Wednesday, 31 May 2017

इनबॉक्स में अंट संट : फ़ेसबुक लीला :स्मृतियों के चलचित्र 

इन बॉक्स में अंट संट 

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मैसेंजर और इन बॉक्स का निमित्त ये है कि आप किसी को बंद लिफ़ाफ़े में पत्र भेज सकते हैं , ऐसे अनेक सन्देश मुझे भी प्राप्त होते हैं और पत्र पाकर खुशी होती है . इनमें मेरी प्रिय छात्राओं के सन्देश भी होते हैं जो मैं अपने लिए टेस्टीमोनियल की तरह सहेज कर रखता हूं , अन्यान्य मित्रों के भी सन्देश आते हैं बड़ा अच्छा लगता है . कोई ऐतराज नहीं , लिखा कीजिए अगर आप को जरूरी लगे और खुल्लम खुल्ला लिखें मेरी दीवार पर तो तो क्या ही बात और लोग भी देखें . मेरी तो क्लास के दरवाजे भी सब के लिए खुले होते थे और आज दिन गुलमोहर के दरवाजे भी सब कोई के लिए खुले होते हैं सब का स्वागत . 🌷🌷


तो फिर बात क्या है सुमन्त ?

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 बात होने को तो ज़रा सी है पर जाने क्यों कोई कोई जरा सी बात पे मेरा माथा ठनक जाता है और मैं बिना पूरी बात साफ़ किए ऐसी बात कह डालता हूं जो मेरे अपनों को बुरी लगती है मानों उनको कह दी हो , जैसे मैंने कह दिया 


“, कुछ लोग ऐसे आ घुसे हैं जो न लीपणे के काम के न पोतने के काम के . “ “, गोबर से भी निकृष्ट ! “


ये बात आप में से किसी भी फेसबुक मित्र के सन्दर्भ में नहीं कही गई थी , जिस सन्दर्भ में कही गई थी वही बताता हूं तो बात साफ हो ही जाएगी .

फ्रैंड रिक्वेस्ट आती रहती है , देखता रहता हूं पर हर बखत उस तरफ ध्यान नहीं दे पाता . एक साब रिक्वेस्ट भेजकर चैट पर आ गए , खैर आए अच्छी बात , लिखना आवे नहीं वो भी जाने दो , उल्टी सीधी रोमन में हिंदी लिखें और मुझे उकसावें पूछ लो , पूछ लो करके . खैर मैंने इस बीच उनका प्रोफाइल खोला कुछ कॉमन फ्रैंड देखकर और शकल सूरत ठीक देखकर मैंने रिक्वेस्ट मान ली .

अब भी खुली बात न करके चैट ही करे जाएं , रात बढ़ रही मैं चाहूं बात बंद हो वो टन टनाए ही जाएं और अन्त में उन्होंने अपनी बुद्धि का समग्र परिचय दे दिया , बोले :


“ आय एम ए सैक्सी मैन . “

---------------------- न जान न पहचान और ये बोल बोला सुनकर ऐसा बुरा लगा मुझे के मैं एक शब्द तलाशने लगा कि क्या कहूं इस व्यक्ति के लिए , फिर मुझे चुन्ना भाई की एक पोस्ट में वो शब्द भी मिल गया और अब मैं इस बात को यों कहता हूं :


“ अरे ये सांड कहां से आ गया ? “


ऐसे इक्का दुक्का छोरे छापरे और भी हैं जो इनबॉक्स का इस्तेमाल गैर जरूरी नॉनसेन्स बातों के लिए करते हैं उनको भी चेतावनी दिए देता हूं कि चपक्या रहो न तो स्क्रीन शॉट लगा दूंगा और शांतिप्रिय जरूर हूँ लेकिन ऐसों को घर पे आ के ठोकूंगा अलग से . 

ऐसी बातें थी कि मैंने कहा था ,” न लीपणे के काम के न पोतने के काम के , गोबर से भी निकृष्ट . “

आत्मालाप :

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“ इत्ता गुस्सा , इत्ता हिंसक विचार काहे सुमन्त ? “

वो राजस्थानी सोरठा की अंतिम पंक्ति में कुछ लोगों के स्वभाव के विषय में कहा है न :

“.....पुचकारयां माथै चढ़ै , ठोक्यां आवै काम . “

कुछ लोग ठुकाई , ममाई डिजर्व करते हैं और उनके विशेष सम्मान में लिखी ये आज की पोस्ट .


