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Saturday, 17 November 2018

पोरम्परा १

पोरम्परा है :  भाग एक .  मर्दाना धोती की बात .
   #बनस्थलीडायरी

कहा गया शब्द वास्तव में परम्परा है  पर इसे ऊपर इस प्रकार इसलिए लिखा गया है ताकि यह लगे कि यह किसी  बांग्ला भाषी  द्वारा कहा गया है । इस परम्परा को बताने के लिए पहले मैं आपको अपनी  कहानी सुनाऊं ।  मैं और मेरा  छोटा भाई विनोद Vinod Pandya  हवामहल के नीचे   कैंची और चाकुओं पर धार लगवाने गए हुए थे  जो ऐसे उपकरणों  से लगाईं जाती है जो फौलाद की बनी चीजों को भी पैना कर देते हैं  । ये वो कारीगर था जो कभी तलवारों को धार लगाता था , अब घरेलू उपकरणों पर धार लगाने लगा था जो बरतते बरतते भोंथरे  हो जाते हैं । इस काम की लागत की बात चली  , जमाने की बात चली  ,रुपये पैसे की बात चली तो एक रोचक संवाद हो गया । उसने एक सुन्दर और लठ्ठ जनता  धोती पहन रखी थी । उसका एक सिरा  झोली की तरह फैलाकर वो बोला   :
      या म्हारी बीस  रिप्या की धोती छै ,  ईं मैं मैं धोण  भर नाज बांध  अर ल्या सकूं छूं ।
अर्थात ये मेरी बीस रुपये की धोती है  ,इसमें मैं आधा मण  याने बीस सेर अनाज बांध कर ला सकता हूं ।

इसके  बाद उसने मेरी पतलून का एक पायचा   नींचे से पकड़ कर एक झटका दिया और बोला :
     या थां की कित्ताक की होली  ?   याने ये आपकी किस कीमत की है ?
     मैं जवाब में पतलून की लागत बोला । जो कुछ भी मैं जवाब में बोला  उसे तो जाने दीजिये  , बल्कि मुझे याद भी नहीं कि तब पतलून कितने में बन जाती थी  पर इतना याद है कि उसकी धोती की लागत और मेरी पतलून की लागत में जमीन आसमान का अन्तर था , और उसने जो पूछा वो मुझे आज तक याद है :
  
ईं मैं  कित्तोक  नाज बांध ल्यावोला  .......?
अर्थात : इसमें  कितनाक अनाज बांध लावोगे.....?

        मुझे इस कारीगर ने निरुत्तर कर दिया था । धोती के प्रति आसक्ति  शुरू हो गई थी  । धोती के महत्त्व को कारीगर ने बहुत  अच्छे से समझा दिया  था । वे मेरे जयपुर प्रवास के दिन थे । मैं सारे  जयपुर में धोती ही पहन कर घूमता ।  यह और सब को भी मैंने सुनाया , अनुयायी भी बनाये । उस समय के अध्ययन में विवेकानंद के लेख   ' मॉडर्न इण्डिया ' और अरविन्द (  sri Aurobindo ) की कृति फाउंडेशन्स ऑफ़ इन्डियन कल्चर ने भी मेरी इस धारणा को  मजबूत किया कि धोती के  भारतीय पहनावे  का कोई मुकाबला नहीं  ।  बनस्थली लौटा तो भी   धोती पहनने की  अपनी आदत और  प्रतिष्ठा साथ  लेकर लौटा । ऊपर जिन कृतियों  का उल्लेख आया है उनकी कुछ बात भी बताऊंगा और आज की पोस्ट को जो शीर्षक दिया है उसके साथ न्याय करने का भी प्रयास करूंगा । पर अभी के लिए ये एक भूमिका तो  बन ही गई है  । सेव करना मुझे आता नहीं इसलिए मैं इसे आपकी   नजर के लिए पोस्ट करता हूँ।..........
     पिक्चर अभी बाकी है .... यह केवल अंतराल है..........
~~~~~~~~~~~~~
इस पोस्ट को फिर से जारी करने और इस कड़ी को पूरा करने का प्रयास करूंगा .
     ~ सुमन्त
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अपडेट
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दो बरस पुरानी पोस्ट है , फ़ेसबुक दिखा रहा है  तो सोचा  ये संस्मरण फिर उजागर होवे  और इष्ट मित्र फिर देखें . यही सोचकर फिर बात छेड़ी है 🙏🌻

नमस्कार  🙏🌻

सुमन्त पंड़्या
@  आशियाना आँगन , भिवाड़ी .
शुक्रवार  १८ नवम्बर २०१६.

नोट
ये  क़िस्से की शुरुआत है  .
क़िस्सा आगे भी चलेगा .
जैसा मुझे याद आ रहा है कई एक कड़ियों में लिखा था ये क़िस्सा  .😀
अथ श्री नेटाय नमः

भोर की सभा स्थगित ............


Friday, 16 November 2018

शेष राशि : बनस्थली की बातें 


बनस्थली जाकर मैं ज्ञान विज्ञान महाविद्यालय में पढ़ाने लगा था । श्यामनाथ पहले से वहां अर्थशास्त्र के युवा प्राध्यापक थे उन्होंने मुझे पड़ौस के एक स्कूल अध्यापक लाभचंद ( बदला हुआ नाम ) जी से मिलवाया । उस दौर में stc ,jtc सरीखी डिग्री लेकर लोग स्कूल अध्यापक बन जाते थे । माट साब उसी पीढ़ी के अध्यापक थे । बी ए के किसी खण्ड की प्रायवेट परीक्षा दे रहे थे , उसकी तैयारी के सिलसिले में ही मुझसे मिलवाया था । माट साब ने अपने प्रयास से , श्रम से बीए भी किया बी एड भी किया और कालांतर में हैड मास्टर भी बने । मेरे घर बनस्थली में भी खूब आये , जयपुर में भी आये । उनके बीएड के दाखिले में भी  मैं इंस्ट्रूमेंटल रहा । मैं श्यामनाथ की बताई एक बात से बहुत आहत  था कि हमारे एक साथी ने तो इन माट साब को पढ़ाने के बदले गृह सेवक की तरह जोता था । खैर हमारे घर में ऐसा नहीं था । अध्यापक होने के नाते मैं उन्हें बराबर का दर्जा देता , उम्र में बड़े होते हुए भी वो जीवन संगिनी को भाभी जी कहते । यह पारस्परिक स्नेह लगातार बना रहा । खैर .....


खैर इन्ही माट साब के भोलेपन से जुड़ा हुआ एक रोचक प्रसंग बताकर आज की बात समाप्त करूं :

 एक दिन माट साब ने मुझसे सौ रुपए उधार देने की मांग की । यह उस समय एक बड़ी रकम थी । मैंने 70 रुपये के एक क्विंटल गेंहूं खरीदे थे , तब की बात है । मुझे काकाजी * से ये सीख मिली थी कि किसी को उधार दो तो सामान्य स्थिति में उतना ही दो जो तुम गंवाना गवारा कर सको । मान लो कि ये रुपया लौट कर नहीं आएगा । मैंने माट साब को अपनी कुछ असमर्थता बताते हुए पचास रुपये तत्काल दे दिए । 

  कुछ दिनों के बाद एक दिन माट साब कालेज में उस पेड़ के नीचे आये जहां मैँ कई साथियों के साथ बैठा था उन दिनों वही स्थान हमारा स्टाफ रूम होता था । ' कैसे आना हुआ माट साब ? ' मैं उनके लिए उठकर खड़ा हुआ । वो बड़े सहज रूप से बोले : मैं वो शेष राशि के लिए आया था । "

      जाने क्यों माट साब ने ये मान लिया था कि किसी मजबूरी के कारण मैं उस दिन पचास ही दे पाया और पचास और दे देने का आश्वासन उन्हें मिल गया है , इसी लिए वो आज फिर से आये थे । मैं फिर उनके साथ अलग जाकर मिला ।

  लौटकर वापिस आया तो साथी मुझसे पूछ रहे थे : अरे तुमने इस मास्टर से उधार ले रक्खा है ?

मेरे बड़कों आशीर्वाद रहा कि परिसर में कभी किसी से उधार माँगने नहीं गया और लोग क्या कहते हैं इस बात की कभी परवाह नहीं की .

  आज के लिए इति ।

Tuesday, 13 November 2018

दस रुपए का मोल : बनस्थली ड़ायरी 

नमस्कार स्वजनों 🙏

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क्या पूछा क़हां से ?

आशियाना आँगन भिवाड़ी से .🌻


आज गई शताब्दी का एक प्रसंग याद आ गया सोचा आपको वो ही बता देवूं . ये बताते हुए किसी का अनादर नहीं कर रहा केवल बात कर रहा हूं . तो सुनो स्वजनों :


गई शताब्दी में १९७१ की जुलाई में जब हम लोग ४४ रवींद्र निवास में रहने लगे तो हमारे घर के आगे की पंक्ति में हमारे प्रिय साथी माधोराम जी रहा करते थे , उनकी बड़ी बढ़िया आदत थी जो आज बहुत याद आ रही है . क्या करते थे वही बताता हूं .

बनस्थली में मंगलवार का साप्ताहिक अवकाश होता था . यदि उस दिन साथियों के साथ जयपुर जाने की योजना बनती तो वो सोमवार को ही बैंक हो आते और अपने बचत खाते से रुपये दस कंटान निकाल कर लाते तथा मंगल को हो आते जयपुर . सारा कैश घर में लाकर या बड़ा रोकड़ा घर में रखते ही नहीं . और ये भी तब कि जब बनस्थली में ले दे कर एक ही सहकारी बैंक था .


अब क्यों याद आई ये बात ?


इसलिए कि कैसा तो ज़माना था , रुपए दस में बनस्थली से जयपुर का आण जाण . किराया भाड़ा हो जाता और रूपए दो रुपए बच ही जाते थे आज तो दस रूपए की हालत ये है कि उस पर छोरा माँड़ देता है :


"सोनम गुप्ता बेवफ़ा है ."


तब दस रूपए की बड़ी इज्जत थी . तब माधोराम जी जैसे साथी थे जो दस रूपए में जयपुर यात्रा कर आया करते थे . 


ये और क़हूं कि मेरे लिखे में रत्ती भर भी अतिशयोक्ति नहीं है .

ये सच है .

वे दिन और वे लोग बहुत ही याद आते हैं 


#स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी #sumantpandya


आभार और आदर सहित  


सुमन्त पंड़्या .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

 मंगलवार १५ नवम्बर २०१६ .


