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Tuesday, 6 October 2020

क्या सीखा मेरे पढ़ाए से : " खेंच दिया भाई साब ."

क्या सीखा मेरे पढ़ाए से  : "  खेंच दिया भाई साब "


 एक  सहपाठी दोस्त  पढ़ाई के बाद शोध के काम में लग गए थे  और मैं लग गया था पढ़ाने के काम में . दोस्त के भाई डिग्री कक्षाओं में पढ़ते थे . मेरा विषय भी पढ़ते थे . दोस्त आकर मिलवा गए  और परीक्ष के पहले मेरे सुपुर्द कर गए कि मैं उनको तैयारी करवा दूं . छोटे भाई नियमित रूप से आते , मैं अपना विषय उन्हें पढ़ा देता , आखिर काम भी यही था मेरा . रोज की चर्चा के बाद छोटे भाई कहते , " भाई साब इसका एक जिस्ट भी बनवा दीजिए . "

 मैं हर दिन के पढ़ाए का जिस्ट भी बनवा देता और अगले दिन के लिए ये पढ़ाई स्थगित हो जाती . डिग्री कक्षा के दोनों साल वो  पढ़ने आए परीक्षा के बाद कभी बताने नहीं आए कि पेपर कैसे हुए  , पर दोस्त से ही पूछा तो पता चला कि मेरा पढ़ाना सफल रहा , छोटे भाई के आशा के अनुरूप अच्छे नंबर भी आए . मुझे भी गर्व हुआ कि मेरा पढ़ाना सफल रहा .साल दर साल यह क्रम चलता रहा .फिर तो बी ए का तीसरा और आखिरी साल पूरा होना ही था .


बी ए फाइनल की परीक्षा के बाद एक दिन ये छोटे भाई रास्ते में मिल गए और मैंने जानना  चाहा  कि पेपर कैसे हुए तो बताने लगे कि  एक पेपर बहुत बढ़िया नहीं हुआ  और पेपर बिगड़ने की  बड़ी ' वाजिब '  वजह भी बता दी उन्होंने :

"  सैकिण्ड पेपर  के दिन करीब डेढ़ घण्टा खराब हो गया भाई साब , फ़्लाइंग मेरे कमरे में ही रही , फिर तो मैंने खेंच दिया भाई साब . "

 

अब मुझे ये तो समझ में आ गया था कि छोटे भाई जिस्ट बनवा देने को क्यों कहा करते थे , पर ये समझ में नहीं आ रहा था कि उनकी इस साफगोई पर कुर्बान जाऊं या अपना करम  पीट लूं  !

सहयोग : मंजु पंड्या .


सुप्रभात


सुमन्त


गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

19 फरवरी 2015 .



Tuesday, 28 May 2019

ठकुर सुहाती 

कपिल ( Kapil Bhatt ) ने कल पूछा


"फूफाजी एक शब्द याद आ रहा है। ठकुरसुहाती । आप से आज के परिप्रेक्ष्य में मार्गदर्शन की जरूरत है। प्रणाम।"


मैं बोला 

" कपिल सब तरफ इसी राह पर तो चल रहे हैं मीडिया के लोग अब मैं और क्या कहूं ।"

और कपिल का कहना था ;

मीडिया तो अब.....क्या कहूं। अस्थि विसर्जन हो गया है । बस।

कपिल 

भतीजे ने सोचने पर मजबूर कर दिया। कुछ न कुछ तो और क़हूं इस बारे में ।

ठकुरसुहाती कहने में हिंदी पट्टी के अख़बार और टी वी मीडिया सभी तो लहालोट हैं ऐसे में सवाल में ही जवाब छिपा है कपिल मैं और कुछ अतिरिक्त जोड़ने की ज़रूरत नहीं समझता । मीडिया का लम्बा अनुभव है कपिल को और वो सिर्फ मेरा मान रखने को सवाल पूछता है इसी में मुझे एक उम्मीद की किरण दिखाई देती है ।


अभी अग्रज मोहन श्रोत्रिय की एक पोस्ट देखी उसमें राजनीतिक दलों के लिए सलाह है , बात भी ठीक है :

देखना है आगे क्या होता है ।


"किसी भी राजनीतिक दल को, जो अपना काम बिना ध्यान बंटाए करना चाहता है, मीडिया का बहिष्कार कर देना चाहिए। 

अपने प्रवक्ता भेजना बंद कर देना चाहिए!


सरकार को समर्पित मीडिया आपके किसी काम का नहीं है!

आपका काम जनता को दिखना चाहिए, उसे ही महसूस भी करना चाहिए। "


अभी तो बात छेड़ी है , बात आगे चलेगी ….


खुश रहो कपिल ।


Saturday, 27 April 2019

बाबा की याद 

एक ग्रुप फ़ोटो से ली गई  बाबा मदन जी महाराज की फ़ोटो ।
और ये अपण 
ट्रायल एरर किए जा रहे हैं ।

शुभ रात्रि ।

Tuesday, 25 December 2018

डिपार्टमेंट की याद : जयपुर डायरी 

जयपुर में होवूं या कहीं बाहर ऐसा अक्सर हो जाता है कि कभी किसी से मिलना इस रूप में सार्थक हो जाता है कि मेरे डिपार्टमेंट की पुरानी स्मृतियाँ जाग जाती हैं . ऐसा ही तो पिछले दिनों हुआ जब हम लोग वर्धमान पार्क घूमने गए और वहाँ पड़ोस में रहने वाले कपिल भरिल्ल हम लोगों से आकर मिले . कपिल बताने लगे अपना घर जो सावित्री पथ पर वर्धमान पार्क के पास ही तो है . उन्होंने और भी तो बातें बताई कि पिछले दिनों बेटे के पास अमरीका में रहकर आए हैं और अब घर लौट आए हैं . यहां अपने पिता , पत्नी घर परिवार के बारे में बहुत कुछ बताया . मैं एक बार को बहुत सी बातें सोचने लगा और उनकी बात सुनता रहा .उनका भरिल्ल सरनेम सुनकर मुझे दो नाम याद आए जो अच्छे से याद हैं मैंने उन्हें बताया भी कि यहां जब मैं यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट में पढ़ा करता था तो वहां मेरी सीनियर थीं चंद्रा भरिल्ल जो उन दिनों भांभरी साब के सुपरविजन में पी एच डी कर रही थीं और उधर जब मैं बनस्थली में पढ़ाता था तो चंद्रा जी की भतीजी मेरे पास पढ़ती थी जिसका नाम था किरण भरिल्ल . ओ हो ये दो नाम सुनकर तो कपिल भावुक हो गए , वहीं मुझसे बात करने को बैठ गए वर्धमान पार्क में . ये कपिल और कोई नहीं चंद्रा जी के ही बेटे हैं . चंद्रा जी अब नहीं रहीं पर उस ज़माने की उनकी स्मृतियों से जुड़ी हुई कितनी ही बातें की हमने और उनसे जुड़े रूवा नाम के एन जी ओ का भी ज़िक्र आया . कपिल मुझे बताने लगे कि कुछ समय रूवा में रहकर कपिल ने भी मां को सहयोग दिया था . इस तरह हमारे बीच पीढ़ियों का रिश्ता निकल आया .

ऐसा होता है जब अनायास अपरिचित परिचित होते हैं तो कितनी पुरानी स्मृतियाँ ताज़ा हो जाती हैं .


कपिल भरिल्ल 

Wednesday, 7 November 2018

सवारी - सवारी .

#सवारी_सवारी

  

जीवन संगिनी से क्षमा याचना के साथ संपादित वृत्तांत Excuse me Manju Pandya

  थियेटर ~

ब्रह्मपुरी चोवटी वीर हनुमान , सन उन्नीस सौ अस्सी के दशक की बात है .

वहां कोई अवसर ऐसा था कि प्रश्नोरा समुदाय के लोग वहां जुटे थे और अब शाम पड़े अपने अपने घरों को जा रहे थे , और लोग भी आए थे शायद कोई बैठक ख़तम हुई थी . 

बाहर निकलने पर अपने अपने साधनों से लोग रवाना होने लगे .

सुरेन्द्र शर्मा दफ्तर से सीधे आए थे और अब घर को लौट रहे थे . उन्होंने अपनी मोटर में अम्मा , मोटी अम्मा , भूआ जी सरीखी सत्तर पार वृद्धाओं को बैठा लिया , आगे उनकी मोटर में ड्राइवर सीट के पास फाइलें रखी थीं और कोई ख़ास जगह बची नहीं थी . रामदास बाबा घर के बाहर ही खड़े थे और इन सब के बैठ जाने के बाद मुझे भी उस मोटर में ही बैठा देना चाह रहे थे ताकि जब ये लोग उतरें तो मेरा साथ रहे और मैं इन्हें संभाल सकूं . इसी को लेकर बाबा और सुरेन्द्र शर्मा में थोड़ी देर संवाद हुआ ~~~~~


एक सवारी और आ जाएगी .


