Friday, 31 March 2017

पहली अप्रेल : बूच्या के श्रीराम जी 😀

ये उपहार में मिली अपनी ही तस्वीर है जो आज के अवसर के लिए उपयुक्त जान पड़ती है । फ़ोटो कलाकारी का श्रेय आनंद जोशी को ।

अब बात आगे की :

पहली अप्रेल : बूच्या के श्री राम जी !

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  #sumantpandya


आज पहली अप्रेल है , नई सभ्यता में में ये दिन मूर्खों के लिए मुक़र्रर है .

आज सोचता हूं अपनी इस कहावत का इतिहास और अभिप्राय खोल दूं जो है :


"बूच्या के 'श्री राम जी'..."


पात्र परिचय :


सूरतगढ़ के अम्बा लाल बाबा का प्यारा बेटा हुआ करता था बूच्या , स्वभाव से थोडा सीधा लेकिन बुद्धि से ठस्स . पढ़ाई में कमजोर . गिनती सीखने के मामले में उसे कठिनाई होती थी .

उसके नामकरण के पीछे की बात यह थी कि उसका एक कान दूसरे कान से थोड़ा छोटा था और इसी लिए उसका घर का , प्यार का नाम प्रचलित हो गया था . उसका लोक नाम कुछ और भी रहा हो तो मुझे पता नहीं क्योंकि ये पिछली शताब्दी के मध्य भाग की बात है और इस विवेच्य कहावत के साथ यही नाम सटीक बैठता भी है .


हुआ क्या था जो कहावत बनी :


आज वही बताने जा रहा हूं . बूच्या जब गिनती सीखता और बोलता तो गिनती का क्रम चलता " .....एक दो तीन चार ..... पांच छह सात ......."


और आगे उसे कुछ याद न आता , उसे कुछ सूझता ही नहीं . क्या बोले बेचारा जब आगे गिनती याद ही न आवे . थोड़ी देर याददाश्त पर जोर डालता और जब पार न पड़ती , कुछ भी न सूझता तो बूच्या जोर से बोल कर इस गिनती अभ्यास का समापन करता :


"श्री राम जी ..."


इस कहावत में आये श्री राम जी कोई बूच्या की निजी संपत्ति तो नहीं हैं इनका नाम बरतने में उसका नाम साथ में जुड़ गया है और तब से मेरे घर में तो कम से कम यह कहावत चल पड़ी है , जहां अटक जावे वहीँ ' बूच्या के श्री राम जी '


इतना अवश्य है कि कभी कभी राम जी का नामोच्चार थोड़ा लंबा अवश्य हो जाता है , इस प्रकार - "श्री राआआआ म जी ".


जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास 'एनीमल फ़ार्म ' में भी मेरी कहावत के नायक समान कुछ पात्रों का उल्लेख आया है .

आधुनिक लोकतंत्र में जहां दादागिरी करने वाले शासक बन बैठते हैं वहां ऎसे पात्र शासकों को बहुत भाते हैं यह कहने की शायद आवश्यकता नहीं है .

#बूच्याकेश्रीरामजी


#पहलीअप्रैल


समर्थन : Manju Pandya

सुप्रभात .

Good morning .


सुमन्त

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

पहली अप्रैल 2015 .

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पुनः प्रकाशित : बूच्या के श्री राम जी.

आवृत्ति : 1 अप्रेल 2016 .

     @ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

ब्लॉग पर प्रकाशित :

शनिवार पहली  अप्रेल  २०१७  ।


Thursday, 30 March 2017

जैन धर्मावलम्बियों के बीच  - २ : बनस्थली डायरी  ✍🏼


जैन धर्मावलंबियो के बीच : दो .

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 #बनस्थलीडायरी #sumantpandya

#दसलक्षणपर्व


मैंने अपनी पिछली पोस्ट में उस स्थिति का संकेत दिया था जब दोस्त बोलने को मजबूर कर देते हैं . ऐसा ही कुछ उस बार हुआ जब जैन साब ने फिर मुझे निवाई के जैन मंदिर पहुंचा दिया था .

