Monday, 9 January 2017

निहांई की कल्लो 😊

 

निहां ही की कर लो  ! बनस्थली से जयपुर :  #बनस्थलीडायरी


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वार त्योंहार कितनी बार बनस्थली से जयपुर और जयपुर से बनस्थली की यात्राएं की अपने सेवा काल के दौरान  वो आज भी बहुत याद आती हैं .  शुरु शुरु में  रोड़वेज की  कुल तीन बसें  जयपुर से बनस्थली को आया जाया करती थीं , उन्हीं से यात्रा करते थे . निवाई ,  मूंडिया  गुनसी , कोथून , चाकसू  , श्योदासपुरा और सांगानेर के नाम हमें बहुत अच्छी तरह याद हो गए थे.  निवाई के बस स्टैंड पर एक आदमी अपनी  प्रायवेट जीपड़ी  खड़ी कर आवाज लगाता :"  खटकड़ा कै पैली  जैपर चालै  तो आ जा ."  मैं  जानना चाहता कि कि ये कैसा हाल है कि राष्ट्रीकृत  रूट पर  ये निजी वाहन चला रहा है और  रोडवेज की बस को खटकड़ा कह कर धिक्कार रहा है  ? मुझे बताया गया कि ये  ट्रांसपोर्ट महकमे के लोगों के ही चलाए निजी वाहन हैं जो इस रूट पर कमाई कर रहे  हैं , इन्हें कोई नहीं टोकता . ये धड़ल्ले से चलते हैं .  इन  यात्राओं के कई अनुभव हैं जो फिर कभी सुनाऊंगा . अभी बनस्थली से रवानगी का ही किस्सा बयान करूँ .

दीपावली से पहले 44 रवींद्रनिवास को हम लोगों ने  रंगवाया पुतवाया लेकिन दीपावली  मनाने जयपुर जाने लगे . हमें सामान निकालकर  बाहर आया देख  45 नंबर से अम्मा भी बाहर आयीं  और बोलीं :"  निहां  की ही कर लो ." अर्थात यहां ही त्योंहार मनाओ और बाहर जाओ ही मत . वह आग्रह तो  मैं आज तक नहीं भूल पाता और यदा कदा मेरी जबान पर आज भी आ जाता है :" निहां  की ही कल लो."  पर जाना तो था ही जयपुर में भी  तो अम्मा के पास दीपावली से पहले पहुंचना था . ऐसे में जब हम जाने ही लगे तो शर्मा जी ने तो एक और सवाल खड़ा कर दिया :"  आपने इतना सुन्दर घर का रंग रोगन करवाया , पीछे से लक्ष्मी जी आएंगी और ताला बंद देखकर  पूछेंगी तो हम क्या जवाब देंगे ?  मैं ने शर्मा जी से कहा  :  आप लक्ष्मी जी को ऐसा कहदेना  " वे लोग तो जयपुर गए हैं और कह गए हैं  कि आप विद्यामंदिर चली जाओ और  वहीं बिराजो ."    उन दिनों  बनस्थली  विद्यापीठ के प्रबंध  मुख्यालय  विद्यामंदिर में ही आ गए थे  जो पहले किसी समय शांताकुंज में हुआ करते थे .  आगे लौटकर आने पर मुझे पता चला कि मेरी शुभेच्छा के अनुरूप लक्ष्मी जी आयीं भी और  विद्यामंदिर में ठहरीं भी . एक बार तो बैंकों में भी होड़ लग गई अपने अपने काउंटर  विद्यामंदिर में खोलने की .


आज के लिए चर्चा स्थगित करूं . ... इति .

सुप्रभात .


Good morning


सुमन्त .


आशियाना आँगन , भिवाड़ी .


10 जनवरी 2015 .


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10 जनवरी 2016 .  साझा और समीक्षा   Manju Pandya


आज इस पोस्ट को फिर से प्रसारित करने का मन किया . वो दिन और वो लोग बहुत याद आते हैं , इसी में मेरे तकिया कलाम की कहानी छुपी है जो है .