अब और सवारी नहीं आ सकती .


आगे आ जाएगी एक सवारी .


नहीं, अब आगे सवारी की जगह नहीं है , जितनी आ सकती थी मैंने बैठा ली अब और जगह बची नहीं है .~~~~

बात बनती न देखकर बाबा ने मेरे दोनों कन्धों पर पीछे से हाथ रखे और मुझे उनके सामने किया ~


" इसे बैठाना है ."


तुरंत जवाब में शर्मा जी ने मोटर का आगे का फाटक खोल दिया मेरे लिए और बोले :

" इत्ती देर से सवारी सवारी कर रहे हो , ये क्यों नहीं कहते ,’ इस को बैठाना है .’ …..ये तो बैठ जाएगा. "

 मैं बैठ गया . लेकिन करम भी पीट लिया 

उमर हो गई टिकिट खरीदते खरीदते और यहां सवारियों में गिनती भी नहीं है .

मेरे अलावा इस प्रसंग से जुड़े सभी पात्र अब स्मृति शेष हैं पर बात है कि मुझे बार बार याद आ जाती है .

नमस्कार .

प्रातःकालीन सभा स्थगित …

इति .

~~~~~~

जयपुर 

16 नवम्बर 2015 .


आशियाना से अपडेट :

***************

पुराना किस्सा है . कई बार सुनाया है , पर जब भी सुनाया जीवन संगिनी से बच बचा के ही सुनाया न तो वे ये ही कहती :


"मुझे ये अच्छा नहीं। लगता कि आपकी सवारियों में गिनती नहीं है . "


गए बरस राम बाबू के आग्रह पर पहली बार ये किस्सा सोशल मीडिया पर डाला था .

आज फेसबुक याद दिला रहा है तो सोचा गृह कलह का जोखिम लेकर एक बार फिर इसे एडिट कर दिया जाए . 

टोका टाकी होगी तो देखी जाएगी . अब अपण तो जैसे हैं जो हैं .

आप तो मजा लो किस्से का .

किस्सा कैसा लगा ? अगर आपने पहले न सुणा हो तो , बताना जरूर .


नमस्कार  

 भोर की सभा स्थगित ..........


सुमन्त पंड्या .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

  16 नवंवबर 2016 .


Tuesday, 7 August 2018

धापीबाई मार्ग की कहानी : स्मृतियों के चलचित्र 

गए दिनों बनीपार्क बार बार जाना हुआ ।एक मार्ग पर पत्थर पर लिखा देखकर मैं थोड़ी देर के लिए ठहर गया , लिखा था ' धापी बाई मार्ग ' । मुझे एक पुराना प्रसंग याद आ गया । मुझे हरि भाई ने बताया था कि शर्मा जी बनस्थली फ्लाइंग क्लब से रिटायर होकर जयपुर में बसने जा रहे थे । बनी पार्क में अपने प्लाट पर उन्होंने मकान बनाया । बस्ती धीरे धीरे बढ़ रही थी । गली की संख्या और प्लाट नंबर से घर की पहचान थी ।इस बीच उनकी मा गुज़र गयी । अपनी मा की याद को जीवित रखने के लिए वे एक तख्ती बनवा कर लाये जिस पर लिखा था - धापी बाई मार्ग * । शर्मा जी ने तख्ती को अपनी गली के मोड़ पर गाड़ दिया और इसे * धापी बाई मार्ग* के रूप में प्रशस्त कर दिया ।

अब वे अपने डाक के पते में भी धापी बाई मार्ग लिखने लगे । वहां आकर बसने वाले अन्य लोग भी अपने पते के रूप में ' धापी बाई मार्ग , बनी पार्क , जयपुर ' लिखने लगे । पोस्टमैन भी इस मार्ग को धापी बाई मार्ग के रूप में जानने लगा और बढ़िया ये रहा कि नगरपालिका में भी यह धापी बाई मार्ग के रूप में दर्ज हो गया ।

यही है ' धापी बाई मार्ग ' के नामकरण की कथा । इस मार्ग के आरम्भ में पत्थर पर शर्मा जी की माँ का नाम उकेरा गया है ।

फ़ेसबुक पोस्ट रूप में जब ये चर्चा चली सन २०१४ में तो प्रियंकर पालीवाल जी की दो टिप्पणियाँ  आईं जो यहां उद्धृत करता हूं :

१.

कई बार सदिच्छाएं ऐसे ही सरल-सहज ढंग से फलीभूत हो जाती हैं . आखिर सबसे पुराने बाशिंदे का कुछ तो विशेषधिकार बनता ही है . मुझे मार्खेज के हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलीट्यूड का गांव-कस्बा मकोंडो याद आया जिसमें गांव को बसाने वाले सीनियर बुएंदिया इस बात पर नाराज होते हैं कि हमारा घर किस रंग से पोता जाए, नगरपालिका यह तय करने वाली कौन होती है . गांव के बहाने बदलने-बढने-सधने-बिगड़ने की अजब-गजब दास्तान है यह .

२.

आपके संस्मरण इतने सहज-स्वाभाविक ढंग से आ रहे हैं कि सीधे मन में उतर जाते हैं. आपको लगातार लिखना चाहिए . एक के बाद एक कड़ी जुड़ती रहे . कई जगहें तो ऐसी हैं जहाँ मेरा भी जाना-रहना हुआ है तो रिकनेक्ट कर बहुत अच्छा लगता है . जैसे बापूनगर और जनता स्टोर का जिक्र . अब गुड वाला किस्सा आ जाए तो उत्सुकता कुछ शांत हो .

इन टिप्पणियों ने मेरा उत्साह बहुत बढ़ाया .

K

ब्लॉग पर प्रकाशित ८ अगस्त २०१८.

Monday, 16 July 2018

मेरा स्टेटस .

मेरा स्टेटस :


जब भी फेस बुक खोलता हूं एक ही बात :

" वाट इज इन योअर माइंड ?"

इसी के जवाब में कभी कबार बल्कि रोज बरोज कुछ न कुछ मांड देता हूं .

ये ही है आज की दुनिया के साथ संचार की कहानी .

कुछ बातें मेरे अपने जानने वालों तक पहुंचती हैं , कुछ पहले से अनजान लोगों तक पहुंचती हैं और वो मेरे जानने वाले बन जाते हैं . कुछ बातें पुराने जानने वालों तक पहुंचती हैं और वो नए सिरे से जुड़ जाते हैं . कुछ बातें बट्टे खाते में भी जाती होंगी ही जिसके लिए ये ही कहा जाएगा कि इन बातों को यहां दर्ज करने की जरूरत ही क्या थी . सेंसर बोर्ड की इस बारे में लगातार चेतावनी भी मिलती है जिसे मैं ख़ुशी से झेलता हूं .


बहुत सी बातों को भूलना चाहता हूं पर भूल नहीं पाता , बहुत सी बातों को याद करने की कोशिश करता हूं पर उनमें कोई कोई ख़ास नुक्ता याद ही नहीं आता . पता नहीं ये मेरे साथ ही होता है या सब के साथ होता है . वस्तुस्थिति क्या है ये तो आप बताएंगे , मैं कैसे बताऊंगा .

एक और झंझट है -- एक बात देखकर दो बात याद आ जाती है . करूं क्या मैं उन बातों का ? उन बातों को दर्ज कर देता हूं . फिर चाहे तो वो बातें जाए बट्टे खाते में .अपने आप से कहता हूं " दर्ज कर और भूल जा."

बुद्धिमान लोग बताते हैं कि प्रायः साठ के पार ऐसा ही होता है . बहरहाल मैं तो मूर्ख हूं इस स्थापना को कल सुबह की पोस्ट में स्पष्ट करूंगा . 

अभी कुछ एक बातें कहे देता हूं :

मैं कोई किस्सा गढ़ता नहीं , आप बीती और आँखों देखी प्रामाणिक बातें ही कहता हूं .

भरपूर कोशिश करता हूं कि कोई किसी को आहत करने वाली बात मेरी ओर से दर्ज न होवे . फिर भी ऐसा हो जाता है कि लोग आहत हो जाते हैं . उसका भी स्पष्टीकरण और समाधान करता हूं . इतना अवश्य है कि भली कही बात को पढ़ने सुनने वाले एक जैसा नहीं समझते . तभी तो नीलम शर्मा बार बार दोहराया करती हैं ,' आप कैसे देखते हैं ? '

 तो आज मैं भी उसी सवाल के साथ प्रातःकालीन सभा स्थगित करता हूं ............' आप कैसे देखते हैं? '

अभी हाल तो ये ही है स्टेटस .


सुप्रभात . ☀️

समीक्षा : Manju Pandya.



Saturday, 14 July 2018

चोरंग्या  : स्मार्टफ़ोन का करतब .

‘ अच्छा है ना सर! चाळे लगे रहते हैं आप ।’