 महेंद्र जैन का फोन आया कि वे यू को बैंक बनस्थली से निवाई जाते हुए मुझे भी साथ लिवा ले जाएंगे और मुझे उनके साथ जाना पड़ा . जैन धर्मावलंबिओं का 'दस लक्षण पर्व' चल रहा था और मुझे सत्य के विषय में बोलना था. मैंने ये तो कहा मार्ग में दुपहिया पर जाते हुए :


" भाई मुझे पहले से बताते और तैयारी का थोड़ा मौक़ा तो देते ताकि मैं इस विषय में कोई साहित्य देख पाता या किसी समझदार साथी से इस विषय में राय ले पाता . अब कैसे और क्या बोलूंगा इसकी रूपरेखा कैसे बनेगी ....?"


पर अब तो जाना तय हो गया था और मैं 'सत्य' पर भाषण देने के लिए जा ही रहा था सो गया और अपने मन मन में सोचता रहा कि कैसे बात बनेगी . थोड़ी देर के लिए निवाई पहुंचकर जैन साब ने धर्मावलंबियों के लिए तैयार एक पुस्तिका भी देखने को दी जो उनके पर्व का महत्त्व बताने वाली थी , मैंने देख ली और उन्हें लौटा दी .

पहुंच गए बड़े जैन मंदिर और बिछायात पर जा बैठे हम लोग . मंदिर की छटा निराली थी . दीपावली की तरह जगमगा रहा था मंदिर और असंख्य जैनी लोग सभा में इकठ्ठा थे . एक बड़ा वर्ग उन लोगों का था जो व्यापारी अपनी अपनी दूकानें बंद कर मंदिर में आ बैठे थे . मुझे इन्ही सब लोगों को सत्य के बारे में कुछ कहना था . दस लक्षण पर्व के अनुसार वो दिन सत्य को समर्पित था . मेरे साथ ऐसा पहले भी होता आया था जब बगैर तैयारी के बोलने की नौबत आ गई और वही उस दिन भी हो रहा था .


आ गई मेरे बोलने की बारी और मैं बोलने खड़ा हुआ . मैंने स्वीकार किया कि मैं इस विषय में बोलने का किसी भी प्रकार से अधिकारी नहीं कहा जा सकता क्योंकि मेरा विषय "नीति शास्त्र" नहीं "राजनीति शास्त्र" रहा है और इसे ही आप थोड़ा कहा अधिक समझ सकते हैं . शाश्वत सत्य / निरपेक्ष सत्य और सापेक्ष सत्य की बात कर मैं सामने बैठे समुदाय की ओर देखने लगा और मुझे उनको देखकर ही यह कहने की प्रेरणा मिली कि लोक व्यवहार में सत्य कितना महत्वपूर्ण है . सत्य का कोई एक दिन नहीं होता . सत्य के तो सब दिन होते हैं . मैं अपनी बनते यह स्थापित करने में सफल हो गया कि दुनियादारी भी सत्य से चलती है , झूंठ से नहीं .

जैन लोगों के साथ अच्छी बीती वो शाम निवाई में *...

* जय जिनेन्द्र .


सहयोग और समर्थन : Manju Pandya.


#दसलक्षणपर्व


#जैनधर्मावलंबिओंकेबीच


सुप्रभात .

Good morning.


सुमन्त

आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

31 मार्च 2015 .

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अपडेट : पुनः चर्चा योग्य प्रसंग .

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मैं जिस चर्चा की खोज में था फेसबुक ने अपने से ही याद दिला दी वो बात .

मेरी पोस्ट से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं आप की टीकाएं इस लिए इसे फिर से चलायमान करता हूं .

प्राइवेट कॉफी डन 

सुप्रभात

Good morning.

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सुमन्त पंड्या .

@ Gulmohar शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

31 मार्च 2016 .

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अपडेट :

गए बरस तक तो इस किस्से को फेसबुक पर दोहराया आज इसे ब्लॉग पर दर्ज किए देता हूं । आगे ये प्रयास भी करूंगा कि एक्सटेम्पोर बोलने के अपने सारे प्रसंगों को एक जगह इकठ्ठा करूं और ब्लॉग पर जोड़ देवूं ।


@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर ।

   शुक्रवार 3१ मार्च २०१७ .