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सुप्रभात 

सुमन्त पंड्या .

@, गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

    सोमवार 30 मई 2016 .

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आज दिन ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

गुरुवार १ जून  २०१७ ।

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बात की बात : ई एम एस नम्बूदरीपाद : स्मृतियों के चलचित्र 


बात की बात : ई एम एस नम्बूदरीपाद .

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कोई बात देख सुनकर पुरानी बात याद आ जाती है . अगर आज के बच्चों की शब्दावली में कहूं तो बात हैश टैग (#Tag.) हो जाती है , ऐसी ही बात की बात बताता हूं . कल की ही बात है :

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जीवन संगिनी टी वी के सामने बैठी कोई कार्यक्रम देख रही थी . अब ये तो मुझे पता नहीं कोई सीरियल था या कहानी थी पर मैं भी कंपनी देने को थोड़ी देर को बैठ गया . मामला एक लड़की का था और विवाह का प्रसंग विचारार्थ आ गया था . लड़की बोलने में हकलाती थी और इसी नाते बात कुछ अटक रही थी , लेकिन बावजूद इस वक्तृत्व कौशल सीमा के उसका आत्म विशवास देखते ही बनता था . मैं दो कारण से उससे अपनत्व अनुभव कर रहा था . एक तो बेटी और दूसरे उसका हैंडीकैप .

पर हुआ कुछ ऐसा कि पिता की इस बेटी ने ऐसी हिमायत की जो शायद और कोई न कर पाता . 

मैं बेटी जात का हिमायती हूं ये तो बताने की शायद आवश्यकता नहीं है , मैं हमेशा यह भी कहता हूं कि किसी के हैंडीकैप का मज़ाक मत उड़ाओ , मजाक उड़ाने वालों से मैं हमेशा भिड़ जाता हूं कि समझते क्या हो तुम्हारा हैंडीकैप मैं तुम्हें बताऊंगा . आपने यह भी पाया होगा कि मां बाप को हमेशा ही अपने हैंडीकैप बच्चे से सबसे अधिक प्यार होता है और अगर नहीं होता है तो मैं ऐसे मां बाप को मां बाप कहलाने के लिए लायक ही नहीं मानता . खैर ये विचार तो मेरे अपने हैं किसी के लिए इनको मानना लाजिमी नहीं है . खैर , कल की बात से जो पुरानी बात याद आती है वो बताता हूं .......


राजनीति शास्त्र विभाग , राजस्थान विश्वविद्यालय :


मैं वहां पढ़ा करता था , विभाग के संस्थापक अध्यक्ष और मेरे भी गुरु डाक्टर एस पी वर्मा इस बात को बड़े गर्व से कहा करते थे कि शायद ही कोई ऐसा नामी राजनीति शास्त्र का विद्वान बचा होगा जो विभाग में आया न हो और इस मंच से बोला न हो . इस विभाग में भाषण देने का निमंत्रण राजनेता भी ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करते थे और खुल कर बात होती थी . इसी सन्दर्भ में मुझे याद आते हैं ई एम एस नम्बूदरीपाद जो विभाग में भाषण देने आए थे . लुंगी और बुश्शर्ट कहा जाने वाला कमीज और गांधी जी जैसी चप्पल पहने विभाग के एक नंबर थियेटर में रॉसट्रम के पीछे खड़े होकर बोलते नम्बूदरीपाद मुझे आज भी याद हैं .


क्यों आई ये बात याद ?


मुझे तो तो उस लड़की की बात पर याद आए ई एम एस .

वो भी हकलाते थे , लेकिन अपनी इस कमजोरी को वो किसी भी प्रकार से हीनता ग्रंथी का कारण बनने देने को तैयार नहीं थे , विभाग में भी जब वो बोले थे तो उनकी बात को सबने शान्ति पूर्वक सुना था . उनकी बात में दम था . उनके तर्क में दम था .


उपसंहार :


एक बार की बात , सिर्फ उन्हें सताने को किसी अकल से पैदल पत्रकार ने ई एम एस से पूछ लिया :


" सर ! डू यू ऑलवेज स्टैमर ....?"

