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Thursday, 9 August 2018

एग्जामिनेशन तीन : राजस्थान विश्वविद्यालय .

एक्जामिनेशन  तीन : राजस्थान  विश्वविद्यालय :



  बात बहुत छोटी सी है . सोचा था ये बताई जानी चाहिए या नहीं फिर लगा बताए देता हूं . सप्रसंग बताता हूं.

मैंने सुना है और कुछ कुछ याद है कि मुझे गुस्सा बहुत आता था, कुछ बड़ा हुआ तो बात बात पर अब गुस्सा नहीं भी आता था , पर ये जो मामला बता रहा हूं ये थोड़ा गुस्सा जताने का ही है . लोकेशन मैंने शीर्षक में ही लिख दी है - एक्जामिनेशन सेक्शन तीन , राजस्थान विश्वविद्यालय ,जयपुर .

राजस्थान विश्वविद्यालय
.
   राजस्थान का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक विश्वविद्यालय जिसका फैलाव पूरे राजस्थान तक हुआ करता था और इसके परीक्षा प्रभाग का बहुत बड़ा कारोबार हुआ करता था . ये तब की बात है जब बनस्थली में मैं भी इसी विश्वविद्यालय के एक एफिलिएटेड कॉलेज में काम करने लगा था पर इस विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार दफ्तर में व्यक्तिशः जाने का तब तक कोई काम नहीं पड़ा था हालांकि मैं इसी परिसर से पढकर गया था .

मामला क्या था ?
     - अंग्रेजी विभाग , बनस्थली में वाजिद साब ( रशाद अब्दुल वाजिद साब ) तब वरिष्ठ प्राध्यापक हुआ करते थे और स्वाभाविक  रूप से विश्वविद्यालय की परीक्षा के परीक्षक भी थे . उनके पास जांचने  के लिए कापियों का बण्डल आया हुआ था और वो उसमें लगे हुए थे . ये बात थी अप्रेल के अंत और मई के आरम्भ की . मई के शुरु में छुट्टी शुरु होते ही मैं तो आदतन अपने घर जयपुर आ गया था . वाजिद साब की एकजामिनर्शिप से मेरा कोई वास्ता नहीं था 

मैं कैसे जुड़ गया मामले से ?
        एक दिन रात पड़े वाजिद साब जयपुर में मेरे घर आए और उन्होंने अपनी परिस्थिति बताई कि उनके अब्बू सख्त बीमार थे, जो कि वास्तव में नहीं ही रहे, और उन्हें बरेली जाना पड़ रहा था , वे कापियां जांचकर अवार्ड लिस्ट  तो पहले भेज चुके थे और कापियों का बण्डल जयपुर के  बनस्थली भवन में रख आए थेऔर मुझे कहने आए थे कि मैं बण्डल वहां चलकर उठा लेवूं और यूनिवर्सिटी के दफ्तर में जमा करवाने की जिम्मेदारी लेवूं .

   मैं बोला ," आप रिक्शा से आए , इसी में बण्डल भी पटक लाते , एक चक्कर तो बचता ."

पर जिसके पिता मृत्यु शैय्या पर हों उसे इतना ध्यान कहां रहता है , उन्हें तो घर पहुंचने की जल्दी थी और वो मुझसे ये मदद मांगने आए थे वो भी विश्वविद्यालय के हित में .

खैर इस परिस्थिति में मैं फिर गया उनके साथ बनस्थली भवन और रिक्शा में पटक कर  बण्डल अपने साथ घर ले आया . अब ये बण्डल मेरी जिम्मेवारी बन गया . उसी दिन पहली बार मैं बनस्थली भवन गया था और रामकृष्ण जी भाई साब से मिला था जो बनस्थली भवन के केयर टेकर हुआ करते थे .

अगले दिन  यूनिवर्सिटी रजिस्ट्रार आफिस :
--------------------------------------------     जैसा बण्डल मूझे मिला था फिर एक रिक्शा में डालकर मैं रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंचा जहां ये जमा होना था . पता किया  ये एक्जाम सेक्शन तीन में जमा होना था सो मय बंडल वहां पहुंचा . वहां एक कठिनाई आ गई कि बण्डल के साथ स्टेटमेंट का एनवलप और होवे तब ही ये बण्डल जमा हो सकता है अन्यथा नहीं . ऐसा कोई लिफाफा मेरे पास तो था नहीं . जिन्हें बण्डल ले लेना चाहिए था वो बाबू लोग बण्डल लेवें नहीं , जिन्हें लिफाफा बनाकर देना चाहिए था वो मौके पर मौजूद नहीं , मेरे पास उनसे संपर्क का कोई जरिया नहीं . कुल मिलाकर मेरे लिए अजीब मुसीबत कि क्या करूं इस बण्डल का . केवल इतनी  राहत की बात थी कि बण्डल पर एक्जामिनर नंबर अलबत्ता लिखा हुआ था . इस कथा में इतना तो साफ है कि इस बण्डल को मैं पहले दिन से  ढोते ढोते परेशान हो चुका था और अब इससे निजात चाहता था .
इस मामले में मैं  असिस्टेंट रजिस्ट्रार साब से मिला तो उन्होंने भी वही नियम की बात कही हालांकि सारी बात मैं उन्हें समझा चुका था .

ए आर साब की बात सुनने के बाद मुझे तय करना था कि मेरा अगला कदम क्या  हो,  जिस रिक्शा से बण्डल ढो कर वहां तक लाया था वो मैं पहले ही लौटा चुका था और सोच रहा था कि इसे कैसे ले जावूं और कहां ले जावूं .  तब मुझे सूझा और मैं ए आर साब से बोला :

" अगर आप इस बण्डल को जमा करने को तैयार ही नहीं हैं तो मैं भी अब इसे लेकर कहीं नहीं जाऊंगा , यहीं दफ्तर के बाहर रखकर इसे आग लगा दूंगा......."

मेरा इतना कहना था कि ए आर साब को बात समझ आ गई और बोले:
" नहीं नहीं आप ऐसा मत कीजिए ...   मैं करवाता हूं जमा."

उन्होंने मुझसे ये जरूर कहा कि इस बाबत मैं अपनी ओर से एक पत्र लिखकर दे देवूं साथ में  और मैंने वहीँ उनकी सीट के सामने बैठकर वो पत्र लिख कर उनके सुपुर्द कर दिया .
बण्डल जमा हो गया और राजिट्रा्र दफ्तर ने उसकी एक औपचारिक रसीद भी इस बाबत दे दी . मेरा भी सिर दर्द मिटा .

बरसों पुरानी बात हो गई पर ये वो दिन था जब मैंने थोड़ा सा गुस्सा दिखाया था , परिस्थिति की मांग ही कुछ ऐसी थी .

इस छोटे से संस्मरण के साथ प्रातःकालीन सभा स्थगित .

प्रसंग समीक्षा :  Manju Pandy.

जब ये चर्चा चली कि मैंने ऐसा किया तो इस पर सुभाष गुप्ता साब . जो आर्गनाइजेशनल बिहेवियर के विशेषज्ञ हैं , ने इस व्यवहार की व्याख्या इस प्रकार की ; 

" There is a difference between 'losing temper' and 'using temper'. It is a good example of using temper appropriately. "

डाक्टर चंद्रिका मालिक ने साफ़ कहा :

"It was losing temper constructively..."

और इस प्रकार लगभग सभी ने मेरे व्यवहार की संस्तुति की . अभी अभी जीजी ने कहा कि ऐसा ही करना चाहिए था , अनन्त ने कहा कि ग़ुस्सा करना शायद समय की माँग थी .

टीका सहित ब्लॉग पर प्रकाशित 

@ जयपुर  १० अगस्त २०१८.

Saturday, 17 March 2018

गैस एजेंसी में : आप क्या थे सर ?

गैस एजेंसी में : " आप क्या थे ? " 


ये भिवाड़ी आने से कई दिन पहले की बात है , अचानक याद आई कि बता दूं , ये वाकया भी जिसमेँ हुआ संवाद ही मेरे अस्तित्व को चुनौती देता लगा था मुझे .

गैस बुक कराता हूं , हो गई बुक , अब ये भी टंटा है मोबाइल फोन से ही होती है गैस बुक . माने फोन न हो तो आप गैस उपभोक्ता ही नहीं हो सकते .

हो गई गैस बुक ऑन लाइन और माना कि आ जाएगी सप्प्लाई मगर सन्देश तो कई आए , बिल नंबर भी आ गया , रवानगी भी बता दी सिलेंडर की और डिलीवरी भी इधर तो सप्लाई आई ही नहीं . ये सब सन्देश तो कंपनी से आते रहे गैस एजेंसी को भेजनी थी गैस सो उसने नहीं भेजी . रोटी तो आजकल गैस पर सिकती है संदेशों से नहीं भरता ये पापी पेट . मुझे लगा अब एजेंसी से ही बात करनी चाहिए सो की बात . लंबे प्रयास से नंबर मिला बताया गया कि मेरा खाता बंद कर दिया गया क्योंकि लंबे अरसे से गैस जो बुक नहीं हुई थी . मूल कागजात , अपनी पहचान बैंक पासबुक आदि लेकर स्वयं एजेंसी में हाजिरी देवूं तो ही यह खाता खुल सकता है . अब खाता तो खुलवाना ही था सो सब कुछ जुटाकर गया गैस एजेंसी और बंद खाते का ताला खुलवाया . 

इस बीच किसी और का फोन नंबर मेरे गैस खाते से जुड़ा दर्ज पाया गया , किसी और का ही उपभोक्ता नंबर था जिसके गैस डिलिवरी सन्देश थे आ तो मुझे रहे थे गैस कहीं और वितरित हो रही थी , इन सब की सफाई करवाई और तार्किक समाधान भी करवाया . जब तक सब गड़बड़झाला दूर नहीं हो गया मैं रहा वहां मौजूद . सिवाय " आधार " के सब कुछ तो था मेरे पास तमाम तरह के अपने आई डी , गैस उपभोक्ता होने के कागजात , बैंक खाते की पासबुक और मैं खुद एक पुराना उपभोक्ता जिसने यह कहा था कि अब तक सेवाओं से संतुष्ट रहा और अब कुछ शिकायत लेकर आया हूं . ये तो मैं खुद था मौजूद तो हो पाया समाधान . अगरचे मैं न होता मौजूद तो कैसे होता ये समाधान ये ही सोचता रहा .


ये सब तो दुरुस्त पर जो बातचीत वहां हुई वह भी तो बताऊं . एजेंसी के अधिकारी ने पूछा :


" आप किस डिपार्टमेंट में हैं? "


मैं बोला: " मैं किसी डिपार्टमेंट में नहीं हूं , क्या आपके लिए इतना जानना काफी नहीं होगा कि मैं सीनियर सिटीजन हूं . "


अधिकारी फिर भी बोला :

  " आप क्या थे ? "

मैं फिर बोला :

" अरे मैं ' था ' नहीं , मैं ' हूं ' . मैं अब भी हूं और आप क्या थे ऐसा पूछ रहे हैं ? ऐसे तो किसी और से पूछिएगा जब मैं न होवूं ."


खैर वो जो जानना चाहते थे वो मैं भी समझता था और अच्छे से समझा भी दिया मैंने पर ये सोचने को बाध्य जरूर हुआ कि सीधी साधी उपभोक्ता आवश्यकताओं से भी ये प्रश्न क्यों जुड़ जाते हैं . सीधे से उपभोक्ता को मान्यता क्यों नहीं मिल जाती .

आखिर हो गया समाधान और साक्षात प्रधानमंत्री की आवाज में मेरे पास इस बाबत टेलीफोन भी आ गया , अवश्य ही आप सब के पास तो पहले ही आ चुका होगा , मेरा ही खाता बंद पड़ा था सो कुछ देर हुई .


फिर एक बार दोहराऊंगा मैं था नहीं , मैं हूं ना . गैस उपभोक्ता हूं और रहूंगा अभी तो . मुझे राइट ऑफ करके कोई मुझसे बात न करे अभी हाल .


Monday, 8 January 2018

ज्योतिष ज्ञान : जयपुर डायरी .

