Friday, 22 September 2017

पतरी पतरी पापरी ....: संध्या वंदन

संध्या  वंदन 🌷🌷
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#स्मृतियोंकेचलचित्र  #sumantpandya #जयपुरडायरी

आज जो बात बताने जा रहा हूं वो तो दुब्बी नामक एक छोटे से गांव के एक किसान की बरसों पहले कही बात है जो उसके सूक्ष्म निरीक्षण पर आधारित खरी बात थी  और किसी भी सुनने वाले को  मुस्कुरा देने को बाध्य कर देने जैसी बात  कहलाएगी आज भी . इस बात को बताने से पहले मुझे इस बात की  पृष्ठभूमि बतानी पड़ेगी सौ साल  पीछे  लौटकर . वही प्रयास करता हूं , बहुत सी बातें बताऊंग तब आप समझ पाएंगे उस भोले ग्रामीण की बात . इसमें मेरी , इसकी , उसकी  , सब की बात जुड़ेगी तब होगी बात साफ़ .
गए दिनों अपने अभिन्न  मित्र श्री गोविन्द राम  केजरीवाल को एक शाम मैंने टिप्पणी में कहा था कि अगली पोस्ट “ संध्या वंदन “ शीर्षक से ही होगी , उस वायदे का निर्वाह भी इस पोस्ट से हो जाएगा .
गए दिनों हम दिल्ली में थे  मैं घर  की बालकॉनी में खड़े खड़े सूर्यास्त का फोटो खींचकर  आपको भेजता और संध्या वंदन लिख देता  वो नई सभ्यता में गुड ईवनिंग कहने  का देशी चलन बनाया  , यहां गुलमोहर में आकर भी मैं सोशल मीडिया पर ,” अभी तो हम हैं “  ऐसा जताने को ऐसा कर देता हूं . पर सौ साल पहले जब हमारे घर में ये नई सभ्यता घुसी नहीं थी तब संध्या वंदन का एक विशिष्ट अभिप्राय था  वो था पूजा पाठ वैदिक ऋचाओं  का उच्चारण साथ में .
सम्प्रति पितृ पक्ष में इस प्रसंग को याद करके मैं  अपने पूर्वजों को भी याद करता हूं और उनकी जीवन शैली का भी अल्प उल्लेख आज करता हूं . देशी राज्यों का ज़माना था ये लोग अपने पांडित्य , ज्योतिष ज्ञान , आयुर्वेदिक चिकित्सा और ऐसे ही ब्राह्मणोचित लक्षणों के कारण जाने जाते थे . अतिराम जी के वंशज , मेरे पूर्वज  किस प्रकार  गुजरात से चलकर  राजस्थान आए वो कहानी  जैसी मैंने सुनी  वो अपने मिलने वालों को मैं यदा कदा सुनाया करता हूं  ,उस कथा के विस्तार में अभी मैं  नहीं जाऊंगा .
ये लोग अपना भोजन खुद तैयार करते थे और जैसा आज भी गुजरातियों की पतली पतली रोटी होती हैं  वैसी ही रोटी बनाते खाते थे . ऐसे ही एक पूर्वज के बारे में किस्सा है जो दुब्बी गांव गया था जो राज्य के द्वारा  अनुदान के रूप में उसे मिला था .

रोटी रोटी का फरक
******************   कृषक ग्रामीण की रोटी तो मोटी रोटी  होती है  और वो भी तब तो मोटे या  मिश्रित अनाज की  हुआ करती थी जिसे आप टिक्कड़ कह सकते हैं  . इसके विपरीत इस गुजराती मूल के व्यक्ति की रोटियां छोटी और  पतली पतली रही होंगी   जिनका उल्लेख आएगा ही अभी जब बात पूरी होने को आएगी . उस ग्रामीण ने इन महाराज की रोटियां भी देखीं और सायंकालीन गतिविधि भी देखी उसपर ही बात है .