जवाब में बोले ई एम एस और तपाक से बोले , पूरे आत्म विशवास से बोले :

" नो ओ ओ....."

"ओनली व्हेन आई स्पी अ अ क ."

इससे बढ़िया जवाब क्या हो सकता था भला?


प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित .

इति .

सुप्रभात 

सुमन्त पंड़्या 

गुलमोहर कैम्प , जयपुर .

31 मई 2015 .

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पुराना संस्मरण है ।

आज दिन जयपुर से ब्लॉग पर प्रकाशित ।

बुधवार ३१ मई २०१७ ।

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Monday, 29 May 2017

" जो कुछ करना है आप ने ही करना है ....."। ज्योति क़ौल  : बनस्थली डायरी 

" जो कुछ करना है आप ने ही करना है , हमने क्या करना है ......"

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बनस्थली डायरी : ज्योति कौल की बाबत .

ऊपर लिखा वाक्य बनस्थली में हमारे यहां आए एक अतिथि ने तब कहा था जब वो ज्योति को साथ लेकर मिलने आए थे . ये एक ऐसा वाक्य है जो न केवल मुझे बार बार याद आ जाता है वरन मैं इसे वक्त बे वक्त मिलता जुलता प्रसंग आने पर दोहराता भी हूं .


अतिथि का परिचय :

______________ आगंतुक अतिथि का इतना ही परिचय यहां काफी होगा कि वो एस ओ एस बाल ग्राम के चंडीगढ़ कैम्पस के डायरेक्ट और ज्योति कौल के अंकल थे और ज्योति को साथ लेकर आए थे जो उन दिनों उनके बाल ग्राम में जा रही थी . ज्योति इस संगठन की सबसे बड़ी हस्ती कौल साहब की बेटी थी . शायद कौल साब उस समय बाल ग्राम संगठन के डायरेक्टर जनरल थे .

आगंतुक मुझे जता रहे थे कि लड़की के जीवन में सभी बातों के फैसले लेने हैं जैसे नौकरी , शादी और इसका भावी जीवन का मार्ग . अपनेअध्ययन के अंतिम पड़ाव में वो मेरे और मेरे परिवार के सर्वाधिक संपर्क में आई थी और इस सब के चलते ज्योति के बारे में मेरी जिम्मेदारी को अपने से अधिक बताकर एक प्रकार से आदर ही दे रहे थे .


ज्योति का परिचय और हमारे परिवारों से जुड़ाव :

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बाल ग्राम से ज्योति बनस्थली कब पढ़ने आई ये बताना तो मेरे लिए संभव नहीं पर इतना याद है कि बी ए , एम ए कक्षाओँ की पढ़ाई के बाद एम फिल की पढ़ाई के दौरान जब बच्चों को अपने लिए एक एक सुपरवाइजर और शोध विषय चुनने का समय आया तो अजय राय की सलाह पर ज्योति मेरे निर्देशन में आई और असंलग्नता आंदोलन के किसी पहलू पर उसने प्रबंध तैयार किया था . अजय राय कुछ समय से बनस्थली में रहे थे , मेरे अच्छे मित्र बन गए थे और आगे चलकर बाल ग्राम जयपुर के डायरेक्टर बने थे .


एक बार की बात :

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हम लोग इंद्रा कालोनी से शहर के मकान लौट रहे थे कि जीवन संगिनी ने ये घोषित कर दिया कि एस ओ एस बाल ग्राम होकर ही घर चलेंगे . देखे तो सही कि हमारी बेटी कैसे है , ज्योति से मिलने के लिए रास्ते में रुकना जरूरी था .


वो बात तो रह ही गई ......

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जब चंडीगढ़ से चलकर ज्योति आई तो तो काम दिलाने के लिए तो जो कुछ सलाह और सिफारिश मैं दे सकता था वो उपलब्ध कराई ही , विवाह के प्रसंग में मैंने जो कहा वो यहां रेखांकित करता हूं .


" अगर तुम्हारी निगाह में कोई लड़का है तो हमें बता दो ......मैं लडके वालों से आगे बढ़कर बात करूंगा . अगर हमें लड़का ढूंढना है तो वैसा कह दो जो मेरे द्वारा लिए गए साक्षत्कार में खरा उतरेगा उसको तुम्हारे पापा और अंकल से मिलवाऊंगा ."  