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Wednesday, 29 March 2017

फूटरा लाग रिया छो  : बनस्थली डायरी  😀


होली स्पेशल :😊 बनस्थली विनोद #बनस्थलीडायरी #sumantpandya

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              हल्की फुल्की बात के लिए क्षमा मांगते हुए एक बहुत छोटा किस्सा बनस्थली प्रवास के आखिरी दशक का कहता हूं .

 विद्या मंदिर के एस्टेब्लिशमेंट सेक्शन में महावीर नाम का एक युवा अनुभाग अधिकारी मुझ से अनायास बोल पड़ा :


  “ ….. फूटरा लाग रिया छो !” ये उसका स्नेह अभिव्यक्त करने का तरीका था , मने वो कह रहा था कि आप सुन्दर लग रहे हैं .

और मैंने कहा था के “ कान ईन्डै ल्या .” मने कान इधर ला . छानै बात कहने - सुनने को . 

और सभी कोई अपने अपने कान लेकर आ गए थे रहस्य की बात सुनने को और तब मैंने जो बात कही वो ये थी :


    “ अरै जद म्हे आया छा न जद छोरी छापरियां म्हां पै मरबो करै छी , अब डोकरी डाकरियां मरबा लाग गी . “


ये स्वीकारोक्ति थी अपनी बढ़ती उमर और बदलते हालात की .


कोई दो दशक बीत गए मेरी यादों में वार्तालाप अभी ताजा है .

अब बच्चे तो जाने क्या कहेंगे ये किस्सा पढ़ सुनकर पर ऐसी बात तो हुई थी . मैंने आज बता दी आप अब जो कहो सो कहो !

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सुप्रभात .

सुमन्त पंड्या 

समीक्षा : Manju Pandyaa

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

   बुधवार 30 मार्च 2016 , राजस्थान दिवस .

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चर्चा के लिए फिर से प्रसारित :

गुरूवार ३० मार्च २०१७ . 

संयोग से इस बरस आज के दिन गणगौर है ।

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चक्की की कहानी : बनस्थली डायरी। स्मृतियों के चलचित्र ।



https://instagram.com/p/BSNbwMaAKAx/

चक्की बाबत ये तो है वीडियो लिंक और अब शुरू होती है इस चक्की की कहानी :  

जब हमलोग बनस्थली के रवीन्द्र निवास में रहा करते थे और निवाई आया जाया करते थे तब की बात है । वहां रामेश्वर जी हैड़ माट साब के ड्राइंग रूम में मैंने और व्यास जी ने ऐसी चक्की रखी देखी थी ।  एक बड़ा छोटा सा उपकरण जो घरेलू आटा चक्की के रूप में काम करता है जानकर हमें बहुत ख़ुशी हुई  । हम दोनों ही दोस्त  इस चक्की पर लट्टू हो गए थे उस दिन तो  । हैड माट साब बताने लगे  कि उनके लिए  तब पांच किलो अनाज भी उठाकर ले जाना और चक्की पर पिसवाकर  लाना कठिन होता था और ऐसे में उन्हें इस उपकरण  से बड़ी सुविधा रही  । व्यास जी से टेंडर मिलने पर  उनको तो  हैड माट साब ने वैसी ही एक चक्की जयपुर से मंगवाकर  दे दी  । उनकी चक्की बनस्थली पहुंच  गई  । मैंने हैड माट साब पर ये भार नहीं डाला और अपने से चक्की जुटाने का निर्णय  लिया  ।

क्यों चाहिए थी चक्की  ?

हम लोग ग़ांव देहात में रहे थे , ये नब्बे के दशक की बात है । तब आजकल की तरह आटे के बैग नहीं ख़रीदे जाते थे । हम लोग साल भर के लिए इकठ्ठा अनाज ख़रीदा करते थे और जैसे जैसे ज़रूरत पड़ती  ग़ांव में लूनिया की चक्की से अनाज पिसवा कर लाया करते थे । इस सब में कम से कम मुझे तो बहुत कष्ट होता था । इसलिए ये उपकरण मुझे भी ज़च गया और सर्वानुमति से ये तय हुआ कि एक चक्की अपण भी ख़रीदेंगे ।