  और अब संध्या वंदन 💐
------------------------       जब ये सज्जन , मेरे पूर्वज संध्या वंदन माने पूजा पाठ कर रहे थे तो उस प्रक्रिया के दौरान  विधान के अनुसार आचमन  की भी  क्रिया हुई . आचमन के अंतर्गत  उन्होंने एक आध चम्मच पानी भी मुंह में फेंका  और इस दृष्य को अपनी आंखों से देखकर वो भोला ग्रामीण  ठगा रह गया  . और फिर वो  जो बोला वो ही आज  इस किस्से का  मार्मिक वाक्य है  . ये एक मौलिक अभिवक्ति है जो इतिहास में दर्ज होने लायक है . कोई अनुवाद इस खूबसूरती से अभिव्यक्त शायद न कर पावे .
वो भोला कृषक बोला :

“ जब तो पतरी पतरी  पापरी न नै खाबे करो , खाबे करो  
अब चुच्ची न तै  पानी पी रो है . “ 😊

याने तब तो पतली पतली रोटियों को खाए गया  , खाए गया और अब चम्मचों से पानी पी रहा है .  याने इसने पानी के लिए भी जगह खाली न छोड़ी .

अब उस भोले किसान को संध्या वंदन और उसमें आचमन से क्या  लेना देना . वो जैसा समझा वैसा उसने कहा .

वे दिन और वे लोग ….
इति . 💐

संध्या वंदन 💐
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सुमन्त पंड्या .
@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .
गुरूवार 22 सितम्बर 2016 .

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ब्लॉग पर प्रकाशित
भिवाड़ी
22 सितंबर 2017 .

Monday, 28 August 2017

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी और दिल्ली डायरी का संस्मरण .

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी  .🌷🌷

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#sumantpandya #स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी

कभी कभी जीवन में ऐसा भी होता है कि व्यक्ति को निराशा घेर लेती है और ये निराशा यदि लंबी अवधि तक बनी रहे तो घातक भी हो सकती है . लेकिन … लेकिन ये योगायोग की बात है कि कुछ अलौकिक घटनाएं ऐसी होती हैं कि निराशा अचानक छूमंतर हो जाती है और जीवनी शक्ति लौट आती है . ऐसे अनुभव सब के जीवन के होते हैं , घटनाओं के प्रभाव हर व्यक्ति के लिए उसके स्वभाव और प्रकृति के अनुसार अलग अलग होते हैं / हो सकते हैं .

 मैं तो अपनी बात बताता हूं जो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन से याद आ रही है , कई दिन से बताने का मन था पर एक तो उपकरण और संचार तंत्र ने कुछ साथ नहीं दिया और दूसरे दिल्ली में दो पारिवारिक शिखर सम्मेलनों में व्यस्त रहा जिसके चलते ये पोस्ट नहीं बन पा रही थी . देखते हैं अगर आज ये बात कुछ हद तक पूरी हो जाती है तो फेसबुक पर अपलोड कर देवूंगा . फिर आएगा शिखर सम्मेलनों की गतिविधियों का विवरण जो अलग पोस्ट का कलेवर बनेगा , देखिएगा जरूर .


दो महत्वपूर्ण व्रत : 🌷🌷

मेरे घर में दो व्रत शायद पीढ़ियों से चले आ रहे हैं और महत्त्वपूर्ण हैं - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और शिवरात्रि जिनमें छोटे छोटे बच्चे भी यथा शक्ति सम्मिलित होते रहे , बिना किसी दबाव के , स्वेच्छा से .

कोई कठोर व्रत नहीं होते थे व्रत के बहुत उदार नियम होते थे इन की सीख मैं जैसे घर में बच्चों को देता वैसे ही अपनी विद्यार्थियों को भी देता और इसका बनस्थली परिसर में भी सर्वत्र निर्वाह होता . जहां तक मेरे घर की विरासत का सवाल है मेरे घर में वैष्णव भक्ति की परम्परा और मेरे ननिहाल में शिव भक्ति की चली आयी परंपरा से इसका सम्बन्ध रहा हो , उसकी तफसील में मुझे अभी नहीं जाना .

अब ये और और बातें बंद कर मैं मुद्दे की बात पर आवूं जो कहने का आज विचार बनाया है …


वर्ष 2003 ईस्वी .

