती निभाने के लिए .


आप सब जहां कहीं भी बैठे हैं, जो कोई भी हैं आप सब को मेरा सलाम पहुंचे . जो जाग गए हैं, जाग रहे हैं उनको भी सलाम , जो सो रहे हैं और आज देर से उठने का विचार कर के सोए हैं उन को भी सलाम , उठेंगे तब देख ही लेवेंगे .


फेसबुक ने ये काम तो बड़ा बढ़िया किया है कि सब कोई को इस प्लेटफॉर्म पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां राम रामी हो जाती है . ये ग्रेट लैवेलर भी है जहां सब कोई को बराबर का दर्जा प्राप्त है . बाकी इस बाबत एक पोस्ट मैं लिख ही चुका हूं जिसे शीर्षक दिया था ," ये फेसबुक की दोस्ती ?" आप ने अब तक न देखी हो तो देख लेवें , देख ली तो फिर बात खतम आप तक पहुंच ही गई मेरी बात .


आज इस मौके पर इतना जरूर कहूंगा कि इस माध्यम का अच्छा इस्तेमाल करें , फर्श गंदा न करें तो ठीक रहेगा वरना तो भले लोग इसे छोड़कर जाने लगेंगे ये कोई अच्छा लगेगा क्या ?


कभी कभी दूसरे को लज्जित करना और उसकी खिल्ली उड़ाना तो बड़ा आसान लगता है पर उसकी बात समझना और उसे अपनी बात समझाना मुश्किल लगता है . न जाने क्यों लोग पहला विकल्प चुन लेते हैं .

अपना तो यह मानना है कि हर बात शान्ति पूर्वक कही जा सकती है , एक बार कहकर तो देखें .


कल एक अहिन्दी भाषी दोस्त कह रहे थे कि उनके चार पांच सौ दोस्त तो बन गए पर वो हैं बड़े कन्फ्यूज्ड क्योंकि लोगों ने अपनी पहचान उल्टी सीधी दे रखी है . अब पहचान छिपाने के पीछे जो कारण होंगे वो तो वो जाने उसकी वजह मैं नहीं जानता पर इतना स्पष्ट कर देवूं कि मेरी अपनी पहचान में कोई दुराव नहीं है . मैं तो जो हूं वही हूं और यही कहने का प्रयास करता हूं कि मेरे कोई सुरखाब के पर नहीं लगे हुए हैं .


मर्यादा में रहकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मैं समर्थन करता हूं .

सुबह हो गई , अब प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

सह अभिवादन : Manju Pandya.

आशियाना  आंगन , भिवाड़ी.

2 अगस्त 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशन २ अगस्त २०१८.


Saturday, 28 July 2018

आप भी झेलो : भिवाड़ी डायरी .

सोने से पहले आज की पोस्ट :


सच क़हूं सब तरफ़ अथाह ज्ञान बिखरा पड़ा है और लोग सोशल मीडिया पर विभिन्न उपक्रमों को माध्यम बनाकर आई गई चीज़ को इधर उधर ठेलने में लगे हैं ।   

लोग बग़ैर कुछ देखे परखे संदेशों को अग्रप्रेषित करते रहते हैं । मेरे लिए तो इन आए संदेशों को झेलना मुश्किल होता जा रहा है । सयाने लोग एक से ज़्यादा फ़ोन नम्बर रखते हैं और वाट्सएप नम्बर हर किसी को देते भी नहीं । मूर्खों के सम्प्रदाय , याने मेरे संप्रदाय , में ऐसा नहीं होता । जिसे नम्बर मिल गया वो अपना बचा क़ुचा ड़ेटा जाने क्यों मुझपर ही न्योछावर कर देता है ।  

जो देखो जो कोई ग्रुप बना लेता है और महाराज ज़माने भर के चले संदेश इधर आ धमकते हैं । कुछ मामलों में तो मुझे यहां तक शक होता है कि मेजने वाले ने इसे ख़ुद भी बाँचा है के नहीं ।


अब सोशल मीडिया पर बने रहना है तो ये सब तो उसके साथ जुड़ा हुआ नफ़ा नुक़सान दोनों है जैसा भी आप समझो ।

और आगे करेंगे बात इस बाबत , अब इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही है ।


भिवाड़ी

२८ जुलाई २०१७ ।

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण : २८ जुलाई २०१८.

Tuesday, 24 July 2018

ये फ़ेसबुक की दोस्ती ? कल और आज .

ये फेसबुक की दोस्ती ?