तीन बरस पहले सज्जन * ने तो ऐसे कह दिया था जब मैंने अपनी ये दुविधा यहां दर्ज की थी . आज उठाकर इसे ब्लॉग पोस्ट बणा दिया , देखो तो सही .

* Sajjan Poswal.


सुप्रभात ☀️

नमस्कार 🙏 

जयपुर १५ जुलाई २०१८ .

*****

     ये स्मार्टफोन ने तो बजाय स्मार्ट बनाने के चोरंग्या कर दिया .

क्या कहा , " चोरंग्या " क्या होता है ?

मतलब होता है जिसका चारों तरफ ध्यान भटकता हो . ये शब्द मैंने बनस्थली में घरों में काम करने वाली बाइयों से सुना और सीखा था .

चारो तरफ से , विभिन्न उपकरणों और माध्यमों से चले सन्देश सुबह ,दोपहर ,शाम और रात आते जाते हैं कि आदमी इससे अटका रहता है , भटका रहता है .

कोई तदनुभूति वाले और हों तो मैदान में आओ और हिम्मत बंधाओ न स तो अपन तो बन गए चोरंग्या .


फोटो क्रेडिट : Manju Pandya



२०१५ की रचना .

दुविधा ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८. 

Thursday, 12 July 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ९.

नानगा द ग्रेट : नौवीं कड़ी 


आज की कड़ी लिखने से पहले दो लोगों का विशेष आभार व्यक्त करता हूं . एक बनस्थली के श्याम जी और दूसरा अलवर का लोकेश . श्याम जी मुझे लगातार कहा करते थे :


" भाई साब , अब काईं न काईं लिखो . अब देबा को बखत आगो ." 

अर्थात भाई साब अब कुछ न कुछ लिखो , अब देने का समय आ गया .


लोकेश और रेणु जयपुर आए थे और तब लोकेश ने मुझे कहा था :


"मौसा जी , आप कोई पोस्ट नानगा के बारे में भी लिखो . उसका व्यक्तित्व ऐसा रहा है कि वो डिजर्व करता है एक पोस्ट ."


इन्हीं लोगों की प्रेरणा मानता हूं कि आठ कड़ी पहले लिख चुका हूं और आज नौवीं कड़ी लिखने जा रहा हूं . आगे बात बढ़ाने में मेरे परिवार जनों और इष्ट मित्रों , जो भी मेरा परिवार ही हैं , ने अभूतपूर्व योगदान दिया जिससे ये श्रृंखला बन पड़ी है , इसमें मेरा कुछ नहीं है . रहीम के शब्दों में: 


" देनदार कोउ और है , देत रहत दिन रैन ।

लोग भरम हम पै धरैं , यातें नीचे नैन ।।"


पहले राजस्थानी की एक लोक प्रचलित कहावत :


" जैपर चाल्यां सै सिद्ध हो जासी.

थाळी ठीकरो हो जासी .

रूपयो - पीसो हो जासी .

टाबर टोळी हो जासी। "


ये उस मनोदशा को इंगित करने वाली कहावत है जो किसी ग्रामीण को नगर की दिशा में प्रयाण के लिए प्रेरित करती है , जैसे प्रेमचंद की कहानी में गोबर नगर चला आता है , नानगा भी जयपुर नगर में आया था पर वो ऐसा आया कि नगर का ही विस्तार वहां तक हो गया जहां जाकर नानगा ने अपने गांव में खुरपी जा गाड़ी .


 नानगा की मसखरी की मुझे चक्रपाणि ने याद दिलाई . नानगा किसी हास्य सम्राट से कमतर नहीं था . आज उसकी केवल एक बानगी बताता हूं . नानगा मुझे कहता:


" रजाई क्यूं बणवावो छो भाया जी , थांकै तो कन्नै ही नुवाई छै ."


अर्थात भाया जी रजाई क्यों बनवाते हो ? आपके तो पास ही निवाई है .

स्थानीय भूगोल के जानकार समझते हैं कि निवाई टाउन बनस्थली के पास ही तो है . निवाई का शब्दार्थ होता है गरमाहट . तो जो निवाई की ओट में रहता हो उसे रजाई ओढ़ने की क्या जरूरत .

जीजी ने भी नानगा बाबत कई बातें बताई , जैसे :

" नानगा की मसखरी का एक किस्सा मैं भी बतातीं हूं  ।एकबार हम उदयपुर आरहे थे ।नानगा से पूछा तुम्हारे लिये उदयपुर से क्या लावें तो उसका जवाब था ।मेरे लिये दो पैसे का उदयपुर ले आना ।ऐसा ही एक वाकया और ,देखिये ।उसने हमारा लेजाने का बिस्तर बांध दिया तब मैंने कहा नानगा थैंक्यू ।उसने प्रत्युत्तर दिया , " क्या फेंक दूं ? " ऐसा था हमारा नानगा । "

एक आध बात भाई साब टिप्पणी में जोड़ेंगे ही मुझे भरोसा है , न तो मैं वो बातें जोड़ूंगा जो उन्होंने बताई हैं अब तक .


नानगा की मसखरी की इन्हीं बातों को आगे भी बताऊंगा पर अभी हाल प्रातःकालीन सभा स्थगित .....

सुप्रभात :

सह अभिवादन : Manju Pandya

आशियाना आंगन, भिवाड़ी .

14 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित : जुलाई २०१८.


Tuesday, 10 July 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ८.

नानगा द ग्रेट : आठवीं कड़ी .


6 जुलाई को नानगा बाबत सातवीं कड़ी लिखकर पोस्ट की थी उसके बाद पोस्ट तो मैंने लिखी पर इस श्रृंखला का क्रम स्थगित हो गया . आज उसे आगे बढ़ाने का प्रयास करता हूं .


सुधीर ने तो मुझे पहले ही कहा था कि उसके नानगा मामा की कहानी वास्तव में हमारे घर की कहानी है . ये कहानी कैसे भला पूरी हो सकती है . पोस्ट पूरी हो सकती है कहानी पूरी नहीं हो सकती . इतनी तो बातें हैं बताने को कि कहां तक बताई जाएं . काकाजी से नानगा ने इतना कुछ सीखा जो शायद हम संतानों ने भी उतने अच्छे से न सीखा कभी .


जीजी ने मुझे फोन कर बताया कि जीजी के विवाह में नानगा ने सोने की अंगूठी उपहार में दी थी . जीजी नियमित रूप से नानगा और शेठाणी के लिए राखी भेजा करती थी इत्यादि .

भाई साब ने और बातों के अलावा नानगा का ये गुण रेखांकित किया कि सब कुछ अपने लिए नहीं , अपने उपभोग के लिए नहीं कुछ आगे की पीढ़ियों के लिए भी बचाओ , उनके लिए भी छोड़ो . ये सन्देश तो वास्तव में किसी व्यक्ति के लिए नहीं वरन अखिल मानवता के लिए है .


खैर अभी हाल नानगा के जीवन दर्शन और अर्थशास्त्र को छोड़कर वहीँ चलूं जहां सातवीं कड़ी छोड़ी थी .....

********

राज भवन में नानगा :

  बात आई थी कि नानगा ने तीतर उड़ा दिया .

गया तीतर , आकाश में उड़ गया . रसोइए ने ये बात बनाई कि तीतर तो बीमार लग रहा हैं , एक आध बार बगीचे और पिंजरे के चक्कर लगाए और ये आ बताया कि तीतर तो मर गया . और इस तरह तीतर की बात , तीतर प्रसंग ख़तम हुआ . जबकि तीतर तो कभी का परिंदों के आकाश में चला ही गया था . बाकी कहानी आप को विदित ही है . उन वीभत्स बारीकियों में मैं अब नहीं जाऊंगा .


नानगा का तबादला :

    नानगा राजभवन में नाखुश था , नौकरी छोड़ना चाहता था . काकाजी ने उसे रोका था और वो दिन गिन रहा था .

जब तक जयपुर महाराजा राज प्रमुख रहे काकाजी भी राज प्रमुख के हिज हाईनेस हाउसहोल्ड में रहे . ठाकुर मोहब्बत सिंह जी के इस्तीफे के बाद काकाजी वहां अकाउंट्स आफिसर बन गए थे . 


पर राज प्रमुख का पद समाप्त होने के बाद उनकी सेवाएं भी तब राज्य सरकार में विलीन हुईं और उन्हें चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग में काम मिला . उनकी हैसियत वर्तमान एफ ओ के समतुल्य थी और तब की व्यवस्था में एक चपरासी और साइकिल सवार की नियुक्ति या तबादला करना या करा लेना उनके हाथ की बात थी . और इस प्रकार नानगा का बड़ी आसानी से तबादला हो गया नानगा मेडिकल डिपार्टमेंट में आ गया .