#निहांईकीकल्लो


सुमन्त पंड्या .


@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .


साझा #बनस्थलीडायरी के अंतर्गत संशोधित और सम्मिलित .

Sunday, 8 January 2017

लिफ्ट के इर्दगिर्द भाग पांच : भिवाड़ी डायरी .


    लिफ़्ट के इर्दगिर्द : भाग पांच : भिवाड़ी डायरी 🌻🌻
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बातें कुछ आगे पीछे अलबत्ता हो गईं हैं और इन बातों को समेटने में ही चार बैठकें हो गईं , चार पोस्ट लिखी हैं मैंने जो उपलब्ध हैं ही इससे पहले . जिस तरह आप सबने रूढ़िवादी सोच को लेकर मेरे आकलन की तस्दीक़ की उसके लिए आप सब का आभार व्यक्त करता हूं और इस चर्चा को आगे बढ़ाता हूं ताकि इसे विराम दिया जा सके . जिस दिन पाँचूलाल जी हमारे साथ यहां आए थे उसी दिन बहुत सी बातें हुई थीं उनसे उन्हीं को अब समेटने का प्रयास करूंग़ा : इनमें सब से रोचक है  बच्चों की गिनती का क़िस्सा . ये मैं कुछ कुछ पहले से भी जानता था पर उस दिन इस इस बात की फिर से पुष्टि हुई थी .
अब बातें बिंदुवार :
१० .
उस दिन हमसे पूछा गया कि हमारे बच्चे कितने हैं और हम दोनों ने ये संख्या ‘ तीन ‘ बताई . ये सवाल आने से पहले बेटी से तो परिचय करवा ही चुके थे जो सामने थी और उसने ही अतिथि के आने पर आव भगत भी  की थी . हमने बताया ‘ एक इससे बड़ा ‘ और  ‘ एक इससे छोटा ‘ . जब उन्होंने अपना अनुमान बताया कि किसी कम्पनी में काम करते होंगे तो बात को साफ़ करने के लिए ये भी बताया कि किसी कम्पनी में काम नहीं करते , क्या करते हैं ये भी बहुत सादगी से बताया . उनका पूछना अपनी जगह सही था कि इस ज़माने में किसी कम्पनी में काम मिल जाना ही बड़ी बात होती है , ख़ैर . ये बात तो हो गई पर इतनी सूचना से उनकी संतुष्टि नहीं हुई और एक सवाल फिर भी  बच रहा इस बाबत . उन्होंने पूछा :

“ और तीसरा ?”

अब ये क्या बात हुई भला !

सवाल बच्चों की बाबत था और हमारी बताई गई बातें ठीक से उनके ज़ेहन में दर्ज नहीं हुईं तभी तो पूछ रहे थे ,” और तीसरा ?”
इस बात पर हम दोनों ये कहने पर मजबूर हुए :
“ तीसरा बच्चा ये है तो सही जिसके घर में अभी हम बैठे हैं .”
इस बात पर एक पुरानी बात याद हो आई मुझे , केवल सवाल जवाब ही आपके सामने रख देता हूं :

सवाल  :  बच्चे कितने हैं  ?”
जवाब  :   बच्चा तो एक ही है साब  , बाक़ी तो लड़कियाँ हैं .

यही गफ़लत यहां हो रही थी . अतिथि ने लड़कों को तो बच्चों में गिन लिया था  और लड़की को सामने देखकर भी गिनती में नहीं जोड़ पा रहे थे .
यही रूढ़िवादी सोच है जो आज  २०१७ तक भी बच रहा है - लड़का असेट है और लड़की लायबिलिटी  है . इसी सोच से ऐसी बातें उपजती हैं जो इस चर्चा में मैंने  छेड़ीं .
११.
मात खाई :
किसने ?  मैंने और किसने  . अल्प अवधि की मुलाक़ात में अतिथि ने सामान्य ज्ञान की कई और बातें भी मुझसे पूछीं पर उस मामले में मैं अनभिज्ञ और अज्ञानी ही सिद्ध हुआ . जैसे यहां आस पास सम्पत्ति के मोल भाव क्या हैं  , दोहितों की फ़ीस क़ित्ती चुकानी पड़ती है स्कूलों में इत्यादि . मुझे मेरे एक साथी का कथन याद आया .
“ मोहे नाय पतो। “
जितनी बातें याद रहीं वो तो सामने लाया मैं . अब इस चर्चा को विराम देता हूं .