     कुछ समय पहले एक मनोविद् को टी वी पर बोलते सुना था कि कुछ एक मनोरोगों के कारणों और लक्षणों में से एक आज के समय में ये " फेसबुक" भी गिनाया जा सकता है .

बहुत हद तक सही तो कह रहे थे मनोविद् . आप उन्हें साइकेट्रिस्ट के रूप में जानते हैं , उस नाम से जान लीजिए .

सर्वथा निजी अनुभव :

        जब से मैंने फेसबुक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है मुझे दोनों ही तरह के अनुभव हुए हैं . बहुत से अनजान लोग मिले और वो ऐसे बन गए कि लगा ही नहीं ये तय भी हो गया कि उनको तो मैं बहुत पहले से जानता हूं . यहां कुछ के नाम मैं नहीं गिनाऊंगा क्योंकि इससे दूसरों का मोल मैं कम नहीं करना चाहता . इस मंच पर लगता है कि हम लगातार साथ साथ हैं . हमें एक दूसरे की गतिविधि का पता रहता है और ये अच्छा है . 

पर ऐसा कर के जमाने भर को हम वो सब बताए दे रहे हैं जिसे सब कोई को बताने की कोई जुरूरत नहीं है . हमारी सारी सूचनाएं विश्व डेटा बाजार में बिकाऊ हैं , मजे की बात ये है कि इन्हीं सूचनाओं को पाकर ठग हमें ठगने के उपाय कर रहे हैं हम उतने जागरूक नहीं हैं जितना हमें होना चाहिए .


भोले दोस्तों के बारे में :

इस बारे में अभी भी स्पष्ट नहीं हूं कि दोस्ती के इस दायरे के बारे में क्या निर्णय लेवूं . क्या इसे आगे बढ़ने दूं ? क्या इसे यही रोकूं ? या कि छटनी कर डालूं , और घटाऊं इस दायरे को ? लौह आवरण की नीति का ही हिमायती होता तो बच्चों के सिखाए से फेसबुक पर आता ही क्यूं ?


सवाल का सबब :

      - बहुत कुछ प्रोफाइल देखकर दोस्ती कबूल करूं . वो भोले लोग जब तब चैट पर आ जावें और मुझसे वो ही , वो ही सवाल पूछें जिनके उत्तर मेरी प्रोफाइल पर दर्ज हैं . तभी तो मैं नें " चोरंग्या" कांसेप्ट पर पोस्ट लिखी थी .

अधिकांशतः फेसबुक के माध्यम से मिले दोस्तों से दोस्ती के साथ साथ मुझे वरिष्ठ नागरिक सम्मान भी मिला बोनस के रूप में लेकिन कोई कोई भोले और नादान मुझे मुझे अपना सा ही समझ लेवें . उनसे तो मैं यही कहूंगा :

" भाई मेरे, मेरी प्रोफाइल फोटो तो देख ली होती . क्या मैं आपको बराबर का लगता हूं?"


 अपनी छात्राओं को संबोधित :

       आप के / तुम्हारे लिए तो ये खुला निमंत्रण है . मेरी फ्रोफाइल पर जब चाहो उपस्थिति दर्ज करवाओ जैसे मेरी क्लास में आया करती थी . बल्कि कभी कभी तो ये कहने का मन करता है :


" बाहर क्यों खड़ी हो , क्लास में आ जाओ ."

अपनी छात्राओं से तो कोई भी संवाद करना मुझे हमेश ही अच्छा लगता है .

अंत में सभा स्थगित करने से पहले यही कहूंगा :

" फेसबुक पर ठहरता हूं अभी हाल तो , बाकी आगे देखेंगे क्या करना है ."

प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

सुप्रभात .

सह अभिवादन : Manju Pandya.

 आंगन, भिवाड़ी .,26 जुलाई 2015.

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण   २६ जुलाई २०१८.

Saturday, 21 July 2018

लैफ्ट हैंड़र : भाग तीन .

लैफ्ट हैंडर : भाग तीन .


    ये दुनियां दांये हाथ को सीधा और बांए हाथ को उल्टा कहती आई है उससे ही बात तो कुछ कुछ साफ़ होती ही है मुझ जैसों के बारे में .

अब मेरा तो जो कुछ होना था हो लिया इस नाते पर बात आगे की बताता हूं जब परिवार में एक बांए हाथ वाला और प्रगट हो गया .

छोटा वाला जब बनस्थली में स्कूल जाने लगा तब की बात बताता हूं .