ज्योतिष ज्ञान
१.
  ये पिछली शताब्दी के उन दिनों की बात है जब ज्योतिष का जुनून मेरे सिर पर सवार था और होनहार कुछ ऐसी थी काका भी ज्योतिष में दखल रखा करते थे .

आज भी काका याद आ जाते हैं , जो असमय चले गए , तो उन की एक सीख बहुत याद आती है वही आज बताने का मन है . हालांकि एक  जोखिम भी है कि इस मामले में बात भर करने पर मैं दकियानूसी , अंधविश्वासी समझा जावूंगा जो शायद मेरे बारे में सही न हो पर मैं भी अपने बारे कितना जानता हूं वो अलग बात है . यही तो मानव मन का एक दुर्बल पक्ष है कि अच्छे भले लोग अपने ही कर्मों का फल लाल बुझक्कड़ से पूछने जाया करते हैं , भविष्य के बारे में अटकल सभी लगाया करते हैं . जो भविष्य के बारे में मन गमती बात कह दे वो आदर का पात्र बन जाया करता है . खैर इस विचार विमर्श को स्थगित कर मुद्दे की बात पर आवूं जो मुझे आज बताने का मन हो आया है .

एक  दिन काका हमारे शहर वाले घर आए हुए थे और मैं कई प्रकार के पंचांगों और मिस्टिक साहित्य में उलझा हुआ था कि काका कहने लगे :

“ सुमन्त , अच्छा है तू ये सब करने लगा है पर कभी किसी की मृत्यु की ज्योतिष मत करना . अगर मर जाएगा तो तुझे उलाहना देने नहीं आएगा और जो बच गया तो जिंदगी को तेरी दी हुई सौगात समझेगा . “

बड़ी मार्के की बात बता दी थी काका ने . उस दिन का दिन है और आज का दिन है कभी किसी को खोटी बात नहीं बताई .

मेरे कई आत्मीय जनो ने तो तब यहां तक कहना शुरु कर दिया कि मुझे वाक् सिद्धि ही प्राप्त हो गई है .

ये भी संयोग  ही है कि जिस दौर की बात है तभी मैंने चश्मा लगाना शुरु किया था , मैं तब चश्मा उतार कर कहा करता था :

“ ये मेरा चश्मा ही कुछ ऐसा है कि इसमें कोई खोटी बात दिखाई नहीं देती .”

और हुआ भी कुछ ऐसा कि जिसके साथ अनर्थ ही होना होता वो मेरे सामने पृच्छक बनकर आता ही नहीं .

खैर ये सब उस जुनूनी दौर की बातें हैं जो बरबस याद आ जाती हैं .

उस दौर के मेरे संपर्कों को याद करते हुए , काका को याद करते हुए , पिछड़ा समझे जाने के खतरे को झेलते हुए , जीवन संगिनी की समीक्षार्थ आज की पोस्ट प्रस्तुत करते हुए ~

प्रातःकालीन सभा स्थगित .


ये है काका का एक यादगार फ़ोटो जब वे जैसलमेर गए थे और विनोद के सरकारी बंगले पर ठहरे थे .

२.     ज्योतिष और मेरी परीक्षा  :  छोटे लाल जी द्वारा.



वैसे  तो  ये दो अलग अलग मामले हैं , ज्योतिष  से मेरा वास्ता और छोटे लाल जी पर यहां दोनों बातें साथ आ रही हैं , ज्योतिष का प्रसंग भी और और छोटे लाल जी का उल्लेख भी . ये बात उन दिनों की है जब मैं  बनस्थली में था  और ज्योतिष में हस्तक्षेप करने लगा था . पता नहीं क्यों ज्योतिष को लेकर सबके ही मन में कुछ न कुछ  कौतुक रहता ही है . मैं इस मामले में  अधिक से अधिक लोगों से अटकने को उन दिनों तत्पर रहता था .  ऐसे  ही एक दिन  क्रिसमस के कारण अवकाश था , उद्बोधन मंदिर में कार्यक्रम  में सम्मिलित होकर मैं घर आया था और अनायास ही प्रोफ़ेसर छोटे लाल जी मेरे घर 44 रवीन्द्र निवास चले आये .

वे क्यों आये ये मेरे मन में प्रश्न था पर उनके मन में भी कोई प्रश्न ही था और  उन्होंने  अपना मंतव्य भी कह  दिया :  मेरा मूक प्रश्न है  और उसका उत्तर दो .


छोटे लाल जी ने मेरे सामने एक परीक्षा की स्थिति उत्पन्न कर दी थी ,  प्रश्न भी बताना था और उत्तर भी देना  था . मेरा राजनीति शास्त्र के  प्रश्नपत्रों  से तो वास्ता पड़ा था पर ज्योतिष का मेरा ज्ञान तो था जैसा ही था ,  जीवन के प्रश्नों का भला मेरे पास क्या उत्तर था  और वो भी यदि  मूक प्रश्न है तो वह क्या  प्रश्न है भला मुझे क्या पता .  खैर अब परीक्षा तो मेरी थी , या तो पास होना था या फेल . मैंने सोचा प्रयास करने में क्या हर्ज है  और मैं पंचांग  तथा कागज़ कलम लेकर  बैठ गया और यह  दरसाया कि किसी गंभीर गणना में  व्यस्त हूं . प्रश्नलग्न  बनाया और  अपने आप  से प्रश्न किया कि मन का स्वामी  कौन है  ,उत्तर मिला कि चन्द्रमा है . चन्द्रमा कहां बैठा है ?  चौथे भाव में जो मां का घर है . मुझे एक सूत्र मिल गया था , मैंने कहा :  डाक्टर साब प्रश्न मां के बारे में है  .  वे सहमत  दिखाई दिए , अब मुझे बात बताना कुछ आसान लगा . मैंने कहा :  आपको उनके बारे में ही चिंता है आप  बिना कोई समय गंवाए गांव चले जाओ  , दर्शन हो जाएंगे . उस दिन छोटे लाल जी मेरा प्रश्नोत्तर सुनकर , संतुष्ट होकर चले गए  और बाद में  मेरे लिए  सबसे बड़ा टेस्टीमोनियल उन्होंने  जबानी जारी किया , कैम्पस में वे यह कहते हुए सुने गए कि  ये एक लड़का है यहां जो ज्योतिष जानता है , बाकी किसी को कुछ नहीं आता .  बहरहाल मैं  छोटे लाल जी द्वारा ली गई परीक्षा में पास हो  गया था . और  बहुत सी बातें हैं . अब छोटे लाल जी भी नहीं रहे , मेरा वो जूनून भी नहीं रहा , उस परिसर से भी आ गए , ये सब तो तब की बातें हैं .






Friday, 5 January 2018

पहले ही दिन इम्तिहान  ? भाग एक . जयपुर डायरी .

पहले ही दिन इम्तिहान ? भाग एक .


ये तब की बात है जब मैं बेटे को पड़ोस के एक स्कूल में प्रवेश दिलवाने गया था . प्रवेश की औपचारिकता से पहले यह आवश्यक बताया गया कि एक परीक्षा देनी होगी . उस समय मैं ही आवेदन लेकर गया था अतः मैं तो प्रिंसिपल महोदया के पास बैठा रहा और और एक अन्य अध्यापिका बालक को परीक्षा के लिए दूसरे कक्ष में ले गई . भला हो उन स्कूल वालों का कि मुझे कोई परीक्षा नहीं देनी थी वरना बड़े स्कूलों में तो माता पिता को भी परीक्षा देनी होती थी उन दिनों . खैर मैं प्रतीक्षा कर रहा था कि देखे क्या नतीजा निकलता है तभी वो अध्यापिका लौटकर वापस आयीं और बच्चे को साथ लाईं , कहा : " इसने तो कुछ नहीं किया ." मैंने प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका दोनों देखे . वास्तव में बच्चे ने कुछ भी उत्तर नहीं लिखे थे , न सही और न गलत . जो कुछ पूछा गया था वह उसे आता था , यह मैं जानता था पर उसने उत्तर न लिखना मुनासिब समझा सो नहीं लिखा यह स्पष्ट था . अब क्या हो ? मैंने निर्णय प्रिंसिपल साहिबा पर छोड़ दिया . कक्षा एक का प्रगति विवरण उनके सामने था , कक्षा दो में प्रवेश दिया जाना था सो उन्होंने स्वीकृति दे दी और मेरी तात्कालिक चिंता दूर हो गई . 


स्कूल में प्रवेश मिल गया था और मैं बेटे को लेकर घर लौट रहा था तब अकेले में मैंने उससे पूछा : " बेटा , उस पेपर में ऐसा तो कोई सवाल नहीं था जो तुझे न आता हो , फिर तूने इम्तिहान क्यों नहीं दिया ? "

उत्तर में बेटा जो बोला वो इस प्रकार था :" पढ़ाया लिखाया कुछ नहीं , पहले ही दिन इम्तिहान , नहीं देता इम्तिहान !!! “

जिस आत्मविश्वास से इम्तिहान न देने का तर्क उसने दिया था वह मुझे समझ में आ गया था.


Saturday, 2 December 2017

पोरंपरा ... आगे की बात : बनस्थली डायरी .

पोरम्परा : मरदाना धोती की बात ~~ आगे की कहानी  


 अन्य बातों में उलझकर कहीं ये प्रसंग पहले से छेड़ा हुआ है , भूल में न पड़ जाए , छूट न जाय इसी लिए इस पर आज बात .....

मैंने पहले बताया था कि कैसे एक सीधे से हिन्दुस्तानी आदमी ने मुझे धोती का महत्व समझा दिया था और मेरे पहनावे में धोती जुड़ गई थी । अरविन्द और विवेकानंद के लेखों ने मेरे पहनावे को वैचारिक आधार दिया था । किन्हीं आर्चर महोदय के एक लेख : is indin civilized ..? के जवाब में अरविन्द ने पूरी एक किताब ठोक दी थी Foundations of Indian culture नाम से और हर बार ये सवाल पूछा था कि क्या अब भी कुछ सन्देह रहा ? विवेकानंद ने इससे पहले ही अपने लेख Modern india में उस धारणा को उठाया था कि हिंदुस्तानी लोग कमर के नीचे कपड़ा लपेट लेते हैं । ये पश्चिमी सभ्यता की ओर से खिल्ली उड़ाने वाली बात थी । विवेकानंद ने उस मखौल का जवाब देते देशवासिओं का आवाहन किया कि भारत माता के सच्चे सपूत हो तो कमर के नीचे कपड़ा लपेटो । न तो मुझे विवेकानंद बनना था न अरविन्द बहरहाल धोती मैं पहनने लगा था और सब जगह धोती ही पहनता था घर बाहर बाजार से लगाकर शासन सचिवालय तक कहीं जाने में संकोच नहीं था । 

कई एक अनुभव :

    राजीव (राजीव मेहता ) आए । धोती पहने मुझे देखकर बड़े खुश हुए और खुद भी धोती पहनना चाहा 

मैं तो लाया ही धोती जोड़ा था , एक उन्हें पहना दी । वे चाहते थे  कि अब कही चलें ! कहां चलें तो तय रहा कि दोनों के दोनों छोटे भाइयो के दफ्तर चलें , वैसे तो राजीव भी मेरा छोटा भाई ही है । एक कठिनाई थी कि राजीव एक भारी मोटर साइकिल लाया था , पर वह भी सहज हल निकल आया । एक विज्ञापन आता था जिसमें दूध वाला मोटर साइकिल पर धोती पहन कर बैठता था । विज्ञापन तो मोटर साइकिल का था पर हमारा संशय दूर हो गया । जो वो कर सकता है.... हम क्यों नहीं ? मैं और राजीव दोनों दोनों गंतव्यों पर क्रमशः गए अपोलो टायर्स के दफ्तर और शासन सचिवालय , दोनों के दोनों छोटे भाइयों के पास । दोनों जगह हम कार्टून कहलाये पर इससे न तो राजीव निरुत्साहित हुए और न मैं । राजीव उन दिनों International cooperative alliance में काम करता था और देश देशान्तरों में अब कोई एक धोती नहीं धोतियां ले गया । मुझे तो बनस्थली जाना ही था , वहां मेरा धोती का पहनावा जारी रहा......