नमस्कार 🙏
सुमन्त पंड़्या .
@ आशियाना आँगन भिवाड़ी .
सोमवार ९ जनवरी २०१७ .
#स्मृतियोंकेचलचित्र #भिवाड़ीडायरी #sumantpandya

लिफ्ट के इर्दगिर्द : भाग चार - भिवाड़ी डायरी .

 
  लिफ़्ट के इर्दगिर्द -भाग चार : भिवाड़ी डायरी .🌻🌻
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बात आशियाना आँगन में हमारे टावर की लिफ़्ट से शुरु होकर यहां घर और बग़ीचे तक गई और इसी बहाने उत्तर भारत के देहाती समाजशास्त्र पर कुछ विचार करने का मौक़ा मिला .
तीसरी कड़ी में बात अटकी थी कि आप बेटी के घर क्यों रहते हो और वो सवाल जवाब बताए ही मैंने .
अब वो ही प्रसंग आगे :
७.
बात आई  थी कि जो बेटों के पास रह रहे हैं या जिनके पास बेटे रह रहे हैं , कैसे ही कह लो , उनके तो सुर्खाब के पर लगे हैं क्योंकि ये तो होती करती / होती आई रीत है पर जो बेटी के घर रहते हैं वो तो दोयम हैं ,कुछ तो लोचा है उनके साथ कि वो ऐसा करने को मजबूर हैं . इस मानसिकता से जुड़ी हुई कुछ छोटी छोटी बातें हैं जिनसे ये बात और साफ़ होवेगी . ये बातें घर , बाहर , नई पुरानी बातों को जोड़कर बताने का प्रयास होगा यहां .
८.
मैं भारत के गाम देहात में चार दशक रहा और ग्रामीणों से बहुत कुछ सीखा भी . उनके बोलने बतलाने में भी बहुत सी बातें प्रतिबिम्बित होती हैं . जैसे ‘ बेटी का बाप ‘ कहन में  बहुत बार बरता जाता है , चाहे कोई बेटी का बाप हो या न हो यदि कोई उसे  बेटी का बाप कह रहा है तो माने ये हैं कि उसे कमज़ोर कह रहा है . आप यूँ न समझें तो बानगी देखिए एक वाक्य में :

“ तू बेटी का बाप थारी तो काँई बस की ही क़ोनै !”
( बेटी के बाप तेरी तो कुछ सामर्थ्य ही नहीं है !)
माने कमज़ोर की उपाधि ‘ बेटी का बाप .’
८ .
अब  ‘ प्राउड फ़ादर ‘ वाली बात .
गाम  देहात में बच्चों की गणना वाला क़िस्सा तो आगे आएगा जिसकी यहां भिवाड़ी में भी पुष्टि हुई , कैसे वो भी बताऊँगा पर पहले एक और बात :
बनस्थली में मेरे सेवाकाल के अंतिम दशक में रिसर्च बाबत एक वर्कशाप  हुई जिसमें तीन मुंबईया प्रोफ़ेसरान भी आई हुईं थी . इत्तफ़ाक़ कि तब हम बाप बेटी एक ही फ़ैकल्टी में पढ़ाया करते थे .
देहाती अपने बच्चे को अपना नहीं बताता , कहेगा ,” आप का बच्चा है .” ये ही आदत मैंने भी सीखी थी .
मुंबई की एक प्रोफ़ेसर ने महिमा को वैलेडिक्टरी सेशन में बोलते देखा और सेशन के बाद चाय के दौरान उसकी तारीफ़ की . मैं वहीं था और कह बैठा , “ आप की बेटी है ..” करके बात  शुरु की .
उनके समझ में ही न आवे बात !  वहीं डाक्टर  अरुणा वत्स खड़ी थीं और उनने ये बात ऐसे  समझाई ,”शी इज हिज ड़ाटर .”  अब आई उनकी समझ में बात  और तब वो जो बोलीं वही आज दोहराता हूं . वो बोली थीं:
“  देन यू मस्ट बी ए प्राउड फ़ादर  .”
इस लिए अब मेरे शब्दकोश में ‘ बेटी का बाप ‘ का अनुवाद है ‘ प्राउड फ़ादर .’