दो बरस तक तो सब कुछ ठीक ठाक रहा . तब वहां बड़ी अच्छी सोच थी कि शिशु कक्षाओं में उसे खेलने खाने में ही व्यस्त रखा गया और कोई कलम हाथ में नहीं पकड़ाई गई . अच्छा ही रहा कि खुद अपने हाथ से खाना खाना सीखा वरना तो घर में उसकी मां उसे खिड़की में बैठाकर , ध्यान बंटाकर खाना खिलाया करती थी . मुसीबत तो तब आई जब हाथ में कलम पकड़ने की उमर आई .

. एक दिन वो घर आकर बोला :

" पापा , जीजी * कहती है कि पेन्सिल हमेशा इस हाथ में पकड़ो !"

उसने ऐसा कहकर अपना दांया हाथ बताया .

* बनस्थली में तब टीचर को जीजी कहने का चलन था .

इन जीजी के बारे में भी बताता चलूं . वे अपने सेवाकाल के अंतिम दशक में कार्यरत थीं और अवस्था में मुझसे बहुत बड़ी थीं .

वैसे ही एक बात और याद आती है जो बताऊं कि इनकी बेटी सत्तर के दशक में मेरे पास एम ए कक्षाओं में पढ़ा करती थी . तब एम ए परीक्षा के बाद वाय वा भी होता था और ये लड़की इतना धीरे बोलती थी कि तैयारी के दौरान ये सुझाव आया कि इनके लिए तो एक माइक लगवा देना ही ठीक रहेगा . खैर तब हम लोग टीचर की भूमिका में थे . अब मैं संरक्षक की भूमिका में था और ये जीजी टीचर थीं . खैर. .... ये बात तो सिर्फ इस लिए जोड़ी कि मैं ये बता सकूं कि कितनी बड़ी थी जीजी . उनके विचार भी बहुत पक्के थे जो मुझे मिलने पर और स्पष्ट हुए .

जब इस प्रसंग में मैं उनसे मिला तो जो पहली बात उन्होंने कही वो थी :

" आप भी इसे समझाओ कि ये दांए हाथ से लिखना सीखे."

हां, तब तो लिखता क्या था, लिखना सीख ही तो रहा था . उनकी मान्यता थी कि ये आदत यहीं से सुधारी जानी चाहिए .

और मैंने यह कहकर अपनी असमर्थता जताई :

" मैं इसे भला क्या समझाऊं , मैं तो खुद बांए हाथ से लिखता हूं "

और भी बातें हुई , घर लौटकर भी बात हुई इस बारे में पर वो आगे आएंगी .

ये बात अभी और चलेगी ......

पिछली दो कड़ियों पर आप सब ने समर्थन दिया उसके लिए आभार व्यक्त करते हुए...

प्रातःकालीन सभा स्थगित .. 

समीक्षा और समर्थन : Manju Pandya.

आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

बुधवार 22 जुलाई 2015 .


ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण  २२-०७-२०१८.

Thursday, 19 July 2018

लेफ़्ट हैंडर : भिवाड़ी डायरी 

लेफ्ट हैण्डर :

समय कम है . आज बात की शुरुआत ही करे लेते हैं.

उस दिन जब जयपुर में शिवाड़ एरिया के छोर पर होमियोपैथी दवा की दूकान के नीचे मैं दवा खरीदने को खड़ा था तो मुझे देखकर एक नवयुवक काउंटर से एक सीढ़ी उतर कर आया और मुझे ऊपर ले लेने को उसने अपना हाथ बढ़ाया . ये उसका बांया हाथ था .

 ये मरी * आर्थराइटीज के चलते कभी कभी सामने वाले को लग जाता है कि सीढ़ी चड़ने के लिए 

इसे सपोर्ट की जरूरत है . यही उस दिन भी हुआ . कुछ कुछ अंदाज तो पहले ही लग गया था पर जब उसी युवक ने बांये हाथ से कलम पकड़ कर दवा का बिल भी बनाया तब तो पक्का ही हो गया कि वो भी मेरी तरह लैफ्ट हैण्डर ही है और इस तरह एक अपनत्व बन गया मेरे और उस बमुश्किल बीस साल के युवक के बीच . 

मैंने उससे पूछा :

" अरे तू भी लैफ्ट हैण्डर है ?

तुझे किसी ने सताया तो नहीं इस बात पर कि तू बांये हाथ से लिखता है ?

ये सारी दुनिया दांए हाथ वालों की है !"

