Wednesday, 31 January 2018

गुस्सा नाक पे : भिवाड़ी डायरी .




गुस्सा नाक पे :  भिवाड़ी डायरी

    अभी दो दिन पहले की बात है मैं और जीवन संगिनी आशियाना आँगन के बाहर से सैर के बाद सब्जी के थैले लेकर परिसर में घुस रहे थे कि वहां एक रंबाद होते देखा उसी की बात आज बता रहा हूं फिर आप बीती भी सुनाऊंगा , बताऊंगा .

बाहर का सीन :

 मेन गेट पर सिक्योरिटी पोस्ट पर खड़ी लड़की अपनी कैफियत में बड़बड़ाए जा रही थी और उधर सिक्योरिटी चीफ के सामने एक अपेक्षाकृत युवा आशियाना रहवासी का गुस्सा पूरे उबाल पर था . फटे में पैर देने की मेरी आदत , जो हमेशा से है , उसके मुताबिक़ मैं तो मामले में उलझना ही चाहता था पर जीवन संगिनी के रोके से मैं वो न कर पाया ,  ये तो अब अफ़सोस ही रह गया  , खैर .


   ये शायद इसलिए है क्योंकि वहां उसे आती जाती घरों में काम करने वाली सेविकाओं की गतिविधि पर नज़र रखनी होती है . ये लड़की हम दोनों से रोज तो मुस्कुराकर मिलती है जब हम पैडिस्ट्रियन वे से अंदर आते हैं पर इस मौके पर वो भी गुस्से में बड़बड़ा रही है , ऐसा क्या हो गया आखिर ?


लेना एक न देना दो , हुआ सिर्फ इत्ता बताया कि उसने नौजवान से उसका फ्लैट या के टावर नंबर पूछ लिया बताया और वो ही उसे बुरा लग गया . बोलो वो यहां रहते हैं और उन्हीं से उनकी पहचान  पूछी जा रही है , ये क्या बात हुई भला ? हो गया रंबाद .


अगर दरवाजे पर पूछताछ होती है तो इसमें आपकी ही हिफाजत है ये तो उल्टे अच्छी बात है , पर कोई न समझे उसका क्या ?


एक और भी बात है ये नई पीढी के लोग  अपने काम से दिन भर तो बाहर रहते हैं और रात बिरात घर लौटते हैं तो द्वार प्रहरी अगर न पिछाणे तो इसमें अच्चम्भे की कोई बात नहीं .

अब हमारी सुणो :

   जब कभी लंबे अरसे बाद बाहर से आते हैं तो बाहर की मोटर देख द्वारपाल टोकते हैं और आने का सबब पूछते हैं . देखिए संवाद :


“ मिलने आए हैं ? “


“  मां बाप हैं , केवल मिलने नहीं रहने आए हैं ।”


और इसका फायदा ये कि द्वारपाल बच्चों को फोन से सूचित करते हैं और बच्चे टॉवर के नीचे खड़े मिलते हैं हमारे पहुंचने पर . ये हर बार की बात है . वैसे ये अपडेट सेल फोन से भी आ जाती है पर कभी नैटवर्क न भी होवे  तो अच्छा ही है ये सूचना कि ये हलचल द्वारपालों की बदौलत होती है . अब बोलो बुरा मानें  के राजी होवें !

कल तो हद हो गई :

हम दोनों  एक ऑटो रिक्शा से आशियाना में एन्ट्री ले रहे थे और नियमानुसार हमने दरवाजे पर अपना टॉवर नंबर बताया तो द्वारपाल ने जल्दी से  फंटा तो उठाया ही बड़ा गहक कर ये और बोला :


“ जानते हैं ..जानते हैं .”


अब लो कर लो बात !  और ये सुनकर जो चित्त प्रसन्न हुआ है उसका तो क्या कहना मानों हम और किसी के नहीं उस द्वारपाल के ही माँ बाप होवें ।


अब कल क्या लेणे को बाहर गए थे और ऑटो से क्यों आए ये एक अलग कहानी है वो आगे कभी आएगी बात .


अभी तो युवा पीढी के लिए इत्ती सी बात :

“ काहे इत्ता गुस्सा नाक पे ?”