प्रातःक़ालीन सभा स्थगित ........

नोटबंदी के बाद हमलोग भिवाड़ी चले गए थे और अनायास आई विपत्ति को झेल रहे थे मिलजुलकर . उन दिनों पैसे , टके , बैंक की पुरानी बातें मुझे बहुत याद आया करती थी . ऐसी ही एक बात मैंने इस पोस्ट में लिखी थी . आज इसका ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण कर रहा हूं .

@  जयपुर     गुरुवार   १५ नवम्बर २०१८ .


Tuesday, 28 August 2018

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी 

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी 


लगभग वैसी ही परिस्थितियाँ हैं और भाद्रपद मास चल रहा है जिन दिनों ये संस्मरण लिखा था मैंने . आज इसे ब्लॉग पर दर्ज करना अच्छा लग रहा है .

कभी कभी जीवन में ऐसा भी होता है कि व्यक्ति को निराशा घेर लेती है और ये निराशा यदि लंबी अवधि तक बनी रहे तो घातक भी हो सकती है . लेकिन … लेकिन ये योगायोग की बात है कि कुछ अलौकिक घटनाएं ऐसी होती हैं कि निराशा अचानक छूमंतर हो जाती है और जीवनी शक्ति लौट आती है . ऐसे अनुभव सब के जीवन के होते हैं , घटनाओं के प्रभाव हर व्यक्ति के लिए उसके स्वभाव और प्रकृति के अनुसार अलग अलग होते हैं / हो सकते हैं .

 मैं तो अपनी बात बताता हूं जो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन से याद आ रही है , कई दिन से बताने का मन था पर एक तो उपकरण और संचार तंत्र ने कुछ साथ नहीं दिया और दूसरे दिल्ली में दो पारिवारिक शिखर सम्मेलनों में व्यस्त रहा जिसके चलते ये पोस्ट नहीं बन पा रही थी . देखते हैं अगर आज ये बात कुछ हद तक पूरी हो जाती है तो फेसबुक पर अपलोड कर देवूंगा . फिर आएगा शिखर सम्मेलनों की गतिविधियों का विवरण जो अलग पोस्ट का कलेवर बनेगा , देखिएगा जरूर .


दो महत्वपूर्ण व्रत : 

मेरे घर में दो व्रत शायद पीढ़ियों से चले आ रहे हैं और महत्त्वपूर्ण हैं - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और शिवरात्रि जिनमें छोटे छोटे बच्चे भी यथा शक्ति सम्मिलित होते रहे , बिना किसी दबाव के , स्वेच्छा से .

कोई कठोर व्रत नहीं होते थे व्रत के बहुत उदार नियम होते थे इन की सीख मैं जैसे घर में बच्चों को देता वैसे ही अपनी विद्यार्थियों को भी देता और इसका बनस्थली परिसर में भी सर्वत्र निर्वाह होता . जहां तक मेरे घर की विरासत का सवाल है मेरे घर में वैष्णव भक्ति की परम्परा और मेरे ननिहाल में शिव भक्ति की चली आयी परंपरा से इसका सम्बन्ध रहा हो , उसकी तफसील में मुझे अभी नहीं जाना .

अब ये और और बातें बंद कर मैं मुद्दे की बात पर आवूं जो कहने का आज विचार बनाया है …


वर्ष 2003 ईस्वी .

    अचानक ये पता लगा कि मेरा शरीर डायबिटीज की गिरफ्त में है और अब आगे से चिकित्सक की निगरानी में पथ्य और परहेज से रहना होगा . क्या खाया जाय क्या न खाया जाय ये भी डाक्टर और डाइटीशियन तय करने लगे . ये सब तो स्वाभाविक था पर इससे अधिक जो बताने लायक है वो ये कि मुझे दुःस्वप्न सताने लगे . मुझे अपने वो सब निकट रिश्तेदार याद आने लगे जो जीवन के अंत समय में या तो आंख की रौशनी गंवा बैठे थे या डाइबिटिक फुट के रोग के चलते एक एक पैर कटा बैठे थे .

ये केवल इस बात को बताने के लिए दोहरा रहा हूं कि जीवन में कैसी निराशा ने मुझे घेर लिया था और इसके कारण अपने कमिटमेंट भी पूरे करने में मैं आनाकानी करता था . भोजन में मिठास लुप्त हो गया था और यों भोजन में रुचि भी कम हो गई थी . ऐसे समय में उसी वर्ष गोकुल यात्रा ने मेरी सोच किस प्रकार बदल दी वही बताता हूं .


गोकुल यात्रा : निमित्त और अनुभूति 

 - इसे मैं एक सुखद संयोग ही कहूंगा कि हमारे साथी सुरेन्द्रपाल मिश्रा के बेटे प्रदीप का विवाह नियत हुआ था और बरात गोकुल जानी थी . मेरा विवाह में जाना पहले से तय था पर अब अपने बारे में नए रहस्योद्घाटन के बाद मैं साथ जाने में आनाकानी कर रहा था . मिश्रा जी मानने को कत्तई तैयार नहीं थे और आखिरकार साथ ले जाकर ही माने और इस प्रकार संभव हुई गोकुल यात्रा .

वैसे बृज प्रदेश की यात्रा मैंने पहले भी की थी अपने दोनों भाइयों के साथ पर इस बार साक्षात गोकुल पहुंचा था जो कृष्ण का गांव था और एक मांगलिक अवसर जिसमें अपने साथियों का साथ मिला था .

उस रात की बात याद करता हूं जब भोजन में अरुचि के चलते मैं जनवासे में अनमना सा लेटा था और सुरेन्द्र मिश्रा मेरी खोज खबर लेने आए थे , आखिर वो अपनी जिम्मेदारी पर मुझे साथ लिवा ले गए थे . वो वर के पिता थे , नेगचार के बीच भी समय निकाल कर आये थे मैंने कुछ नहीं खाया जानकर मुझे भवन के ऊपरी तल पर लिवा ले गए . वहां कढ़ाव में दूध ओट रहा था जो कुल्हड़ भर कर मुझे पीने को दिया गया . बगैर चीनी के भी गोकुल की गायों का दूध कितना स्वादिष्ट हो सकता था ये मैं उस रात ही जाना .

गोकुल की सडकों गलियों में मैं बारात के साथ भी घूमा और अगले दिन रवानगी के पहले भी . भवन , भित्तिचित्र , लोक व्यवहार और परस्पर अभिवादब में भी मैंने भगवान् श्रीकृष्ण को वहां लगातार उपस्थित पाया .

अधिक विस्तार में न जाकर मैं तो यही कहूंगा कि प्रदीप का विवाह और मिश्रा जी का साथ चलने का आग्रह निमित्त बन गए थे वास्तव में मेरा मन बदलने को मेरी सोच सकारात्मक बनाने को भगवान श्रीकृष्ण ने ही मुझे गोकुल बुलाया था उस बार .


मैं नहीं जानता कृष्ण इतिहास का विषय हैं या कवियों का घड़ा हुआ मिथक हैं पर गोकुल जाकर मैंने तो कृष्ण के रूप में एक वास्तविकता को अनुभव किया था .

बनस्थली के समय और साथियों को याद करते हुए ….

गोकुल यात्रा को याद करते हुए ..

सायंकालीन सभा स्थगित .।

सोमवार 29 अगस्त 2016 .

ब्लॉग पर प्रकाशन और पुनः लोकार्पण  - जयपुर   २९ अगस्त २०१८.


Friday, 10 August 2018

इशो तिशो ....  : राजस्थानी कहावत 

राजस्थानी कहावतें .


गए दिनों प्रियंकर जी ने बहुत अच्छी राजस्थानी कहावतें फेसबुक पर उद्धृत कीं और जरूरत पड़ने पर उनकी व्याख्या भी की तो बड़ा अच्छा लगा . एक छोटा सा प्रयास इसी सन्दर्भ में ये भी है . मुझे केवल इस बात का डर है कि इन कहावतों को कहीं सेंसर बोर्ड ( मेरा अपना सेंसर बोर्ड ) रद्द न कर देवे . उस स्थिति में मैं तत्काल प्रभाव से इस पोस्ट को हटा लेवूंगा . अभी हाल के लिए दो कहावतें विचारार्थ रखता हूं .

1.

--- इशो तिशो .....

 विवाह की आयु निकल रही थी और विवाह नहीं हो रहा था.

" किसका ?"

उसे रहने दीजिए , उससे क्या काम है . कोई भी इस बात का बुरा न माने इसलिए मैं कुछ नहीं कहूंगा .

मैंने तो स्थिति के स्पष्टीकरण के लिए एक कहावत कही थी वही दोहराता हूं :

" इशो तिश्यो मन भावै न , अर मोत्यां वाळो आवै न ."

पहली कहावत का अर्थ है ( इशो तिश्यो ...) कि ऐसा वैसा तो मन को भाता नहीं और मन भावन , मोतियों वाला आता नहीं .

कहावत हर उस परिस्थिति पर चरितार्थ है जब सामने उपलब्ध स्वीकार न हो और मनचाहा विकल्प मिलता न हो .

2.

-- बाई सा का ....


लेकिन विवाह तो हो गया , मेरी कही कहावत उस दिन रद्द हो गई .

मुझसे पूछा गया ,' अब क्या कहते हो? '

मैंने उस दिन दूसरी कहावत दोहराई थी :


" बाई साब का कंवार गिरह उतरगा अर कंवर साब की रिबरिबी मिटगी ."


दूसरी कहावत का अर्थ है परिस्थिति से ऐसा समझोता जिसमें कन्या की कुमारी अवस्था भी पार हो जाय और वर की रीरी पी पी ( किसी बात के लिए मचलना ) भी मिट जाए .


ये केवल कहावतें हैं , जीवन अनुभव पर आधारित , किसी को भी आहत करने के लिए नहीं हैं .


कुछ कहावतें मेरी अपनी गढ़ी हुई हैं , समय आने पर उन्हें भी साझा करूंगा . कुछ एक तो पहले साझा की भी हैं .

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

समीक्षा : Manju Pandya.

प्रियंकर जी की ये टिप्पणी विशेष रूप से उद्धृत :

" अभिव्यंजक ! दीर्घकालीन सामाजिक अनुभव का सार विन्यस्त है इनमें . "

ब्लॉग पर प्रकाशित ; ११ अगस्त २०१८. 