------------------ अचानक ये पता लगा कि मेरा शरीर डायबिटीज की गिरफ्त में है और अब आगे से चिकित्सक की निगरानी में पथ्य और परहेज से रहना होगा . क्या खाया जाय क्या न खाया जाय ये भी डाक्टर और डाइटीशियन तय करने लगे . ये सब तो स्वाभाविक था पर इससे अधिक जो बताने लायक है वो ये कि मुझे दुःस्वप्न सताने लगे . मुझे अपने वो सब निकट रिश्तेदार याद आने लगे जो जीवन के अंत समय में या तो आंख की रौशनी गंवा बैठे थे या डाइबिटिक फुट के रोग के चलते एक एक पैर कटा बैठे थे .

ये केवल इस बात को बताने के लिए दोहरा रहा हूं कि जीवन में कैसी निराशा ने मुझे घेर लिया था और इसके कारण अपने कमिटमेंट भी पूरे करने में मैं आनाकानी करता था . भोजन में मिठास लुप्त हो गया था और यों भोजन में रुचि भी कम हो गई थी . ऐसे समय में उसी वर्ष गोकुल यात्रा ने मेरी सोच किस प्रकार बदल दी वही बताता हूं .


गोकुल यात्रा : निमित्त और अनुभूति 🌷

 --------------------------------------- इसे मैं एक सुखद संयोग ही कहूंगा कि हमारे साथी सुरेन्द्रपाल मिश्रा के बेटे प्रदीप का विवाह नियत हुआ था और बरात गोकुल जानी थी . मेरा विवाह में जाना पहले से तय था पर अब अपने बारे में नए रहस्योद्घाटन के बाद मैं साथ जाने में आनाकानी कर रहा था . मिश्रा जी मानने को कत्तई तैयार नहीं थे और आखिरकार साथ ले जाकर ही माने और इस प्रकार संभव हुई गोकुल यात्रा .

वैसे बृज प्रदेश की यात्रा मैंने पहले भी की थी अपने दोनों भाइयों के साथ पर इस बार साक्षात गोकुल पहुंचा था जो कृष्ण का गांव था और एक मांगलिक अवसर जिसमें अपने साथियों का साथ मिला था .

उस रात की बात याद करता हूं जब भोजन में अरुचि के चलते मैं जनवासे में अनमना सा लेटा था और सुरेन्द्र मिश्रा मेरी खोज खबर लेने आए थे , आखिर वो अपनी जिम्मेदारी पर मुझे साथ लिवा ले गए थे . वो वर के पिता थे , नेगचार के बीच भी समय निकाल कर आये थे मैंने कुछ नहीं खाया जानकर मुझे भवन के ऊपरी तल पर लिवा ले गए . वहां कढ़ाव में दूध ओट रहा था जो कुल्हड़ भर कर मुझे पीने को दिया गया . बगैर चीनी के भी गोकुल की गायों का दूध कितना स्वादिष्ट हो सकता था ये मैं उस रात ही जाना .

गोकुल की सडकों गलियों में मैं बारात के साथ भी घूमा और अगले दिन रवानगी के पहले भी . भवन , भित्तिचित्र , लोक व्यवहार और परस्पर अभिवादब में भी मैंने भगवान् श्रीकृष्ण को वहां लगातार उपस्थित पाया .

अधिक विस्तार में न जाकर मैं तो यही कहूंगा कि प्रदीप का विवाह और मिश्रा जी का साथ चलने का आग्रह निमित्त बन गए थे वास्तव में मेरा मन बदलने को मेरी सोच सकारात्मक बनाने को भगवान श्रीकृष्ण ने ही मुझे गोकुल बुलाया था उस बार .


मैं नहीं जानता कृष्ण इतिहास का विषय हैं या कवियों का घड़ा हुआ मिथक हैं पर गोकुल जाकर मैंने तो कृष्ण के रूप में एक वास्तविकता को अनुभव किया था .

बनस्थली के समय और साथियों को याद करते हुए ….

गोकुल यात्रा को याद करते हुए ..

सायंकालीन सभा स्थगित .।


संध्या वंदन 🌷

सुमन्त पंड्या 

सोमवार 29 अगस्त 2016 .

आज ये संस्मरण ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूं  .

भिवाड़ी   २९ अगस्त २०१७ .


Monday, 31 July 2017

बागळ कै बागळ पांवणी

"बागळ कै  बागळ पांवणी ,
एक डाळ कै तू भी लूम्ब जा ."   #फेसबुक      #बागळ  #sumantpandya

ये राजस्थानी की एक कहावत है जिसका अर्थ है कि चमगादड़ के यहां मेहमान आवे तो ये ही खातिर तवज्जो है कि पेड़ की एक डाली लटकने को उसे भी मिल जावे .