बनस्थली का एक रोचक प्रसंग कहकर आज की बात को विराम दूं :


मैंने एक बंटवारा कर कर रखा था ।एक दिशा में पढ़ाने जाता तो खादी का सफारी पहनकर जाता ,दूसरी दिशा में मेहमान घर खाना खाने जाता तो धोती कुरता ही पहनकर जाता । मेहमान घर में जमीन में बैठकर पट्टे पर पत्तल दोने में भोजन होता । यह सब चल ही रहा था कि एक दिन कुछ दो पारियों के बीच समय की कमी के चलते इधर की पोशाक में ही उधर चला गया । देखने वाले के मन में आपकी एक प्रतिमा | इमेज बन जाती है वही कह रहा हूँ । वहां खाना बनाने वाली बाई जी उस दिन मुझे देखकर बोली :


“   भाई साब... आज तो अंग्रेजी पोशाक मैं ! “


शेष फिर कभी ...... ये पोरम्परा की कहानी जरा लंबी है .....

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ब्लॉग पर प्रकाशित 

जयपुर 

रविवार  ४ दिसम्बर २०१७ .

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Monday, 27 November 2017

देबू जी महाराज की जय  :  बनस्थली डायरी .

कल दोपहर शिवाड़ एरिया में .......बनस्थलीडायरी के अंतर्गत समाविष्ट चर्चा  .


आजकल राम स्वरूप जी एक वैन में सब्जी बेचने इधर आते हैं , उणियारा के मूल निवासी राम स्वरूप जी घर बैठे जरूरत की सब्जी और फल दे जाते हैं मेरे घर के बाहर भी आकर रुकते हैं , सब्जी भी ले लेता हूं इतनी देर में दो बात भी होती है । परसों कुछ ऐसा हुआ कि मैं किसी काम से बाहर चला गया , जीवन संगिनी नहाने चली गयी और राम स्वरूप जी ’ सब्जीईईईई ." की आवाज लगाकर चले गए । कल भी जीवन संगिनी लगभग उसी समय बाजार चली गयी जब उनका आना हुआ । सारा दारोमदार मुझपर ही था । कहीं आज भी मेरी गैर हाजिरी न लग जाए इसलिए मैं थोड़ा सतर्क रहा ।


  राम स्वरूप जी बाबत और भी बताता चलूं , वे बातें यही कह देना ठीक रहेगा । वे पहले घोड़ा गाड़ी लेकर आते थे । घोड़ों से मेरा लगाव मेरे बनस्थली के सेवाकाल से रहा है , जो कई एक प्रसंगों में मेरी याद में आ ही जाता है । @ भगवान देव नारायण उनके देवता हैं । देबूजी महाराज का मंदिर मेरे सेवा क्षेत्र के निकट ही है । बहरहाल उणियारा और बनस्थली एक ही जिले के भाग हैं । 

     जब राम स्वरूप जी घोड़ा गाड़ी लेकर आते तो यहां होने पर श्रद्धा की बेटी उर्वी घोड़े पर जरूर बैठती । उस पर बैठकर फ़ोटो भी खिंचवाती । ये बदलाव तब आया जब उनका घोड़ा मर गया । अब तो मैं भी देबू जी के स्थान और घुड़सवारी मैदान वाले परिसर से थोड़ा दूर आ बसा हूँ ।


   कल की बात पर लौटूं । राम स्वरूप जी की आवाज दो मकानों की दूरी पर खड़े विद्या अपार्टमेंट्स के बाहर से कुछ बुलंद स्वर में  

 ऐसी सुनाई दी मानों वो गुलमोहर * के बाहर ही आ गए हैं । आवाज सुनकर मैं बाहर चला आया । लेकिन राम स्वरूप जी तो वो ही दो मकान की दूरी पर थे , याने विद्या अपार्टमेंट्स के बाहर । मैं यहां खड़ा न रहकर वहां तक चला गया । गलती शायद वहीँ कर बैठा , दो प्रकार से 1 झोला मेरे पास नहीं था जो एक ऐसा उपकरण है जो मेरे कंधे पर लटक जाता है और मेरा काम काज का बांया हाथ खाली रहता है । 2 मैं वहां तक गया ही क्यों , जबकि राम स्वरूप जी तो यहीं आने वाले थे । पर होनी को कौन टाल सकता है , बलवान होनहार मुझे वहां ले गयी ।

~ बाबूजी यहां तक क्यों आये , मैं तो वहीँ आ रहा था । वे बोले ।

~ कल मैं घर नहीं था , ऐसा न हो कि आप सीधे निकल जाओ मैं बोला ।


~खैर , अब यहीं सही ।


          गोभी, मटर जैसी निरापद सब्जियां थोड़ी तादाद में ले ली गईं । संतरा , सेव और अमरूद भी ले लिए गए । आदतन धनिया भी उन्होंने डाल दिया । मेरी आवश्यकता न होते हुए मिर्ची भी डाल दी । छोटी बड़ी दो थैलियां उन्होंने मुझे पकड़ा दीं । बहुत भारी सामान होता तो वे कमलेश को भेज देते या मेरे घर के बाहर से निकलते हुए उतार जाते पर उन्होंने मुझे वहां से सुरक्षित रवाना कर दिया और मैं इधर आने को चल दिया । अपने सब्जी खरीद अभियान की सफलता से मन ही मन प्रसन्न मैं विद्या अपरमेंट्स की ओर से गुलमोहर की दिशा में चला आ रहा था कि एक अप्रत्याशित परिघटना हुई जिसकी मुझे दूर दूर तक आशंका नहीं थी ।


   रामेश्वरम ( किक्की भाई साब का आवास ) के बाहर तक आते आते न जाने कैसे एक काली मोटी गाय का निशाना मैं बन गया । गाय की हमारे घर में अम्मा के जमाने से पूजा होती आई है , जीवन संगिनी आज भी गाय की पूजा करती है पर गौ माता एक बार बनस्थली में आक्रामक होकर उनकी ओर ऐसी बढ़ी थी कि उन्हें धराशायी करके ही वापस लौटी थी । मैं पहुंचा पर बचा नहीं पाया , मुझे बहुत आत्मग्लानि भी हुई थी कि इनकी तो रक्षा का मैंने शुक्ल जी के सामने वचन दिया था , उस वचन का क्या हुआ ? गाय थी कि मुझपर झपट रही थी । इधर शिवाड़ एरिया में दो जमाने साथ साथ चल रहे हैं । कुछ पचास साठ साल पहले से रह रहे लोग अभी भी कई कई गायें पालते हैं और दुग्ध व्यवसाय करते हैं । ये लोग गायों को दिन में खुला छोड़ देते हैं , उन्हीं में से किसी की ये गाय रही होगी । आसन्न संकट को भांपकर मैंने दोनों थैलियों सहित दोनों हाथ विश्राम की मुद्रा में पीछे की ओर किये तो गौ माता मेरी परिक्रमा करने लगी । अब मैं चक्कर लगाने लगा , लगा कि या तो मैं चककर आने से गिर पडूंगा या ये गौ माता मुझे वैसे ही धराशाई कर के मानेगी जैसे उस दिन इसकी बहन जीवन संगिनी को बनस्थली में धराशाई कर गई थी । उस दिन इनकी रक्षा मैं न कर पाया था , शायद इसी का दंड मुझे मिलने जा रहा है ।


परिवेश का विवरण और परिदृश्य :  

     जब गौ माता की गिरफ्त में ही आ गया तो मैं इस दृष्टि से चारों ओर झांका कि आपात सहायता कहां से मिल सकती है ? राम स्वरूप जी और उनके सहायक कमलेश को तो मैं इतना पीछे छोड़ आया था कि वो दोनों या उनमें कोई एक भी मौक़ा ए वारदात तक पहुंच ही नहीं सकता था । सामने यादव जी के घर के बाहर कई एक लड़कियां खड़ी खड़ी बातें कर रही थीं , जिनमें से कुछ की निगाह इधर भी थी । वे मेरी दुर्दशा की गवाह तो थीं पर मेरी कोई सहायता कर सकेंगी ऐसा मुझे नहीं लगा । यादव जी के घर में केवल लड़कियों के लिए छात्रावास जैसा है । इसी कारण यह लड़कियों का एक छोटा समूह वहां था । इतने में मैं क्या देखता हूँ कि एक मोटर साइकिल पर सवार लड़का भी वहां किसी प्रतीक्षा में खड़ा है । मरता क्या न करता , मैंने उसी से सहायता चाही :


           अरे मोटर साइकिल वाले लडके आ और मुझे गाय से बचा ।


  लड़का परिस्थिति को भांपकर मेरी आवाज सुनकर ही इधर मुड़ा था वरना तो वो दूसरी तरफ देख रहा था और परिस्थिति से पूरी तरह अनभिज्ञ था । लडके ने बैठे बैठे ही अपनी सवारी मोटर साइकिल की दिशा बदली और पलटकर आगे बढ़कर मोटर साइकिल को गाय की ओर बढ़ाने का उपक्रम करते मेरे और गाय के बीच जगह बना ली । मय अपनी सवारी के यह लड़का मेरी सुरक्षा के लिए ऐसे खड़ा हो गया जैसे मैं किसी दुर्ग में खड़ा हूं । मैं अपनी सुरक्षा के लिए आश्वस्त होकर गुलमोहर * की रैम्प तक सुरक्षित आ गया । फाटक खोल कर अंदर आ गया । हाथ खाली कर मैं उस लडके का आभार व्यक्त करने को दरवाजे के बाहर फिर गया , पर तब तक वो जा चुका था ।


    मैं तो यही कहूं कि साक्षात् भगवान देव नारायण आये आज के ज़माने के इस मशीनी घोड़े पर सवार होकर और उस घड़ी मेरे सुरक्षा प्रहरी बन गए ।


* मेरा जयपुर आवास ।


इति प्रातःकालीन सभा के लिए ।


शुभ प्रभात


Good morning !


नोट : ये मरखनी गाय की कहानी और भी पहले से मेरे जीवन में आई हुई है जिस पर अलग से पोस्ट लिखूंगा । आज इतना ही समय मिल पाया कि कल का तात्कालिक अनुभव ही लिखा । समयाभाव के चलते रही कमी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं ।#Debuji_maharaj.


28 नवम्बर 2015 

--------------------- विगत वर्ष की इस पोस्ट को साझा करने की गरज से फिर से जारी करने का प्रयास कर रहा हूं .


अपडेट :

आशियाना 28 नवम्बर 2016 .


बोलो :

देबू जी महाराज की जय 👍

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आज के लिए ये पोस्ट ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर  

मंगलवार  २८ नवम्बर २०१७ .

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Friday, 24 November 2017

बोध कथा :  “ होयली तो अब “

बोध कथा : " ....होयली तो अब ! "

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भिवाड़ी से नमस्कार 🙏🌻


आज एक राजस्थानी बोध कथा का उल्लेख करता हूं और इसकी व्याख्या के अधिकार सार्वजनिक करता हूं , वैसे भी किसी लोक कथा पर मैं कौनसा एकाधिकार जता सकता हूं .


मैं एकाधिकारवादी सोच का अनुयायी नहीं हूं , आप तो जानते ही हैं .


कथा प्रारम्भ :

********* कथा एक तांत्रिक की है जो श्मशान में जाकर जाने क्या क्या विचित्र साधना किया करता था और उसकी स्त्री इन सब गतिविधियों से दुखी रहा करती थी जो बड़ी स्वाभाविक सी बात है .


यहां तक तो बात बड़ी तार्किक है , ऐसे विचित्र लोग होते हैं और ऐसे में दुखियारी स्त्रियां होती हैं , समझ में आने वाली बात है .


तर्क से न समझ में आने वाली बात आगे आएगी वही बताने का प्रयास करता हूं .


क्या हुआ आगे ?