९.
अब ये बच्चों की गणना वाला क़िस्सा बताने का समय तो बचा न दीखै लम्बी बात संभव नहीं लगती अभी , ऐसे में पोस्ट को रोकने के बजाय मैं इसी नोट पर रुकता हूं :

मेरे शब्द कोष में बेटी का बाप माने प्राउड फ़ादर .
मैं हमेशा कहता हूं  :” माई सपोर्ट फ़ार द गर्ल चाइल्ड .”
हो सके तो दंगल देखो  “ म्हारी छोरियाँ छोरों से कम हैं के ? “
मेरी मानस पुत्रियों को इसमें शामिल मानें .

नमस्कार  🙏
प्रातःक़ालीन सभा स्थगित …..

सुमन्त पंड़्या .
@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .
रविवार ८ जनवरी २०१७ .
#स्मृतियोंकेचलचित्र #भिवाड़ीडायरी #बनस्थलीडायरी #sumantpandya

Friday, 6 January 2017

लिफ्ट के इर्दगिर्द : भाग तीन : भिवाड़ी डायरी .🎎

   

लिफ़्ट के इर्दगिर्द : भाग तीन : भिवाड़ी डायरी .🎎

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लिफ़्ट से शुरु हुई बात लिफ़्ट तक सीमित न रही और बात इधर घर आकर जारी रही साथ ही अगले दिन बग़ीचे में आई बात वो मैंने पिछली कड़ी में बताई ही थी . वही बात बिंदुवार आगे बढ़ाता हूं :

ज़हां चर्चा छोड़ी वहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न था ,” आप बेटी के घर क्यों रहते हो ?”

५.

“ आप बेटी के घर क्यों रहते हो ?”

वैसे तो ये बड़ा सीधा सा सवाल है , जितना सीधा सा ये सवाल है उतना  ही सीधा सा उत्तर भी दिया जीवन संगिनी ने जो कि उचित ही मानूँगा मैं तो . इसके लिए जीवन संगिनी का आभार .

पर प्रश्न की समीक्षा भी आवश्यक है क्योंकि प्रश्न के पीछे कुछ दृढ़ मान्यताएँ हैं

पहले एक पुराना प्रसंग बात को समझाने के लिए . बनस्थली में रवीन्द्र निवास में हमारे सामने वाले घर में शर्मा परिवार रहता था और हमारा छोटा वाला जब गोद में खिलाने लायक था तब प्रायः वहीं पाया जाता था . इस साँवले बच्चे को भाभी जी गोद में लिए रहतीं और इधर उधर डोला लातीं .

एक दिन मोहल्ले की एक और भाभी जी ने मिसेज़ शर्मा को कहा  :

“ काहे को लदे रहती हो इस काले कलूटे को ?”

( ये ल्लो मेरा साँवला सलोना उनको काला कलूटा लगा ! ख़ैर )

और तिस पर  मिसेज  शर्मा का बड़ा सीधा सा उत्तर था , उनकी अपनी बोली में :

“ मोहे अच्छो लगै .”

बड़ा सीधा जवाब कि मुझे अच्छा लगता है . दो टूक बात - हिसाब साफ़ .