आपका क़िस्सागो पार्क में .

Thursday, 9 August 2018

एग्जामिनेशन तीन : राजस्थान विश्वविद्यालय .

एक्जामिनेशन  तीन : राजस्थान  विश्वविद्यालय :



  बात बहुत छोटी सी है . सोचा था ये बताई जानी चाहिए या नहीं फिर लगा बताए देता हूं . सप्रसंग बताता हूं.

मैंने सुना है और कुछ कुछ याद है कि मुझे गुस्सा बहुत आता था, कुछ बड़ा हुआ तो बात बात पर अब गुस्सा नहीं भी आता था , पर ये जो मामला बता रहा हूं ये थोड़ा गुस्सा जताने का ही है . लोकेशन मैंने शीर्षक में ही लिख दी है - एक्जामिनेशन सेक्शन तीन , राजस्थान विश्वविद्यालय ,जयपुर .

राजस्थान विश्वविद्यालय
.
   राजस्थान का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक विश्वविद्यालय जिसका फैलाव पूरे राजस्थान तक हुआ करता था और इसके परीक्षा प्रभाग का बहुत बड़ा कारोबार हुआ करता था . ये तब की बात है जब बनस्थली में मैं भी इसी विश्वविद्यालय के एक एफिलिएटेड कॉलेज में काम करने लगा था पर इस विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार दफ्तर में व्यक्तिशः जाने का तब तक कोई काम नहीं पड़ा था हालांकि मैं इसी परिसर से पढकर गया था .

मामला क्या था ?
     - अंग्रेजी विभाग , बनस्थली में वाजिद साब ( रशाद अब्दुल वाजिद साब ) तब वरिष्ठ प्राध्यापक हुआ करते थे और स्वाभाविक  रूप से विश्वविद्यालय की परीक्षा के परीक्षक भी थे . उनके पास जांचने  के लिए कापियों का बण्डल आया हुआ था और वो उसमें लगे हुए थे . ये बात थी अप्रेल के अंत और मई के आरम्भ की . मई के शुरु में छुट्टी शुरु होते ही मैं तो आदतन अपने घर जयपुर आ गया था . वाजिद साब की एकजामिनर्शिप से मेरा कोई वास्ता नहीं था 

मैं कैसे जुड़ गया मामले से ?
        एक दिन रात पड़े वाजिद साब जयपुर में मेरे घर आए और उन्होंने अपनी परिस्थिति बताई कि उनके अब्बू सख्त बीमार थे, जो कि वास्तव में नहीं ही रहे, और उन्हें बरेली जाना पड़ रहा था , वे कापियां जांचकर अवार्ड लिस्ट  तो पहले भेज चुके थे और कापियों का बण्डल जयपुर के  बनस्थली भवन में रख आए थेऔर मुझे कहने आए थे कि मैं बण्डल वहां चलकर उठा लेवूं और यूनिवर्सिटी के दफ्तर में जमा करवाने की जिम्मेदारी लेवूं .

   मैं बोला ," आप रिक्शा से आए , इसी में बण्डल भी पटक लाते , एक चक्कर तो बचता ."

पर जिसके पिता मृत्यु शैय्या पर हों उसे इतना ध्यान कहां रहता है , उन्हें तो घर पहुंचने की जल्दी थी और वो मुझसे ये मदद मांगने आए थे वो भी विश्वविद्यालय के हित में .

खैर इस परिस्थिति में मैं फिर गया उनके साथ बनस्थली भवन और रिक्शा में पटक कर  बण्डल अपने साथ घर ले आया . अब ये बण्डल मेरी जिम्मेवारी बन गया . उसी दिन पहली बार मैं बनस्थली भवन गया था और रामकृष्ण जी भाई साब से मिला था जो बनस्थली भवन के केयर टेकर हुआ करते थे .

अगले दिन  यूनिवर्सिटी रजिस्ट्रार आफिस :
--------------------------------------------     जैसा बण्डल मूझे मिला था फिर एक रिक्शा में डालकर मैं रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंचा जहां ये जमा होना था . पता किया  ये एक्जाम सेक्शन तीन में जमा होना था सो मय बंडल वहां पहुंचा . वहां एक कठिनाई आ गई कि बण्डल के साथ स्टेटमेंट का एनवलप और होवे तब ही ये बण्डल जमा हो सकता है अन्यथा नहीं . ऐसा कोई लिफाफा मेरे पास तो था नहीं . जिन्हें बण्डल ले लेना चाहिए था वो बाबू लोग बण्डल लेवें नहीं , जिन्हें लिफाफा बनाकर देना चाहिए था वो मौके पर मौजूद नहीं , मेरे पास उनसे संपर्क का कोई जरिया नहीं . कुल मिलाकर मेरे लिए अजीब मुसीबत कि क्या करूं इस बण्डल का . केवल इतनी  राहत की बात थी कि बण्डल पर एक्जामिनर नंबर अलबत्ता लिखा हुआ था . इस कथा में इतना तो साफ है कि इस बण्डल को मैं पहले दिन से  ढोते ढोते परेशान हो चुका था और अब इससे निजात चाहता था .
इस मामले में मैं  असिस्टेंट रजिस्ट्रार साब से मिला तो उन्होंने भी वही नियम की बात कही हालांकि सारी बात मैं उन्हें समझा चुका था .

ए आर साब की बात सुनने के बाद मुझे तय करना था कि मेरा अगला कदम क्या  हो,  जिस रिक्शा से बण्डल ढो कर वहां तक लाया था वो मैं पहले ही लौटा चुका था और सोच रहा था कि इसे कैसे ले जावूं और कहां ले जावूं .  तब मुझे सूझा और मैं ए आर साब से बोला :

" अगर आप इस बण्डल को जमा करने को तैयार ही नहीं हैं तो मैं भी अब इसे लेकर कहीं नहीं जाऊंगा , यहीं दफ्तर के बाहर रखकर इसे आग लगा दूंगा......."

मेरा इतना कहना था कि ए आर साब को बात समझ आ गई और बोले:
" नहीं नहीं आप ऐसा मत कीजिए ...   मैं करवाता हूं जमा."

उन्होंने मुझसे ये जरूर कहा कि इस बाबत मैं अपनी ओर से एक पत्र लिखकर दे देवूं साथ में  और मैंने वहीँ उनकी सीट के सामने बैठकर वो पत्र लिख कर उनके सुपुर्द कर दिया .
बण्डल जमा हो गया और राजिट्रा्र दफ्तर ने उसकी एक औपचारिक रसीद भी इस बाबत दे दी . मेरा भी सिर दर्द मिटा .

बरसों पुरानी बात हो गई पर ये वो दिन था जब मैंने थोड़ा सा गुस्सा दिखाया था , परिस्थिति की मांग ही कुछ ऐसी थी .

इस छोटे से संस्मरण के साथ प्रातःकालीन सभा स्थगित .

प्रसंग समीक्षा :  Manju Pandy.

जब ये चर्चा चली कि मैंने ऐसा किया तो इस पर सुभाष गुप्ता साब . जो आर्गनाइजेशनल बिहेवियर के विशेषज्ञ हैं , ने इस व्यवहार की व्याख्या इस प्रकार की ; 

" There is a difference between 'losing temper' and 'using temper'. It is a good example of using temper appropriately. "

डाक्टर चंद्रिका मालिक ने साफ़ कहा :

"It was losing temper constructively..."

और इस प्रकार लगभग सभी ने मेरे व्यवहार की संस्तुति की . अभी अभी जीजी ने कहा कि ऐसा ही करना चाहिए था , अनन्त ने कहा कि ग़ुस्सा करना शायद समय की माँग थी .

टीका सहित ब्लॉग पर प्रकाशित 

@ जयपुर  १० अगस्त २०१८.

Sunday, 5 August 2018

बनस्थली की याद : मोहन सिंह जी माट साब - ३


फिर बनस्थली की याद : मोहन सिंह जी माट साब - भाग तीन .

कल मैंने बताया था कि माट साब के अभिन्न मित्र कल्याण मल जी ब्यावर से चलकर बनस्थली आए . अवसर था सरोज का विवाह . वह उनकी इस पैमाने पर एक मात्र बनस्थली यात्रा थी जिसमें वो लोग तीन दिन वहां रुके और इस बाबत अक्षय ने भी कल उस परिवार को याद किया . इस शिष्ट मंडल में चाची जी , इनकी बेटी और उसके साथ एक बच्चा सम्मिलित थे .

समारोह में वो लगातार सम्मिलित रहे पर उनका विश्राम स्थल रहा 44 रवीन्द्र निवास , उन दिनों मैं घर में अकेला ही था और इस बहाने मुझे भी संरक्षण मिल गया .


इसी बहाने मेरी एक बात :

   अब छोटा बच्चा तो रात को सोवे तब ही सोवे . कल्याण मल जी परिवार रात को बाहर वाले कमरे में सोए . दोनों कमरों के बीच का दरवाजा ढाल दिया और मुझे बोले,' लाला तू तो सो जा , तुझे तो सुबह उठकर पढ़ना है , पढ़ाने जाना है .'


ऐसे ही पुरानी बात याद आ गई , कितना अपनत्व होता था उन लोगों में .

जैसे उनका बेटा मुकुट उनके लिए लाला था मैं भी उनके लिए लाला ही था .


चौहान परिवार के बारे में :

----प्रायःदेखा जाता है कि माता पिता अपने बच्चों पर केरियर थोपने का प्रयास करते हैं . स्वयं अध्यापक होकर भी बच्चों के लिए इतर व्यवसाय चाहते हैं . ऐसे में मोहन सिंह जी माट साब मिसाल हैं इस बात की कि उनकी देखा देखी उनके बच्चों ने उनका ही कार्यक्षेत्र चुना . विजय सिंह जी और निर्भय सिंह जी तो विद्यापीठ में ही कार्यरत रहे, मेरा भी निकट संपर्क रहा दोनों से . बच्चों के कारण मैं आशा जी को भी जाना , उनके सौम्य स्वभाव की मैं हमेशा सराहना करता हूं .

भूगोल के शिक्षक के नाते विजय सिंह जी का तो आज भी लड़कियां नाम लेती हैं .

अक्षय भैया तो हैं ही बनस्थली की यादों को ताजा करने वाले .