जैसा कि राज्य सरकार की सेवा में होता है काकाजी के तो डिपार्टमेंट भी बदले , जयपुर शहर के बाहर भी तबादले हुए पर नानगा उसी मेडिकल डिपाटमेंट में रहा और शहर में ही रहा जहां उसे नियुक्ति मिली थी .

नानगा बाबत एक ख़ास टिप्पणी भाई साब नरेंद्र पंड़्या की -

" नानगा के बाबत मैं ये कहूँगा कि खून के रिश्तों के इतर भी कोई रिश्ते खून के रिश्तो से भी बढ़कर हो सकते हैं, वे नानगा के और हम लोगो के रिश्ते थे शायद हमारे देश में पाए जाने वाले ऐसे ही रिश्तो पर ही हमारे देश की बुनियाद टिकी है और ये ही रिश्ते हमारे देश भारत को भारत बनाये हुए है पता नहीं क्यों लोग इस देश को बाटने और बर्बाद करने की व्यर्थ कोशिश करते है इंसानी रिश्ते धर्मं ,प्रान्त,सम्प्रदाय औरभाषा सेऊपर है."

ऐसे ही एक टिप्पणी मित्रवर गोविंद राम केजरीवाल की भी यहां जोड़ता हूं जिन्होंने ये संस्मरण लिखते हुए मेरा बहुत उत्साह वर्धन किया , वे कहते हैं :

“ बहुत ही सुंदर श्री सुमंतजी.. आपके स्मृतियों के चलचित्र भी इतने सुहावने और स्फूरतिदायक हैं कि मन प्रसन्न हो जाता है जैसे "मुगले आॅजम" फिर से रिलीज हो गई है.. “

कथाक्रम जारी रहेगा........

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

सुप्रभात .

समर्थन और सहयोग : Manju Pandya.


सुमन्त पंड्या .

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

11 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित    जुलाई २०१८ .

यहां फिर मेरी जुगलबंदी नानगा के बड़े बेटे शंकर के साथ .



Monday, 9 July 2018

ल्याओ खीर : स्मृतियों के चलचित्र 

लाओ खीर .....


बरसों पहले माता पिता के साथ मेहसाणा , गुजरात की यात्रा कर रहा था तब की एक बात याद आ गई .

एक कोई सौदागर यात्रा के दौरान बोली के जरिए तरह तरह की चीजें बेच रहा था . लंबी दूरी की यात्रा से ऊबे मुसाफिरों का इस सौदेबाजी से मनोरंजन भी हो रहा था और सौदागर का माल भी बिक रहा था इस तरह से .

भांत भांत के आयटम थे उसके पास बेचने को . जो सबसे ऊंची बोली लगाता वो उस बिक्री के आयटम को खरीदता . पर एक बात और भी थी कि कभी कभी सबसे ऊंची बोली लगाने वाले का भी सौदा नहीं पटता . सौदागर ये जताता कि उसे माल की वाज़िब कीमत नहीं मिल रही और वो बजाय आयटम देने के ऊंची बोली लगाने वाले को कोई गिफ्ट दे देता बजाय सौदा मुकम्मल करने के .

ये गिफ्ट देने वाला आइडिया ही वो सूत्र है जो मुझे आज की पोस्ट की तरफ धकेल रहा है . जो श्रृंखलाएं चल रही हैं अगर विचार मंथन के अभाव में कुछ रुकी हैं तो मेरे पाठक / श्रोता क्यों निराश हों और मुझे टोकें कि आज की पोस्ट क्योंकर नहीं आई . क्यों न स्मृतियों की चित्रशाला से कोई एक छोटा प्रसंग कह डालूं , सुना डालूं . श्रृंखला की पोस्ट मुकम्मल नहीं तो ये गिफ्ट ही सही इस बीच .

तो आज बल्ला काकाजी के बारे में :

     - बल्ला काका काकाजी (हमारे पिता )के मामा के बेटे भाई थे और क्रॉनिक बैचलर थे . नाम तो वैसे उनका लक्ष्मी नारायण था पर घर के नाम " बल्ला" से ही पुकारे जाते थे . जीवन भर वे भारतीय रेल की सेवा में रहे . तबीअत के रईस थे . उनका एक स्टाइल था . पहली तारीख को वेतन मिलता तो वो जयपुर के जौहरी बाजार स्थित एल एम बी होटल में खाना खाने अनिवार्यतः जाते . तब का तो बेहतरीन शाकाहारी होटल और रेस्टोरेंट वही था . आज भी नाम है ही उस होटल का .

ये तो पचास के दशक की बात है . उन्हें भर पेट भोजन के शायद पचास रुपए चुकाने होते थे , मेरी स्मृति में दर्ज आंकड़ा कुछ भिन्न भी हो सकता है पर उससे क्या ? बात तो ये है बताने की कि उन्हें भर पेट भोजन करना था और एक मुश्त भुगतान करना था .

सवाल ये था कि ग्राहक सेवा की शर्तें होटल की हों या ग्राहक की ? साथ ही एटीकेटी की बात .


अब आता है किस्से का क्लाइमैक्स :

    - डेजर्ट के नाम पर छोटो छोटी कटोरियों में बहुत गरम खीर लेकर बैरा आवे और "ल्यो खीर ...ल्यो खीर " कहकर चिड़ावे ग्राहकों को . ग्राहक चम्मचों से सिपड़ सिपड़ करें और खीर को उस ताप पर खा न पावें .

बल्ला काका , भरतपुर के मूल निवासी , मिठाई के शौक़ीन उनको ये स्थिति स्वीकार नहीं थी . काहे का एटीकेट उन्होंने बाजी पलट दी , वही आज बताता हूं जो मुझे आज तक याद है .

वो लट्टू सी छोटी कटोरियाँ बजाय एक के चार लेते वेटर से, थाली में उलटते और ठंडी करके खाते खीर .

थोड़ी देर पहले वेटर की बारी थी : "ल्यो खीर...ल्यो खीर..."

( लो खीर...लो खीर ...)

अब बल्ला काका की बारी थी : " ल्याओ खीर ....ल्याओ ..खीर..."

( लाओ खीर...लाओ खीर...)

ब्लॉग पर प्रकाशित  : जुलाई २०१८.

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आपका किस्सागो    सुमन्त ।

Monday, 2 July 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ७.

नानगा द ग्रेट : सातवीं कड़ी .


     नानगा गवर्नर हाउस याने राज भवन में त्रस्त था और नौकरी छोड़ने पर आमादा था . जैसी खान पान की सामग्री उसे बाजार से लेकर आनी होती थी उसे अच्छा नहीं लगता था . राज भवन में भी उसके काम काज का तरीका निराला था . निरक्षर व्यक्ति दुनियां भर में डाक बांट आता आखिर वो साइकिल सवार था , कैसे छटनी करता कैसे यथा स्थान पहुंचाता उसका अपना ढंग था . 

वहां रहते भी वो अपनी करनी से बाज नहीं आता .

तीतर उड़ाया .

    एक दिन नानगा को लगा कि रात के भोजन में एक तीतर भोज्य बनने वाला है . आखिर नॉन वैज खाने वालों को तो वो सुस्वादु लगता है ऐसा मैंने समझदार लोगों से सुना ही है . नानगा को तीतर पर दया आ गई और उसने तीतर उड़ा दिया . खुले आकाश में उड़ने वाला पक्षी चला गया आकाश में . रसोइया चाहे नॉन वैज बनाता रहा हो नानगा की शाकाहारी विचारधारा का भी तो आदर करता था . 

डिनर के लिए काटे जाने को तीतर उपलब्ध नहीं रहा . क्या हुआ उसके बाद आपकी जानने की उत्सुकता होगी पर ये बात आ पाएगी अगली कड़ी में ही . 

अनायास प्रातःकालीन सभा स्थगित 

(कथाक्रम आगे जारी रहेगा ....)

सुप्रभात .

सहयोग और समीक्षा : Manju Pandya .

सुमन्त पंड्य 

आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

6 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८ .

फोटो में शंकर के साथ मेरी जुगलबंदी .


Sunday, 1 July 2018