Monday, 29 January 2018

जो देखो जो लाइव : भिवाड़ी डायरी .



जो देखो जो लाइव

   अब तो भिवाड़ी में आए और रहते हुए महीनों हो गए और  ये जो बात है वो इधर आने के बाद की ही है .

क्या बात है आख़िर ऐसी ?

इधर फ़ेसबुक की प्रसारण प्रणाली और तदनुरूप उपकरणों में एक इज़ाफ़ा हुआ है , बोले तो “ लाइव “

है तो बढ़िया आइडिया , इसके चलते जो देखो जो लाइव हो जाता है आजकल . जैसे के कल रात अनुपमा गर्ग ने लाइव प्रस्तुति दी और उसपे कमेंट माँगा तो कित्ता अच्छा लगा , है न कोई बात . ये तो राजा मिसाल है इसलिए ज़िक्र कर दिया है , ऐसे कई लाइव परफ़ार्मेन्स देखे . कोई कोई लोग अपनी प्रस्तुति के बजाय किसी और की को भी ऐसे करके लाइव दिखा देते हैं  , साधुवाद तो उनका भी बनता है .

तो अपणा क्या विचार है ?


इसमें विचार करने को क्या है किसी न किसी दिन अपण भी हो जाओ लाइव और तो क्या ?

पर लाइव होने जैसी शक़ल सूरत तो होवे , सुभाष तो सी एल हेयर ड्रेसर के हजामत बणवा आया अपनी सिफ़ारिश पर जयपुर में  और इधर आँगन के हज्जाम ने अपनी हजामत बिगाड़ दी क्या करें अब .

उपकरण न्यारे कमज़ोर . यंत्र कोई पकड़े और अपण होवें लाइव तब बने बात .

अब समय कम है , मचमची आ रही है किसी न किसी दिन अच्छा मौक़ा देखकर अपण भी हो जाओ लाइव और क्या .

जय हो . फ़ेसबुक की माया अपरंपार .

ऊपर ताज़ा मिसाल है ऐसे लिखना था और उपकरण ने उसमें राजा टाइप कर दिया , दुबारा पढ़ा तो ये भी अच्छा लगा तो ऐसे ही रहने दिया और क्या !

प्रातःक़ालीन सभा स्थगित …..जय हिन्द 🇵🇾🇵🇾

भिवाड़ी से सुप्रभात

नमस्कार  🙏

गए बरस ये पोस्ट भिवाड़ी से लिखी थी तब की ही बातें हैं , आज इसे ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूं ।

Sunday, 28 January 2018

बनस्थली डायरी  : भूली बिसरी यादें .

बनस्थली डायरी :  भूली बिसरी यादें .

आज बिलकुल छोटी छोटी बातें बताऊंगा , शायद इनसे कोई अर्थ निकले . कुछ बातें मेरी जुबान पर रहीं और अभियक्ति का अंग बन गईं वही कहता हूँ . अब क्योंकि सेवा काल समाप्त करके आया हूं अतः आखिरी बात पहले . जब भी क्लास ख़तम होने का समय होता मैं कहता :" इसी हंसी ख़ुशी के वातावरण में प्रातःकालीन सभा समाप्त की जाती है " , यह वाक्य इतना लोकप्रिय रहा मेरी कक्षाओं में कि मुझे तो प्रस्ताव का आदि पद ही बोलना पड़ता बाकी तो मेरे सभासद मेरी छात्राएं स्वयं ही पारित कर देती थीं ये प्रस्ताव . एक शब्द मेरी जुबान पर ही रहता , शब्द क्या था वह तो एक विचार था" सर्वानुमति " यह मैंने " कनसेनसस " के बदले बरता था . सब कोई प्रस्ताव सर्वानुमति से ही पारित होते यह तो क्लास में रोज बरोज का चलन होता था . मुझे अगले दिन न आना होता तो उसकी बाबत सूचना यह कहकर देता ," आपको यह जानकर अपार हर्ष का अनुभव होगा कि कल............" हालांकि शायद इतना हर्ष वास्तव में उन सूचित लड़कियों को होता नहीं . एक और शब्द था ' मंच अधिग्रहण ' ये मेरी जुबान पर ही रहता . आयोजन किसी और विभाग का हो तो भी उसमे ऐसे भाग लेना जैसे अपना ही आयोजन हो और यदि मंच मिल जाए तो वहां से अपनी बात कहना आखिर लंबी अवधि तक " राष्ट्र सभा " का मैं सलाहकार अध्यापक भी तो रहा था . मैंने एक परिपाटी को केवल अपनी क्लास के लिए चलाया कि क्लास में आने के लिए दरवाजे पर रुककर कोई न पूछे और सवाल पूछने के लिए खड़ा न हो , बैठे बैठे ही संवाद हो . न अनुमति आने के लिए मांगी जाय , न जाने के लिए मांगी जाय . जरूरी नहीं कि लड़की अपनी हर बात हमें बताए अतः जाना चाहे तो बिना वजह बताए भी चली जाए .