उत्तर मुझे चोंकाने वाला था . वो बोला :

" सताया न अंकल , सबसे पहले तो बचपन में ही घर वालों ने दांये हाथ से लिखने पर जोर डाला , स्कूल में भी वही सब कुछ हुआ . कुछ एक काम मैं दांए हाथ से भी करने लगा पर बांए हाथ से लिखने की मेरी आदत न छूटी . "

इस दुनियां में ये लैफ्ट राइट डिवाइड बड़ी जबरदस्त है .

इसके चलते तो एक बार बनस्थली में संरक्षक के रूप में मैंने पेशी भी झेली और मैं " नॉट गिल्टी " प्लीड नहीं कर पाया वो कहानी रोचक भी है और भावुक कर देने वाली भी पर आज समय कम है , बहुत से सूत्र पिरोने पड़ेंगे . बात थोड़ी लंबी चलेगी .

प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित ........

* मरी ही कहा है मेरी नहीं .

सुप्रभात .

सह अभिवादन : Manju Pandya.

भिवाड़ी . राजस्थान .

20 जुलाई 2015

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण   २० -०७-२०१८ .

Edit


Tuesday, 17 July 2018

कहो तो सही कहां जाना है : भिवाड़ी डायरी 

मैं मूर्ख हूं :


  आज की पोस्ट वास्तव में पूरक पोस्ट है , वो क्या कहते हैं सप्लीमेंट्री पोस्ट कह लीजिए . पिछली एक पोस्ट में इस प्रसंग को बीच में छोड़ना पड़ा था क्योंकि बात की दिशा तब कुछ और थी और ये बताने लगता तो ट्रैक बदल जाता . तो आज सही . प्राइवेट कॉफी हो चुकी और अब ये बात .

हुआ क्या था ?

             - मैं लिफ्ट में अकेला था . ग्राउंड फ्लोर पर दरवाजा ज्यों ही खुला मेरी ही उमर के से एक सज्जन अंदर आए और मुझे जल्दी थी ये बताने की कि मैं तो मूर्ख हूं जो मैं ने उन्हें बताकर जी हल्का किया . जल्दी से बात को स्पष्ट किया कि माजरा क्या था क्योंकि संवाद लंबा चलाने के लिए अधिक समय न उनके पास था और न ही मेरे पास . फिर भी भलमनसाहत उनकी कि ये बात वो मानने को तैयार ही नहीं थे और मेरे बरअक्स मुझे ही डिफेंड कर रहे थे , बोले :

" मैं समझा , लिफ्ट ऊपर से आई है और आप भी ऊपर से ही आ रहे हो."

" कोई ऊपर से नहीं आया साहेब , ऊपर जाने को लिफ्ट में घुसा था ,ऊपर तो पहुंचा नहीं खड़ा हूं जहां का तहां और आप आए हो तो बताए देता हूं तीसरे फ्लोर पर जाना है ,आप जाते हुए उतार जाइएगा . "

संवाद से पल भर को वो सज्जन भी खुश हुए . थोडा सा विलम्ब हुआ, वो भी ज्यादा नहीं और आ गया यथा स्थान . अपने आप से सवाल किया साठ पार ऐसे ही होता है ये तो सुना ही था , तेरे साथ भी यही होने लगा ?  

 मशीन है कहो जिस तल पर ले जाने को , अरे पर मूरख मशीन को कहो तो सही कि जाना कहां है .

जो बात इस घटना में है वही बात जीवन में है , कहो तो सही :

" कहां जाना है ?"

बात अभी घर में भी नहीं बताई थी , आपको बताई है अपने तक रखिएगा .

प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

सूचनार्थ : Manju Pandya

*******

इस पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियों का भी यहां उल्लेख करता हूं :

१.

प्रभात ने इसे एबसेंट माइंडेड़ होना बताया कहा इसका उम्र से कोई ताल्लुक़ नहीं .

२.

कुसुम परीक ने एक और क़िस्सा बताकर मेरी हिम्मत बढ़ाई , कहा :

" सर यह कोई उम्र वाला या भूलने वाला वाकया नही है। हम महिलाओं के संस्मरण सुनाए तो दंग रह जायेेंगे आप

एक बार मेरी एक सहेली ने बताया कि हम 3 4 जनी शादी में जा रही थीं ।

 सब लिफ्ट में घुस गए ।

सामने एक दर्पण था 🤓🤓 

फिर क्या हुआ 😇😇 

आप समझ गए होंगे ।

3 4 मिनट तक लिफ्ट हिली ही नही और उनका सँवरना पूरा हुआ तो ध्यान आया कि हम कहाँ है? 

देखा तो जस के तस खड़े है।🙏😍😂😂😂😂😂 "

३.