बात फिर उस जमाने की :

सोमवार को मैं तो जयपुर चला आया . 44 रवीन्द्र निवास में ठहरे हुए थे मेहमान जो घर के समान ही थे . मंगलवार को बनस्थली से विदा होकर जब वो लोग जयपुर आए तो घर की चाबी देने आए और ऐसे बताया कि लाला (याने मैं ) के कारण ठाठ रहे उनके . घर में दो उपकरणों की उन्होंने विशेष सराहना की - एक तो गैस कनेक्शन और दूसरा था प्रैशर कुकर .


हालांकि उस वक्त की और बहुत सी बातें याद आ रही हैं पर आज इस चर्चा को विराम देता हूं .

उन स्वर्णिम दिनों को याद करते हुए ..

प्रातःकालीन सभा स्थगित.

सह अभिवादन और समीक्षा :Manju Pandya

अतिरिक्त समीक्षार्थ : Akshaya Chauhan

आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

6 अगस्त 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशन सोमवार ६ अगस्त २०१८.


आदि बनस्थली .

Saturday, 4 August 2018

बनस्थली की याद : मोहन सिंह जी माट साब .२.

फिर बनस्थली की याद : मोहन सिंह जी माट साब - २ 

कल उपलब्ध समय कम था , मैं इतना ही बता पाया था कि सरोज के जरिए बुलाए जाने पर बनस्थली में मोहन सिंह जी माट साब के घर पहुंचा और वो बड़ी आत्मीयता से मिले , बैठाया , खिलाया पिलाया और आगे कुछ बातें बताने लगे . 


माट साब ब्यावर के रहने वाले थे और ब्यावर से ही उन्हें अपने एक मित्र कल्याण मल का पत्र मिला था जिसमें मेरा भी उल्लेख था . उल्लेख कुछ इस प्रकार था कि मेरा नाम बताते हुए ये मित्र कह रहे थे कि मेरे बॉस के बेटे गए दिनों बनस्थली में नियुक्ति पाकर वहां पहुंचे हैं , आप उनसे संपर्क स्थापित करें और उनका घर के व्यक्ति की तरह ही ध्यान रखें . यही पत्र वो आधार था जिसने माट साब को मुझे बुला भेजने को अधिकृत किया था .


खैर, माट साब की बेटी तो मेरे पास पढ़ती ही थी उस समय , दशक बीता और अगले दौर में पोती भी पढ़ने आई , माट साब आजीवन विद्यापीठ परिसर में रहे और इस प्रकार जो संपर्क स्थापित हुआ वो आज भी कायम है . इसे मैं चार पीढ़ियों का संपर्क कहूंगा .


एक अच्छी बात ये भी थी कि मोहन सिंह जी माट साब सोशल स्टडीज पढ़ाते थे और विषय मेरे ही अध्ययन अध्यापन से जुड़ा हुआ था . वे उस जमाने के थे जब अध्यापकों का हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान हमेशा बढ़िया होता था चाहे वो किसी भाषा के अध्यापक न हों . मुझे याद आता है अलका से उसके साथ पढ़ने वाली लडकियां रश्क किया करती थीं कि उसके तो दादा जी अंग्रेजी में छपे सन्दर्भ ग्रंथों के अंश अनुवाद करा देते हैं . और सब के तो दादा जी वहां नहीं होते थे .


तब मेरे विषय का बहुत सा साहित्य अंग्रेजी में ही उपलब्ध हुआ करता था .


अब तो अलका भी किसी कालेज में प्रिंसिपल बन गई होगी , न तो नियुक्त होने वाली होगी . ये तो पुरानी बातें हैं जो मैं याद कर रहा हूं .


 चिट्ठी पत्री का ज़माना  :

लौटें उस बात पर जब मैं पहली बार माट साब के घर गया था .

मैंने जुलाई के चौथे सप्ताह में तो काम सम्हाला ही था और ये बात है अगस्त की जब तक कितना पत्र व्यवहार हो चुका था वही बताने की बात है .

काकाजी ने कुल तीन महीने अजमेर में काम किया था . वहां कल्याण मल जी उनकी ट्रेजरी में अकाउंटेंट थे . काकाजी के लिए अजमेर तो तबादले के बाद छूट गया पर कल्याण मल जी( कल्याण मल शर्मा ) से आत्मीयता बरकरार रही . उनसे नियमित चिठ्ठी पत्री चलती रहती थी . ऐसी ही चिठ्ठी में मेरी नई नियुक्ति का उल्लेख था . कल्याण मल जी ब्यावर के रहने वाले थे , वो प्रमोट होकर जयपुर भी आए और आखिर में रिटायर होकर अपने गृह नगर ब्यावर जा बसे थे . कल्याण मल जी मोहन सिंह जी माट साब के सहपाठी और दोस्त थे और इन दोस्तों में भी चिठ्ठी पत्री चलती रहती थी .

ऐसे ही एक नियमित पत्र में मेरा उल्लेख आया था और ऐसे करके माट साब ने मुझे बुलाया था उस दिन अगस्त के महीने में अपने घर .


पहली बार में हमें जोड़ने वाली कड़ी थे कल्याण मल जी अंकल .

अभी तो वो बात बतानी है जब एक आध वर्ष बाद सरोज का विवाह हुआ और कल्याण मल जी अंकल सपरिवार बनस्थली पहुंचे . वो एक उदाहरण है पुराने लोगों की आत्मीयता का , वह भी बताऊंगा .

अभी हाल प्रातःकालीन सभा स्थगित.. 

( कथा क्रम आगे जारी...)


सह अभिवादन : Manju Pandya

समीक्षा: Akshaya Chauhan

अशियाना आंगन , भिवाड़ी .

5 अगस्त 2015.

ब्लॉग पर प्रकाशन ५ अगस्त २०१८.


Friday, 3 August 2018

बनस्थली की याद : मोहन सिंह जी माट साब 

फिर बनस्थली की याद आई .: मोहन सिंह जी माट साब .

            ये उसी साल की बात है जब मैंने बनस्थली में पढ़ाना शुरु किया था . बी ए थर्ड ईयर की क्लास को पढ़ाकर बाहर निकला तो एक छात्रा ने मुझे कुछ बात कहने को रोका . इस छात्रा का नाम सरोज चौहान था . वो मुझे कहने लगी :


" आपको पिता जी ने घर बुलाया है ."


देखो समझ का फेर , वो अपने पिताजी की बात कह रही थी और मैं समझ रहा था कि बीते सप्ताहान्त मैं जयपुर नहीं पहुंचा इस लिए मेरे घर से ये सन्देश आया है . खैर बात समझा और पता समझा और फिर मैं पहुंचा सरोज के घर . वहां पहुंचने पर संपर्क और आत्मीयता के कितने सूत्र आपस में जुड़े वो ही मैं बताने का प्रयास करूंगा. बात काकाजी * से शुरु होकर मोहन सिंह जी माट साब तक पहुंची थी और इसी आधार पर माट साब ने मुझे बुलवाया था . ये संपर्क तो फिर माट साब के रहते भी रहा और पीढ़ी दर पीढ़ी चला जो शायद मैं एक आध कड़ी में कह पावूंगा .

इस बहाने शायद मैं ये भी कह पावूं कि उस जमाने में सिर्फ चिठ्ठी पत्री से भी कितना संचार होता था और आत्मीयता का दायरा कैसे बढ़ता था .

आज स्मार्टफोन का ज़माना आ गया पर इन संबंधो की प्रकृति शायद वैसी न रही जो महज चिठ्ठी पत्री के जमाने में हुआ करती थी .


तो उस दिन की बात :

---------------------- जब बनस्थली में पोस्ट आफिस के बराबर वाली गली में माट साब के घर मैं पहुंचा तो वो बहुत अपनत्व से मिले बैठाया और एक पत्र मेरे सामने रख दिया जिसके आधार पर वे मुझे बुला भेजने को अधिकृत थे . क्या था पत्र में ऐसा , किसने लिखा था पत्र ये सब भी बताऊंगा पर आज सिर्फ इतना कि इसके बाद पीढ़ियों का रिश्ता बन गया  

सारी कड़ियां जोड़ कर पूरी बात कहूंगा . उसी सन्दर्भ में जुड़े मुझसे बब्बू भैया याने अक्षय चौहान **. 

( अगली कड़ी में जारी )

प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित .

सुप्रभात .

सह अभिवादन : Manju Pandya.

* काकाजी हमारे पिताजी जिन्हें हम इसी नाम से संबोधित करते थे .


** Akshaya Chauhan.


आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

4 अगस्त 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशन  ४ अगस्त २०१८.

Monday, 30 July 2018

जिसकी तलाश थी वो मिल गया : तकिया कलाम की कहानी

जिसकी तलाश थी वो मिल गया …..! : तकिया कलाम  की कहानी

अक्सर ये बात मैं बड़ा गहक के कह दिया करता हूं :

" जिसकी तलाश थी वो मिल गया ."

ऐसे ही मेरे और भी तकिया कलाम हैं , जैसे :
१.
ये तो बार की बात छै माट साब  .. फेर तो थे जाणो !
और
२.
प्यारे मोहन जी नै ने जाणो ..?

मेरे हर तकिया कलाम का कोई न कोई विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ होता है और मुझे वो सीन याद आने लगता है जब किसी न किसी ने ये बात कही थी और आगे के लिए वो बात मेरे हाथ लग गई .
ख़ैर किस्सगोई के दौरान तकिया कलाम के ये मणके  मैं पिरोता भी रहता हूं और बताता हूं कि बात आईं क़हां से . ख़ैर अभी तो उस शीर्षक पर ही बात करें जो आज की पोस्ट के लिए दिया गया है :

" जिसकी तलाश थी वो मिल गया ."

अपने आप से बात :
-------------------

" किसकी तलाश थी ?"

इसी बात को स्पष्ट करने का प्रयास करूंग़ा .

" ये किसी व्यक्ति , वस्तु   या विचार किसी की भी तलाश हो सकती है जिसके पूरा होने पर मैं ऐसा कह बैठता हूं और अब तो ये वाक्य बोलना मेरी आदत में शामिल हो चुका है ."

" पर पहली बार ऐसा कहा किसने था ? "

" हां वही बताने का प्रयास है आज , ये  विशिष्ट व्यक्ति  की कही बात है जो आज तक मेरी ज़ुबान पर है . "
------------------
अब आगे : फिर वो ही बात .