----------------- एक दिन तांत्रिक को श्मशान में एक खोपड़ी मिली जिसके भाल - कपाल पर ये अंकित था :


      " हुई तो कांई छै होयली तो अब ! "

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( अर्थात् अभी तो क्या हुआ है , होगा तो अब )


वैसे तो हिन्दू अंतिम संस्कार में खोपड़ी की कपाल क्रिया कर ही देते हैं , खोपड़ी साबुत बचती ही नहीं . आश्चर्य था कि खोपड़ी साबुत थी . पर ऐसा भी खैर हो सकता है .


तांत्रिक को कौतुक हुआ कि अब आगे की होनहार क्या है ? और इसी कौतुहल के चलते वो तांत्रिक उस खोपड़ी को अपने साथ घर ले आया और एक ऊंचे आले पर रख दिया .


ऐसे जोड़े में गृह कलह तो स्वाभाविक है . आदमी तंतर - मंतर करता हो तो औरत कैसे सुखी रहेगी भला ?


एक दिन की बात : क्लाइमैक्स ऑफ द स्टोरी 💐

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औरत घर की कुछ साफ़ सफाई कर रही थी और उसी दौरान उसे ऊंचे आले पर रखी वो खोपड़ी मिल गई . अब उसका भी क्रोध जागृत हो गया . उसके क्रोध की वजह साफ़ थी कि अब तक तो ये आदमी श्मशान में जाकर ही तंत्र साधना किया करता था , अब जब उसने ये खोपड़ी घर ला रखी है तो वो अवश्य ही घर की स्त्री पर कोई तंत्र आजमाएगा .


क्यों आजमाए वो घर की स्त्री पर तंत्र ?


उस स्त्री ने अपने ढंग से आसन्न संकट का समाधान कर दिया .

उसने इमाम दस्ते से कूट पीट कर उस खोपड़ी का चूरा कर दिया और उसे तारत में फेंक आयी .

बिधना के लेख को कौन टाल पाया है .😢


राजस्थानी बोध कथा के लोकार्पण के साथ ही  

प्रातःकालीन सभा स्थगित .....


नोट : कुछ डिस्क्लेमर जोड़े जाने हैं जो अगले संशोधन में जोडूँग .


- सुमन्त पंड्या .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

    शुक्रवार 25 नवम्बर 2016 .

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गए बरस भिवाड़ी में थे तब लिखी थी ये राजस्थानी बोध कथा . आज इसका ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण किए देता हूं .

जयपुर 

शनिवार २५ नवम्बर २०१७ .

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Monday, 13 November 2017

“ ......... नहीं हैं तो करना ही क्या है ? “  जयपुर डायरी .




........नहीं हैं  तो करना ही क्या है  ?

  पिछली   शताब्दी  ( सहस्राब्दी भी ) के अंत में हम लोग शहर  के पैतृक आवास से चलकर बापूनगर में रहने आये  तब की बात है ।  आ तो गए थे  पर जुड़ाव  नाहरगढ़ रोड़ और चांदपोल बाजार से ही था , आज भी है ।  मेट्रो की तैयारी के नाम पर शहर खुद रहा है पर वहां जाने को मन करता है चाहे यातायात में कितनी ही दिक्कत आये । खैर ये तो तब की बात है जब यह उत्पात नहीं था ।


          नाहर गढ़ रोड़ के नुक्कड़ पर न्यूं लक्ष्मी जनरल स्टोर हुआ करता था जिसका मालिक उस समय गोवर्धन था । इससे दो पीढ़ी का चला आ रहा रिश्ता था जब गोवर्धन के पिताजी दूकान पर बैठा   करते थे तो काकाजी * भी उसके यहां से सामान खरीद कर लाते थे  । अब  हम लोग सामान खरीदते थे ।  उसे हमारी जरूरतों का भी पता होता घर में टूथ पेस्ट बीत रहा है और भाई लेने पहुंचा तो वो ये भी बता देता ,' ये रहने दो भाई  साब पहले ही ले जा चुके हैं ।'   


   शहर से बापूनगर आते हुए छोटा भाई विनोद Vinod Pandya , बहुतेरा सामान इकठ्ठा खरीदकर ला रहा था  ।  जेब में थे वो पैसे कम पड़ गए  । उसने सोचा कुछ आयटम कम कर दूं  जितने पैसे हैं  उतने का ही सामान ले चलूं । इस सोच के चलते  हजामत के सामान में से एक  मंहगा रेजर  गोवर्धन को लौटाया कि रकम कम हो जाए । ये रहने दो फिर कभी  ऐसा कहा ।


     खैर ये तो बात थी विनोद की तरफ से । अब बारी थी गोवर्धन के बोलने की और वो बोला :  साब इसे क्यों छोड़ जाते हो यही तो एक पुरुषों का सौंदर्य प्रसाधन * * है ।.... रही बात पैसों की तो  अगर  आप हैं  और हम हैं तो ये  गए ही कहां हैं  ...... और अगर नहीं हैं  तो इनका करना ही क्या है  ? खैर विनोद ने वो सामान भी ले लिया जो वो छोड़ रहा  था ।


अब तो हम लोग भी जनता स्टोर , बापू नगर और टोंक रोड़ के ग्राहक बन गए , गोवर्धन ने नुक्कड़ की वो दूकान छोड़ दी , बेटे को अशोका नाम से एक और दूकान खुलवा दी और खुद रिटायरमेंट ले लिया ।


उसकी  तब की कही दो बातें - पुरुषो का प्रसाधन और जेब में   पैसा बाबत मुझे याद रहीं , विनोद भी अवश्य इसकी पुष्टि करेगा ।

#स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी #sumantpandya

पुराना संस्मरण सर्वानुमति के आधार पर आज ब्लॉग पर प्रकाशित  —

जयपुर 

मंगलवार  १४ नवम्बर  २०१७ .

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Sunday, 12 November 2017

मन की उलझन : जयपुर डायरी

गुलमोहर कैम्प , जयपुर से नमस्कार 🙏

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कल इत्ती बात कही थी रेग्युलर पोस्ट के नाम पर और बात ऐसी अटकी के पूरी करने का ओसाण ही नहीं मिला .  भूल में न पड़े इसलिए तब तक कही बात यहां टीप देता हूं --

"   नमस्कार 🙏

सुबह खिचड़ी पोस्ट मांड़कर हो लिया था वर्धमान पार्क और वहां भी जित्ती देर बैठा रहा ये बात सोचता रहा पर ये गुत्थी सुलझी नहीं वही बताने का प्रयास कर रहा हूं .

कैसी गुत्थी ?

वो ही बताता हूं .

कल दोपहर अजीब उलझन में पड़ गया . अपने ही घर में जूतों के ढेर में  क़ई  एक अच्छे अच्छे जूते मिलें पर हर एक जूता एक पैर का और जोड़ी का जूता नदारद . अब क्या तो करो आप , एक बार को घर से निकलने  का विचार ही स्थगित करना पड़ गया .

दूसरा जूता न मिले तो एक मिला मिलाया भी बेकार .

ऐसा हो क्यों रहा है ये सोच सोचकर परेशान . मेरे साथ ये चोट की किसने ये बात भी समझ से बाहर . सिवाय जूतों के ढेर को कुखेरने के और क्या करता  ?

बहुत देर तक उधेड़बुन में रहा और उद्यम करता रहा पर कोई हल  न निकला .

गए दिनों मुझपर दबाव रहा कि मैं भी और लोगों की तरह मँहगे विदेशी जूते ख़रीद लेवूं और ठमके से चलूँ  , लगा ये उसी का दंड भुगतना पड़ रहा है , पर अब क्या करो आप . सच परेशान हो गया .

सच ये रम्बाद लम्बा चला .

इस रम्बाद के और पहलू  भी हैं पर अभी थक गया हूँ कुछ ठहर कर बताऊंग़ा .......

अधूरी बात पूरी करूंग़ा जरूर से ...."

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अब आगे --

मैंने कल  सुबह जो कुछ लिखा था उसे फ़ेसबुक पर अधूरी पोस्ट के रूप में जारी कर दिया था और आपने मेरी उलझन को सराहा उसके लिए तो आप सब  का जित्ता आभार व्यक्त करूं कम होगा पर बात आगे तो बतानी ही पड़ेगी --

ये मँहगे जूते के विचार और जूता जोड़ी के तालमेल में उलझकर जब मैं ख़ूब परेशान हो लिया तो मेरी आँख खुली और ये अहसास हुआ कि हालात यथावत हैं . पर आश्चर्य की बात ये कि मुझे ये ही लगता रहा कि अगर थोड़ा सा वक़्त और मिलता तो मैं कोई  न कोई जोड़ी का जूता ढूँढ ही लेता पर अब वो अवसर छिन चुका था  और मैं स्वप्न से वर्तमान में आ चुका था .

स्वप्न की व्याख्या

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१.

मनसाराम से मेरी दोस्ती और  देशी जोड़ी से मेरा लगाव शायद कहीं मेरे अंतर्मन में रहा हो जो ऐसे सपने का कारण रहा हो .

२.

एक जूता मिले और जूते की जोड़ी न मिले इसमें कोई प्रतीकात्मक संकेत तो नहीं है ?  ये भी कल सोचता ही रहा .

३.

मैं और जीवन संगिनी इत्तफ़ाक़ से ऐसा जोड़ा हैं जिनकी जूता नाप एक है  , क्या इसमें हम दोनों को जीवन के लिए कोई सीख है ? ये भी सोचने वाली बात है .

४.

स्वप्न की व्याख्या में विनोद ने बड़ीं मदद की  जिससे ही  ये पोस्ट आज पूरी हो पाई .ऐसे और कोई को कोई इंटरप्रटेशन सूझे तो वो भी बतावें अच्छा रहेगा

अब मनसाराम की बनाईं प्रीमियम जूता जोड़ी की फ़ोटो यहां जोडूंग़ा जो कल से पहनकर घूम फिर रहा हूं .

अथ श्री जूता पुराण समाप्त .

प्रातःक़ालीन सभा स्थगित .............

जयपुर

शनिवार ११ नवम्बर २०१७ .

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मेरी इस  "  मन की उलझन " को समझने में सर्वाधिक सहायक हुई प्रोफ़ेसर सुभाष गुप्ता की व्याख्या जो उनके शब्दों में यहां जोड़ता हूं  --

"  भाई साहब, सुप्रभात! कल उत्सुकता थी, आज का समापन अनपेक्षित और सारगर्भित। मुझे लगता है कि चूंकि "जुड़ाव ", "मित्रता", "प्रेम"आपका स्थाई भाव है, तो " बिछड़ना" आपका स्वाभाविक भय, जो सपने में जूतों के माध्यम से प्रकट हुआ। वैसे पंड्याजी (विनोद) मनोविज्ञान पढ़े हैं, ज्यादा बेहतर विश्लेषण कर सकते हैं।  "

आद्या जी का भी समर्थन मिला इस बात के लिए कि क़िस्सा ब्लॉग पर जोड़ा जाय .

आभार सभी टिप्पणीकारों का . क़िस्सा आज ब्लॉग पर प्रकाशित -

जयपुर 

सोमवार १२ नवम्बर २०१७ .


Tuesday, 24 October 2017

जयपुर डायरी — गुरु चेला संवाद  

पंडित जी का चेले से संवाद -

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“ छोरा पठ्ठा तू ज्यां ज्यां न पंडत समझै छै मैं सै न मूरख समझूं छूं ।”


“ म्हाराज मैं तो थां नै भी पंडत ही समझूं छूं ।”

गुरुजी निरुत्तर !!!!

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पंडित जी का चेले से संवाद ---

“ छोकरे पठ्ठे तू जिन जिन को पंडित समझता है मैं सब को मूर्ख समझता हूँ ।”


“ महाराज मैं तो आपको भी पंडित ही समझता हूँ ।”

गुरूजी निरुत्तर !!!!!

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क़िस्सा आज ब्लॉग पर प्रकाशित 🔔🔔

जयपुर 

बुधवार  २५ अक्टूबर २०१७ .