तब हमलोग जयपुर में अपने शहर वाले घर में रहा करते थे । चक्की बनस्थली ले जाने के लिए चाहिए थी पर खोज जयपुर में ही शुरु हुई और उसका पहला ट्रायल भी जयपुर में  ही  हुआ था । उन दिनों सुरेश मदान त्रिपोलिया बाजार में इलेक्ट्रानिक सामानों की दूकान किया करता था ।  उसने कहते ही हमारे घर , नाहरगढ रोड ये चक्की भिजवा दी थी । मुझे आज भी याद है पहली बार इस चक्की से मोटा आटा पीसकर हलुआ बनाया गया था और भगवान जी के भोग भी लगाया गया था ।

तब की एक मज़ेदार बात बताऊं । चक्की आई उसके बाद कम्पनी का मैकेनिक ट्रायल ड़िमोंसट्रेट करने आया था तो वो मुझे पीछे हटाता और जीवन संगिनी को कहता ,"  आप आगे आओ , आप देखो !"  वही सोच कि ये घरेलू काम महिला का है । ये ल्लो पगले को ये अन्दाज़ भी नहीं था कि चक्की तो मुझे चलानी थी और आज दिन गर्व से कहता हूं मुझे बीस बरस से अधिक हो गए सफलता पूर्वक चक्की चलाते ।



( ये फ़ोटो तो मैंने फ़ाइल से लेकर ऐसे ही यहां जोड़ दी है कि जब मैं चक्की के काम में लगता हूं तो कैसे लगता हूं , आप देख लेवें । फ़ोटो २००९ का है , गुलमोहर का । )

चक्की अम्मा को पसंद आई :

---------------------------      ये चक्की जब आई तो अम्मा को बहुत पसंद आई । अम्मा के पास अपनी  बड़ी बढ़िया हाथ की चक्की थी पत्थर के पाटों और सीमेंट के गरंड वाली जिसकी भोर में चलने वाली आवाज़ तो मेरी बचपन की यादों में बसी है । पर ये ही तो ख़ास बात थी अम्मा की अम्मा ने इस नए ज़माने की चक्की को स्वीकार किया और बहुत सराहा । 

उदय भैया को इस चक्की का मोटा आटा इसलिए बहुत अच्छा लगता कि वो अपनी मम्मी से इस आटे से उत्तपम बनाने की फ़रमाइश करता । बहरहाल जितनी देर चक्की चलती अम्मा पास बैठती ये मुझे आज भी याद आता है ।  चूरमा और बाटी के लिए ख़ास आटा तो क्या ही ज़ोरदार तैयार होता इस चक्की से । ये उपयोग यहां  जयपुर में भी हुआ और आगे जाकर बनस्थली में भी जो आगे बताऊंग़ा ही आपको ।

चक्की का यातायात :

---------------------     चक्की आई तो जयपुर में थी और ज़ाणी थी बनस्थली  इसलिए ये ज़िम्मेदारी हिमांशु को सौंपी गई कि वो इसे बनस्थली पहुंचाए । हिमांशु उन दिनों जयपुर में रहकर पढ़ता था और यदा कदा बनस्थली जाता था । अगले फेरे में वो जय भैया के दोस्त वीरू उर्फ़ इक़बाल की ठेली से चक्की सिंधी कैम्प बस स्टैंड ले गया । वहां बुकिंग खिड़की पर फिर दिक़्क़त दरपेश । बुकिंग क्लर्क कहवे  कि चक्की बस में नहीं ले जा सकते । बस के साथ कंडक्टर कहीं समझदार था  और वो था बनस्थली का ही लड़का प्रमोद । उसने तजवीज़ दी कि ये कोई चक्की है ही नहीं  , ये तो मशीन है छोटी सी । लगेज टिकिट बणा दिया और चक्की का लदान हो गया सफलता पूर्वक । अब तो चक्की को पहुँचना ही था बनस्थली ।

चक्की के बनस्थली पहुँचने पर कैसा हर्षोल्लास का वातावरण था ! ये किसी भी रूप में उससे कम  नहीं था जो पहली बार टी वी और वो भी कलर टी वी आने पर बना था ।

मेरा नास्टेलजिया :

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छोटे छोटे स्मृतियों के चलचित्र हैं जो आपके सामने प्रस्तुत करता हूं । इस चक्की से नियमित गेहूं तो पीसा ही गया इसके अलावा बेजड़ , बाजरा , ज्वार , मक्का और स्वतंत्र रूप से चना दाल की भी पिसाई हुई । कुछ बातें संक्षेप में :

१.