विशिष्ट अतिथि आए हुए थे , रवीन्द्र निवास में  ठहरे थे और इस बाबत दो एपिसोड मैंने अपने ब्लॉग और फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल पर लिखे भी थे . तीसरा एपिसोड जो अभी लिखा जाना बाक़ी है उसमें ही आता है ये प्रसंग  .

प्रसंग ये है कि स्नान के बाद जब वे धुले  और प्रेस  किए हुए कपड़े पहनने लगे तो पाया कि   पतलून में कमर का क्लिप पिचका हुआ है और उसे दुरुस्त किए बिना पतलून पहनना सम्भव नहीं था .
वो बौद्ध दर्शन में एक विचार आता है न  " अर्थ क्रिया कारित्व " वही सूझ रहा है मुझे तो यहां इस स्थिति के लिए . ख़ैर  बात आगे …

समस्या समाधान की वो बात सोच ही रहे होंगे कि उनका ध्यान अलमारी के ऊपर के खण की ओर गया  और वो अचानक बोल पड़े :

" जिसकी तलाश थी वो मिल गया ."
  ------------------------

वहां रखा एक पेचकस उठाकर वो ये बात बोले थे . पिचके क्लिप को दुरुस्त करने के लिए ये उपयुक्त उपकरण था जो उन्हें यहां मिल गया था .

वैसे इस पूरे प्रसंग का तीसरा एपिसोड जब आएगा तो ये बात और स्पष्ट  होएगी  कि आख़िर वो क्लिप पिचका हुआ था क्यों .
आज मैंने पूरी बात बताई कि ये तकियाकलाम  मैंने सीखा क़हां से था .

नमस्कार 🙏

सुमन्त पंड़्या
@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी
शनिवार ३१ दिसम्बर २०१६ .
#स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी #sumantpandya

कांई जात छै ? : बनस्थली डायरी .

कांई जात छै .......?

ये बात बनस्थली की है .
तब विद्यामंदिर में यू को बैंक का एक एक्सटेंशन काउंटर हुआ करता था और एक युवा बैंक अधिकारी वहां बैठता था . इस अधिकारी का नाम था प्रशांत निहलानी .
एक दिन की बात छात्रावास की दो परिचारिकाएं अपने खाते से रुपए निकालने आईं थीं और वहां बैठी थीं  . ये मेरे सामने की बात है कि उन दो में से किसी एक ने इस युवक से बड़ा सहज प्रश्न कर लिया :

" भाया , थारी कांई जात छै ?"
( भैया, तुम्हारी जाति क्या है ?")

हालांकि वो जिस काम से आई थीं उसमें इस  बात का कोई औचित्य नहीं था पर उन्होंने पूछ ही लिया और क्यूं पूछा ये भी बताता हूं . असल में जयपुर में जन्मा और पला , बड़ा हुआ प्रशांत निहलानी  ढूंढारी बोली बड़ी बढ़िया बोलता था और उसने इसी बोली में उन दोनों से बात की थी . अपना सा लगा तो उन्होंने पूछ लिया .

अब जानिए कि निहलानी क्या बोला :

" माजी , म्हे सिंधी  छां ." वो बोला.
(मां जी , हम सिंधी हैं.)

और वे दोनों प्रश्नकर्ता इस उत्तर से संतुष्ट थीं .
वो दोनों तो चली गईं रह गए मैं और निहलानी . मैं ने निहलानी से कहा कि जो सवाल था उसका ये जवाब तो पर्याप्त नहीं था . सिंधियों में भी तो जात बिरादरी होती है . मेरे जिस एक सिंधी परिवार से बड़े आत्मीय सम्बन्ध हैं वे ब्राह्मण हैं  और जिन यजमान के यहां वो कोई पूजन करवाने जयपुर आए थे ,और हमारे घर ठहरे थे , वो माहेश्वरी बनिया हैं .  पर हां विभाजन के बाद जो सिंधी इधर भारत में आ बसे उनकी जात बिरादरी के नाते पहचान से ज्यादा बड़ी पहचान ये बन गई कि वे सिंधी हैं . जात बिरादरी की बात गौण हो गई .
भारत में आ बसे बहुसंख्य सिंधी हिन्दू हैं और इसकी वजह सब को मालूम है , मुझे बताने की कोई आवश्यकता नहीं है .

और बहुत सी ऐसी ही बातें हैं बताने की , इसी बहाने चर्चा करने की .


प्रातःकालीन सभा स्थगित.
इति.

सह अभिवादन : Manju Pandya

सुमन्त पंड्या .
आशियाना आँगन, भिवाड़ी .
31 जुलाई 2015 .


क़िस्से का प्रकाशन  और लोकार्पण जुलाई २०१८.

Tuesday, 24 July 2018

इमर्जेंसी : बनस्थली डायरी .

इमरजेंसी

  - इमर्जेंसी की बातें फिर याद आने लगी पिछले महीने . क्यों याद आने लगी उसे तो जाने दीजिए , आप बेहतर जानते हैं मुझे आज के हालात के बारे में अभी हाल कुछ नहीं कहना . मैं तो तब की थोड़ी सी बात याद आ गई और लगा कि इसे दर्ज भी कर दिया जाए तो कोई हर्ज नहीं , वही करने लगा हूं .


तब जब उन्नीस सौ पिचहत्तर - सतत्तर में इमरजेंसी का दौर था अखबार और रेडियो और बहुत कीजिए तो टेलीग्राम टेलीफोन ये ही तो संचार के साधन थे , इनका भी फैलाव आज जैसा कहां था . फिर भी बात फैलती तो थी . 


एक बात मैं अवश्य रेखांकित करूंगा उस जमाने की कि लोग आकाशवाणी के समाचारों की बनिस्पत बी बी सी के समाचारों और रेडियो प्रसारणों पर ज्यादा भरोसा करने लगे थे . ये कोई अच्छी बात तो नहीं कही जा सकती लेकिन हालात ही कुछ ऐसे थे और उन्हें हमारे ही शासन ने उत्पन्न किया था .


एक निजी अनुभव :

           एक दिन बनस्थली में आई बी के एक अधिकारी मेरे घर आए , अजब इत्तफाक था कि वो मेरे कालेज के जमाने के दोस्त निकले . दोस्तों के बीच खुलकर जैसी दुनियां जहान की बातें होती हैं वो हो गईं . 

इस दोस्त आई बी अधिकारी के पास ऐसी राज मुद्रिका थी नए जमाने की कि वो कहीं भी आ जा सकता था . मुझे तब ये अच्छी तरह पता चला था कि इन ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास आगे से आगे कितनी सूचनाएं इकठ्ठा होती हैं . 

जाने अनजाने वो दोस्त मुझसे भी ऐसी सूचनाएं ले ही गया जो प्राप्त करना उसका पार्ट ऑफ जॉब था .

इस आई बी अधिकारी की आवक बाद में भी परिसर में देखी गई . मेरे कुछ एक नजदीकी दोस्तों की राय थी कि दोस्त था तो क्या हुआ आया तो आई बी की तरफ से था मुझे उससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए थी . मैं ऐसा कभी कर नहीं पाया . मैंने राजनीतिशास्त्र पढ़ा और पढ़ाया जरूर था पर ये पैंतरे बाजी मुझे न तब आती थी न अब आती है .

एक भले दोस्त के रूप में उसने एक राय जरूर दी थी जो बात मुझे आज भी याद आती है :

" सुमन्त , मेरी मानो तो किसी पार्टी की मेंबरशिप भूल कर भी मत लेना वरना अपना ये सोचने का तरीका गंवा बैठोगे . .. सब एक जैसे हैं ."


हम लोग कोई सरकारी नौकर नहीं थे अतः किसी राजनैतिक दल के प्रति प्रतिबद्धता निषिद्ध तो नहीं थी , पर उस दिशा में कोई महत्वाकांक्षा मैंने पाली भी नहीं थी .

ऐसे ही याद आई बाते आपसे साझा करते हुए 

प्रातःकालीन विलंबित सभा स्थगित :


सहमति और समीक्षा : Manju Pandya


आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

25 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण  जुलाई २०१८.


Sunday, 15 July 2018

बनस्थली की रेल यात्रा : शाम वाली गाड़ी में .

बनस्थली की रेल यात्रा : शाम वाली गाड़ी में .


    जयपुर आना होता प्रायः मंगलवार के छुट्टी के दिन . शाम को लौटने के बखत जयपुर स्टेशन पर जाकर गाड़ी पकड़ते जो छह बजे के आस पास जयपुर से निकलती थी .

बनस्थली जाने वाली रोडवेज की आख़िरी बस तो पांच बजे ही रवाना हो चुकी होती अतः थोड़ा अधिक समय मिल जाता इसलिए गाड़ी पकड़ते .

वही लोहारू सवाई माधोपुर रूट की शाम की सवारी गाड़ी , इससे ही बम्बई जाने वाले मुसाफिर भी सवाई माधोपुर जाया करते थे , हमें तो खैर बनस्थली - निवाई स्टेशन तक ही जाना होता था . उसी यात्रा की एक बार की बात आज बताता हूं , पहले गाड़ी के माहौल का दृश्य बयान कर दूं .

सवारी गाड़ी की हालत :

       इस गाड़ी में जबरदस्त भीड़ तो होती ही थी , ऊपर से तुर्रा ये कि ट्रेन के करीब आधे डिब्बों में रोशनी भी नहीं होती . सर्दियों में तो निवाई पहुंचने तक अंधेरा होने लगता इसलिए अगर बच्चे साथ होते तो प्रायः टॉर्च भी साथ रखते जिससे सामान और बच्चों को ठीक से उतार सकें अपना स्टेशन आने पर .

टिकिट खिड़की पर भी भीड़ होती , मैं तो शहर में वैस्टर्न रेल्वे आउट एजेंसी से पहले ही जाकर टिकिट खरीद लाता तब फिर स्टेशन की राह पकड़ता .

अब एक बार की बात :

       यही गाड़ी पकड़ने को मैं जयपुर के रेल्वे प्लेटफार्म पर जाकर खड़ा हुआ तो वहां सहयात्री के रूप में संगीत के प्रोफ़ेसर नाडकर्णी मिल गए . मैं तो उस दिन अकेला ही था , साथ मिल गया , एक से दो होगए . बहरहाल दोनों ही सामान के थैलों से संपन्न थे .


अंजनी कुमार आ गए टहलते हुए हमारे पास . मैंने कहा ," आ जाओ ."