ये तो हुई एक तीस साल  पुरानी बात कि अटपटे सवाल का जवाब कैसे दिया जाए .

अब विचाराधीन सवाल का जवाब :

“ आप बेटी के घर क्यों रहते हो ?”

“ क्योंकि हमें अच्छा लगता है .”

इतना ही जवाब दिया जीवन संगिनी ने , जैसा कि मुझे बताया गया .

क्यों तो कोई इत्ता खोदा खोदे और क्यों ऐसे सवालों के बहुत खोल के जवाब दिए जाएँ ये ही सोच रहा जीवन संगिनी का . लोग तो सवाल दर सवाल करते ही हैं वो बात भी सम्भव हो गया और तारतम्य बैठ गया तो बताऊँगा आगे .

अभी हाल के लिए प्रश्न की समीक्षा .

६ .

उपर्युक्त प्रश्न में ये मान्यता छिपी हुई है कि अगर आप बेटी के घर रहते हुए पाए जाते हैं तो इससे सहज निष्कर्ष निकाल लिया जाता है कि आप मजबूर हैं और आपके पास कोई और ठोर ठिकाना नहीं है . जो साधिकार बेटों के पास हैं वो अपने को एक पायदान ऊपर समझते हैं .

ये बात है ही ऐसी कि और विस्तार माँगती है .

अधूरी रही बात अलबत्ता पर समयाभाव के कारण

प्रातःक़ालीन सभा स्थगित …

सुप्रभात

नमस्कार

सुमन्त पंड़्या .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

शनिवार ७ जनवरी २०१७.