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ज्योति न केवल मुझे वरन जीवन संगिनी को आज भी याद आती है और याद आता है उसके अंकल का वो वाक्य जो उन्होंने उस दिन कहा था और कितना अपनत्व दिया था .


विलंबित प्रातःकालीन सभा स्थगित .

इति .


सह अभिवादन और सतत समर्थन :

Manju Pandya

सुमन्त

गुलमोहर कैम्प, जयपुर .

29 मई 2015 .

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आज दिन जयपुर से ब्लॉग पर प्रकाशित :

सोमवार २९ मई २०१७ ।

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Saturday, 27 May 2017

सूरजभान खत्री : स्मृतियों के चलचित्र

सूरजभान खत्री : ऐसे दोस्त जो मुझे आज भी याद आ जाते हैं .
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जयपुर के त्रिपोलिया  बाजार में जैसे मेरा आना जाना बाबूलाल  तरसेन कुमार की बरतनों की दूकान  पर होता था वैसे ही ठाकुरदास खत्री  एंड संस  नाम की घडी की दूकान पर भी होता था . ये लोग  विभाजन के बाद डेरा इस्माइल खां से चल कर जयपुर में आ बसे लोग थे . घड़िया विदेश से मंगवाते  बेचते . फर्म का वही नाम रखा गया था जो वहां से लेकर आए
थे . बड़े भाई सूरज भान खत्री मेरे ऐसे दोस्त बन गए थे जो बातों में उस समय हिमायती बनकर खड़े हो जाते जब साक्षात मेरे बड़े भाई मेरी कच्ची कौड़ी मान कर मेरी बात को दर  गुजर कर रहे होते . केवल मिलने और बतियाने को वो हमारे  शहर वाले घर , नाहर गढ़ की सड़क पर  भी आए . अपने  बेटे राकेश के विवाह के आनंदोत्सव में उन्होंने न्योता भेजा और मैं फर्ज समझ कर बड़े वाले को साथ लेकर छत्रसाल पार्क के उस समारोह में गया भी था . ये ऐसे आत्मीय सम्बन्ध थे जिनमें कोई व्यापार व्यवहार नहीं था .
मेरा जाना तो किसी निमित्त से ही होता और वो बात हो जाती जैसे कोई घडी खरीदना या सुधरवाना पर वो होवे अपनी जगह सूरजभान हाथ का काम रोक कर टाइम आउट ले लेते और मेरे लिए कोई न कोई सवाल छोड़ देते .
उनका लायक बेटा राकेश अब भी उस दूकान पर बैठता है . सूरज भान नहीं रहे पर उनकी स्मृति मेरे लिए आज भी कल की सी ताजा बात है .

एक बार की बात :
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पहले छोटी सी बात :
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मैंने इलेक्ट्रॉनिक घडी के बाबत पूछा ," गारंटी कितनी ?"
वो बोले :" जितनी देर घडी तो आपके हाथ में है लेकिन आपने पैसे नहीं चुकाए ."

अब बड़ी बात :
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एक दिन सूरज भान मुझसे बोले :

" प्रोफ़ेसर साब मुझे येे बताओ कि ये हिंदुओं में मुर्दे को जलाते ही क्यों हैं और समुदायों की तरह गाड़ते या रखकर छोड़ते क्यों नहीं ."

गंभीर सवाल था और मुझसे उत्तर की अपेक्षा थी . जाने क्यों अध्यापक से लोग उम्मीद करते हैं कि उसके पास हर सवाल का उत्तर  होगा .
मैंने पीने का पानी मांगा और उत्तर देने को बैठ गया और बोला, बात यहां से शुरू की :

" भाई साब अंतिम संस्कार का सम्बन्ध  जीवन दृष्टि से है . अपन तो मानते हैं कि शरीर नश्वर है ,  पंच  तत्त्व से मिलकर बना है . हिन्दू संस्कारों में हवन का बड़ा महत्त्व है , अग्नि को शरीर समर्पित करना भी एक  प्रकार का हवन ही तो है .
जीवन के बाद भी जीवन है , जैसे कपडे बदलते हैं वैसे ही शरीर बदलते हैं.
यही सब तो सोच है भाई  साब .
लेकिन जो लोग ऐसा सोचते हैं कि एक दिन ये ही शरीर उठ खड़े होंगे वो अंतिम संस्कार की अन्य विधि अपनाते हैं ..........
............. "
नहीं रहे सूरजभान पर आज भी राकेश हम लोगों से लगाव रखता है . पर
अब उधर जाना भी कम होता है ......
प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित .
इति .