प्रियंकर जी ने इसे एक दार्शनिक प्रश्न से जोड़ा और मेरा उत्साह बढ़ाया :

" काश ! कहां जाना है यह ठीक-ठीक पता होता . काश ! वहां ले जाने वाली लिफ्ट हुआ करती . :) "

४.

चुन्ना भाई नवीन भट्ट ने मेरी इस प्रकार सराहना की :

" विधाता की लिफ्ट भी निरन्तर चल रही है ,कभी ऊपर कभी नीचे ,लिफ्ट के माध्यम से आपने बड़ी गहन दार्शनिक बात कहदी ---- सुंदर पोस्ट "

५.

पल्लव ने तो पूछ ही लिया :

" मुसाफ़िर जाएगा क़हां ?"

६.

और जीजी ने एक दार्शनिक बात कह दी इसी पोस्ट पर :

" उम्र बीत गई गन्तव्य नहीं पासकी  यही अफ़सोस है । ---------जीजी

******

ब्लॉग पोस्ट का प्रकाशन और लोकार्पण :

जयपुर  : गुरुवार १९ जुलाई २०१८.




Friday, 8 June 2018

आय एम लॉस्ट : फ़ेसबुक लीला 

दिल्ली से सुप्रभात 

नमस्कार 🙏

कुल जमा छह बरस पहले बच्चों से कह सुनकर अपना फेसबुक खाता खुलवाया था और तब अपनी फोटो लिवाई थी और जुड़वाई थी वही आज फिर से प्रकाशित किए दे रहा हूं । मनोदशा वहां लिखी हुई है कैना मैं खो गया हूं और मुझे लिवा ले चलो । तब से अब में कई खट्टे मीठे अनुभव हुए । अब भी मेरा तकिया कलाम है -

" अभी तो हम हैं "

९ जून २०१८.



Sunday, 3 June 2018

गोआ से लाई कमीज का खटका ।

https://photos.app.goo.gl/YOiHIwOknK8sAFPg1

गए नहीं आप ?  : भिवाड़ी डायरी .

" गए नहीं आप ?"


है न अजीब सवाल , पर इसमें भी प्यार छुपा है ये बात ज़रा देर से समझ आई मुझे जब एक हम उम्र दोस्त ने पिछली बार मुझसे ये सवाल मिलते ही पूछ लिया था । डबका तो ये ये हुआ कि ये मुझे यहां से रवाना कर देने को बेताब है । पर असलियत ये थी कि उनको मुझसे लगाव था और उनको बात चलाना ऐसे ही आता था । फिर मैं कैफ़ियत देने लगा कि आपको निराश नहीं करूंग़ा , कल यहां एक कार्यक्रम में भाग लूंग़ और परसों जरूर चला जावूँगा । 

आजकल देश में माहौल भी कुछ ऐसा है कि छोरे छापरे ही मुझे कहीं और जाकर देख लेने की सलाह दे देते है . सब उनकी समझ का फेर मैं उनसे आगे अटकता नहीं केवल भविष्य के लिए एक कहावत याद आ जाती है :

" समझा तो समझा पर तूम्बी फोड़कर समझा ।"

अब आया हूं यहां आगे जाने के लिए , अभी हाल यहां से राम रामी 🙏



Monday, 19 March 2018

डाक बाक़ी बात बाक़ी :  भिवाड़ी डायरी 

डाक बाकी -बात बाकी ।


ये 16 मार्च 2018 की ही तो बात है आंगन के स्टोर में पहुंचते ही अवि ने कहा था : " हैप्पी बर्थ डे आंटी !" और चॉकलेट खिलाई थी ।

कल जीवन संगिनी ने कहा कि ये फोटो तो सोशल मीडिया पर होनी चाहिए , उसी की तामील कर दी है आज ।



Wednesday, 14 February 2018

आभार ज्ञापन . भिवाड़ी डायरी .

सुप्रभात ☀️

         आभार ज्ञापन 

        कल के बीते वैलेंटाइन डे उत्सव के निमित्त आप ने जो बधाई संदेश भेजे और अपनत्व जताया उससे मैं अभिभूत हूं और आप सब को प्रणाम करता हूं 🙏

अब मिल गया बहाना अटकने का , आप सब से कई दिनों तक अलग अलग अटकता रहूँगा . ख़ूब होम वर्क इकठ्ठा हो गया है इस बहाने से .