लिफ़्ट के इर्दगिर्द : भाग दो : भिवाड़ी डायरी



       लिफ़्ट के इर्दगिर्द : भाग दो : भिवाड़ी डायरी .
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लिफ़्ट के इर्दगिर्द .. भिवाड़ी डायरी भाग दो.
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लिफ़्ट के इर्द गिर्द की बात परसों शुरु की थी इसमें जोड़ने लायक बातें कल तक हुईं  , वो ही आज बताता हूं न तो अधूरा छूट जाएगा ये प्रसंग और जो मैंने शुरु में देश , काल और समाज बाबत बात उठाई थी वो न आ पाएगी .
पहले छोटी बात और फिर बड़ी बात  बिंदु वार .
२.
मैंने कहा था न हम तो ख़ुद ही लिफ़्ट में अटक गए थे फिर भी मेरा साथ देखकर और भरोसा करके पुष्पा लिफ़्ट में आ गई थी उसी बात को साफ़ करता हूं .
एक दिन की बात स्कूल से लौटे सैम को साथ लेकर नाना नानी लिफ़्ट के केबिन में घुस गए , लिफ़्ट के पट बंद तो हो गए पर पर लिफ़्ट चली नहीं और चाहने पर खुली नहीं . अब ऊपर आने या बाहर निकलने के दोनों विकल्प खतम हो गए थे . थोड़ा घबराए पर सैम पर अपनी घबराहट ज़ाहिर न होने दी . उपाय मालूम था - बैल और काल के दोनों बटन दबाए , ज़रा सी देर में लिफ़्ट खुल गई और गार्ड बाहर खड़ा मिला हमारी ख़ैरियत पूछने को . उसी ने समस्या सुलझाई थी . उसने भरोसा दिलाया कि हम लिफ़्ट से बेखटके ऊपर जाएँ वो बाहर खड़ा रहेगा .
और एक दिन ऊपर से नीचे जाते लिफ़्ट बीच में रुक गई , इमर्जेंसी लाइट जल गई , दरवाज़ा भी खुल गया बग़ैर किसी मंज़िल का ठीड़ा पकड़े , पर फिर वही हुआ , गार्ड के हस्तक्षेप से लिफ़्ट नीचे गई , नीचे ही हमें जाना था , मिल गई मंज़िले मक़सूद .
और कल तो हम दोनों तीन नम्बर फ़्लोर पर ही लिफ़्ट में घुसकर अटक गए , लिफ़्ट बंद , न चले न खुले . फिर वही आपात संदेश , चली लिफ़्ट , पहुंचे नीचे , तारण हार गार्ड नीचे लिफ़्ट के बाहर खड़ा मिला और उसने हिम्मत बंधाई , कहा उसके रहते कोई परेशानी नहीं होने वाली .
ख़ैर ये तो एक बात से जुड़ी कई बातें थीं जो अब बंद .
अब असल बात बिंदु तीन के अंतर्गत .
३.
उसदिन याने  नरसों लिफ़्ट के बाहर , नीचे ही , मिले थे पाँचूलाल जी जो बाहर से आए हुए थे और थोड़े अनमने थे कि यहां कोई किसी से बोलता ही नहीं है बावजूद इसके कि एक इमारत में चालीस परिवार रहते हैं लोग एक दूसरे को जानते ही नहीं हैं . 
एक सहज तुलना थी भारत के गाँव देहात से ज़हां नवागंतुक से भी लोग ‘ राम राम ‘ करते हैं . 
जीवन संगिनी को जाने क्या सूझी कि उनकी पहल पर हम उन्हें अपने साथ यहां ले आए और ये भी बताया कि हम तो लम्बे अरसे तक गाम देहात में रहे हैं और हमें उनसे मिलना और बात करना अच्छा लगेगा .
उत्तर भारत और ख़ास तौर से उसके देहाती सोच के बारे में मेरा जो आकलन बहुत कुछ पहले से भी था उसे स्पष्ट करने में बड़ी मदद मिली उस दिन . आज सूत्र रूप में वही बताने का प्रयास करूंग़ा .
मैंने कोई ग्रामीण समाज शास्त्र नहीं पढ़ा पर समाज के प्रबुद्ध लोगों से मिलकर ये बातें समझी हैं , वही बताता हूं :
लिफ़्ट में प्रवेश करते ही उन्होंने मेरी बिरादरी पूछी हालांकि मैंने इसे एक ग़ैर ज़रूरी सवाल बताया  इस ज़माने के हिसाब से पर  उनका मन रखने को अपनी जात छुपाई नहीं बताई ही . ऊपर आकर सवाल दर सवाल . अगर ब्राह्मण हैं तो कौनसे  ? गौड़ या सनाढ़्य ?
अब जाने क्यों और क्या सोचकर वो ये बारीक सवाल पूछ रहे थे . कहावत है :
“ पानी पीकर जात नहीं पूछते .”
इसी लिए शायद वो समय रहते ही बात साफ़ कर ले रहे थे .
अब मैं उनको ब्राह्मणों की क़िस्मों के बारे में क्या बताता . उनके फ़्रेम आफ रेफेरेंस में जो क़िस्में थीं उसी के आधार पर तो पूछेंगे वो .
मैंने उनसे अधिक प्रतिप्रश्न नहीं किए और बताया अपने बारे में कि न तीन में न तेरह में .

विराम दूं इस बात को ये कहते हुए हुए कि वर्ष दो हज़ार सत्रह में भी आज इंसान की पहली पहचान उसकी जात बिरादरी है बहुतों के सोच में , चाहे कुछ भी चाहा हो महर्षि दयानंद सरस्वती ने .
४
आगे जेंडर की बात पर पर आऊंग़ा उसके ट्रेलर रूप में कल की बात जो शाम को जीवन संगिनी ने बताई थी . बाक़ी विस्तार अगली कड़ी में ही आ पाएगा :
कल जो उनके घर से हैं ( पत्नी का उल्लेख ऐसे ही किया था उन ने ) उन ने जीवन संगिनी से एक सवाल किया था जब उनका पार्क में शिखर सम्मेलन हुआ , मैं उस दौरान अपने ब्यूटीशियन के यहां गया हुआ था :

“ आप बेटी के घर क्यों रहते हो ?”