चक्की आने के बाद हमारा स्टाइल था कि नया अनाज ख़रीदने से पहले सैम्पल के लिए पनसेरी अनाज ख़रीदते और उसे पीस और उसकी रोटी बनाकर परीक्षण करते  फिर ख़रीदते अनाज की बोरी क्विंटल या दो क्विंटल । ये आइडिया मोहल्ले में लोकप्रिय हुआ । एक बार श्याम जी ने भी सैम्पल गेहूं पिसवाया । मैंने आटा उनके घर पहुंचा दिया तो श्याम जी लौटकर आए ये कहने को ," भाई साब काटो तो काट लेता ।"  माने ये कि हम भी उसे बरत कर देखने को थोड़ा आटा रख लेते । ख़ैर वो भी हुआ और फिर तो श्याम जी भी एक दमदार चक्की ले ही आए ।

२.

एक्सपोर्ट क्वालिटी का दलिया तैयार हुआ इसी चक्की से । कब ? एस एस गुप्ता साब और भाभी जी विशाखा के पास रहने को अमरीका जा रहे थे । बेटी की जचगी का समय आने वाला था । भाभी जी ने साथ ले जाने को दलिया इसी चक्की पर तैयार करवाया  और ये लोग अमरीका लेकर गए  ।

३.

एक दिन चक्की वाले लूनिया ने टोका  , " आजकाल तो आओ ही क़ोनै  ?" माने आजकल तो आते ही नहीं हो ।

और मैंने गर्व से कह दिया :" थे भी चक्कीआळा  म्हे भी चक्की आळा  अब घरां ही चक्की छै ज़द काँ बेई आवां ?" माने आप भी चक्की वाले हम भी चक्की वाले , जब हमारे घर ही चक्की है तब क्यों आवें भला ?    पर लूनिया से तो अपना याराना था जो बरक़रार रहा । उसमें कोई फरक नहीं आया ।

अभी तो चक्की से जुड़े प्रसंगों पर और भी कई स्मृतियों के चलचित्र साझा करने हैं आपसे जो दूसरे खंड में ही बता पाऊँगा ।

जीवन संगिनी का यह भी सुझाव है कि स्टोरी बराबर से फ़ेसबुक पर भी आनी चाहिए , लोगों को ब्लॉग खोलने में कठिनाई होती है । इसका भी उपाय करूंग़ा ।

अभी हाल के लिए प्रातःक़ालीन सभा स्थगित ....  

डूंगरपुर

मंगलवार २ मई २०१७ ।

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Tuesday, 28 March 2017

जैन धर्मावलंबियों के बीच -- १ .