ब्लॉग लेखन में भी एक नई पहल कर पाया हूं . कल से पहले मैं ब्लॉग पर फ़ोटो जोड़ता था तो ब्लॉग पोस्ट तो छप जाती थी और तस्वीर कूड़ेदान में चली जाती थी . कल संत वैलेंटाइन की कुछ ऐसी कृपा हुई कि पोस्ट के साथ तस्वीर भी जुड़ गई , एक बार नहीं दो दो बार . मैंने सोचा बड़ी मुश्किल से तो ये सम्भव हुआ है , कहीं ऐसा न हो कि फिर उड़ जाय तस्वीर तो रहने दिया . अब आगे से बात लिखूंग़ा सो तो लिखूंग़ा ही बात की हिमायत में तस्वीर भी जोड़ा करूंग़ा . आप तो देख लिया करो बस इत्ती सी बात है .

अथ श्री नैटाय नमः 🔔

मेरी मंशा है कि ये ब्लॉग लेखन और ब्लागोत्थान का ख़ुमार अभी कई दिन तक चले .

प्रातःक़ालीन सभा अभी हाल के लिए स्थगित .....।

नोट : ब्लॉग का लिंक अलग से देवूँगा , जैसे ही कुछ इज़ाफ़ा होवेगा . 

Sunday, 11 February 2018

ब्लॉग और फ़ोटो का तालमेल  ; आज का स्टेटस अपडेट .


ब्लॉग और फोटो का तालमेल : आज का स्टेटस अपडेट 


आज से ठीक एक बरस पहले ये ब्लॉग पोस्ट यहां जोड़ी थी जिसका ब्लॉग लिंक आज फिर जोड़ रहा हूं और इसी बहाने से कुछ और बात भी क़हूंगा । सबसे पहले अपने ब्लॉग के बारे में जिसका शीर्षक है ," " रवीन्द्र निवास से गुलमोहर " तब मैं जस तस फ़ेसबुक पर आई रही पोस्ट को ब्लॉग पर तो मांड देता था पर मुझे ब्लॉग लेखन के तौर तरीक़ों का न तो ज़्यादा ज्ञान था और न ही मैं अपने लिखे का ठीक से सम्पादन कर पाता था । कभी कभी तो अपने ब्लॉग तक पहुंच पाना भी सम्भव नहीं होता था और उसी दौर में मैंने एक पोस्ट लिखी थी , " अपने ही घर का पता पूछते हैं ।" और भी कई एक बातें हैं , बिना बात सारी पोस्ट को बोल्ड और इटालिक्स में मांड़ देता और इमोज़ी लगा देता । तब से अब मैं इन बातों को कुछ बेहतर समझने लगा हूं ।

ब्लॉग के साथ फ़ोटो अपलोड कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं हो पाता था और लिखी लिखाई पोस्ट रिजेक्ट हो जाया करती थी ।उसी दौर में एक नामचीन सम्पादक की इस राय ने मेरा उत्साह वर्धन किया कि लोग मेरा लिखा गद्य पढ़ना पसंद करते हैं और मुझे उनको कोरी फ़ोटोओं से टरकाना नहीं चाहिए । फ़ेसबुक पर तो मैं फिर भी फ़ोटो जोड़ देता था ब्लॉग पर तो मैं शब्द चित्र ही उकेरने लगा था । चार बरस से फ़ेसबुक पर हज़ार से ज़्यादा पोस्ट लिखी उन्हें धीरे धीरे ब्लॉग पर जोड़ने का प्रयास अब करता रहता हूं । अब नए उपकरण की मदद से ब्लॉग पर फ़ोटो जोड़ना भी यदा कदा सम्भव हो जाता है पर इस विधा को अभी भी सीख रहा हूं यही क़हूंगा । फ़ोटो से ज़्यादा ज़रूरी है इबारत ये मैं भी मानता हूं । 

आज एक बात और क़हूं -

मैसेंजर और इन्बॉक्स में और तो और वाट्सएप के ज़रिए ( जिसके पास भी मेरा नम्बर हुआ ) अब बहुत संदेश आने लगे हैं । अच्छा तो बहुत लगता है पर ये मेरी ही असमर्थता क़हूंगा कि उस गति से प्रत्युत्तर नहीं दे पाता । आशा है आप अन्यथा नहीं लेवेंगे यदि उत्तर समय पर न मिले । मेरे कुछ चाहने वाले भोले लोग समय असमय वीडियो काल भी कर देते हैं जिन्हें मैं कभी कभी सिक़र नहीं पाता । मैं ऐसे लोगों के प्रेम से अभिभूत हूं । एक बात साफ़ कह देवूं कि मेरी सूरत वही है जो आज की प्रोफ़ाइल पिक्चर में है । आप से पूछकर ही तो आज सुबह जोड़ी है ।अब वीडियो काँफ्रेंसिंग न हो पावे तो कोई बात नहीं ।

ऐसी भी क्या बात है किसी दिन ये विद्या सीखकर लाइव हो जावूँगा तो इस बात की भी आंशिक पूर्ति हो जाएगी ।

और बहुत सी बातें हैं कहने की , ये बातें कभी पूरी थोड़े ही होती हैं , पर अब उपलब्ध समय समाप्त हो रहा है ।

अतः प्रातःक़ालीन सभा स्थगित …..