वो मिले पर वापस लौट गए , उनका तो फर्स्ट क्लास में रिजर्वेशन था . उन्हें बम्बई जाना था . कोई पांच सात सूट केस और उनकी वाइफ नियत स्थान पर दीख रहे थे जिधर उन्होंने इंगित किया . उनका और हमारा साथ तो जयपुर के प्लेटफार्म तक गाड़ी आने के पहले तक ही रहा .

बच गए मैं और प्रोफ़ेसर नाडकर्णी जो गाड़ी आने पर जस तस मय सामान के सवार हुए और थोड़ी थोड़ी जगह पाकर सीट पर बैठ गए .

हम आपस में बातें करने लगे . साथ बैठकर बात करते हमारी यात्रा की ये घंटे दो घंटे की अवधि बीत जानी थी पर ज़माना कहां चैन लेने देता है . 

क्या हुआ वही बताता हूं :


टंटे की शुरुआत :

          रवाना होते समय ही हमारे कम्पार्टमेंट में भी सवारियों का दबाव काफी बढ़ गया था . इसी क्रम में कुछ निहायत लफंगे किस्म के नौजवान लड़के कीचड़ में सने जूते पहने पहने ही ऊपर की सीटों पर आ चढ़े और ताश खेलने में मशगूल हो गए थे . इस पर भी हमें क्या ऐतराज हो सकता था अगरचे वो शान्ति पूर्वक रहते . पर वे शान्ति से कहां रहने वाले थे . थोड़ी ही देर में खेल के साथ धींगा मुश्ती शुरु हो गई और उनके जूतों से मिट्टी हम पर झड़ने लगी .

" ए भाई जरा तमीज से बैठो , नीचे भी इंसान बैठे हैं ."

 फ्रोफेसर नाडकर्णी ने थोडा तेज आवाज में उनको समझाइश का प्रयास किया . उनको बात समझ में कहां आने वाली थी , उलटे वो हम से संगठित रूप से उलझने लगे . मुझे उस समय लगा कि अब ये लोग नीचे उतरकर हमसे गुत्थमगुत्था और होंगे और हमारे लिए कठिन स्थिति उत्पन्न हो रही है .

आपात सहायता :

    हमारा तो उस ओर घ्यान भी नहीं था . पुलिस की वर्दी में एक थानेदार हमारी ही सीट पर खिड़की के पास चुपचाप बैठे थे . बाद में पता चला वो जयपुर के किसी थाने में अपनी ड्यूटी ख़तम कर अपने गांव जा रहे थे , वे अचानक हमारी हिमायत में उठ खड़े हुए और कड़क कर कुछ इस प्रकार बोले :


" फ्रोफेसर साब समझा रहे हैं और तुमको बात ही समझ में नहीं आ रही ?

मैं अच्छी तरह समझाऊं क्या तुमको ... ?"


उन्होंने अपने पुलिसिया अंदाज में एक की बांह मरोड़ी और एक बारी तो धमकाने को उनका हाथ कमर में लटकी पिस्तौल पर भी चला गया बोले शूट कर दूंगा . फिर उन्होंने उन लफंगों को वहां से हटाकर ही दम लिया .

विपत्ति आई पर इस प्रकार दूर भी चली गई . हम कौन हैं इस बात का अंदाज हमारे तारणहार को शायद हमारी आपसी बात चीत से ही लगा वरना परिचय तो उनके इस हस्तक्षेप के बाद ही हुआ था .


आज प्रोफ़ेसर नाडकर्णी तो रहे नहीं इस वाकये की तस्दीक करने को मुझे ये घटना याद है जो मैंने दर्ज की .

ऐसी अनेक यादें हैं जो बनस्थली की यात्राओं से ही जुड़ी है , आगे फिर कभी बताऊंगा .

अंजनी कुमार की बात भी अधूरी रह गई . वो भी आगे कभी ...


प्रोफ़ेसर नाडकर्णी को याद करते हुए .  

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

समीक्षा : Manju Pandya.


Sunday, 8 July 2018

घोड़े बेचकर सोया : बातें बनस्थली की 

घोड़े बेचकर सोया : बातें बनस्थली की .


    क्षमा कीजिएगा ' नानगा द ग्रेट ' श्रृंखला की एक कड़ी में लिखते लिखते बात आई थी कि नानागा छत पर बिस्तर बिछाता था और मैं जाकर सो जाता था . उस श्रृंखला की तो शायद सात कड़ियां लिख चुका उसे आगे लिखूंगा ही उस बात से ये बातें याद आने लगीं वही आज बताता हूं .

जयपुर में हमारे शहर वाले घर में तो धीरे धीरे छत पर जाके सोने का चलन कम हो गया था पर गर्मियों में 44 रवींद्रनिवास की छत पर जाकर सोना बदस्तूर जारी था . ये बात बनस्थली की है . बच्चे इकठ्ठा होते तो रात को छत पर जाकर सोने का आनंद सब अनुभव करते .

जय भैया रोज रात को सोने से पहले 'चार दोस्तों' वाली कहानी सुनता .

जय को और कोई पास न सुलाता , कौन झेले उसकी लात जो वो नींद में चलाता. मैं उसे अपने पास जगह देता . एक तरफ दीवार होती जय के और दूसरी तरफ मैं होता . मैं भी घोड़े बेचकर सोता इसलिए मुझे उसकी लात की कोई परवाह नहीं होती . याद करता हूं तो हंसी आ जाती है . जय कहता , " जयपुर जाऊंगा तो ये छत अपने साथ ले जाऊंगा ."


मेरी नींद के भी कई किस्से हैं , वो किस्सा जब दरवाजा तोड़ने की नौबत आ गई थी सुनाऊंगा तो तो जुलुम हो जाएगा . आज वो नहीं , आज तो बनस्थली की यादों से जुडी दो बात बताकर समाप्त करूंगा .


मैंने एक बात प्रचारित कर रखी थी कि काकाजी परेशान रहते हैं कि मैं तो नए नए घोड़े खरीदवाता हूं और पंड्या जी बेच देते हैं . 

बाहरी लोगों के लिए बताता चलूं कि और सब बातोँ के अलावा ये काकाजी नाम के व्यक्ति जीवन पर्यन्त मुख्य प्रशासन अधिकारी रहे और घुड़ सवारी मैदान में वो घोड़ों का परफार्मेंस देखने आते थे और मैं मेहमानों की अगवानी के लिए खड़ा होता था . उन्हें दिल्लगी की बातों में बहुत रुचि होती थी सो एक बात मैंने अपनी नींद से भी जोड़ रखी थी .


अब घर की छत की बात :

    एक रात की बात . शाम से ही छोटे वाले को बुखार की शिकायत थी . हम दोनों लोग आदतन घर की छत पर बच्चों के साथ जाकर सो गए थे . अब ये तो मानी हुई बात है कि बच्चे को बुखार हो तो मा तो निश्चिन्त होकर नहीं सो सकती और बाप चाहे तो सो जाए . वही हुआ उस दिन भी . आधी रात के बाद किसी समय छोटे वाले का बुखार तेज हो गया , शायद नाप भी लिया गया . जरूरत आन पड़ी कि उसे गोली दी जाए . मुझे जगाया जीवन संगिनी ने और कहा :


" उठो, छुटकू नै गोळी आपवी छै."

( उठो , छुटकू को गोली देनी है .)

उन्होंने मान लिया कि मैं उठ गया और जो बताया वो करने को चल पड़ा हूं . यहीं गड़बड़ हो गई . मैं चला तो सही , पर कहां चला अलमारी समझकर जीने की ओर चल दिया और अगला पैर नीचे उतरने की कोई चौथी सीढ़ी पर टिका . धमाका सुन जीवन संगिनी भी चौंकी. कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई पर चेत होने से पहले तो मुझे दिन रात और स्थान का भी ठीक से पता नहीं था . अलमारी समझकर जीने की ओर जा रहा था .

फिर तो सब कुछ ठीक ठाक हो गया और मैंने अपना आगे का कर्तव्य भी निभाया . पर उस दिन हम दोनों ने संयुक्त रूप से निर्णय लिया कि जब तक जीवन संगिनी पूरी तरह आश्वस्त न हो जाएं कि मैं पूरी तरह जाग गया हूं मेरी बात पर कत्तई भरोसा न करें और मुझे ढीला न छोडें .

उस दिन ऐसे में तो मैं दवा भी क्या दे बैठता, क्या भरोसा ?


तो ये था सिर्फ एक किस्सा घोड़े बेचकर सोने वाली नींद का ...


प्रातःकालीन सभा स्थगित..   

सुप्रभात .

सह अभिवादन :

Manju Pandya

सुमन्त पंड्या .

आशियाना आँगन, भिवाड़ी .

9 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८.



Wednesday, 4 July 2018

बनस्थली की रेल यात्रा : चाकसू स्टेशन .

बनस्थली यात्रा :एक आध प्रसंग याद आ गए .


                                                  ये उस जमाने की बातें हैं जब बीकानेर एक्सप्रेस से पहले छोटी लाइन की गाडियां लोहारू से सवाई माधोपुर जाया करती थीं . हम लोग भी उस जमाने में बनस्थली निवाई स्टेशन जाने को इस रुट की गाड़ी कभी कभार पकड़ा करते थे .


एक बार की बात मैं बनस्थली जाने को ट्रेन से यात्रा कर रहा था . मैं तो उस दिन अकेला था , परिवार या कोई साथी नहीं था साथ में . सहयात्री परिवार शायद लंबी दूरी की यात्रा करने वाला था . उन दिनों दिल्ली - बम्बई रूट की फ्रंटियर और जनता नाम की गाड़ियों में लोग इसी गाड़ी से सवाई माधोपुर जाकर सवार होते थे . सहयात्री परिवार को भी शायद बम्बई ( आज का मुम्बई ) जाना था . कंपार्टमेंट में काफी जगह खाली थी , सब बड़ी सुविधा से बैठे थे . इस परिवार का बहुमत था , मैं था अकेला अल्प मत लोक सभा में राष्ट्रपति के नामजद सदस्य की मानिंद , मेरी पटरी बहुमत परिवार से भी ठीक बैठ रही थी , थोड़ी बात चीत भी हुई थी सब कुछ ठीक ठाक .