जैन धर्मावलबियों के बीच :

~~~~~~~~~~~~    #बनस्थलीडायरी   #sumantpandya

उस दिन यू को बैंक वाले महेंद्र जैन मुझे कुछ साथियों के साथ निवाई लिवा ले गए थे . चातुर्मास में जैन मुनि आए हुए थे और हम लोगों को वो मिलवाना चाहते थे .

1.

   मैं सोच में पड़ गया था महाराज के सामने क्या पहन कर जावूं . मैंने अपना सफ़ेद कमीज निकाला था और वही पहनकर गया था .

जब हम महाराज के सामने पहुंचे तब मुझे समझ आया वे तो दिगंबर  सन्यासी थे . काहां मेरी दुनियावी सोच कि क्या पहनूं .

कितना कठोर जीवन जैन सन्यासी का .

2.

  महाराज थोड़ी देर बोले और फिर उन्होंने कहा :

आप बुद्धिजीवी हैं , इस विषय में आप कुछ कहिए .

मैंने उस दिन इतना ही कहा :

" महाराज , मेरे टाइम टेबिल में छह दिन मेरे बोलने के होते हैं , सप्ताह के वे छह दिन बीत चुके . आज मंगलवार का दिन है इसी दिन तो मुझे बोलने से विश्राम मिलता है .

आज मेरे चुप रहने का दिन है . आप बोलेंगे और मैं सुनूंगा ."

और मैंने महाराज के सामने समर्पण कर दिया था .

मंगलवार को विद्यापीठ में अवकाश होता आया है ,यह दोहराने की शायद आवश्यकता नहीं है .

पर मित्र बोलने को विवश भी तो कर देते हैं वह बात अगली बार....

समर्थन :  Manju Pandya

सुप्रभात .

सुमन्त पंड्या

भिवाड़ी .

29 मार्च 2015 .

#बनस्थलीडायरी

#जैन

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बात पुरानी , पोस्ट गए बरस की , आज फिर से विचारार्थ प्रसारित और प्रचारित

स्टेटस अपडेट :

प्राइवेट काफी डन @ गुलमोहर कैम्प , जयपुर .

सुमन्त पंड्या

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

मंगलवार 29 मार्च 2016.

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#स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी

गए बरस की बातें याद करते हुए आज का अपडेट :

Good morning , private coffee done @ गुलमोहर ।☕

२९ मार्च २०१७ ..

नोट :  आज इस किस्से को ब्लॉग पर साझा किए देता हूं  , देखिएगा ।

गुलमोहर कैम्प , जयपुर से सुप्रभात । ☀️☀️

क़िस्सा ब्लॉग पर साझा ।

Monday, 27 March 2017

बड़े आदमी की बात : जयपुर डायरी 

संयोग से ये पहला क़िस्सा है जो पल्लव की राय लेकर मैंने फ़ेसबुक पोस्ट के रूप में लिखा था और इस क़िस्से पर बहुत अनुकूल टिप्पणियाँ भी आईं थीं । पता नहीं ऐसा क्यों हुआ कि ये क़िस्सा फ़ेसबुक पर तो रहा आया पर ब्लॉग पर दर्ज होने से रह गया । आज इसे बिना किसी अतिरिक्त संशोधन के ब्लॉग पर दर्ज किए देता हूं । अपने लोगों को ब्लॉग का लिंक भी भेजूँगा । इस क़िस्से को लेकर जो जो असमंजस रहे वो भी यहां इंगित हैं । अब तो ज़बानी किस्सागोई में मैंने ये भी कहना शुरु कर दिया है : “ अब जब घर में ही बड़े आदमी नहीं माने गए तो अपण काहे के बड़े आदमी !” जयपुर  २७ मार्च २०१७ । #स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी  

असल क़िस्सा :
 -------------- बनास जन ** मेरे घर आये थे । उन्हें बड़े सवेरे उठकर जाना था ।मैंने पूछा 'क्या बड़े आदमी के साथ काफी पीओगे ?'  उन्हें जिज्ञासा हुई कि क्योंकर मै अपने को बड़ा आदमी कह रहा हूँ । जो एक पुरानी बात मैंने बताई वो इस प्रकार थी -

 १. 