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Friday, 22 September 2017

पतरी पतरी पापरी ....: संध्या वंदन

संध्या  वंदन 🌷🌷
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#स्मृतियोंकेचलचित्र  #sumantpandya #जयपुरडायरी

आज जो बात बताने जा रहा हूं वो तो दुब्बी नामक एक छोटे से गांव के एक किसान की बरसों पहले कही बात है जो उसके सूक्ष्म निरीक्षण पर आधारित खरी बात थी  और किसी भी सुनने वाले को  मुस्कुरा देने को बाध्य कर देने जैसी बात  कहलाएगी आज भी . इस बात को बताने से पहले मुझे इस बात की  पृष्ठभूमि बतानी पड़ेगी सौ साल  पीछे  लौटकर . वही प्रयास करता हूं , बहुत सी बातें बताऊंग तब आप समझ पाएंगे उस भोले ग्रामीण की बात . इसमें मेरी , इसकी , उसकी  , सब की बात जुड़ेगी तब होगी बात साफ़ .
गए दिनों अपने अभिन्न  मित्र श्री गोविन्द राम  केजरीवाल को एक शाम मैंने टिप्पणी में कहा था कि अगली पोस्ट “ संध्या वंदन “ शीर्षक से ही होगी , उस वायदे का निर्वाह भी इस पोस्ट से हो जाएगा .
गए दिनों हम दिल्ली में थे  मैं घर  की बालकॉनी में खड़े खड़े सूर्यास्त का फोटो खींचकर  आपको भेजता और संध्या वंदन लिख देता  वो नई सभ्यता में गुड ईवनिंग कहने  का देशी चलन बनाया  , यहां गुलमोहर में आकर भी मैं सोशल मीडिया पर ,” अभी तो हम हैं “  ऐसा जताने को ऐसा कर देता हूं . पर सौ साल पहले जब हमारे घर में ये नई सभ्यता घुसी नहीं थी तब संध्या वंदन का एक विशिष्ट अभिप्राय था  वो था पूजा पाठ वैदिक ऋचाओं  का उच्चारण साथ में .
सम्प्रति पितृ पक्ष में इस प्रसंग को याद करके मैं  अपने पूर्वजों को भी याद करता हूं और उनकी जीवन शैली का भी अल्प उल्लेख आज करता हूं . देशी राज्यों का ज़माना था ये लोग अपने पांडित्य , ज्योतिष ज्ञान , आयुर्वेदिक चिकित्सा और ऐसे ही ब्राह्मणोचित लक्षणों के कारण जाने जाते थे . अतिराम जी के वंशज , मेरे पूर्वज  किस प्रकार  गुजरात से चलकर  राजस्थान आए वो कहानी  जैसी मैंने सुनी  वो अपने मिलने वालों को मैं यदा कदा सुनाया करता हूं  ,उस कथा के विस्तार में अभी मैं  नहीं जाऊंगा .
ये लोग अपना भोजन खुद तैयार करते थे और जैसा आज भी गुजरातियों की पतली पतली रोटी होती हैं  वैसी ही रोटी बनाते खाते थे . ऐसे ही एक पूर्वज के बारे में किस्सा है जो दुब्बी गांव गया था जो राज्य के द्वारा  अनुदान के रूप में उसे मिला था .

रोटी रोटी का फरक
******************   कृषक ग्रामीण की रोटी तो मोटी रोटी  होती है  और वो भी तब तो मोटे या  मिश्रित अनाज की  हुआ करती थी जिसे आप टिक्कड़ कह सकते हैं  . इसके विपरीत इस गुजराती मूल के व्यक्ति की रोटियां छोटी और  पतली पतली रही होंगी   जिनका उल्लेख आएगा ही अभी जब बात पूरी होने को आएगी . उस ग्रामीण ने इन महाराज की रोटियां भी देखीं और सायंकालीन गतिविधि भी देखी उसपर ही बात है .

  और अब संध्या वंदन 💐
------------------------       जब ये सज्जन , मेरे पूर्वज संध्या वंदन माने पूजा पाठ कर रहे थे तो उस प्रक्रिया के दौरान  विधान के अनुसार आचमन  की भी  क्रिया हुई . आचमन के अंतर्गत  उन्होंने एक आध चम्मच पानी भी मुंह में फेंका  और इस दृष्य को अपनी आंखों से देखकर वो भोला ग्रामीण  ठगा रह गया  . और फिर वो  जो बोला वो ही आज  इस किस्से का  मार्मिक वाक्य है  . ये एक मौलिक अभिवक्ति है जो इतिहास में दर्ज होने लायक है . कोई अनुवाद इस खूबसूरती से अभिव्यक्त शायद न कर पावे .
वो भोला कृषक बोला :

“ जब तो पतरी पतरी  पापरी न नै खाबे करो , खाबे करो  
अब चुच्ची न तै  पानी पी रो है . “ 😊

याने तब तो पतली पतली रोटियों को खाए गया  , खाए गया और अब चम्मचों से पानी पी रहा है .  याने इसने पानी के लिए भी जगह खाली न छोड़ी .

अब उस भोले किसान को संध्या वंदन और उसमें आचमन से क्या  लेना देना . वो जैसा समझा वैसा उसने कहा .

वे दिन और वे लोग ….
इति . 💐

संध्या वंदन 💐
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सुमन्त पंड्या .
@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .
गुरूवार 22 सितम्बर 2016 .

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ब्लॉग पर प्रकाशित
भिवाड़ी
22 सितंबर 2017 .

Wednesday, 28 June 2017

अतरा मनख जीम्या ..अतरा मनख जीम्या ... अठी तो .....

अतरा मनख जीम्या , अतरा मनख जीम्या , अठी तो खेरो ही नी आयो …। 


(१)


किसी ज़माने की मधुबन , उदयपर की बात है वही बताता हूं और ये बात क्यों याद आई ये भी ।


दलाल सदन में किसी रात बड़ी भारी दावत हुई , बहुत सारे लोग आए और देर रात तक चली दावत ।

अगले दिन सुबह का परिदृष्य ये था कि रात हुई दावत के प्रमाण घर के अहाते में बिखरे पड़े थे और बराबर के घर के अहाते में खड़े बुज़ुर्गवार ये बड़बड़ाते हुए सुने गए थे :


“ अतरा मनख जीम्या , अतरा मनख जीम्या …. अठी तो खेरो ही नी आयो !”


वे शायद बीती रात की दावत में आमन्त्रित नहीं थे , शायद ये ही खिन्नता का कारण रहा हो । ख़ैर , जो भी रही हो बात , मुझे तो कहन याद आ गई वो ही दोहराई है ।


(२)


एक और कहन है गोस्वामी तुलसी दास की , वो इस प्रकार :


“ सकल पदारथ हैं जग मांही। करमहीन नर पावत नाहीं ।।”


बातें याद क्यों आयीं ? वही बताता हूं ।


जयपुर के जवाहर कलाकेंद्र स्थित इंडियन काफ़ी हाउस में गए हुए थे घर के सब लोग और सब के लिए विभिन्न भोज़्य पदार्थ उपलब्ध थे जो सब के सब मौज शौक़ से खा रहे थे पर मैं उन में से एक के लिए भी अधिकृत नहीं था । मेरे लिए तो घर से रोटियाँ ले जाईं गईं थी मैंने वो ही खाईं । ये सब स्वास्थ्य कारणों से परहेज़ बरतने के कारण , ख़ैर मेरा पेट भर गया , कोई ख़ास बात भी नहीं वैसे ।

ऊपर से सब ने मँगाकर शरबत भी पीया मेरे लिए तो वो भी निषिद्ध था ।

ले देकर हारे के हरिनाम एक काफी ही बच रही थी जो मैं पी सकता था पर वो भी तो आती सी आवे । जब सब लोग शरबत का पूरा पूरा मज़ा ले चुके तब उसके बाद आई काफ़ी जिसमें तो ख़ैर और लोग भी मेरे साथ शामिल हुए ।


काफ़ी का ऐतिहासिक और सम सामयिक महत्व 

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बनस्थली में सेवाकाल के अंतिम दशक से लगाकर गए दिनों यहां और अन्यत्र रहने के दौरान भी मेरी भोर में काफ़ी बनाकर पीने की आदत ही रही । “ प्राइवेट काफ़ी डन “ ये भोर की जगार की एक स्टेटस रहती आई है । कुछ तकनीकी कारणों से ये गतिविधि भी गए कुछ दिनों से स्थगित रही , ये भी एक बात है ।

जब भी इंडियन काफ़ी हाउस गया , चाहे विद्यार्थी जीवन नें चाहे बाद में , काफ़ी पीने का तो शौक़ रहा ही था ।

ऐसे में जब उस दिन काफ़ी का प्याला एक अंतराल के बाद सामने आया तो उसकी फ़ोटो ये कहते हुए अपलोड की थी कि इस बाबत इबारत बाद में लिखूंग़ा ।

ये हुई आज वो बक़ाया इबारत पूरी ।

सुप्रभात 

नमस्कार 

सुमन्त पंड़्या 

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर ।

गुरुवार २९ जून २०१७ ।

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Friday, 9 June 2017

अजमेर यात्रा : पिछली शताब्दी की याद - स्मृतियों के चलचित्र 

अजमेर यात्रा : पिछली शताब्दी की एक याद .

_______________________________ #अजमेरयात्रा उस शाम मैं जयपुर के सिंधी कैम्प बस स्टैंड से बस बदलकर अजमेर जाने वाली बस में बैठा था और एक ख़ास निमित्त से अजमेर जा रहा था . अगले दिन मुझे महार्षि दयानंद विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के अधीन प्राध्यापकों के एक रिफ्रेशर कोर्स में भाषण देना था . 

पहला सवाल तो रात पड़े ठिकाने पर उतरने और पहुंचने का था .बचपन में कुछ महीने अजमेर शहर में रहा और स्कूल की ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ा भी था पर शहर के भूगोल का तब का ज्ञान बेमाने था . मैंने बस में नजर दौड़ाई कि तभी एक जाना पहचाना व्यक्ति दीख गया और तुरंत मेरी सहायता को मेरी सीट के पास मुझे समझाने को चला आया . ये रुजबेह नामक युवक था जो उन दिनों बनस्थली में मैनेजमेंट फैकल्टी में प्राध्यापक था और उस रात अपने घर अजमेर जा रहा था . उसने मुझे उस स्थान पर उतरने की सलाह दी जहां से मैं पैदल पैदल विश्वविद्यालय परिसर पहुंच सकता था और मैंने वैसा ही किया भी था .

सुविधा पूर्वक मैं गेस्ट हाउस तो पहुंच गया वहां मेरे ठहरने खाने की व्यवस्था थी , मेरा नाम दर्ज था , पर सवाल तो अगले दिन का था , बोलना क्या है ये तो तय नहीं था . मैं उसी परिसर में विभाग के मुखिया राजेन्द्र जोशी के घर पहुंचा , मुझे कोई ऐसा प्रसंग चुनना था जो अब तक इस जमावड़े में अछूता रहा हो . खैर उनसे मिलकर यह भी तय हो गया कि मैं हंटिंगटन के विचार " क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन " पर बात करूंगा और वही काम मैंने अगले दिन किया भी .


अब कुछ इतर बातें : 

_____________उस रात मुझे लगा कि जीवन संगिनी भी मेरे लिए वैसे ही चिंतित थीं जैसे मां बाप अपने अल्प वयस्क बालक के लिए चिंता करते हैं कि ठिकाने पर पहुंचा कि नहीं . मिसेज जोशी से मिलने पर पता लगा कि उनका फोन इस बाबत वहां पहले ही आ चुका था . खैर पास के पी सी ओ पर जाकर मैंने घर पर फोन किया और अपने कुशल समाचार दिए , बहरहाल जोशी जी के घर पर उस समय एस टी डी की सुविधा नहीं थी .

रात काली कर दी कुछ कागज़ मांडने में जिन्हें मैं उन दिनों ' तीतरी' कहा करता था ताकि बोलते बोलते नींचे झांकूं तो कुछ सहारा मिल जाए .