सुप्रभात  .

सुमन्त पंड़्या
गुलमोहर कैम्प, जयपुर .
27 मई 2015 .
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आज दिन ये संस्मरण ब्लॉग पर प्रकाशित  ।
दिल्ली
शनिवार  २७ मई २०१७ ।
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Friday, 26 May 2017

जनता स्टोर के क़िस्से : स्मृतियों के चलचित्र 


जनता स्टोर : कल परसों की बात और आगे

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 कल टी ब्रैक के चलते बात जहां छोड़ी थी वहीँ से आगे चलें ...

अब उस चौक में अपने भतीजों का घाटा नहीं है . राहुल की डेयरी पर जाते पैली आवाजें आने लगती हैं :

" ताऊ जी ढोक !" 🙏

" ताऊ जी ढोक ! " 🙏

मैंने तो दो बार ही मांडा है , ऐसा तो सारे छोरे बोलते हैं .

उस दिन राजू तो काउंटर पर टॉफी लेकर ही खड़ा हो गया के ताऊ जी बड़े दिनों बाद आए . अब ताऊ भी क्या करें और जगह भी तो बच्चों के पास जाना पड़ता है . फोटू जोड़ूंगा राजू की , देखिएगा .

दुनियांदार भी देखते रह जाते हैं के ये कौन ताऊ आ गए जो इनकी ऐसी आव भगत हो रही है .

अटके भटके बनस्थली की पुरानी लड़कियां भी यहां नई भूमिका धारण किए मिल जाती हैं वो बात आगे किसी पोस्ट में बताऊंगा .

अब उठने का समय हो रहा है अतः मीडिया पर पहला सन्देश फेसबुक पर भी दर्ज :


Good morning & private coffee done @ Gulmohar camp .☕.

सुप्रभात .

सुमन्त पंड्या

जयपुर 

गुरुवार 26 मई 2016 .

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आज दिन दिल्ली से ब्लॉग पर प्रकाशित ये क़िस्से का  पुछल्ला  ।

शुक्रवार २६ मई २०१७ ।

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Thursday, 25 May 2017

बातें बनस्थली की : वीर पुरुष का  दर्जा  😎

बातें बनस्थली की : वीर पुरुष का दर्जा: डाक्टर लाल चंद जैन . 💐💐

________________________________  बनस्थलीडायरी 


डाक्टर लाल चंद जैन होने को तो हिंदी विभाग में रहे पर रवीन्द्र निवास की सायंकालीन सभाओं में ये विभागों का भेदाभेद नहीं होता था और अरविन्द निवास से चलकर जब वो हमारी सभा में आते तो उन्हें विशिष्ट अतिथि या मुख्य अतिथि का दर्जा दिया जाता . कभी कभी मैं आगे बढ़कर सभा की अध्यक्षता के लिए भी उनका नाम प्रस्तावित कर देता और वो बात हमेशा ही मान भी ली जाती . हंसी के ठहाके के मामले में उनकी जोड़ी का परिसर में कोई नहीं था .

हमेशा खादी के सफ़ेद कमीज और पैन्ट पहनते . सर्दी के मौसम के लिए मरीनो ऊन के शाल से बनाया गया सूट पहनते और बचे हुए कपडे का बनवाया हुआ मफलर लगाना उनका ख़ास स्टाइल था .

आजकल वे अलवर में रहते हैं , मेरा अलवर से नाता तो जग जाहिर है , गया तब उनसे भी मिलकर आया था .

अभी भी वही नूर बरकारार है , उनकी पूर्व छात्राओं की सूचनार्थ ये बात दर्ज की है .