उन दिनों मैं सेवा रत था ,केदार के विवाह में सम्मिलित होने के लिए बसवा जाने के लिए निकला था और इस क्रम में सिकंदरा के बस स्टैंड पर उतर कर आगे जाना चाहता था ।मैंने वहां बसवा के लिए बस की बाबत तलाश शुरु की ।  ठेले वालों ने सुझाव दिया कि मैं ओम प्रकाश के पास जाकर पूछ लूं जो चाय की स्टाल चलाता था और रोड़वेज का बुकिंग एजेंट भी था ।मैं ओम प्रकाश के पास पहुंचा ।संवाद शुरू हुआ :   बसवा के लिए बस लेनी है । *अभी एक बस बालाजी से आएगी और एक गंगापुर से जो भी पहले आएगी आपको मिल जाएगी । *टिकट दे दो । उत्तर मिला ." वो तो बस आने पर ही मिलेगा ।" मैं मुड़ने लगा तो ओम प्रकाश बोला ,' बाबूजी आप बड़े आदमी हैं आप टिकट लेते ही रह जायेंगे और बस में जगह भर जाएगी ।आप तो बैठ जाना मैं आपको बस में ही टिकट दे दूंगा । " इस सदाशयता से मैं खुश हुआ ,उसने मुझे बड़ा आदमी भी तो कहा था । बात आई गयी हो गई ।

 २. 
विवाह में सम्मिलित हो मैं जयपुर लौटा । जयपुर में पंड्या अस्पताल जाने के लिए बस स्टैंड पर खड़ा था ।इसी बीच एक रिक्शा वाला आ गया ,बोला : " बाबूजी चलते हो क्या? "  उत्तर दिया * :" भाई मैं तो बस की इंतजार में था ।तुम ले चलो , महावीर मार्ग पर चलना है क्या लोगे ?" उत्तर मिला :"* बाबूजी ! आप बड़े आदमी हैं ,जो चाहो दे देना ।" मैं उसी रिक्शा से गया ।उतर कर मैंने बीस रुपये दिए ।  रिक्शा वाला बोला : " 'पांच तो और देते । " मैंने पांच और भी दिए । आखिर बड़े आदमी से ही तो कोई उम्मीद करता है ।बात आयी गयी हो गयी । 

 ३. 
महीने भर बाद मुझे अलवर जाना था । इस निम्मित्त मैं नारायण सिंह बस स्टॉप पर बस की प्रतीक्षा में खड़ा था । बस आई और कंडक्टर बस से उतर कर टिकट खिड़की की ओर जाते हुए कह रहा था ,' टिकट लेकर बैठना , टिकट लेकर बैठना ।" मैं कंडक्टर से अनायास पूछ बैठा : " क्या मुझे भी खिड़की पर जाना पड़ेगा ??"" उत्तर मिला --" आप तो बड़े आदमी हैं ।आप बैठो ।आपका टिकट मैं ले आवूंगा । " इस बार जब घर लौटा तो जीवन संगिनी से बोला ,'अब अपन भी बड़े आदमी हैं ।एक बार नहीं दो बार नहीं तीन बार ऐसा हो गया लोग बड़े आदमी कहते हैं । जीवन संगिनी बोली :

 " आप बाईफोकल चश्मा लगते हो , बाल भी खिचड़ी हो गए हैं,चाल में भी फ़रक आ गया है ,लोग बूढ़े आदमी को बड़े आदमी कह देते हैं । आप अपने को हाई सोसाइटी वाले बड़े आदमी मत समझो " 

 गुड़मॉर्निंग . प्राइवेट कॉफी डन . सुमन्त . आशियाना आंगन , भिवाड़ी . 8 जुलाई 2015. ------------------------------ 
 आज की भोर में उठकर ये विचार आया कि एक बार को उस पोस्ट को दुबारा प्रकाश में लाऊं जो मैंने पहली पहली बार एक यशस्वी सम्पादक की प्रेरणा से फेसबुक पर दर्ज की थी . जबानी अपने जीवन में घटे वाकयों की कहानी तो मैं लोगों को सुनाता रहा था , फेसबुक पर दर्ज करने का वो पहला ही मौक़ा था .. तब से अब में मेरे मित्रों की संख्या बढ़ी है . ये सोचकर ही ऐसा करने का मन बना . चाहता तो ये भी हूं कि इसे एक ब्लॉग की शकल मिल जाए लेकिन तकनीकी जानकारी की कमी के चलते अभी ये संभव नहीं हो पा रहा . जानकारों से उम्मीद करता हूं कि कभी इस काम के लिए समय निकाल कर मेरे बिखरे सामान को इकठ्ठा करेंगे . जानकार ढूंढने मुझे कहीं और नहीं जाना पडेगा . घर के बच्चे जमाने भर को ऐसी सलाह और सहायता देते आए हैं वे ये काम भी कर डालेंगे . तो आगे आएगी पुरानी पोस्ट : 
 सुप्रभात . सहयोग : Manju Pandya सुमन्त पंड्या Sumant Pandya. 8 जुलाई 2015 . नोट : क्रम थोड़ा उलट गया है , भूमिका परिशिष्ट की तरह बाद में जुड़ गई है और पोस्ट पहले आ गई है , सुधि पाठक मेरे इस तनीकी अज्ञान को दरगुज़र कर बात को समझेंगे . **बनास जन पत्रिका के यशस्वी संपादक डाक्टर पल्लव से अभिप्राय है . 
--सुमन्त #बनासजन #बड़ेआदमी ---------------------------------------