सुबह हुई , पुरोहित जी मिल गए जो उदयपुर से आए थे , जोशी जी के तो वे गुरु थे ही उनका स्नेह भाव मेरे प्रति भी वैसा ही था , अपने सेवा काल की समाप्त्ति के बाद वे कई बार बनस्थली भी आ और पर्याप्त समय ठहर चुके थे इस नाते मुझे अच्छे से जानते थे . पुरोहित जी से मिलने पर मैंने रात की बात बताई कि ,"ठंड लगी" तो वो कहने लगे:" आप बैड कवर ही ओढ़ लेते , लगता है आप अनुभवी सेमिनारिस्ट नहीं हैं , ऐसी जगहों में कम ठहरे हैं " और मैं ऐसा अनाड़ी था तब कि जो बिछा है वही ओढ़ना है मुझे तो ये भी नहीं पता था . खैर रात हुआ जो हुआ , सुबह आदतन जल्दी उठा था , शक्ल सूरत ठीक की ( हजामत बनाई ) उपलब्ध गरम पानी से नहाया और तैयार होकर पुरोहित जी के साथ हो लिया . ठण्ड का बखत था इस लिए खूब सारे कपडे पहन लिए इससे शरीर की मेरी कमजोरी भी प्रायः छिप जाया करती है .


मौकाए वारदात पर :

______________ उस दिन मेरी ख़ुशी का पारावार इसलिए नहीं था कि कोर्स में भागीदार मेरे पास पढ़ी हुई दो छात्राएं - राजरानी माथुर और अलका चौहान भी वहां उपस्थित थीं जो अब पर्याप्त अनुभवी प्राध्यापिकाएं थीं और अपने अलग अलग समय में बनस्थली से पढकर गईं थीं . एक ने उस दिन मेरे स्वागत के निमित्त बोला और दूसरी ने आभार व्यक्त किया था . खैर और बात करें ....

अपने सम्बोधन में मैंने कोर्स के भागीदारों को पर्याप्त आदर देते हुए अपने साथी ही माना था और किसी भी रूप में ये नहीं जताया था कि मैं कोई ऐसा विद्वान हूं कि उनके सब प्रश्नों का उत्तर दे दूंगा . पर एक छोटी सी बात जो उस दिन की याद रही वही बताता हूं ...

 एक युवा प्राध्यापक जो राजस्थान विश्वविद्यालय के ही पढ़े हुए थे एक ऐसी बात ले आए जिसका उत्तर देने में द्वंद्व था . ये गेना साब की लिखी पाठ्य पुस्तक में लिखे का हवाला देकर सवाल पूछने लगे ..


गेना साब के बारे में..

_____________ वे मेरे गुरु भाई भी हैं और गुरु भी हैं , उन्हें मैं तब से जानता हूं जब उनकी गिनती युवा प्राध्यापकों में होती थी मैं विभाग में विद्यार्थी था और एक और बुजुर्ग पीढ़ी के लोग थे पढ़ाने के लिए . आगे चलकर उन्होंने बड़ी बढ़िया किताबें लिखी हैं उस पेपर के लिए जो वो पढ़ाया करते थे . मुझे तो एक बार वे स्वयं और एक बार उनका प्रकाशक किताबों की प्रतियां भी दे गए थे , मैं भी कम्पेरेटिव पॉलिटिक्स का पेपर पढ़ाया करता था . 

पर जिस विचार को लेकर जिस धरातल पर उस दिन चर्चा हुई थी उसमें पाठ्य पुस्तक का जिक्र तो पूरी तरह सन्दर्भ से बाहर था क्योंकि उन किताबों में वैसा उल्लेख ही नहीं आया . नॉटी बॉय स्टाइल में युवक ने तो सवाल दाग दिया था और मुझे देना था उसका उत्तर . मैनें उन्हें कोई उत्तर नहीं दिया और शेष उपस्थित लोगों को जो कहा वो यह था :


" इन्हें मुझसे कोई सवाल थोड़े ही पूछना है .... इन्हें तो ये सिद्ध करना है कि ये भी मेरे गुरु भाई हैं ..... और मैं इनकी ये हैसियत स्वीकार करता हूं ."


इस से अधिक और भला मैं क्या कहता .


अपने जीवन के सुनहरे पलों को याद करते हुए .

आज की प्रातःकालीन सभा स्थगित 

सुप्रभात .


सुमन्त पंड़्या 

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

8 जून 2015 .

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चर्चित पोस्ट आज ब्लॉग पर प्रकाशित  

जयपुर 

९ जून २०१७ ।

Wednesday, 31 May 2017

इनबॉक्स में अंट संट : फ़ेसबुक लीला :स्मृतियों के चलचित्र 

इन बॉक्स में अंट संट 

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मैसेंजर और इन बॉक्स का निमित्त ये है कि आप किसी को बंद लिफ़ाफ़े में पत्र भेज सकते हैं , ऐसे अनेक सन्देश मुझे भी प्राप्त होते हैं और पत्र पाकर खुशी होती है . इनमें मेरी प्रिय छात्राओं के सन्देश भी होते हैं जो मैं अपने लिए टेस्टीमोनियल की तरह सहेज कर रखता हूं , अन्यान्य मित्रों के भी सन्देश आते हैं बड़ा अच्छा लगता है . कोई ऐतराज नहीं , लिखा कीजिए अगर आप को जरूरी लगे और खुल्लम खुल्ला लिखें मेरी दीवार पर तो तो क्या ही बात और लोग भी देखें . मेरी तो क्लास के दरवाजे भी सब के लिए खुले होते थे और आज दिन गुलमोहर के दरवाजे भी सब कोई के लिए खुले होते हैं सब का स्वागत . 🌷🌷


तो फिर बात क्या है सुमन्त ?

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 बात होने को तो ज़रा सी है पर जाने क्यों कोई कोई जरा सी बात पे मेरा माथा ठनक जाता है और मैं बिना पूरी बात साफ़ किए ऐसी बात कह डालता हूं जो मेरे अपनों को बुरी लगती है मानों उनको कह दी हो , जैसे मैंने कह दिया 


“, कुछ लोग ऐसे आ घुसे हैं जो न लीपणे के काम के न पोतने के काम के . “ “, गोबर से भी निकृष्ट ! “


ये बात आप में से किसी भी फेसबुक मित्र के सन्दर्भ में नहीं कही गई थी , जिस सन्दर्भ में कही गई थी वही बताता हूं तो बात साफ हो ही जाएगी .

फ्रैंड रिक्वेस्ट आती रहती है , देखता रहता हूं पर हर बखत उस तरफ ध्यान नहीं दे पाता . एक साब रिक्वेस्ट भेजकर चैट पर आ गए , खैर आए अच्छी बात , लिखना आवे नहीं वो भी जाने दो , उल्टी सीधी रोमन में हिंदी लिखें और मुझे उकसावें पूछ लो , पूछ लो करके . खैर मैंने इस बीच उनका प्रोफाइल खोला कुछ कॉमन फ्रैंड देखकर और शकल सूरत ठीक देखकर मैंने रिक्वेस्ट मान ली .

अब भी खुली बात न करके चैट ही करे जाएं , रात बढ़ रही मैं चाहूं बात बंद हो वो टन टनाए ही जाएं और अन्त में उन्होंने अपनी बुद्धि का समग्र परिचय दे दिया , बोले :


“ आय एम ए सैक्सी मैन . “

---------------------- न जान न पहचान और ये बोल बोला सुनकर ऐसा बुरा लगा मुझे के मैं एक शब्द तलाशने लगा कि क्या कहूं इस व्यक्ति के लिए , फिर मुझे चुन्ना भाई की एक पोस्ट में वो शब्द भी मिल गया और अब मैं इस बात को यों कहता हूं :


“ अरे ये सांड कहां से आ गया ? “


ऐसे इक्का दुक्का छोरे छापरे और भी हैं जो इनबॉक्स का इस्तेमाल गैर जरूरी नॉनसेन्स बातों के लिए करते हैं उनको भी चेतावनी दिए देता हूं कि चपक्या रहो न तो स्क्रीन शॉट लगा दूंगा और शांतिप्रिय जरूर हूँ लेकिन ऐसों को घर पे आ के ठोकूंगा अलग से . 

ऐसी बातें थी कि मैंने कहा था ,” न लीपणे के काम के न पोतने के काम के , गोबर से भी निकृष्ट . “

आत्मालाप :

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“ इत्ता गुस्सा , इत्ता हिंसक विचार काहे सुमन्त ? “

वो राजस्थानी सोरठा की अंतिम पंक्ति में कुछ लोगों के स्वभाव के विषय में कहा है न :

“.....पुचकारयां माथै चढ़ै , ठोक्यां आवै काम . “

कुछ लोग ठुकाई , ममाई डिजर्व करते हैं और उनके विशेष सम्मान में लिखी ये आज की पोस्ट .


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सुप्रभात 

सुमन्त पंड्या .

@, गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

    सोमवार 30 मई 2016 .

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आज दिन ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

गुरुवार १ जून  २०१७ ।

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बात की बात : ई एम एस नम्बूदरीपाद : स्मृतियों के चलचित्र 


बात की बात : ई एम एस नम्बूदरीपाद .

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कोई बात देख सुनकर पुरानी बात याद आ जाती है . अगर आज के बच्चों की शब्दावली में कहूं तो बात हैश टैग (#Tag.) हो जाती है , ऐसी ही बात की बात बताता हूं . कल की ही बात है :

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जीवन संगिनी टी वी के सामने बैठी कोई कार्यक्रम देख रही थी . अब ये तो मुझे पता नहीं कोई सीरियल था या कहानी थी पर मैं भी कंपनी देने को थोड़ी देर को बैठ गया . मामला एक लड़की का था और विवाह का प्रसंग विचारार्थ आ गया था . लड़की बोलने में हकलाती थी और इसी नाते बात कुछ अटक रही थी , लेकिन बावजूद इस वक्तृत्व कौशल सीमा के उसका आत्म विशवास देखते ही बनता था . मैं दो कारण से उससे अपनत्व अनुभव कर रहा था . एक तो बेटी और दूसरे उसका हैंडीकैप .

पर हुआ कुछ ऐसा कि पिता की इस बेटी ने ऐसी हिमायत की जो शायद और कोई न कर पाता . 

मैं बेटी जात का हिमायती हूं ये तो बताने की शायद आवश्यकता नहीं है , मैं हमेशा यह भी कहता हूं कि किसी के हैंडीकैप का मज़ाक मत उड़ाओ , मजाक उड़ाने वालों से मैं हमेशा भिड़ जाता हूं कि समझते क्या हो तुम्हारा हैंडीकैप मैं तुम्हें बताऊंगा . आपने यह भी पाया होगा कि मां बाप को हमेशा ही अपने हैंडीकैप बच्चे से सबसे अधिक प्यार होता है और अगर नहीं होता है तो मैं ऐसे मां बाप को मां बाप कहलाने के लिए लायक ही नहीं मानता . खैर ये विचार तो मेरे अपने हैं किसी के लिए इनको मानना लाजिमी नहीं है . खैर , कल की बात से जो पुरानी बात याद आती है वो बताता हूं .......


राजनीति शास्त्र विभाग , राजस्थान विश्वविद्यालय :


मैं वहां पढ़ा करता था , विभाग के संस्थापक अध्यक्ष और मेरे भी गुरु डाक्टर एस पी वर्मा इस बात को बड़े गर्व से कहा करते थे कि शायद ही कोई ऐसा नामी राजनीति शास्त्र का विद्वान बचा होगा जो विभाग में आया न हो और इस मंच से बोला न हो . इस विभाग में भाषण देने का निमंत्रण राजनेता भी ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करते थे और खुल कर बात होती थी . इसी सन्दर्भ में मुझे याद आते हैं ई एम एस नम्बूदरीपाद जो विभाग में भाषण देने आए थे . लुंगी और बुश्शर्ट कहा जाने वाला कमीज और गांधी जी जैसी चप्पल पहने विभाग के एक नंबर थियेटर में रॉसट्रम के पीछे खड़े होकर बोलते नम्बूदरीपाद मुझे आज भी याद हैं .


क्यों आई ये बात याद ?


मुझे तो तो उस लड़की की बात पर याद आए ई एम एस .