प्रश्न में बहुत कुछ छिपा है .
धन्य प्रश्नकर्त्ता और धन्य उत्तरदाता .
बात तो और आगे जाएगी परंतु
प्रातःक़ालीन सभा स्थगित …..

नमस्कार 

-सुमन्त पंड़्या .
आशियाना आँगन , भिवाड़ी .
शुक्रवार ६ जनवरी २०१७ .
#स्मृतियोंकेचलचित्र #भिवाड़ीडायरी #sumantpandya 


         

लिफ़्ट के इर्दगिर्द - भाग एक



    लिफ़्ट के इर्द गिर्द - भाग एक  : भिवाड़ी डायरी 
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लिफ़्ट के इर्द गिर्द : भिवाड़ी डायरी -- भाग एक .
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कल के एक दो तज़ुर्बे बताता हूं  .

बहुमंज़िला इमारत में  लिफ़्ट के महत्व को अतिरिक्त रेखांकित करने की आवश्यकता नहीं वो एक ज़रूरी सुविधा है . ज़हां दस दस मंज़िला इमारत होवें , और अब तो कोई कोई इमारत बारह मंज़िल की भी है , तो लिफ़्ट तो होवे ही होवे .आशियाना आँगन में यही है , कोई कोई लोग लिफ़्ट को बरतें और कोई न भी बरतें उस बात पर भी आवूँगा , वजहें अलग अलग . अभी एक आध बात उसी तज़ुर्बे की बताता हूं , बात पूरी होते तो समय लगेगा और ये बात देश काल और समाज से जुड़ेगी इसलिए बिंदुवार बात चलाता हूं :
१.
दिन में ज़रा देर को मैं टावर के नीचे से ऊपर आया और फिर वापस लिफ़्ट से ही नीचे जाने लगा तब की बात है .
मैं तीसरे फ़्लोर पर लिफ़्ट के सामने खड़ा हूं , मेरी पीठ की तरफ़ जीना है जो भी ऊपर से नीचे तक आने जाने का ज़रिया हो सकता है , मैं अलबत्ता उसे कम  ही बरतता हूं , लिफ़्ट का नीचे जाने का संकेत  बटन दबाता हूं , लिफ़्ट अभी चौथे फ़्लोर पर है . नीचे की ओर चल पड़ी लिफ़्ट और मेरे सामने पट खुल गए  एक फ़्लोर उतरने में देर ही क़ित्ती लगती है अगर च लिफ़्ट चल पड़े . मैं दाख़िल हो जाता हूं लिफ़्ट के कैबिनेट में पर रवाना होते होते मुझे लिफ़्ट स्थगित करनी पड़ती है , क्यों  ? यही वजह साफ़ करता हूं .
“ अंकल अंकल  “  या शायद  “ अंकल जी अंकल जी “ बोलती एक लड़की जीने से अपना सामान लिए  तेज़ी से उतर कर आती है और लिफ़्ट के कैबिन  में दाख़िल हो जाती है . ऊपर से आ रही है तो नीचे ही जाना चाहती है ये मानकर मैं ० ज़ीरो बटन दबा देता हूं . मैं जानता भी हूं इस लड़की को , ये नीलम की बहन है और प्रेस के कपड़े लेने आती है इस इमारत में .
अब मैं इस लड़की से एक सवाल पूछता हूं :

“ ये लिफ़्ट भी  चार नम्बर से आई और तू भी चार नम्बर से आ रही है फिर तू लिफ़्ट से ही क्यों नहीं आई  सीढ़ी से क्यों  आई  ? “

तब वो बोली :

“ मैं चार नम्बर से नहीं छह नम्बर से आ रही हूं  , और लिफ़्ट का कोई भरोसा नहीं बीच में बंद हो जाय , अटक जाय .”
उसे लिफ़्ट पर भरोसा नहीं था  मुझ पर भरोसा था इसलिए तो उसने अब दाख़िला लिया था .

अब हमारी सुणो हम तो ख़ुद अटक गए थे वो भी क़िस्सा आएगा अगली किसी कड़ी में .