एक सवाल जो मैंने अपने विद्यार्थी काल में बहुत सुना था , अध्यापक बनकर कभी नहीं पूछा , " फादर क्या करते हैं? " क्यों पूछे ऐसे सवाल , हमें ऐसा पूछकर क्या भेदभाव करना है .

स्मृतियां अनेक हैं, लंबी बात एक साथ कोई सुनना नहीं चाहता. आज के इति  .


Tuesday, 23 January 2018

इंस्टाग्राम : भिवाड़ी डायरी

मुझे पता नहीं था इंस्टाग्राम होता क्या है .

फिर एक दिन पता लगा कोई माध्यम है जिससे कुछ फ़ोटू वोटू दर्ज करके भेजी जा सकती है अपने लोगों को . और ये भी पता लगा कि फ़ोटू  की रंगत भी बदली जा सकती है इसमें .

मुझे पता नहीं था कि ये इंस्टाग्राम विद्या मेरे उपकरणों में भी है. मैं कोई कोई फ़ोटू इंस्टाग्राम हल्के में ठेल देता . अब मुझे सूचना मिलने लगी कि कोई कोई लोग मेरा अनुसरण भी करते हैं माने फालो करते हैं . अपण ने तो बताने को ही डाली फ़ोटू , कोई छिपाने को थोड़े ही डाली तो ये बात भी बढ़िया .

इस विधा का अधिकतम इस्तेमाल इधर भिवाड़ी आकर सीनियर्स की बैठकों में ही किया है मैंने .एक दिन तो मेरे साथ फ़ोटो लिवाने की होड़ ही हो गई . लोग राज़ी अपण भी राजी  और क्या कहने .कई सीनियर्स फ़ोटो की प्रति लेना चाहें तो वो वाट्सएप नम्बर से जुड़ गए और ये सिलसिला चल पड़ा .

अब एक बात और फ़ोटो के साथ कुछ कुछ इंदराज भी तो होवे वो भी छोटा मोटा इंदराज मैं करने लगा . पर अभी भी मुझे पता नहीं है कि क्या किस्सागोई और संवाद भी इस चार दीवारी में साथ साथ चल सकता है .

अब देखते हैं कैसा काम आता है ये इंस्टाग्राम आगे .

अभी कई इल्म और सीखने हैं बच्चों से देखते हैं कैसा ढ़ब बैठता है आगे !

Monday, 22 January 2018

अपना सा लगे कोई : बनस्थली डायरी .



बनस्थलीडायरी  : अपना सा लगे कोई .

ये  उन दिनों की बात है जब   मैं बनस्थली में काम किया करता था  और  लेखा अनुभाग में वेतन का  चैक लेने जाना  पड़ता  था .

एक बार ऐसा हुआ कि वेतन मिलने में कुछ देर हुई  , वैसे ये कोई नई बात भी नहीं थी , वजह ये बताई गई कि वेतन पत्रक बनाने वाला बाबू छुट्टी पर चला गया था . उन दिनों ये बाबू कम्प्यूटर पर हिसाब बनाया करता था और शायद ये अकेला ही  उस अनुभाग में इस तंत्र का जानकार था इसलिए कुछ दिनों काम अटक गया था .  खैर बाबू लौट आया और  हिसाब तैयार हो गया . वेतन मिलने की बात सुन लोग हिसाब विभाग पहुंचने लगे और इसी सिलसिले में मैं भी हिसाब विभाग  गया था . वहां की एक छोटी सी बात आज बताता हूं .