चाकसू स्टेशन आ गया :

   - स्टेशन आने से पहले सहयात्री परिवार के मुखिया कम्पार्टमेंट के दोनों ओर के दरवाजे इस तरह से बंद कर आए कि कोई आगंतुक बाहर से न खोल सके और स्टेशन से ट्रेन आगे बढ़ जाए . इन की आगे की यात्रा इसी शांति और आनंद के साथ संपन्न हो . मुझे उनकी इस हरकत में " हाई सोसाइटी सिंड्रोम " की बू आ रही थी .

थोड़ी ही देर को गाड़ी स्टेशन पर रुकती थी . गाड़ी रुकी , प्लेटफार्म पर भीड़ भाड़ थी .लोग इस डब्बे में भी आने को इच्छुक थे .


अपनी कहूं , मेरी पटरी ऐसे लोगों से भी सही बैठ जाती है जो अभिजन ग्रंथि से ग्रसित होते हैं पर ग्रामीणों से और बढ़िया बैठती है . मेरा मन कैसे माने कि लोग तो आना चाहें और इस डब्बे के दरवाजे बंद रहें .

मैं उठा और प्लेटफार्म की ओर के दरवाजे की दोनों सटकनी हौले से खोल कर आवागमन सहज बना दिया . ऊपर से सह यात्रियों को ये और कहा : 

" मेरे मिलने वाले हैं ."

अब इस प्रकार के लोग आ गए थे कम्पार्टमेंट में जिनके साथ मैं अधिक सहज अनुभव कर सकता था हालांकि मेरे सहयात्री नहीं . 

जाने क्यों लोग अपनी सुविधा के लिए अन्य लोगों की यात्रा को बाधित कर बैठते हैं , ये मानसिकता प्रायः देखी जाती है .

खैर उस दिन तो चाकसू स्टेशन के बाद मैं अपने जनवाद के विचार के साथ बहुमत स्थापित करने में सफल हो ही गया था .

शीर्षक में एक आध प्रसंग कहा था. ये तो एक ही प्रसंग हो पाया. 

आगे कुछ एक प्रसंग और भी बताऊंगा पर अभी प्रातःकालीन सभा स्थगित ....


सुप्रभात .

समर्थन और समीक्षा :Manju Pandy.

आशियाना आंगन , भिवाड़ी.

7 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८.



Tuesday, 5 June 2018

बनस्थली डायरी : बिन बात की बात .

" गुस्सा आता है प्यार आता है ,
            गैर के घर से यार आता है . "
          --------------------
    

    गए बरस की पोस्ट है  , मजबूरी में दोहराता हूं ,
     -- सुमन्त पंड्या .
      @ गुलमोहर
       6 जून 2016 .
   *******
 
फिर बनस्थली की याद : बिना बात की बात .
______________________________  
आज अचानक बहुत दिनों पहले की बात याद हो आई .
उस दिन मैं 44 रवीन्द्र निवास और 45 रवीन्द्र निवास के बीच के  चौक जैसे स्थान में परिवार और साथियों के साथ बैठा हुआ था और बातों में लगा  था रात घिर आई थी और बातें जारी थीं .
इतना सा वहां का स्थानीय राजनीतिक सन्दर्भ  जोड़ना यहां उचित होगा कि उन दिनों मैंने कर्मचारियों की  कोऑपरेटिव सोसाइटी ओढ़ रखी थी , मैं उसका अध्यक्ष बना हुआ था .
अचानक लेखानुभाग वाले गुप्ता जी एक और साथी के साथ  दक्षिण दिशा से आए और पास आने पर ही पहचान में आए क्योंकि अंधेरा था उस बखत . आते पहले बरसने लगे और जितनी देर वहां रहे बरसते ही रहे . मामला कोई सोसाइटी का ही था जिसकी तफ़सील  मुझे याद भी नहीं और तब भी उसके कोई मायने नहीं थे . उन्हें बरसना था और वो बरसे मैं लगातार केवल सुनता रहा और इस बात का अवसर देता रहा कि वो अपनी बात खुलकर कह लें . जब वो कह चुके तो मैं बोला," ठीक ". और वो चले गए .
गुप्ता साब के जाने के बाद साथ बैठे साथियों ने पूछा :

" सुमन्त जी आपको गुस्सा नहीं आता ?"

मैंने ऐसी ही कुछ बात कही उस समय :

" ..बचपन में बहुत आता था , अब नहीं आता , और ये भी है कि ऐसे पंचायती काम ओढ़ने पर इस तरह की स्थितियां आती ही हैं इनको झेलें यही जरूरी है ."
और वो घड़ी टल गई , कोई झगड़ा टंटा नहीं हुआ , जिस दिशा से आए थे उसी दिशा में लौट गए गुप्ता साब . मेरे लिए बात आई गई हो गई .
आगे जीवन की गाड़ी उसी प्रकार चलती रही जिसमें घर परिवार , पढ़ाने का काम और सोसाइटी की जिम्मेवारी साथ साथ चले .

एक दिन की बात : गुप्ता जी का बुलावा आया :
________________________________
उन्ही गुप्ता जी का बेटा मेरे लिए सन्देश लेकर आया कि जयपुर से कोई सज्जन आए हैं , गुप्ता जी के घर बैठे हैं और मुझ से मिलना चाहते हैं .
जाने पर उनसे साक्षात्कार हुआ और वो निकले राजस्थान विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के डाक्टर हुकुमचंद  गुप्ता जो एक ही बिरादरी के होने के नाते कोई रिश्तेदारी की बात चलाने वहां आए थे और लेखानुभाग वाले गुप्ता जी उन्हें अपने घर लिवा ले गए थे .  उनके घर जाते हुए मेरे घर के बाहर नाम पढ़कर डाक्टर गुप्ता साब ने  पूर्व परिचय के आधार पर मुझसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो भी बनस्थली वाले  उन्हें यह कहते हुए लिवा ले गए कि इनको भी अपने यहां ही बुला लेंगे  , उस समय प्राथमिकता और काम की थी . यही करके बेटा बुलाने आया था और मैं वहां गया था .
मेरे ऊपर आगंतुक डाक्टर गुप्ता साब का अपार स्नेह था और अपना विद्यार्थी वहां पाकर वो बहुत खुश थे पर उनके सामने जो कुछ बनस्थली वाले गुप्ता जी बोले वो था आश्चर्यजनक तो .
वो बोले :
" साब इनको पढ़ाना आता है .  .... एक दिन इनसे लड़कियों ने कहा सर आज हम नहीं पढ़ेंगे .....तो इन्होंने भी कह दिया मैं भी आज नहीं पढ़ाऊंगा , अपन तो आज केवल बात करेंगे और ये उन्हें क्लास में ले गए , लड़कियों को तो साब पता भी नहीं चला कि कब बातों बातों में उनकी पढ़ाई शुरु हो गई और ये उन्हें पढ़ाकर ही आए ."
डाक्टर गुप्ता के लिए तो यह सब सुनना सुखद था ही मेरे लिए आश्चर्यजनक भी था और सुखद भी क्योंकि बात कहां से कहां पहुंच गई थी .
मैं सोच रहा था , क्या ये वही व्यक्ति हैं जो उस रात कैसे बरसे थे , बोलो ये तो मुझे कितना चाहते और सराहते  हैं .
बनस्थली के अच्छे दिनों को याद करते हुए
प्रातःकालीन सभा स्थगित .
समीक्षा :    Manju Pandyadya
#sumantpandya
सुप्रभात.
सुमन्त
गुलमोहर ,  शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .
6 जून 2015 .

Monday, 21 May 2018

पैदल पैदल : बनस्थली डायरी .


जिन साथियों के साथ मैंने बनस्थली में एक लंबी पारी खेली उसमें एक नाम इतिहास विभाग के डाक्टर पेमा राम का भी है . उन्हीं को लेकर एक रोचक प्रसंग सुनाता हूं .

 ज्ञान मंदिर या कि वाणी मंदिर से क्लास पढ़ाकर रवीन्द्र निवास की ओर पैदल पैदल आ रहा था कि एक हस्तक्षेप हुआ . डाक्टर पेमा राम अपनी नई कार से सड़क पर रूककर मुझसे बतियाने लगे .

आखिर ख़ास बात क्या थी ?

उन दिनों आर्थराइटीज के दर्द के कारण मेरी चाल प्रसिद्ध अंग्रेज कवि लॉर्ड बायरन जैसी लगा करती थी , किसी भी स्वजन को देखकर तदनुभूति के कारण दर्द हो आता था . ऐसा ही कुछ डॉक्टर पेमा राम के साथ भी हुआ .

ये सही है कि इस मर्ज का सबसे अच्छा और सुलभ व्यायाम भी पैदल चलना ही है . मैं आभारी हूं वैद्य हरिनारायण का कि उनकी बताई चिकित्सा से कुछ दुरुस्त होकर जब मैं आपाजी आरोग्य मंदिर पहुंचा था तो वैद्य जी बोले थे:


" देखो, आज तो घोड़े की जात चले आ रहे हैं पंड्या जी ."


खैर वो बात तो फिर सही अभी तो उस ख़ास दिन की बात :

रुके और कहने लगे पेमा राम :


"भाई साब आप थोड़ा पैदल चला करो."


बात तो सही थी और उन्होंने एक व्यापक सन्दर्भ में कही थी , ठीक ही तो कही थी . पर मैंने तो तात्कालिक सन्दर्भ को पकड़ लिया और मैंने तुरंत कहा:


" डाक्टर साब मैंने आप को कहा क्या कि मुझे मोटर में बैठाकर ले चलो ?

मैं तो हूं ही पैदल ."

मेरी भी बात सही थी , निरुत्तर हुए डाक्टर पेमा राम .

उन दिनों को याद करता हूं तो पुरानी बातें याद आ जाती हैं .

बनस्थली की यादों के साथ  सभा स्थगित .


Monday, 14 May 2018

ज्योतिष और मेरी परीक्षा छोटेलाल जी द्वारा : बनस्थली डायरी 

ज्योतिष और मेरी परीक्षा : छोटे लाल जी द्वारा. 