नानगा द ग्रेट  : स्मृतियों के चलचित्र ६ .

नानगा द ग्रेट : छठी कड़ी


                                   मैंने पिछली कड़ी में लिखा था ,लिखा क्या था बल्कि कहा था कि नानगा ने जयपुर शहर से दूर सुक्या गांव में अपनी खुरपी गाड़ी थी , शहर में तो वो जीवन निर्वाह के लिए आश्रय और रोजगार की तलाश में आया था . मैंने वादा किया था कि इसे समझने के लिए नानगा का अर्थशास्त्र भी बताऊंगा . इस के साथ ही नानगा के केरियर में आए बदलाव भी तो बताने हैं , एक एक कर दोनों ही बातें बताता हूं . पहले अर्थशास्त्र को ही ले लेते हैं , इस बाबात जानने की उत्सुकता ज्यादा रहती है .


नानगा का अर्थशास्त्र :

  नानगा को यदि पांच रूपए महीना काकाजी से मिलता था तो वो यहीं अपने रुपयों को घर के बिस्तरों में दबाकर रख छोड़ता था . दस महीनों की इस प्रकार इकठ्ठा बचत से सस्ते जमाने में एक सोने की मोहर खरीदी जा सकती थी और नानगा वही करता . सोने की खरीद में उसके मददगार होते मुनीम साब जो एक सर्राफा व्यपारी सेठ के विश्वास पात्र मुनीम हुआ करते थे . नानगा ने अपनी मेहनत की कमाई को सोने में बदला और इस काम में कभी नहीं ठगाया . हमारे ही घर के एक सुरक्षित कमरे में नानगा का एक ट्रंक रखा रहता था . उस ट्रंक में मोहरें होंगी किसी को पता नहीं था बहुत बाद तक भी पता नहीं था . वही नानगा का बैंक था , वही स्ट्रांग रूम वही ट्रेजरी ।


आगे चलकर इसी स्वर्ण धन से उसने आज के सुखपुरिया और तब के सुक्या गांव में खेती की जमीन खरीदने की शुरुआत की जिसके लिए मैंने कहा है कि नानगा ने खुरपी गाड़ी . बहुत समय वहां खेती का काम हुआ लेकिन नगर विस्तार के चलते वहां तक तो आज शहर चला गया . रूपांतरण के बाद जमीन के भाव तो अप्रत्याशित बढ़ गए . नानगा के बाद नानगा के बेटों ने अवाप्ति के चलते अगर पांच बीघा जमीन बेचीं तो आवक से अठ्ठाईस बीघा जमीन और खरीदी . इस तरह वो योगः क्षेम की नीति पर चले . जो था उसका संवर्धन ही किया .


पर अब नानगा के केरियर की बात .


नानगा राज प्रमुख के दफ्तर में :

 राजस्थान के निर्माण के बाद जयपुर महाराजा नई व्यवस्था में राज प्रमुख बने और पद पर रहे तब तक नानागा उस दफ्तर में साइकिल सवार रहा .


विलक्षण बुद्धि थी उसकी . उसे ढेरों निमंत्रण पत्र दे दिए जाते जिनपर अंग्रेजी में नाम पते लिखे होते मगर मजाल जो कोई कार्ड इधर उधर हो जाता . हर एक कार्ड पर वो अपनी समझ से कोई निशान बना लेता और सब को यथा स्थान पहुंचा आता .


राज भवन में नानगा :

  1956 में एक परिवर्तन हुआ . राज प्रमुख का पद समाप्त हो गया और राज्यपाल का पद सृजित हुआ . राज प्रमुख के स्टाफ के ये लोग याने हिज हाइनेस हाउसहोल्ड के लोग राज भवन का स्टाफ बनाकर भेज दिए गए . नानगा भी उनमें से एक था .


नानगा को वहां बड़ा कष्ट था और एक बार तो वो नौकरी छोड़ने पर ही आमादा हो गया था , काकाजी ने उसे समझा बुझाकर यह कहकर रोका था कि मिली मिलाई सरकारी नौकरी ऐसे न छोड़े उसका और कहीं तबादला ही करवा देंगे और ये कष्ट मिट जाएगा .


नानगा के शाकाहारी स्वभाव को ये मंजूर नहीं था कि वो मुर्गी के अंडे पोल्ट्री से लेकर आए .

तात्कालिक समाधान ये निकाला गया कि वो रसोइए को कहता कि उसकी साइकिल के हैंडिल पर वो अपना थैला टांक देवे . विक्रेता से कहवे कि वो थैला उतार कर उसमे अंडे भर देवे और फिर टांक देवे . लौट कर रसोइए से थैला उतरवा देवे . गरज ये कि उसे अण्डों को हाथ न लगाना पड़े .


ऐसा था नानगा द ग्रेट .......


कथाक्रम जारी रहेगा.......


सायंकालीन सभा स्थगित .


समर्थन और सहयोग :

Manju Pandya

Himanshu Pandya


नमस्कार .


सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर . जयपुर .

3 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित   जुलाई  २०१८. 



 लड़ो मन्नै   : जयपुर डायरी 

" लड़ो मन्नै !"

       जयपुर डायरी 


 पुरानी बात याद आ गई . नाहर गढ़ की सड़क पर घोषी समुदाय का पपैया पहलवान कबूतर पालता था , बड़ा सुन्दर बांस का मचान था उसके घर " पपैया मंजिल " की छत पर , उस पर भांत भांत के कबूतर बैठे रहते . इनमें कई एक सफ़ेद कबूतर भी होते मुझे लगता ये ठंडे मुल्कों से आए हुए हैं . इन कबूतरों से जुडी हुई कई एक यादें हैं , बताऊंगा और अभी क्यों बात याद आई वो भी बताऊंगा .

ये कबूतर खुले आकाश में खूब उड़ते और लौट कर अपने घर के मचान पर आ बैठते बड़ा ही सुन्दर दृष्य होता . बाकी उनके लिए घर की नीचे की मंजिल में , पोळी में , जालीदार घर भी बने थे जहां ज्वार के चुग्गे का भरपूर इंतजाम होता था . पोळी में एक साथ चुग्गा डाल दिया जाता और कबूतरों की घुटर घूं - शुरु हो जाती . घूम घूम कर सारे कबूतर चुग्गे के पास भी आते , दाना भी चुगते और लड़ते भी .


एक दिन की बात 

एक कबूतर रास्ता भटक कर या पता नहीं क्यों सामने हमारे घर की दूसरी मंजिल में आ गया और वो वापिस न जा पावे . सामने के घर में पुकार कर बताया कि एक कबूतर यहां आ गया है , सुनकर पपैया पहलवान का बड़ा बेटा सिकंदर आया , उसने पास जाकर कबूतर को उठाया और अपने कंधे पर बैठा लिया और सिकंदर के कंधे पर बैठकर वो कबूतर अपने घर गया साब वैसे ही जैसे यज्ञोपवीत के दौरान बटुक मामा की गोद में चढ़कर यज्ञस्थल पर आता है . दो अलग अलग बातें हैं पर मुझे उपमा निमित्त ऐसे ही बातें याद आ जाती हैं . कबूतरों का वो ही सिलसिला कभी मचान पर कभी विश्राम और भोजन के लिए पोळी में .


और एक पुरानी याद 

ये उन दिनों की बात है जब जयपुर में टी वी प्रसारण सायंकालीन सभा में शुरु ही हुआ था . घर घर में टी वी लाए जा रहे थे और घरों की छतों पर टी वी के पुराने किस्म के एंटीना लगने लगे थे . पपैया मंजिल के कबूतरों के मचान और टी वी के एन्टीनाओं में बहुत कुछ एक जैसा था पर थोड़ा फरक भी था , मचान बांस का था और एंटीना मैटल के . हमारे घर की छत पर भी था एंटीना और जाहिर था इसका सम्बन्ध ऊपर की मंजिल में रखे टी वी से था . हुआ क्या कि मैं घर की छत पर मन बहलाव के लिए छोटी सी महिमा को लेकर गया था . बमुश्किल बोलना सीखी थी बेटी लेकिन एंटीना और मचान का फरक उसने मुझे समझाया था इस प्रकार :


" जे फूटू , जे फ़ूटू , जे फूटू , जे फूटू ना ! "


उसने अपनी जुबान में मुझे समझाया था कि बाकी सब तो टी वी एंटीना थे और कबूतरों का मचान एक अलग वर्ग था .


तब तो महिमा उस अवस्था से भी कुछ छोटी थी जित्ता अब सैम है .


आज का शीर्षक : लड़ो मन्नै . *