बाबू के सामने :

जब वेतन का हिसाब समझने को मैं कंप्यूटर के सामने बैठा था तो मेरा ध्यान पड़ा कि इस बाबू का सिर मुंडा हुआ है . हमारे देश में अचानक अगर किसी का सिर मुंडा दिखे तो  लोग जो सवाल करते हैं वही सवाल मैंने किया  , मैंने पूछा :

“ क्या हो गया ? “

और ये बाबू बोला :

“ पिता जी नहीं रहे  ...। “

सहज दूसरा सवाल मैंने पूछा  :

“ उमर कित्ती थी पिता जी की ? “

उसका जवाब था :

“  बावन साल….”

ये जवाब सुनकर  मुझे धक्का सा लगा और उसकी वजह थी तदनुभूति  , मेरी उमर भी उस समय  बावन बरस की ही थी .

अब हालांकि ये कोई अनोखी बात नहीं थी , मृत्यु किसी भी उमर में हो सकती है  पर उस समय तो पूरे बावन बरस की उमर ने मुझे कुछ सोच में डाल दिया था और मैं इस लडके की सूरत निहार रहा था .

ध्यान से देखने पर  लगा कि ये बाबू एक दम मेरे बड़े बेटे जित्ता ही तो है  और इस उमर में इस पर विपदा आन पड़ी है  .

और सब बात हुई पर एक ख़ास बात जो मुझसे  सम्बंधित थी वो ये कि  पूरे हिसाब विभाग में ये लड़का मुझे अपना सा लगने लगा .

कभी कभी ऐसा होता है कि कोई क्यों अपना सा लगने लगता है हमें पहले से पता नहीं होता  .

विपत्ति अनायास किसी को अपना बना देती है ….

बनस्थली के अच्छे दिनों को याद करते हुए .

प्रातःकालीन सभा स्थगित …

अथ श्री नैटाय नमः

Sunday, 21 January 2018

या कों अखीर काराऊंगो : जयपुर डायरी .



या कों अखीर कराउंगो .....  !

ये है हिण्डौन , फाजिलाबाद , दुब्बी , बुर्जा  इलाके के किसी एक भोले  किसान का कहा हुआ  वाक्य, जो उसने अपने बेटे के बाबत कहा था और वो बात मुझे बताई थी फूफाजी गंगा सहाय जी ने जो जयपुर में प्राथमिक स्कूल नादिर जी का मंदिर , नाहर गढ़ रोड  में मेरे शिक्षक और मेरे आदि गुरु थे  और बात पते की कहते थे . ये बात मैंने सुनी होगी कोई उन्नीस सौ पचपन छप्पन के आस पास . ये एक ऐसा ध्येय वाक्य है जो मुझे बार बार आज भी याद आ जाता है .

" या कों अखीर कराउंगो ...."

अरे... इसका अर्थ तो बताया ही नहीं , क्या कहना चाहता था किसान ?

क्या मतलब निकला इस वाक्य का ?

मतलब असल में तो बहुत गहरा है जिसका सम्बन्ध शिक्षा , रोजगार और जीवन के अन्यान्य पहलुओं से है .

आज उन्हीं फूफाजी का प्रपौत्र हितेश , मेरा फेसबुक फ्रेंड , कोई इतना बड़ा पैकेज लेकर किसी प्रतिष्ठान में काबिज हुआ है कि पूरी बिरादरी में हल्ला है . मुझे रकम याद न रही नहीं तो वो भी यहां लिख डालता .

और एक दिक्कत ये भी है कि रकम में मैं जरा समझता भी कम हूं .

वो ही जानता होता तो पढ़ाने का काम क्योंकर हाथ में लेता , बैंक में नौकरी न कर लेता .

बहर हाल मैं बहुत खुश हूं कि अपने बच्चे भी ये पैकेज प्रतियोगिता में औरों को पछाड़ कर आगे बढ़ने लगे हैं .