वो भी हकलाते थे , लेकिन अपनी इस कमजोरी को वो किसी भी प्रकार से हीनता ग्रंथी का कारण बनने देने को तैयार नहीं थे , विभाग में भी जब वो बोले थे तो उनकी बात को सबने शान्ति पूर्वक सुना था . उनकी बात में दम था . उनके तर्क में दम था .


उपसंहार :


एक बार की बात , सिर्फ उन्हें सताने को किसी अकल से पैदल पत्रकार ने ई एम एस से पूछ लिया :


" सर ! डू यू ऑलवेज स्टैमर ....?"

जवाब में बोले ई एम एस और तपाक से बोले , पूरे आत्म विशवास से बोले :

" नो ओ ओ....."

"ओनली व्हेन आई स्पी अ अ क ."

इससे बढ़िया जवाब क्या हो सकता था भला?


प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित .

इति .

सुप्रभात 

सुमन्त पंड़्या 

गुलमोहर कैम्प , जयपुर .

31 मई 2015 .

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पुराना संस्मरण है ।

आज दिन जयपुर से ब्लॉग पर प्रकाशित ।

बुधवार ३१ मई २०१७ ।

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Saturday, 27 May 2017

सूरजभान खत्री : स्मृतियों के चलचित्र

सूरजभान खत्री : ऐसे दोस्त जो मुझे आज भी याद आ जाते हैं .
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जयपुर के त्रिपोलिया  बाजार में जैसे मेरा आना जाना बाबूलाल  तरसेन कुमार की बरतनों की दूकान  पर होता था वैसे ही ठाकुरदास खत्री  एंड संस  नाम की घडी की दूकान पर भी होता था . ये लोग  विभाजन के बाद डेरा इस्माइल खां से चल कर जयपुर में आ बसे लोग थे . घड़िया विदेश से मंगवाते  बेचते . फर्म का वही नाम रखा गया था जो वहां से लेकर आए
थे . बड़े भाई सूरज भान खत्री मेरे ऐसे दोस्त बन गए थे जो बातों में उस समय हिमायती बनकर खड़े हो जाते जब साक्षात मेरे बड़े भाई मेरी कच्ची कौड़ी मान कर मेरी बात को दर  गुजर कर रहे होते . केवल मिलने और बतियाने को वो हमारे  शहर वाले घर , नाहर गढ़ की सड़क पर  भी आए . अपने  बेटे राकेश के विवाह के आनंदोत्सव में उन्होंने न्योता भेजा और मैं फर्ज समझ कर बड़े वाले को साथ लेकर छत्रसाल पार्क के उस समारोह में गया भी था . ये ऐसे आत्मीय सम्बन्ध थे जिनमें कोई व्यापार व्यवहार नहीं था .
मेरा जाना तो किसी निमित्त से ही होता और वो बात हो जाती जैसे कोई घडी खरीदना या सुधरवाना पर वो होवे अपनी जगह सूरजभान हाथ का काम रोक कर टाइम आउट ले लेते और मेरे लिए कोई न कोई सवाल छोड़ देते .
उनका लायक बेटा राकेश अब भी उस दूकान पर बैठता है . सूरज भान नहीं रहे पर उनकी स्मृति मेरे लिए आज भी कल की सी ताजा बात है .

एक बार की बात :
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पहले छोटी सी बात :
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मैंने इलेक्ट्रॉनिक घडी के बाबत पूछा ," गारंटी कितनी ?"
वो बोले :" जितनी देर घडी तो आपके हाथ में है लेकिन आपने पैसे नहीं चुकाए ."

अब बड़ी बात :
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एक दिन सूरज भान मुझसे बोले :

" प्रोफ़ेसर साब मुझे येे बताओ कि ये हिंदुओं में मुर्दे को जलाते ही क्यों हैं और समुदायों की तरह गाड़ते या रखकर छोड़ते क्यों नहीं ."

गंभीर सवाल था और मुझसे उत्तर की अपेक्षा थी . जाने क्यों अध्यापक से लोग उम्मीद करते हैं कि उसके पास हर सवाल का उत्तर  होगा .
मैंने पीने का पानी मांगा और उत्तर देने को बैठ गया और बोला, बात यहां से शुरू की :

" भाई साब अंतिम संस्कार का सम्बन्ध  जीवन दृष्टि से है . अपन तो मानते हैं कि शरीर नश्वर है ,  पंच  तत्त्व से मिलकर बना है . हिन्दू संस्कारों में हवन का बड़ा महत्त्व है , अग्नि को शरीर समर्पित करना भी एक  प्रकार का हवन ही तो है .
जीवन के बाद भी जीवन है , जैसे कपडे बदलते हैं वैसे ही शरीर बदलते हैं.
यही सब तो सोच है भाई  साब .
लेकिन जो लोग ऐसा सोचते हैं कि एक दिन ये ही शरीर उठ खड़े होंगे वो अंतिम संस्कार की अन्य विधि अपनाते हैं ..........
............. "
नहीं रहे सूरजभान पर आज भी राकेश हम लोगों से लगाव रखता है . पर
अब उधर जाना भी कम होता है ......
प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित .
इति .

सुप्रभात  .

सुमन्त पंड़्या
गुलमोहर कैम्प, जयपुर .
27 मई 2015 .
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आज दिन ये संस्मरण ब्लॉग पर प्रकाशित  ।
दिल्ली
शनिवार  २७ मई २०१७ ।
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Friday, 26 May 2017

जनता स्टोर के क़िस्से : स्मृतियों के चलचित्र 


जनता स्टोर : कल परसों की बात और आगे

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 कल टी ब्रैक के चलते बात जहां छोड़ी थी वहीँ से आगे चलें ...

अब उस चौक में अपने भतीजों का घाटा नहीं है . राहुल की डेयरी पर जाते पैली आवाजें आने लगती हैं :

" ताऊ जी ढोक !" 🙏

" ताऊ जी ढोक ! " 🙏

मैंने तो दो बार ही मांडा है , ऐसा तो सारे छोरे बोलते हैं .

उस दिन राजू तो काउंटर पर टॉफी लेकर ही खड़ा हो गया के ताऊ जी बड़े दिनों बाद आए . अब ताऊ भी क्या करें और जगह भी तो बच्चों के पास जाना पड़ता है . फोटू जोड़ूंगा राजू की , देखिएगा .

दुनियांदार भी देखते रह जाते हैं के ये कौन ताऊ आ गए जो इनकी ऐसी आव भगत हो रही है .

अटके भटके बनस्थली की पुरानी लड़कियां भी यहां नई भूमिका धारण किए मिल जाती हैं वो बात आगे किसी पोस्ट में बताऊंगा .

अब उठने का समय हो रहा है अतः मीडिया पर पहला सन्देश फेसबुक पर भी दर्ज :


Good morning & private coffee done @ Gulmohar camp .☕.

सुप्रभात .

सुमन्त पंड्या

जयपुर 

गुरुवार 26 मई 2016 .

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आज दिन दिल्ली से ब्लॉग पर प्रकाशित ये क़िस्से का  पुछल्ला  ।

शुक्रवार २६ मई २०१७ ।

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Wednesday, 24 May 2017

क़िस्सा जनता स्टोर का : जयपुर ड़ायरी - स्मृतियों के चल चित्र 

ये क़िस्सा लगातार दो दिनों में लिख कर दर्ज किया था फ़ेसबुक पर  , आज ये आ रहा है ब्लॉग पर ।

भाग एक :

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जनता स्टोर पर : कल की बात

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  चलताऊ तौर पर सब्जी तो खरीद ली इन लड़कों के पास और बराबर में सीढ़ी चढ़ गया फल वाले की दूकान में . मीठे फल खाना तो आजकल मने है तो ले दे के दो चीज कुल दे देने को कहा छोरे को :

1 फालसा

2 आलू बुखारा वो भी कच्चा खट्टा 


छोरे को फुरसत कहां मुझे अटेंड करने को वो अटका हुआ एक सजीली युवती के आर्डर की तामील में और उसे ," भाभी जी , भाभी जी " कहे जाय . मुझे एक दम सीरियल का सा माहोल लगा ," भाभी जी घर पर हैं ." चल रहा हो मानो . 

अब तब तो मैं चुप रहा युवती के सामने , वो क्या सोचती वरना और उसके सीढ़ी उतरते ही मैं जो बोला वो जान लीजिए :

" इत्ती देर से भाभी जी भाभी जी करे जा रिया है 

और यहां तेरे ताऊ खड़े हैं उनकी कोई परवाह ही नहीं ? " 

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टी ब्रैक .

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इत्ता ही लिखा था उस दिन तो पर फिर उत्सुकता जाग गई कि फिर क्या हुआ  । इसी उत्सुकता का समाधान करने को दूसरा भाग लिखा था अगले दिन जो अविकल यहां दोहराता हूं । ये रहा :

भाग दूसरा :

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जनता स्टोर : कल की बात ...और आगे .

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अब तो ये परसों की बात हो गई पर बात कहते कहते मजबूरी में रुकना पड़ा था तो आगे की बात तो बतानी ही पड़ेगी न इस लिए छेड़ी है ये बात फिर से .


बात तो कुल जमा इत्ती सी ही थी कि फल वाला छोरा भाभी जी - भाभी जी करे जाय और अपण को पूछे ही नहीं और तब लपकाया मैंने "......यहां तेरे ताऊ खड़े हैं उनकी कुछ परवाह ही नहीं ? " 💐 खैर छोरा आया लाइन पे , पहले का कहा भूलकर फिर पूछने लगा :


" क्या देऊं बाबूजी ? "


और बाबूजी ने जारी किया फरमान :


" ढाई सौ ग्राम फालसा दे और दे , ढाई सौ ग्राम दे आलू बुखारा . "

खैर

तौल दिए लडके ने मैंने अस्सी रूपए चुकाए पर एक बात भी हुई ही इस लेन देन के दौरान , उसे इस संवाद में बाबूजी की कुछ " असहिष्णुता " लगी शायद सो एक बेतुका सा सवाल पूछ बैठा 

क्या पूछता है :


" बाबूजी आप के बच्चे नहीं हैं क्या ? "


और अब बाबूजी के बिफरने की बारी थी , बोले बाबूजी :


" अरे अकल के कोल्हू ! मेरे बच्चे कोई न्यारे हैं क्या ? तुम्ही तो हो मेरे बच्चे ! "


अब लड़का मेरा मिजाज समझ चुका था और मुझे याद आ रहा था कि मेरे कार्यस्थल पर स्थानीय कार्यकर्ता मेरे लिए कहते :


" ये ही छै बेवारस्यां का बाप . "


खैर ये छोटा सौदा तो निबट गया , दूसरे वाले लडके ने सीढ़ी उतरने के लिए मुझे सपोर्ट दिया और मैं जनता स्टोर चौक में नीचे आ गया पर अब भी एक संवाद होना बाकी था .


एक और बात :

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एक बुजुर्ग सज्जन मिले , तुरंत मैंने पूछा :


" आप तो सीनियार सिटीजन हैं ? "


मैंने पूछा था कि भाई एक संयुक्त मोर्चा बन जाए .


उन्होंने तस्दीक तो कर दी पर मेरी ओर कौतुक से देखने लगे और मैंने उनकी उत्सुकता शांत की :


"....।फिर क्या बात , मिलाओ हाथ ! "


अब वो मेरा शुभ नाम पूछने लगे खैर वो ही बात मैंने पूछी और वो निकले हेमंत पाटनी , जे डी ए के सामने रहते बताए .

***


टी ब्रैक .


सुप्रभात .


आगे चलेगी अभी बात .

गए बरस की स्मृतियों पर आधारित बातों को जोड़कर आज दिन दिल्ली में बनाई ये पोस्ट और इसे अब ब्लॉग पर प्रकाशित करने जा रहा हूं ।

गुरुवार २५ मई २०१७ ।

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Tuesday, 23 May 2017

बड़े मामा जी स्टेशन वाले : स्मृतियों के चल चित्र 

बड़े मामाजी - स्टेशन वाले : स्मृतियों के चलचित्र  

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अम्मा अपने कुटुंब में कई भाइयों की छोटी बहन थी . जिन भाइयों को अम्मा राखी बांधा करती थी उनमें सबसे बड़े थे जिन्हें हम बच्चे बड़े मामाजी स्टेशन वाले कहा करते थे , आज उन्हीं की एक बात का प्रसंग उठाता हूं .