अपना वही सोच : जब हम हैं तो क्या ग़म है .

पहले ज़माने में लिफ़्ट राखी देखी चीज़ हुआ करती थी तब लिफ़्ट के साथ लिफ़्टमैन हुआ करते थे आजकल तो ज़्यादातर ख़ुद को ही ख़ुद का लिफ़्टमैन बनना पड़ता है .

आशियाना से नमस्कार 🙏

सुमन्त पंड़्या 
@ भिवाड़ी .
बुधवार ४ जनवरी २०१७.
#स्मृतियोंकेचलचित्र #भिवाड़ीडायरी #sumantpandya 


       

Wednesday, 4 January 2017

कोई अस्सी का कहवे ...: भिवाड़ी डायरी 📙


    कोई अस्सी का कहवे कोई कहे पिच्चासी का : भिवाड़ी डायरी

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अभी लिफ़्ट के इर्दगिर्द चर्चा चल ही रही है , आज आगे बढ़ाऊँगा उसे . पर उसी क्रम में एक छोटी सी बात निकल के आई वो अभी हाल यहां मांड देता हूं .

हमारे देश में , ख़ास तौर से देहात में , आज भी सैल्यूटेशन इन दो बातों से तय होता है - बिरादरी और उमर . बिरादरी की बात अभी छोड़ते हैं वरना बात बग़ैर बात लम्बी हो जाएगी अभी तो उमर की ही बात करते हैं :

कल और परसों यहां अनायास मिले पाँचू लाल जी जिनसे हुआ संवाद ही आज की चर्चा का प्रस्थान बिंदु है .

उन्होंने छूटते पहले मेरी बिरादरी पूछी और मेरी उमर के बारे में अपना अनुमान भी बता दिया . बिरादरी अभी विचाराधीन नहीं है अतःसीधे दूसरी बात पर आते हैं , वो बोले :

“ अस्सी एक साल की होगी आप की उमर बाबा ?”

अब आप  जाणो मैं उनके अनुमान को क्यों ठुकराता , मैंने तो उनका आभार ही व्यक्त किया . मैं बोला :

“ बड़ी मेहरबानी आपने मुझे बारह बरस और दे दिए .” बंदा तो ख़ुश हुआ उनकी बात सुनकर कि सुपर सीनियरों की सोहबत में हो गया अपना बेड़ा पार . ख़ैर , ये तो बात हुई परसों . अब कल की बात .

कल सुबह सीनियरों की बैठक में मैंने उनकी नज़र से अपनी उमर की परख करवाई  तो मेरे हम उमर गुलाब सिंह जी बीचमें बोलने को उद्यत हुए , मैंने उन्हें रोका कैणे आप तो मुझे जानते हो और किसी को बताने दो करके .

अब यहां बुज़ुर्गवार ने मेरी उमर बताई  -- पिच्चासी  . मैंने उनका भी आभार व्यक्त किया कि आपने मुझे सत्रह साल और दिए , क्या कहने .

अब मुझे समझ आया कि इन दिनों आशियाना में सीनियरों की बैठक में प्रायः अध्यक्षता का अवसर मुझे ही क्यों मिल जाता है . ये तो हुई एक बात फिर एक छोटी सी बात .

शाम को , कल, गुलाब सिंह जी मुझसे पूछ रहे थे ,” आपने अपने आप को मेनटेन  कैसे किया ?”

जबकि उधर परसों पाँचूलाल जी कह गए थे ,” कमज़ोरी बहुत आ गई !” मानों मुझे पहले से जानते हों और क मोटा तगड़ा देखा हो .

इधर मुझे याद आती है अपने फीज़िशियन की कही बात , “ लाइफ़ बिगिंस एट सिक्स्टी .”

मैं तो अपनी दूसरी पारी खेल ही रहा हूं

सुप्रभात

नमस्कार

सुमन्त पंड़्या .

@ आशियाना आँगन भिवाड़ी .

 गुरुवार ५ जनवरी २०१७ .