फूफाजी का कहा वाक्य जो वास्तव में एक किसान का कहा वाक्य था में  

" अखीर " का अभिप्राय था अल्टीमेट . उसकी चाहत थी कि वो शिक्षा के क्षेत्र में बच्चे को अंतिम छोर तक पहुंचाए जिसके बाद हासिल करने को कुछ भी न बचे . बस ' इतिहास के अंत ' की तर्ज पर ' शिक्षा का अंत '

मैंने ये भी जानना चाहा था कि उस किसान की नजर में वो छोर था कौनसा ?  वो ' चौदहवीं' और ' सोलहवीं 'क्लास की पढ़ाई को शिक्षा का वो छोर मानता था . इतने बरस पढ़ाई में लगाकर वो  डिग्रियां मिल जाया करती थीं उन दिनों  जिन्हें अपने नाम के साथ मांडकर लोग इतराया करते थे .

पर मैं ये बातें सोचते सोचते ये कहने को मजबूर हो जाता हूं कि कि इन काले अक्षरों की पढ़ाई ने आज बहुत कुछ नष्ट भी तो कर दिया है जीवन अनुभव से प्राप्त स्वर्णाक्षरों में अंकित ' जीवन मूल्य' तंगड़ में  तुलते हैं और आदमी की कदर काले धन की मात्रा से होती है . हुनर भी पैसे से ही तुलता है . अभी अभी एक फेसबुक मित्र ने एक शेर भेजा  है जो यहां कहकर मजबूरी में प्रातःकालीन सभा का स्थगन प्रस्तावित करता हूं

" मेरी तरफ कुछ सिक्के उछाल कर ।

लो वो मेरा ईमान आजमाता है ।।"

और उसी मित्र का एक ये शेर भी देख लीजिए :

"मैं ईमान बेच देता तो  ,

मैं भी अमीर हो जाता ।।"

( आभार दर्द गढ़वाली )

" अच्छे दिनों " की सराहना के साथ जीवन मूल्यों को नमन करते हुए .

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

वैचारिक अष्पष्टता के लिए क्षमा याचना सहित

Friday, 19 January 2018

मैं हाथां पोट उचा आयो .. : बोध कथा .




" मैं हाथां पोट उचा आयो .."   ---- राजस्थानी बोध कथा .

आज ये बोध कथा याद आ गई जो यहां साझा कर रहा हूं . कभी काकाजी **  से सुनी  थी . कथा का सन्दर्भ पता होने पर ये पंक्ति अपने आप में एक कहावत के रूप में भी बरती जा सकती है .

कथा  और सन्दर्भ :

एक राजा अपने राज्य में रात को भेस बदलकर घूमता और प्रजा जन का प्रत्यक्ष  हाल जानने का प्रयास करता था . ऐसे उसको अपने राज्य के अंदरूनी हालात का भी पता चलता और अपने लिए नीतिगत निर्णयों में भी मदद मिलती .

एक रात की बात :

 रोज  की तरह राजा बदले हुए भेस में महल की चार दीवारी के पास से गुजर रहा था कि उसने एक हरकत देखी . महल की ही एक सेविका अनाज की एक भारी पोट चुरा कर ले जा रही थी . पोट इतनी भारी थी कि उसके लिए उठाना मुश्किल था . साधारण राहगीर प्रतीत होने वाले राजा ने  इस सेविका की मदद की और उचा कर उसके सिर पर रखवा दिया . वो चोरी का अनाज अपने साथ ले जाने में सफल हो गई .

राजा सब कुछ जान भी गया और चुप भी रहा .

अगले दिन की बात .

अगले दिन वो ही सेविका किसी मामले में भाव दिखाने लगी और राज्य छोड़ कर चले जाने की धमकी भी दे बैठी , तिस पर राजा ने जो कहा वही है कहावत .

राजा ने कहा :

" मैं हाथां पोट उचा आयो जद भी  ईं गांव ( राज ) नै छोड़ अर जाय छै  , तो कोई पीस पो अर खवा दे ऊं गांव मैं जा अर बस जे ."

अभिप्राय: कि मैं अपने  हाथों से तेरी पोट उचा आया , फिर भी इस गांव को छोड़ कर जाती है तो फिर किसी ऐसे गांव / राज में जाकर बसना जहां का  राजा अनाज पीस कर और खाना बना- पका कर भी खिला देवे .

** काकाजी अर्थात हमारे पिता जी .

बोध कथा समाप्त .