एक ख़ास बात :

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बनस्थली में विश्वविद्यालयों के बालीबाल टूर्नामेंट हो रहे थे . जाने किस तुफैल में मैं भी उसकी बुलेटिन बनाने वाली कमेटी में सम्मिलित कर लिया गया . अगले दिन सुबह जारी होने वाले बुलेटिन में मैं भी कोई कवित्त रचकर जोड़ देता . कमेटी के सर्वेसर्वा भैया विजयवर्गीय जी थे.

इसी झमेले में आधी रात होने आई तब प्रेमचंद जी उठे और अपनी ब्राउन शेरवानी पर शाल लपेटते हुए मुझसे और लाल चंद जी से बोले :


" आप लोग हैं न , मैं एक बार घर जाकर भोजन कर आता हूं. "


भूखे तो हम भी थे पर डटे रहे कैसाबिआंका की तरह और भैया के लौटकर आने का इंतज़ार करते रहे . वो गए भी , उन्होंने खाना खाने में भी समय लगाया और लौटकर आए तब मेरी और लाल चंद जी की पैरोल शुरु हुई और हम दोनों घरों को चले .

जब रवीन्द्र निवास के मेरे घर के सामने हमारे बिछुड़ने की घडी आई तो बॉस बोले :


" अब क्या करोगे? भोजन होगा तैयार ?"


मैं बोला: " करना क्या है , घर जाकर खिचड़ी बनाऊंगा और खाऊंगा और क्या .....?"

उस दिन मेरे घर में तो कोई भी और नहीं था जो मेरे लिए घर पहुंच कर खाना तैयार मिलाता . इस परिस्थिति के प्रति डाक्टर साब उदासीन कैसे रहते , तुरत बोले :


" ....तो आजाओ मेरे साथ ."


और इस प्रकार उस रात मुझे वो साथ लिवा ले गए .

कहना पडेगा कि उस दिन भाभी जी ने भी मुझे प्रेम से भोजन कराया , आम हिन्दुस्तानी की तरह " बूरा लाओ ", अचार लाओ" ये फरमाइश भी डाक्टर साब ने की . अपनी पेट भराई अच्छे से हो गई पर उसी दिन मैंने डाक्टर साब को " वीर पुरुष " सम्मान से भी नवाजा . मेरा तर्क था :


" आज के जमाने में कोई खाविंद एक तो आधी रात के बाद घर आवे और साथ में एक सितखवुए दोस्त को और ले आवे तो मैं उसे तो ' वीर पुरुष ' ही कहूंगा . "


प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित .

इति.

सुप्रभात .

सुमन्त पंड़्या 

गुलमोहर कैम्प, जयपुर .

26 मई 2015 . 

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अपडेट : 26 मई 2016 .

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गए बरस की सराहना से अभिभूत हूं , ये सहेजने लायक संस्मरण है , इसे ब्लॉग पर भी प्रकाशित करूंगा . अभी हाल के लिए चर्चा के लिए प्रसारित .


-- सुमन्त पंड्या .

   जयपुर 

    26 मई 2016 .

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डाक्टर साब का फ़ोटो सीमा की दीवार से लिया है ।

आज दिन ये संस्मरण दिल्ली से प्रकाशित 

शुक्रवार २६ मई २०१७ ।

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बनस्थली डायरी : बैचलर्स किचन 🍽

बातें बनस्थली की : बैचलर्स किचन . 

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आज की तारीख में विनीत कुमार लन्दन पहुंचा हुआ है वैसे वो बैचलर्स किचन का मास्टर शैफ भी है और इस बाबत खूब लिखता है . 

इधर मुझे लगा कि क्यों न इस प्रसंग में विनीत की गैर मौजूदगी में मैं अपने खट्टे मीठे अनुभव जोड़ कर एक पोस्ट बनाऊं सो ये ही किस्से लिखने बैठा हूं .

(1)

परनामी और गौतम के साथ :

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अंग्रेजी विभाग के परनामी और गौतम दो युवा प्राध्यापक उन दिनों मेरे साथी थे . परनामी का तो तब तक विवाह ही नहीं हुआ था , मुसीबत का मारा गौतम अपनी पत्नी और बेटी को मां बाप के पास छोड़ आया था और उसके घर में रोटियों का कोई इंतजाम ही नहीं था .