 एक दिन मेरे सामने की घटना , मैं पपैया के पास कुछ दूध का हिसाब करने गया था कि वहां कबूतरों के झुंड में ज्वार के दानों के आस पास कुछ लड़ाई शुरु हो गई आपस में , कुछ कबूतरों ने दादागिरी शुरु कर दी , घुटर घूं की आवाज तेज हो गई . इस गतिविधि को देखकर पपैया दो ही शब्द बोला :


" लड़ो मन्नै . "


और फिर शान्ति हो गई . कबूतर कित्ती आसानी से उस्ताद की बात समझ गए ये देखना बहुत आश्चर्य जनक था .


अभी क्यों याद आई बात 

"...... मैं उनसे लड़ी सर ,’ ये तो हमारे सर हैं , आप इनकी फ्रैंड कैसे बन गईं ??? "


दिल्ली से मेरे पास मेरी विद्यार्थी के भेजे लंबे सन्देश में से एक कतरन उद्धृत की है मैंने . कितना अपनत्व है ऐसा कहने में वही बताने को मैंने इत्ती सी बात खोली है . ऐसे अपनापन जताते सन्देश मुझे और जीवन संगिनी को बहुत भाव विभोर करते हैं और बनस्थली के दिनों की याद दिला जाते हैं .

और मैं यहीं पपैया की कही बात दोहराता हूं :

" लड़ो मन्नै . 

माने , " लड़ो मत . "

दोनों ही दोस्त बनो , मेरे और गुरु मां के आशीर्वाद दोनों को .


और चलते चलाते दुष्यंत का कहा 

" …. राम जाने किस जगह होंगे कबूतर ,

  इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है . " 

सुप्रभात 

Good morning

Sumantpandya

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

  शुक्रवार , 1 जुलाई 2016 .

ब्लॉग पर प्रकाशित   जुलाई २०१८.


Thursday, 28 June 2018

ऋषिकांत की बात : फ़ूफ़ाजी ढोक !

ऋषिकांत की बात : " फूफाजी ढोक ." 
       

चलते रस्ते बन गया किस्सा है  आज अगर समय ने अनुमति दी तो वही बताए देता हूं .

अब ये तो आए दिन का रंबाद है कि सुबह सुबह कोई किस्सा मांड न पावूं तो मैं अपनी कोई नई या पुरानी जैसी भी सूझे फोटो लगा देवूं और अभिवादन का क्रम शुरु हो जावे .
ऐसे ही गए दिनों एक फोटो मैंने प्रोफाइल पर टांग दी . इस पर आई टिप्पणियों में एक टिप्पणी ऋषिकांत की भी थी जिसे बचपन से ढब्बू कहते आए हैं   ढब्बू ने अपनी समझ से लिखा :

   " फूफा जी ढोक ."   

  फूफाजी ने आशीर्वाद भी दे दिया पर असल में  ढब्बू के लिखे में कुछ टाइप की गड़बड़ से या गफलत में हो गया था :

"  फूफाजी ठोक ! "

  बात   छूट भी जाती पर   टीप पर टीप देते हुए संदीप ने लिखा :

"   ठोक  नहीं  ' ढोक '  ."

  अब मेरा भी  ध्यान गया कि चाहे गफलत में ही सही ठोकने की बात आ गई है तो मैंने आगे सवाल दाग दिया :?

" किसको ठोकना है ऋषिकांत  बता ? फूफाजी तो ठोक देंगे . "
 
अब ऋषिकांत का तो ध्यान जाता सा जावे , इस बीच क्या हुआ बताता हूं . बात पर बात याद आई पिछली शताब्दी की  .

   कमला मेरी देखरेख में अपना एम् फिल डेसर्टेशन लिख रही थी .  उसके प्रबंध में ढाका का नाम बड़ा महत्वपूर्ण था  विषय के शीर्षक में भी और इबारत में भी पर वो जब भी कुछ लिखकर लाती ' ढाका '  को  ' ठाका '  ही लिखा होता और सुधारना पड़ता , आखिर में मैंने तो यह तय किया कि ये बात टाइपिस्ट को ही बता देवेंगे कि   " ठाका " नहीं  " ढाका " लिखा जाना है .
और इस प्रकार निभ गई बात  , हो गया कमला का शोध प्रबंध पूरा .
ये  पिछले जमाने की बनस्थली की बातें हैं जो बरबस याद आ जाती हैं .

 और एक बात कहने की 
************************
जाने ऐसा क्यों है कि अंग्रेजी की ए बी सी डी जिसको देखो याद होती है , छोटे छोटे बच्चों से ये वर्णमाला बुलवाकर मां बाप बड़े राजी होते हैं पर हिंदी की वर्णमाला में बड़े बच्चे भी चूक जाते हैं .
क्या तो करो आप अब जो वस्तुस्थिति है सो है . मुझे तो " जोशी बाबा " ने हिंदी / देवनागरी की वर्णमाला और बारहखड़ी पहले पहल सिखाई थी , रोमन अक्षर तो बहुत बाद में पहचानने लगा था . मैं उन जोशी बाबा को नमन करता हूँ  जिनका  सिखाया अक्षर ज्ञान आज दिन तक काम आ रहा है . यही अक्षर ज्ञान मैंने कमला का शोध प्रबन्ध  जांचते हुए दोहराया था .

कभी जोशी बाबा बाबत भी लिखूंगा , देखिएगा  जरूर .

😊 फिर ढब्बू की बात  
   *****************
   जब दो बार मैंने ये सवाल दाग दिया :

"  किसको ठोकना है ??? . "

    तो ऋषिकांत माने मेरा प्यारा ढब्बू हरकत में आया और उसने जो लिखा उसे मैं अल्टीमेट  कहूंगा   . उसने लिखा :

"  फूफाजी ! अपने आशीर्वाद रूपी डंडे से मुझे ठोक दो .! " 

   😊 अब अपनी बात 
       **************
  जाने क्यों  गए दिनों से ऐसे किसी को ठोक देने जैसे विचार मेरे मन में आ जाते हैं , ऐसा तो मैं नहीं हुआ करता था , पर अब ऋषि के इस " आशीर्वाद के डंडे " के विचार ने मुझे एक नई सूझ दी है  , अब किसी छोटे मोटे को ठोको तो आशीर्वाद के डंडे से ठोको . यही तो है अब अपने पास .

अब ये पोस्ट तो जाने लायक बन गई पर अभी ढब्बू की भूआ की इस पर स्वीकृति बाकी है .
तदर्थ पोस्ट जारी ..........
आशीर्वाद ऋषिकांत .

सुमन्त पंड्या .
Sumantpandya.
@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .
    बुधवार 29 जून 2016

Tuesday, 26 June 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ५.

नानगा द ग्रेट : पांचवी कड़ी .


   शंकर को देख कर आज भी मुझे नानगा की याद आ जाती है . मुझे बचपन से नानगा की जो छवि याद आती है उसमे सिर पर साफा , कानों में सोने की मुरकी , कमीज और धोती पहने हुए , पावों में देशी जूती याने पगरखी पहने हुए नानगा दर्ज है .

नानगा कभी क्लीन शेव्ड कभी दाढ़ी थोड़ी बढ़ी हुई , फिर एक आध दिन में संवार बनाकर तैयार नानगा .


शिव भक्त नानगा :

   नानगा के कमीज की बगल की जेब में घी में सनी हुई फूल बत्तियं एक डिबिया में रखी रहती थीं . इतनी भक्ति जाने वह कैसे सीख गया था कि घर के सामने चौराहे पर जो जंगजीत महादेव का मंदिर है सीढियां चढ़कर वो नियमित रूप से वहां जाता और एक दीया जलाकर आता .

उसी का मैं पुण्य प्रताप मानता हूं कि साक्षात शंकर ने उसके घर जन्म लिया . वरना तो उसके समुदाय में लड़कियों की तब कमी ही होती थी और जैसी पारिवारिक पृष्टभूमि थी उसका विवाह भी कैसे होता .


मुनीम साब :

 नानगा के साले थे मुनीम साब जिनका नाम तो वैसे नारायण था पर हम लोग उन्हें मुनीम साब ही कहते थे . वो छोटी चौपड़ के पास एक सर्राफा व्यापारी की दूकान पर मुनीम का काम करते थे . मुनीम साब कुछ मामलों में नानगा के वित्तीय सलाहकार भी थे और वैसे भी शेठाणी के भाई होने के नाते आत्मीय तो थे ही . पर यहां मैं एक और कारण से उनका उल्लेख कर रहा हूं जो आगे स्पष्ट होगा .