वैसे तो ये दो अलग अलग मामले हैं , ज्योतिष से मेरा वास्ता और छोटे लाल जी पर यहां दोनों बातें साथ आ रही हैं , ज्योतिष का प्रसंग भी और और छोटे लाल जी का उल्लेख भी . ये बात उन दिनों की है जब मैं बनस्थली में था और ज्योतिष में हस्तक्षेप करने लगा था . पता नहीं क्यों ज्योतिष को लेकर सबके ही मन में कुछ न कुछ कौतुक रहता ही है . मैं इस मामले में अधिक से अधिक लोगों से अटकने को उन दिनों तत्पर रहता था . ऐसे ही एक दिन क्रिसमस के कारण अवकाश था , उद्बोधन मंदिर में कार्यक्रम में सम्मिलित होकर मैं घर आया था और अनायास ही प्रोफ़ेसर छोटे लाल जी मेरे घर 44 रवीन्द्र निवास चले आये .

वे क्यों आये ये मेरे मन में प्रश्न था पर उनके मन में भी कोई प्रश्न ही था और उन्होंने अपना मंतव्य भी कह दिया : मेरा मूक प्रश्न है और उसका उत्तर दो . 


छोटे लाल जी ने मेरे सामने एक परीक्षा की स्थिति उत्पन्न कर दी थी , प्रश्न भी बताना था और उत्तर भी देना था . मेरा राजनीति शास्त्र के प्रश्नपत्रों से तो वास्ता पड़ा था पर ज्योतिष का मेरा ज्ञान तो था जैसा ही था , जीवन के प्रश्नों का भला मेरे पास क्या उत्तर था और वो भी यदि मूक प्रश्न है तो वह क्या प्रश्न है भला मुझे क्या पता . खैर अब परीक्षा तो मेरी थी , या तो पास होना था या फेल . मैंने सोचा प्रयास करने में क्या हर्ज है और मैं पंचांग तथा कागज़ कलम लेकर बैठ गया और यह दरसाया कि किसी गंभीर गणना में व्यस्त हूं . प्रश्नलग्न बनाया और अपने आप से प्रश्न किया कि मन का स्वामी कौन है ,उत्तर मिला कि चन्द्रमा है . चन्द्रमा कहां बैठा है ? चौथे भाव में जो मां का घर है . मुझे एक सूत्र मिल गया था , मैंने कहा : डाक्टर साब प्रश्न मां के बारे में है . वे सहमत दिखाई दिए , अब मुझे बात बताना कुछ आसान लगा . मैंने कहा : आपको उनके बारे में ही चिंता है आप बिना कोई समय गंवाए गांव चले जाओ , दर्शन हो जाएंगे . उस दिन छोटे लाल जी मेरा प्रश्नोत्तर सुनकर , संतुष्ट होकर चले गए और बाद में मेरे लिए सबसे बड़ा टेस्टीमोनियल उन्होंने जबानी जारी किया , कैम्पस में वे यह कहते हुए सुने गए कि ये एक लड़का है यहां जो ज्योतिष जानता है , बाकी किसी को कुछ नहीं आता . बहरहाल मैं छोटे लाल जी द्वारा ली गई परीक्षा में पास हो गया था . और बहुत सी बातें हैं . अब छोटे लाल जी भी नहीं रहे , मेरा वो जूनून भी नहीं रहा , उस परिसर से भी आ गए , ये सब तो तब की बातें हैं .


Saturday, 14 April 2018

संगीत से मेरा वास्ता - १: बनस्थली डायरी .

बनस्थली डायरी : संगीत से मेरा  वास्ता.

एक दिन एक मराठी भाषी युवक , जो कुछ समय पहले संगीत विभाग में प्राध्यापक बनकर आया था, रवीन्द्र निवास में मेरे घर आया . उसे आकाशवाणी में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव के पद के लिए साक्षात्कार के लिए बुलावा आया हुआ था . आकर मुझे कहने लगा  :

"  आप मुझे इंटरव्यू की तैयारी करवा दोगे  ? "

मैं थोड़ा असमंजस में उससे मुखातिब हुआ . मेरा संगीत का ज्ञान और ख़ास तौर से शास्त्रीय संगीत का ज्ञान  रहा मुग़ल बादशाह औरंगजेब के जैसा , मैं भला उसे क्या तैयारी करवाता . ये आकाशवाणी और शिक्षा जगत में तब आवाजाही रहा करती थी वो बात भी चर्चा में आई थी पर वो बात आगे फिर कभी ...
मेरा संकोच और असमर्थता अपनी जगह थी पर वो युवक जो बोला उससे स्थिति कुछ स्पष्ट हुई और लगा कि इस बाबत कुछ किया जा सकता है .
वो कहने लगा:

" आप मुझे जनरल नॉलेज की तैयारी करवा देवो , मुझे आप के लिए ही बताया गया है , आप ये तैयारी करवा सकते हो ."

न जाने क्यों यह मान्यता है  कि जनरल नॉलेज का हल्का पॉलिटिकल साइंस से ताल्लुक रखता है , हालांकि जनरल नॉलेज इतनी जनरल होती नहीं, वो तो बहुत स्पेसिफिक होती है . खैर ...

अब आई तैयारी की बारी . मैं बताने लगा कि उसे संगीत के ही बाबत इस मामले में भी तैयारी करनी चाहिए . हम लोग बाहर वाले बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे कि मै  अंदर से पिछले दिनों के अखबार उठा लाया .
उन दिनों मैं देखा देखी में टाइम्स ऑफ़ इंडिया मंगवाया करता था .
कुछ ही दिनों पहले कुछ प्रख्यात संगीतकारों को पद्म सम्मान या तो घोषित हुए थे या वो लोग सम्मानित किए गए थे , मैंने उन्हीं के बाबत तैयारी की सलाह दे डाली . उनमें एक बड़ा नाम कुमार गन्धर्व का भी था जो अपनी विशिष्ट गायन शैली के लिए जाने गए थे . वे बनस्थली भी आ चुके थे ,  जब वो आए थे तो पटवर्धन साब बड़े वाले को संगीत सुनवाने लिवा ले गए थे और इस अबोध को गोद में बैठाए रखा था ताकि मेरी अगली पीढ़ी मेरी जैसी न बने . ये सब भी मुझे याद आया . खैर...

बात तैयारी की थी इन्ही सूत्रों को पकड़ कर इस युवा संगीत प्राध्यापक को मैंने जैसे तैसे तैयारी करवाई और वह कारगर रही इसका इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा की युवक ने लौटकर बताया कि सोची गई दिशा में ही इंटरव्यू चला और उसका चयन भी हो गया .
जैसे उस युवक की मनोकामना पूरी हुई वैसे ही आज की युवा पीढ़ी की भी मनोकामना पूरी हो इसी सद्भाव के साथ .
इति प्रातःकालीन सभा .

अपडेट :
गए बरस बनस्थली काल के संस्मरण पर आधारित ये पोस्ट भिवाड़ी में बैठकर लिखी थी .
आज फेसबुक ने याद दिलाई है ये बात .

आज दिन की मेरी अतिरिक्त व्यस्तता मुझे कोई नई पोस्ट लिखने की अनुमति देती नहीं लगती इसलिए इसे ही चर्चा के लिए प्रचारित करता हूं .
विचार कई उमड़ घुमड़कर  आ रहे हैं पर शान्ति से बैठने का समय नहीं मिलेगा  फिर चर्चा के लिए जारी :

जयपुर
शनिवार १५ अप्रेल २०१५ .
सूचना :
अपरिहार्य कारणों से नेहरू गार्डन जाना आज रद्द हुआ है ।
सब खैरियत है ।
जय भोले नाथ ।🔔🔔
सुप्रभात 🌅🌅
पी एस .
अगर संभव हुआ तो कोई लोक रंजक प्रसंग अभी अपलोड करूंगा । आप जुड़े रहो ।
सुमंन्त पंड्या ।
शनिवार १५ अप्रेल २०१७.
********************

आज दिन संस्मरण ब्लॉग पर प्रकाशित :

भिवाड़ी   रविवार १५ अप्रेल २०१८ .

Tuesday, 10 April 2018

हास्य सम्राट रंगलाल : बनस्थली डायरी

बनस्थली डायरी : हास्य सम्राट रंग लाल .

यदि आपने शांता कुञ्ज से सटे पुराने मेहमान घर में भोजन किया और रंगा जी से नहीं मिले तो आपने कुछ खो दिया यही समझ लीजिए .
भोजन हंसी ख़ुशी के वातावरण में ही हो रंगा जी इस सिद्धांत के प्रतिपादक हुआ करते थे . रंगा वो कड़ी भी है जो मुझे राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद से  जोड़ती है . उन्हें भी भोजन परोसा था और मुझे भी , केवल समय का अंतराल बीच में है .
छीले के पत्तों से बनी पत्तलों और दोनों में  भोजन परोसा जाता . दाल, चावल , सब्जी से लबालब भरी बाल्टी  से रंगा जी पत्तल में भोजन परोसने लगते तो दाल का दोना डगमगाने लगता , दाल पत्तल में बिखरने को होती और रंगा जी तुरत कहते :

"मैंने प्याज पहले ही दे दिया है , एक प्याज टुकड़ा लगाओ दोने के बराबर दोना रुक़ जाएगा ."

ये बात तो मुझे बार बार याद आती है कि भोजन के अंत से पहले पापड़ लाया जाता और मैं कहता :

" रंगा जी, पापड़  मुझे जाते बखत देना , पापड़ खाते रास्ता कट जाएगा और मैं घर  पहुंच जाऊंगा ."
रंगा जी तुरत कहते :
"ये तो आप अभी खाओ , जाते बखत दूसरा देऊंगा ."

और जब मैं चौक में टंकी के सामने हाथ  धोकर जेब से रूमाल निकाल रहा होता तो रंगा जी मेरे लिए दूसरा पापड़ लिए खड़े होते .
मेरे लिए उन्होंने दो बार  पापड़ का विशेष प्रावधान कर दिया था , यह मैं कैसे भूल सकता हूं .
अगर उस जमाने के रंगा जी से आप  मिले होते तो यह कहना सही होता :

"अब टेंशन जाएगा पेंशन लेने !"

किसी जमाने में शांताकुंज के द्वार पर छब्बीस नंबर का सार्वजनिक टेलीफोन हुआ करता था , रंगलाल याने रंगा जी वहां भी ड्यूटी देते .
फोन आने पर कह बैठते :

" मैं प्रोफ़ेसर रंगा बोल रहा हूं ."

ये वो ज़माना था जब संसद में  प्रोफ़ेसर रंगा का नाम हुआ करता था .
ये सुनकर दूसरी ओर से बोल रहे अभिजन कहते :

"रंगा , तू कब सुधरेगा ?"
ऐसे मेरे प्रिय जन रंगा जी को याद करते हुए .
इति प्रातःकालीन सभा .