Wednesday, 31 January 2018

गुस्सा नाक पे : भिवाड़ी डायरी .




गुस्सा नाक पे :  भिवाड़ी डायरी

    अभी दो दिन पहले की बात है मैं और जीवन संगिनी आशियाना आँगन के बाहर से सैर के बाद सब्जी के थैले लेकर परिसर में घुस रहे थे कि वहां एक रंबाद होते देखा उसी की बात आज बता रहा हूं फिर आप बीती भी सुनाऊंगा , बताऊंगा .

बाहर का सीन :

 मेन गेट पर सिक्योरिटी पोस्ट पर खड़ी लड़की अपनी कैफियत में बड़बड़ाए जा रही थी और उधर सिक्योरिटी चीफ के सामने एक अपेक्षाकृत युवा आशियाना रहवासी का गुस्सा पूरे उबाल पर था . फटे में पैर देने की मेरी आदत , जो हमेशा से है , उसके मुताबिक़ मैं तो मामले में उलझना ही चाहता था पर जीवन संगिनी के रोके से मैं वो न कर पाया ,  ये तो अब अफ़सोस ही रह गया  , खैर .


   ये शायद इसलिए है क्योंकि वहां उसे आती जाती घरों में काम करने वाली सेविकाओं की गतिविधि पर नज़र रखनी होती है . ये लड़की हम दोनों से रोज तो मुस्कुराकर मिलती है जब हम पैडिस्ट्रियन वे से अंदर आते हैं पर इस मौके पर वो भी गुस्से में बड़बड़ा रही है , ऐसा क्या हो गया आखिर ?


लेना एक न देना दो , हुआ सिर्फ इत्ता बताया कि उसने नौजवान से उसका फ्लैट या के टावर नंबर पूछ लिया बताया और वो ही उसे बुरा लग गया . बोलो वो यहां रहते हैं और उन्हीं से उनकी पहचान  पूछी जा रही है , ये क्या बात हुई भला ? हो गया रंबाद .


अगर दरवाजे पर पूछताछ होती है तो इसमें आपकी ही हिफाजत है ये तो उल्टे अच्छी बात है , पर कोई न समझे उसका क्या ?


एक और भी बात है ये नई पीढी के लोग  अपने काम से दिन भर तो बाहर रहते हैं और रात बिरात घर लौटते हैं तो द्वार प्रहरी अगर न पिछाणे तो इसमें अच्चम्भे की कोई बात नहीं .

अब हमारी सुणो :

   जब कभी लंबे अरसे बाद बाहर से आते हैं तो बाहर की मोटर देख द्वारपाल टोकते हैं और आने का सबब पूछते हैं . देखिए संवाद :


“ मिलने आए हैं ? “


“  मां बाप हैं , केवल मिलने नहीं रहने आए हैं ।”


और इसका फायदा ये कि द्वारपाल बच्चों को फोन से सूचित करते हैं और बच्चे टॉवर के नीचे खड़े मिलते हैं हमारे पहुंचने पर . ये हर बार की बात है . वैसे ये अपडेट सेल फोन से भी आ जाती है पर कभी नैटवर्क न भी होवे  तो अच्छा ही है ये सूचना कि ये हलचल द्वारपालों की बदौलत होती है . अब बोलो बुरा मानें  के राजी होवें !

कल तो हद हो गई :

हम दोनों  एक ऑटो रिक्शा से आशियाना में एन्ट्री ले रहे थे और नियमानुसार हमने दरवाजे पर अपना टॉवर नंबर बताया तो द्वारपाल ने जल्दी से  फंटा तो उठाया ही बड़ा गहक कर ये और बोला :


“ जानते हैं ..जानते हैं .”


अब लो कर लो बात !  और ये सुनकर जो चित्त प्रसन्न हुआ है उसका तो क्या कहना मानों हम और किसी के नहीं उस द्वारपाल के ही माँ बाप होवें ।


अब कल क्या लेणे को बाहर गए थे और ऑटो से क्यों आए ये एक अलग कहानी है वो आगे कभी आएगी बात .