नानगा के सन्दर्भ में इस प्रसंग की प्रासंगिकता :

मुनीम साब के बड़े भाई अवधि पार जा रहे थे और उनका विवाह नहीं हो पा रहा था . जिस जगह विवाह की बात चली वहां बेटी के बाप ने एक बात रख दी कि बड़ी बहन का विवाह बड़े भाई से होवे तो छोटी बहन का विवाह छोटे भाई से भी होवे ही तभी यह रिश्ता मंजूर होगा . नतीजा ये कि मुनीम साब का विवाह गूंगी बहरी से हुआ था . खैर पर मुनीमाणी के साथ उनकी गृहस्थी भी सफल रही . इस लिए मैंने एक आध बार कहा कि भाग्य से नानगा का विवाह हो गया था . समुदाय में लड़कियों की तो शार्टेज ही थी .....

नानगा आया किस गांव से था ये तो मुझे अब पता नहीं पर इतना पता है कि सांगानेर के पास सुक्या गांव में उसका ससुराल था . कालान्तर में ये ही गांव सुखपुरिया कहलाया . नानगा ने शहर में कोई मकान जमीन जैसी चीज नहीं खरीदी . वो गांव का था उसने अपने ससुराल के गांव सुखपुरिया में जाकर अपनी खुरपी गाड़ दी और आप विशवास कीजिए नानगा के कारण शहर बस गया वहां . पर अभी ये लंबी कहानी है .


इसे समझने के लिए आपको नानगा का अर्थशास्त्र समझना पडेगा 


बहुत सी बाते बताने की हैं बहुत सी न बताने की भी .

ये क्रम जारी रहेगा.....

इस प्रसंग में आई सुभाष गुप्ता सांब की टिप्पणी भी यहां जोड़ता हूं  , जो इस प्रकार है :

" भाई साहब, यदि परिवार के वे सब जन जो श्री नानगा  जी के साथ बड़े हुए, यदि थोड़ा सहयोग करें तो एक उपन्यास की सामग्री हो जाएगी। बहुत ही रोचक और प्रेरणादायक उपन्यास होगा। "

इस आत्मीय टिप्पणी के लिए विशेष आभार Subhash Gupta  साब .

आज फिर से नानगा के दोनों बेटों - शंकर और कैलाश को मेरे आशीर्वाद .

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

सुप्रभात :

सहयोग और सह अभिवादन : Manju Pandya


प्रेरणा :

Narendra Pandya

Himanshu Pandya

Mahima Pandya


सुमन्त

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया, बापू नगर , जयपुर .

30 जून 2015 .


संलग्न फ़ोटो नानगा के बड़े बेटे शंकर का .


नानगा द ग्रेट  : स्मृतियों के चलचित्र  ४.

नानगा द ग्रेट : चौथी कड़ी .       


   नानगा काकाजी अम्मा के पास आ गया था और हमारे घर में ही रहने लगा था . उसके लिए रोजगार की तलाश थी . वो ट्रांसपोर्ट कंपनी की नौकरी में जाने को कतई तैयार नहीं था . उसे चंद्र महलों में बेलदार का काम मिला था और अब वह नानगा से नानगराम बन गया था . भाग्य से उसका विवाह भी हो गया था . पड़ोस में राय जी परिवार के घर में नानगा और उसकी बहू गलकू के लिए अलग रहने को एक कमरा किराए पर भी ले लिया गया था . इस नए जोड़े की तब अपनी कोई गृहस्थी नहीं थी . दिन में नानगा अपना काम करने चला जाता और उसकी बहू गलकू , जो हमारे घर में शेठाणी ( सेठाणी का गुजरातीं में उच्चारण ) कहलाई , हम बच्चों की गवर्नेस बन जाती . तब मुझे स्कूल भेजने को शेठाणी ही तैयार किया करती थी ये मुझे अच्छी तरह याद है .

अम्मा की गोद में तो तब छोटा भाई विनोद हुआ करता था , अब उसे देखकर कौन कहेगा कि वो मुझसे चार साल छोटा है . विनोद की स्कूलिंग थोड़ी देर से ही शुरु हुई , वो जब पैदल चलने लगा तो शेठाणी उसे हमारे ही परले घर तक डोलाने ले जाती ये भी मुझे याद है .

मैं इसे बहुत नॉस्टेलजिया से याद करता हूं कि मेरा हेयर स्टाइल उस समय शेठाणी ने ही सैट किया जो आज दिन तक कायम है . मेरे पास प्राइमरी स्कूल के समय की अपनी एक फोटो है , अगर वो ढूंढें से मिल गई तो प्रमाण स्वरूप यहां साझा करूंगा .

नानगा तामीर के काम में बेलदार के रूप में हाथ बंटाता था पर उसका सूक्ष्म निरीक्षण बड़ा जबरदस्त था , वो चीजों को जितना बारीकी से समझता था वो समझ किसी सिविल इंजीनीयर से कम न थी . 


नानगा शाम को अपना काम करके आता और तब शामको वो दोनों राय जी के घर में रहने चले जाते वो समय भी , मेरा बचपन का समय , मुझे याद है .

इस मजदूरी के काम में नानगा को बहुत मेहनत करनी पड़ती थी पर वो मेहनत से जी चुराने वाला नहीं था . वो सभी कुटुम्बी जनों में अपनी सेवा परायणता के लिए जाना जाता था . बाबा याने पंडित श्याम सुन्दर जी के बंगले पर सर्दी आने पर एक प्रकार के बिस्तर दुछत्ती से उतारने और सर्दी जाने पर वहीँ बिस्तर बांधकर ऊपर रखने के लिए नानगा ही बुलाया जाता और उसके लिए तब यह कहा जाता कि वो किसी जिंद की तरह काम में लग पड़ता है और काम निबटाकर ही दम लेता है .

यहां एक टिप्पणी तब के जीवन और सभ्यता के बारे में करता चलूं , तब शाम को बिस्तर बिछाए जाते थे और अनिवार्य रूप से सुबह बिस्तर समेटे जाते थे .आज की सभ्यता में तो बैड रूम का कांसेप्ट आ गया जहां बिस्तर बिछे ही रहना सभ्यता का अनिवार्य अंग है .

बिस्तर समेटने का भी नानगा का ख़ास स्टाइल था जिसको जीवन संगिनी मेरे पोस्ट बनाते हुए याद कर रही है . शायद वे इस बाबत कोई टिप्पणी करें इस लिए इस प्रसंग को यहां स्थगित करता हूं .

बेलदारी के काम में नानगा को मेहनत बहुत थी . काकाजी और अम्मा दोनों चाहते थे कि उसे कोई बेहतर रोजगार मिले और वो उसे मिला जब एक चपसरासी की पोस्ट जयपुर महाराजा के हिज हाइनेस हाउसहोल्ड में खाली हुई . नानगा वहां साइकिल सवार बना और इस नाते उसे कुछ अलाउंस भी मिला वेतन के अतिरिक्त .

हमारे घर से नानगा और शेठाणी वैसे ही जुड़े रहे .

क्रम आगे जारी रहेगा .........

प्रातःकालीन सभा स्थगित .


सुप्रभात .

सह अभिवादन और सहयोग :

Manju Pandya

विशेष सहयोग : Himanshu Pandya

नागगा बाबत एक टिप्पणी भाई साब  ने लिखी थी वो भी यहां जोड़ता हूं :

" सुमन्त नानगा शादी के बाद रायजी के मकान से पहले किशन पोल बाज़ार के आकडों के रास्ते में आकड़ एंड कंपनी नामक दूकान के मालिक के मकान में रहने लगा था वे सेठ यानी व्यापारी बनिए थे इसीलिये सभी ने नानगा को भी सेठ और उसकी पत्नी को सेठानी का संबोधन शुरू कियाथा ,कभी कभी मैं जब सोकर उठने में आनाकानी करता तो वह मुझे भी भी बिस्तर के बीच मे फोल्ड करने का नाटक करता और मजाक करता और फिर कहता दादा थे सो रह्या छा काई मने तो दीख्या ही कोने,मकर संक्रांति केदिन नानगा सवेरे सवेरे अँधेरे में ही आजाता और नीचे से जोर से चिल्लाता "वोआयो' और हमलोग सोये से उठकर पतंग पकड़ने दौड़ पड़ते तब काकाजी और अम्मा कहते अभी तो अँधेरा है अभी कहाँ पतंग है ?ये तो नानगा की मजाक है।नानगा के अनेक प्रसंग हैं पर अब तो केवल मीठी और साथ ही दर्द भरी यादे और कसक है।"

सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