मामाजी का परिचय :

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मामा जी ने रेल्वे में काम किया उस जमाने में जब भारत आजाद भी नहीं हुआ था. पचास के दशक में तो वो रिटायर होकर जयपुर में रहने लगे थे तब उनसे खूब खूब बातें होती थीं . जो उन्होंने बताया था वही बता रहा हूं .


कैसे गए रेलवे की नौकरी में :

जब स्कूली शिक्षा पूरी हुई तो अम्मा की बडिया(ताई जी ) ने घर में आए किसी महात्मा से बाल और बब्बू नाम के दो बेटोँ का भविष्य पूछा तो वो बोले :

" इन्हें रेलवे में नौकर करा दो ."

 और सच में वही हुआ , दोनों भाई रेलवे में आवेदन कर स्टेशन मास्टर बन गए . जिस "बाल" का अभी जिक्र आया वही थे मेरे ' बड़े मामाजी स्टेशन वाले '.

 किसी जमाने में ये मामाजी जयपुर स्टेशन के स्टेशन सुपरिंटेंडेंट हुआ करते थे . अपना नीला कोट और कैप पहन कर रेलवे प्लेटफार्म पर आते तो उन पर नूर आ जाता था . विदेशी सैलानी ट्रेन से उतरते तो उनसे अंग्रेजी में भी अच्छी खासी बात कर लेते .

जयपुर आने वाले हम लोगों के नाते रिश्तेदार कभी रात की गाडी से जयपुर स्टेशन पर उतरते तो सुबह होने तक उनके यहां ही ठहरते .

तब स्टेशन और शहर परकोटे के बीच का इलाका बड़ा सुनसान और उजाड़ हुआ करता था . ये सब तो तब की बातें हैं जब वो सेवारत थे . अभी तो बाद के जमाने की बात बाकी है जिसकी अभी भूमिका बनी है .


बाद की सिर्फ एक बात :


पृष्टभूमि- रिटायरमेंट के के बाद मामाजी एक आम ग्रामीण हिन्दुस्तानी के हुलिए में रहा करते थे . उरेप का एक जेबदार सिला हुआ बनियान , कमर के नींचे शायद धोती नहीं बल्कि एक अंगोछा और गर्मी में कंधे पर एक पारंपरिक लाल अंगोछा . मामी अलबत्ता करीने से साड़ी पहन कर , पतले फ्रेम का चश्मा पहनकर स्मार्ट लगती थी .

ये दोनों तब ट्रेन के उपलब्ध सबसे बड़े क्लॉस ' फर्स्ट क्लास ' में साधिकार यात्रा कर रहे थे . उन्हें यात्रा का पास मिलता था . उनके सहयात्रियों को मामी तो अपने क्लास के अनुरूप लग रही थी पर मामाजी को तो वो बगैर टिकट डब्बे में चढ़ आया कोई ग्रामीण अशिक्षित ही समझ रहे थे . शायद मामी से उन महिलाओं ने कुछ जिक्र भी छेड़ा पर मामी ने कोई तवज्जो नहीं दी . आखिर वह भी हो गया जो सहयात्री चाहते थे , टिकट चैकर डब्बे में आ गया . लोगों ने इस बगैर टिकट सवारी के डब्बे में बैठे होने की शिकायत की और आगे वही हुआ जो होना ही चाहिए था .

टिकट चैकर ने पूछा:


"बाबा ! आपका टिकिट ?"


" मेरे पास कोई टिकिट नहीं है ." बोला टिकिट चैकर का बाबा .


हम तो ये जानते ही थेे , इस भाव के साथ वो तथाकथित हाई सोसायटी 

के लोग ये मान बैठे कि अब आया ऊंट पहाड़ के नींचे . तभी मामाजी ने उरेप के बनियान की जेब में हाथ डाल कर एक कागज़ निकाला और बोले:


" ये एक कागज़ का टुकड़ा जुरूर है , देख लो तुम्हारे समझ आवे तो ."


ये मामाजी और मामी का फ्री ट्रेवल पास था जो उन्हें सेवा काल के बाद मिली सुविधाओं के तहद मिलता था . इसमें उनकी हैसियत का बखान भी था .

देखकर संतुष्ट हुआ टिकिट चैकर और बरसा उन सहयात्रियों पर जो वेश भूषा देखकर लोगों की हैसियत नापते थे .

भाव ये था कि ' आप यात्रा करें न करें इस डिब्बे में ये तो यात्रा करेंगे ही .'


गजब थे बड़े मामाजी स्टेशन वाले .

उनकी कोई तस्वीर भी ढूंढने की कोशिश करूंगा .

प्रायवेट कॉफी डन .


प्रातःकालीन सभा स्थगित .

इति.

सुमन्त पंड़्या 

जयपुर .

23 मई 2015 .

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आज इस क़िस्से के साथ अनन्त की एक टिप्पणी भी जोड़ता हूं जो इस क़िस्से की रंगत बढ़ाने वाली है । देखिए अनन्त बताता है :

"    यह घटना 70 के दशक की है जब बाबा और माताजी अम्मा गर्मियों की छुट्टियों में दिल्ली से हरिद्वार जा रहे थे बीना भी जिद करके उनके साथ चली गई थी , सहयात्री और उनकी पत्नी को लगा कि ये कोई बडे घर की महिला व बच्ची है और ये बुजुर्ग इनका अटेन्डेट है जब उस व्यक्ति ने अम्मा से कहा कि यह बुढ्ढा IInd क्लास में नहीं बैठ सकता तो मताजी अम्मा बोली कि क्या करूँ ये बुढ्ढा तो मानता ही नहीं है कहता पट्टा लिखाकर लाया हूँ । "

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आज दिन दिल्ली से प्रकाशित :

बुधवार २४  मई २०१७ ।

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Friday, 19 May 2017

दुर्लभ आशीर्वचन : भिवाड़ी डायरी 

फ़ोटो में जीज़ाज़ी अभ्युदय में  और अब उनके आशीर्वचन सम्बन्धी पोस्ट :


दुर्लभ आशीर्वचन प्राप्त हुए  

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कल ये हमारा सौभाग्य रहा कि उदयपुर में बैठे हुए जीजाजी ने हमारे एक पारिवारिक वाट्सएप समूह के साथ बचपन में ब्रह्मपुरी में बिताए दिनों की कुछ स्मृतियों को साझा किया . परिवार के सब सदस्यों को तो इस सब में आनंद आया ही , कइयों ने इस सन्दर्भ को वर्तमान से जोड़ा और बाद के दौर की कई बातें भी बताई जिनका समावेश अभी मैं इस आलेख में नहीं कर पाया हूं और मैं चाहूंगा कि वो लोग यहां चर्चा से जुड़ जाएं .


 पहले दो बात :


1 . जीजाजी के प्रिय शिष्य दुर्गाप्रसाद अग्रवालअग्रवाल साब का आग्रह था कि गुरूजी को फेसबुक पर नियमित लेखन के लिए मनाया जाए , एक माने में उनका आग्रह और अनुरोध कारगर रहा . सन्देश मुझे मिले और मैंने अग्रप्रेषित किए . आज की पोस्ट जीजाजी के मुझे प्राप्त संदेशों के आधार पर ही संकलित है . 


2.. गए दिनों मैंने ब्रह्मपुरी के रहवासी सुपर सीनियर सिटीजन पद्माकर जी की फोटो यहां प्रकाशित की थी जिसे देखकर जीजाजी को बचपन की बातें याद हो आईं . पद्माकर जी जीजाजी के बाल सखा हैं . मैंने तब भी कहा था इनकी दोस्ती को सलाम .


अब इतना और कहूंगा कि मैंने जीजाजी के संदेशों में से कुछ अनावश्यक क्षेपक हटाकर इन्हें संपादित करने का प्रयास किया है , उसमें जो कुछ कमी रही हो वो मेरी कमी मानी जाए .

अब आशीर्वचन की आज की कड़ी 

प्रदाता : मूलचंद्र पाठक .

     Moolchandra Pathak


निवेदन और सम्पादन :

--- सुमन्त पंड्या .


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   प्रिय सुमन्त ! 

    आज मैं तुम्हें ब्रह्मपुरी में बिताये अपने जीवन के बारे में कुछ बताना चाहता हूं।मैं लगभग 25 साल की उम्र तक जयपुर व ब्रह्मपुरी में रहा। ब्रह्मपुरी की अपनी कुछ विशेषताएं थीं। सबसे बडी बात जिसका जिक्र जरूरी है वह थी हर साल होने वाले तमाशे। ये तमाशे हर साल तीन होते थे --

1.जोगी का 

2. रांझा और हीर का

 3 झुट्टन मियां का।  

तमाशे के दिन निश्चित होते थे । अतः दर्शनार्थी निश्चित दिन हजारों की संख्या में स्वतः पहुंच जाते थे। ब्रह्मपुरी में ये तमाशे दो जगह होते थे - छोटे अखाडे में तथा बडे अखाडे में। छोटे अखाडे में तैलंग भट्ट फूल जी तथा मन्नु जी व उनके परिवार जन करते थे तथा बडे अखाडे में गुजराती औदिच्य ब्राह्मण अनोखे लाल ।दोनों जगह ये तमाशे एक ही दिन व एक ही समय पर होते थे। दोनों अखाडे पास पास होने के कारण दर्शक लोग भी इधर-उधर आते जाते थे। तमाशे सुबह से शाम तक दो दिन चलते थे।ब्रह्मपुरी में इन दो दिनों में मेले का सा माहोल रहता था। ये तमाशे संगीतप्रधान होते थे- संगीत भी परम्परागत व शास्त्रीय होता था। फूल जी व मन्नुजी अपने समय के जाने-माने शास्त्रीय गायक थे।इसी प्रकार अनोखी लाल भी बहुत अच्छे संगीतज्ञ थे। फूल जी के पुत्र गोपी भट्ट उम्र में मुझ से कुछ ही बडे थे पर बहुत अच्छा गाते थे।उन्हीं दिनों वे दिल्ली रेडियो से भी आने लगे थे।

 जोगी और हीर-रांझे के तमाशे में कथा-सूत्र भी रहता था, पर बहुत हल्का सा ही। वस्तुतः शास्त्रीय संगीत ही मुख्य होता था और इन तमाशों के श्रोता या दर्शक गण भी अधिकतर शास्त्रीय संगीत के प्रेमी होते थे।


 झुट्टन मियां का तमाशा सिर्फ छोटे अखाड़े में होली के दिनों में, संभवतः धूलंडी की रात उक्त तैलंग भट्ट परिवार द्वारा प्रस्तुत किया जाता था। अवसर के अनुसार यह तमाशा कुछ अश्लीलता युक्त भी होता था, पर पूर्व दो तमाशों के समान इसमें भी संगीत तत्त्व ही प्रधान होता था।

     ये भी उल्लेखनीय है कि इन तमाशों में कुछ अभिनय का अंश भी रहता था। जोगी के तमाशे में मुख्य पात्र जोगी का वेश धारण कर के आता था और हीर-रांझे के तमाशे में एक गायक हीर होता था और दूसरा रांझा।वे अपने अपने संवाद बोलते या गाते थे।

 उनकी वेशभूषा में भी यथोचित अन्तर रहता था।

  उक्त परिवार द्वारा आमेर में शिवजी के मंदिर के बाहर भी साल में एक बार गोपीचन्द भरथरी का तमाशा प्रस्तुत किया जाता था।

-- मूलचंद्र पाठक .

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सूचनार्थ :Padma Pathak Manju Pandya Vasudha Nanawati


सुप्रभात . 💐

Sumantpandya .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

  गुरूवार 19 मई 2016 .


#स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी #उदयपुरडायरी 

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दिल्ली से ब्लॉग पर प्रकाशित 

शुक्रवार १९ मई २०१७ ।

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