अभी तो युवा पीढी के लिए इत्ती सी बात :

“ काहे इत्ता गुस्सा नाक पे ?”




Monday, 29 January 2018

जो देखो जो लाइव : भिवाड़ी डायरी .



जो देखो जो लाइव

   अब तो भिवाड़ी में आए और रहते हुए महीनों हो गए और  ये जो बात है वो इधर आने के बाद की ही है .

क्या बात है आख़िर ऐसी ?

इधर फ़ेसबुक की प्रसारण प्रणाली और तदनुरूप उपकरणों में एक इज़ाफ़ा हुआ है , बोले तो “ लाइव “

है तो बढ़िया आइडिया , इसके चलते जो देखो जो लाइव हो जाता है आजकल . जैसे के कल रात अनुपमा गर्ग ने लाइव प्रस्तुति दी और उसपे कमेंट माँगा तो कित्ता अच्छा लगा , है न कोई बात . ये तो राजा मिसाल है इसलिए ज़िक्र कर दिया है , ऐसे कई लाइव परफ़ार्मेन्स देखे . कोई कोई लोग अपनी प्रस्तुति के बजाय किसी और की को भी ऐसे करके लाइव दिखा देते हैं  , साधुवाद तो उनका भी बनता है .

तो अपणा क्या विचार है ?


इसमें विचार करने को क्या है किसी न किसी दिन अपण भी हो जाओ लाइव और तो क्या ?

पर लाइव होने जैसी शक़ल सूरत तो होवे , सुभाष तो सी एल हेयर ड्रेसर के हजामत बणवा आया अपनी सिफ़ारिश पर जयपुर में  और इधर आँगन के हज्जाम ने अपनी हजामत बिगाड़ दी क्या करें अब .

उपकरण न्यारे कमज़ोर . यंत्र कोई पकड़े और अपण होवें लाइव तब बने बात .

अब समय कम है , मचमची आ रही है किसी न किसी दिन अच्छा मौक़ा देखकर अपण भी हो जाओ लाइव और क्या .

जय हो . फ़ेसबुक की माया अपरंपार .

ऊपर ताज़ा मिसाल है ऐसे लिखना था और उपकरण ने उसमें राजा टाइप कर दिया , दुबारा पढ़ा तो ये भी अच्छा लगा तो ऐसे ही रहने दिया और क्या !

प्रातःक़ालीन सभा स्थगित …..जय हिन्द 🇵🇾🇵🇾

भिवाड़ी से सुप्रभात

नमस्कार  🙏

गए बरस ये पोस्ट भिवाड़ी से लिखी थी तब की ही बातें हैं , आज इसे ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूं ।

Tuesday, 23 January 2018

इंस्टाग्राम : भिवाड़ी डायरी

मुझे पता नहीं था इंस्टाग्राम होता क्या है .

फिर एक दिन पता लगा कोई माध्यम है जिससे कुछ फ़ोटू वोटू दर्ज करके भेजी जा सकती है अपने लोगों को . और ये भी पता लगा कि फ़ोटू  की रंगत भी बदली जा सकती है इसमें .

मुझे पता नहीं था कि ये इंस्टाग्राम विद्या मेरे उपकरणों में भी है. मैं कोई कोई फ़ोटू इंस्टाग्राम हल्के में ठेल देता . अब मुझे सूचना मिलने लगी कि कोई कोई लोग मेरा अनुसरण भी करते हैं माने फालो करते हैं . अपण ने तो बताने को ही डाली फ़ोटू , कोई छिपाने को थोड़े ही डाली तो ये बात भी बढ़िया .

इस विधा का अधिकतम इस्तेमाल इधर भिवाड़ी आकर सीनियर्स की बैठकों में ही किया है मैंने .एक दिन तो मेरे साथ फ़ोटो लिवाने की होड़ ही हो गई . लोग राज़ी अपण भी राजी  और क्या कहने .कई सीनियर्स फ़ोटो की प्रति लेना चाहें तो वो वाट्सएप नम्बर से जुड़ गए और ये सिलसिला चल पड़ा .

अब एक बात और फ़ोटो के साथ कुछ कुछ इंदराज भी तो होवे वो भी छोटा मोटा इंदराज मैं करने लगा . पर अभी भी मुझे पता नहीं है कि क्या किस्सागोई और संवाद भी इस चार दीवारी में साथ साथ चल सकता है .

अब देखते हैं कैसा काम आता है ये इंस्टाग्राम आगे .

अभी कई इल्म और सीखने हैं बच्चों से देखते हैं कैसा ढ़ब बैठता है आगे !