परनामी की छोटी बहन साथ रहती थी पर शायद उस दिन वो भी बाहर गई हुई थी .

मेरे कब्जे में 44 रवीन्द्र निवास था और उस दिन तो रसोई पर भी मेरा एकाधिकार था , जीवन संगिनी वहां नहीं थी , अब ये याद नहीं कि वो जयपुर आई हुई थी या अलवर गई हुई थी . बहर हाल हम तीन साथी छड़े और अपने भोजन का इंतजाम करने को स्वतन्त्र थे , कहिए मजबूर थे .

कैसा विरोधाभास है हमारी स्वतंत्रता ही हमारी मजबूरी थी .


ऐसे में परनामी और गौतम ने घोषणा कर दी :


"सुमंत के यहां चलते हैं , वहां चलते हैं , वहीँ खाना बनाएंगे और खाएंगे ."


 मुझे ऐतराज ही क्या हो सकता था , दोनों यार अलग विषय के चाहे रहे हों , हम लोग एक ही विश्वविद्यालय के पढ़े हुए थे और एक ही परिसर में काम करने आ गए थे . तो साब हम आ गए 44 रवीन्द्र निवास में . अब संसाधन मेरे थे और रोटी सब्जी तैयार करने की भूमिका बाकी दोनों की .

गौतम ने सब्जी का जिम्मा लिया और परनामी ने रोटी का . उस दिन सब्जी के नाम पर गाजर और मटर ही घर में उपलब्ध थे , आलू जैसा कोई पदार्थ घर में नहीं था इस बाबत दोनों ने मुझे धिक्कारा पर शाम पड़े अब क्या हो सकता था . वो इसी की सब्जी बनाने लगे .

उन दिनों डालडा नाम का बनस्पती घी घर में पाया जाता था , था घर में उपलब्ध , मुझे सब्जी में डालडा बरतने के सुझाव पर कंजूस घोषित करते हुए दोनों ने देशी घी में ही सब्जी बनाने का निर्णय लिया . सरसों के तेल का प्रस्ताव भी गिर गया . मेरा हर प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से गिरता रहा और सब्जी भी देशी घी में ही बनी आखिरकार .

देशी घी : उन दिनों देशी घी चौबीस रूपए का दो किलो आने लगा था और ठाकुर अभय सिंह जी मुझे वक्त जरूरत अपने घर या पड़ोस से ला दिया करते थे .

डब्बा भरा रखा था और यार लोग इसे बरतने को उद्यत थे .


सतपुड़ा के परांवठे :

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परनामी ने आटा लगाया और साधारण रोटी बनाने का विचार रद्द करते हुए सतपुड़ा के परांवठे बनाने का संकल्प व्यक्त किया जो ऐसे बने जैसे आज कल होटलों में लच्छा परांवठा मिलता है उसका बाप !

लोया रोटी की तरह बेल कर उसको घी से चुपड़ा गया . बीचों बीच से शुरू कर परिधि की और कुरचे से काटा गया और फिर इस तरह रोल किया गया कि बार बार घी लगाकर बेलने पर उसके सात परत बन गए और जब घी की सहायता से लोहे के तवे कर सेका गया तो सुन्दर परांवठा तैयार हुआ .

यही प्रक्रिया दोहराते हुए परनामी ने पर्याप्त मात्रा में सतपुड़ा के परांवठे बना डाले . 

उस दिन जो विशिष्ट परांवठे बनाना मैंने परनामी से उस दिन सीखा बाद में भाभी जी और जीवन संगिनी के सामने भी बनाकर मैंने प्रदर्शित किया पर उस रात यारों के साथ डिनर का आनंद तो कमाल ही रहा .


भोजन में कंपनी का बड़ा महत्त्व होता है ये बात उस दिन की आकस्मिक परिघटना से सिद्ध हुई थी .


आज की भोर में ले दे कर ये एक ही किस्सा लिखा जा सका . आगे ऐसे और किस्से आएंगे जिनमें और पात्र भी प्रकट होंगे .

प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित ,

(क्या करें टैम नहीं है .)

इति.

सुमन्त पंड्या ।

जयपुर .

25 मई 2015 .

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दिल्ली से पुनः प्रसारित और ब्लॉग पर प्रकाशित :

२५ मई २०१७ ।

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