29 जून 2015 .


ये फ़ोटो है नानगा के बड़े बेटे शंकर की ।

Monday, 25 June 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ३.

नानगा द ग्रेट : तीसरी कड़ी .

नानगा बाबत दो पोस्ट लिख चुका हूं , उसी कड़ी में ये तीसरी पोस्ट है पर शीर्षक थोड़ा सा बदला हुआ है . नानगा कोई मामूली आदमी नहीं था वो विलक्षण था और उसके अपने जीवन मूल्य थे जिनसे उसने कभी समझोता  नहीं किया . समय के साथ उसके जीवन में बदलाव आया और बच्चों के लिए वो ऐसी विरासत छोड़ गया जिसका उसकी बचपन की कहानी से तालमेल दूसरों के लिए तो समझना भी मुश्किल होगा .

शंकर :
-------     उस दिन शंकर आया , मैं उसे छोड़ने को बाहर गया तो बड़ा स्वाभाविक प्रश्न कर बैठा :
" मोटर कोडै छै थारी?"
मतलब तेरी मोटर कहां है .
और शंकर फाटक बंद कर पैदल जाने लगा मुझे बताया कि वो पैदल ही आया है और घर जाने के लिए सिटी बस पकड़ेगा . हाथ में एक ऐसा ही थैला था उसके पास जैसा मुठ्ठी में लटकने वाला थैला लेकर ग्रामीण और कस्बाई लोग चला करते हैं . आ गई मेरे  समझ में बात कि आखिर तो नानगा का बेटा है , डाउन टू अर्थ . वरना तो महाराज , जो अकूत सम्पदा का मालिक हो वो जमीन पे पांव ना धरे . कैसे बन गई ये सम्पदा इसी की कहानी जुड़ेगी नानगा के जीवन की अगली बातों से . अभी तो फिर वही नानगा के बचपन की बात .

नानगा काकाजी अम्मा के पास :
----------------------------------   नानगा , एक अनाथ लड़का काकाजी अम्मा के पास रहने तो आ गया पर उसके लिए किसी बेहतर रोजगार की तलाश तो थी ही . उसे किसी ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम मिल गया और ये तय हो गया कि वो माल लाने ले जाने वाले ट्रक के साथ जाएगा जहां उसे लगा बंधा वेतन भी मिलेगा .
जब अगले दिन उसे काम पर जाना था पहले दिन सुबह से नानगा दीवार में मुंह छुपाकर बार बार रोने लगा . काकाजी ने उससे इस रोने की वजह पूछी तो बोला :

" मैं म्हारा मा बाप नै छोड़ अर कौने  जा सकूं ."
मैं अपने मा बाप को छोड़कर नहीं जा सकता .
वहीँ नौकरी में जाने का विचार तत्काल रद्द हो गया . काकाजी बोले :

"तनै कुण खै छै जाबा बेई ?"
अर्थात ,  तुझे जाने को कौन कहता है ?

और काकाजी ने उसे आश्वस्त किया कि वो उसे कुछ और रुपये प्रतिमाह दे दिया करेंगे उसे अपना घर छोड़कर कहीं जाने की जरूरत नहीं है . उसने जयपुर में ही रहकर काम भी किया . राज्य सरकार की नौकरी में रहकर काकाजी का अलबत्ता तबादला हुआ पर नानगा ही रहा हमारे घर का केयर टेकर  उस दौरान भी .

घर से बाहर पहला काम : नानगा से नानगराम .
________________________________नानगा
का भाग्य से विवाह भी हो गया और वो अपने लिए यहीं कोई रोजगार चाहता था . उन दिनों चन्द्रमहल (सिटी पैलेस) में लगातार तामीर और मरम्मत का काम चलता रहता था , नानगा को वहां ' चमाळया' ( बेलदार) का काम मिल गया .
नियुक्ति के समय काकाजी ने ही उसे ' नानग राम ' नाम दिया जो दर्ज किया गया . काकाजी का नाम ' मुकुंद राम ' था .
काकाजी और नानगा के नाम में एक लय थी , वैसी ही लय उनके सोच में भी थी , जो बात आगे आएगी ही .....
आज के लिए इतना ही ....
प्रातःकालीन सभा स्थगित .

सुप्रभात .
सह अभिवादन : Manju Pandya

सुमन्त पंड्या .
गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर जयपुर
27 जून 2015 .
नोट : मेरे साथ फोटो नानगा  की नहीं शंकर की है .


नानगा द ग्रेट  : स्मृतियों के चलचित्र  २.

मेरा नानगा याने नानग राम : भाग दो .


नानगा का जयपुर आना 

 नानगा अपनी मौसी के साथ जयपुर आया था किसी आश्रय की तलाश में . नानगा की मौसी हमारे घर में माई के नाम से जानी जाती थी , मैंने भी उस माई को देखा था जो नानगा को जयपुर लेकर आई थी . माई का दूसरा नाम ' भोमा की माँ ' था , भोमा भी पहले से जयपुर में रहता था और काम करता था . ये उस जमाने की बात है जब हमारे वृहत्तर संयुक्त परिवार में पांच पीढियां लगभग साथ साथ रहा करती थी . हमारे कुटुंब के शहर में दो मकान थे एक नाहर गढ़ की सड़क पर लाल हाथियों के मंदिर के सामने और दूसरा जंगजीत महादेव के मंदिर के सामने . शहर याने परकोटे के बाहर बस्ती बसने का दौर भी अभी शुरू होने जा रहा था .


जयपुर क्यों आ गया नानगा ?

- बचपन में ही इसके पिता की मृत्यु हो गई थी और मां नातै चली गई थी ( उसका दूसरा विवाह हो गया था.) मां के दूसरे परिवार में इस बच्चे के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता था और इसी लिए ये मौसी के साथ जयपुर आ गया था .

अपनी मां के इस नए परिवार से भी नानगा के संपर्क तो रहे होंगे , मैंने नानगा की मां तो कभी नहीं देखी पर इसका एक छोटा भाई राम चंदर यदा कदा जयपुर आता तो इसके पास ही ठहरता था , ये तो बहुत बाद की बात है जब नानगा राय जी के घर में नीचे की मंजिल के एक कमरे में रहने लगा था . अभी तो नानगा के हमारे घर में आकर रहने की बात है जो मैं बताने चला हूं .

दयावान मौसी जब नानगा को जयपुर ले आई तो उसके लिए किसी ऐसे परिवार की तलाश थी जो इस अनाथ बच्चे को आश्रय देवे और ये श्रेय मिला काकाजी और अम्मा ( हमारे माता पिता ) को. उन्होंने इसे अपने घर में रखा . भोजन और आवास के अतिरिक्त कुछ छोटी सी राशि वे इसे देने लगे . घर को झाड़ना बुहारना शाम को बिस्तर बिछाना और सुबह बिस्तर उठाना ये नानगा का नियमित काम होता था . मैंने तो जब होश संभाला तब से नानगा को ये काम करते देखा था . वो जब हमारे घर में आया था तब तो हम भाइयों में से किसी का जन्म भी नहीं हुआ था . काकाजी अम्मा और एक बेटी ( हमारी जीजी) जो अब अस्सी पार हैं और कल रात उन्होंने नानगा को बहुत याद किया और मुझे फोन पर बहुत बातें बताईं , ये ही छोटा सा परिवार था .

नानगा को रहने को घर मिल गया था और मानों काकाजी अम्मा को बेटा मिल गया था .

मुझे बचपन की शहर की गर्मियां बहुत याद आती हैं जब नानगा शाम पड़े छत पर बिस्तर बिछा दिया करता था और मैं तो शायद परिवार का सबसे पहला सदस्य होता था जो वहां जाकर सो जाता था .

बेहतर रोज़गार के लिए नानगा को घर से जाने की नौबत आई तो क्या हुआ यह भी बड़ी मार्मिक कहानी है जो आगे आएगी ही.

नानगा के नानगराम बनने की बात भी बताऊंगा पर अभी इतना ही ...

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सायंकालीन सभा अधूरे एजेंडा पर स्थगित .

सह अभिवादन :

Manju Pandya


सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

25 जून 2015 .