आएगा इसका स्पष्टीकरण कि ये कहावत क्योंकर याद आ गई .

एक और कहावत कि

हाजिर में हुज्जत नहीं,
गैर की तलाश नहीं .

अर्थात जो है वो सामने है और छिपाने को बाद में दिखाने को कुछ नहीं है अपने पास .
अब आवूं आज की बात पर .

कई एक मैत्री प्रस्ताव आते हैं . अब अगर प्रस्तावक जाना पहचाना है तो कोई बात ही नहीं है , तुरंत स्वीकार किए लेता हूं , आखिर फेसबुक पर रोज बरोज कुछ लिखता हूं इसी लिए तो कि बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचे . अभी मैत्री क्षेत्र इतना नहीं फैला है कि जगह ही खाली न हो .

कभी कभी अनजाने लोगों से प्रस्ताव  आते हैं तो पूछ बैठता हूं :

" कैसे पधारना हुआ ?"

" कोई ख़ास नहीं यों ही चैट करने के लिए ." ऐसा कुछ उत्तर मिलता है .

और तब मुझे कहना पड़ता है कि अन्यथा न लेवें , मेरे पास चैट करने के लिए समय नहीं है .
मुझे लगता है ये चैट का इच्छुक कुछ ऐसा है जो मुझे बातों में उलझाकर मेरी क्लास का उपलब्ध समय नष्ट कर डालना चाहता है . मेरे यहां कोई कालीन नहीं बिछे हुए हैं . जो कुछ है वो उस कहावत में है जहां से बात शुरु हुई .

अभी तो पढ़ना बाकी है :
------------------------- मेरे साथ ये होता आया है कि लगता है अभी तो कुछ पढ़ा ही नहीं फिर लिखूं कैसे ? पढने में समय निकल जावे लिखने को समय न बचे .
अब अधूरी तैयारी से लिखने लगा हूं तो यही सोचकर कि अब नहीं तो कब लिखूंगा और इसी लिए कमी रह जाती है , आप सुधारें मेरी बात जहां गुंजाइश हो .

अंत में एक रोचक संवाद :
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मैं डी बी साब के घर गया था , तब मुझे बनस्थली में पढ़ाते कई एक वर्ष हो गए थे , उधर , एक युवा साथी आए हुए थे जो शेखावाटी के किसी लड़कों के कालेज में नियुक्त हुए थे और वहां के अनुभव सुना रहे थे .

पढ़ने वाले लड़कों ने क्लास में कुछ शैतानी की होगी तो इनका प्रत्युत्तर   था :

" फड्या भी हूं और फैलवानी भी की है .( पढ़ा भी हूं और पहलवानी भी की है ) . ऐसे चाहो तो ऐसे आ जाओ , वैसे चाहो तो वैसे आ जाओ ."

कुछ एक दिनों से फेस बुक पर लोगों को बिला वजह ही बांहें चढ़ाते देख ये एक पुरानी बात याद हो आई जिसका मैंने उल्लेख किया .

बहर हाल मैं न तो इतना पढ़ा हूं न ही पहलवानी की है कभी , मैं तो जैसी बात होती है कहे देता हूं .
सुबह हो गई और प्रातःकालीन सभा अब स्थगित . 

इति.

सह अभिवादन : Manju Pandya.

सुमन्त पंड्या.
(Sumant Pandya.)
आशियाना आंगन, भिवाड़ी .
  1 अगस्त 2015 .
आज बलॉग पर
1 अगस्त को 2017 ।

Saturday, 15 July 2017

सफ़र के साथी श्याम जी की बाबत संस्मरण  : स्मृतियों के चलचित्र 

सफ़र के साथी : श्याम जी की बाबत :

______________परसों शाम जब शिमला से रवाना होकर सड़क मार्ग से चंडीगढ़ पहुंचे तो हमारे लिए इस यात्रा के मजबूत साथी थे श्याम जी जो हमारे लिए कितनी सावधानी से आड़े तिरछे रास्तों में ट्रवेरा नामका वाहन चलाकर सुरक्षित नीचे ले आए थे . जब वो हमें और हमारे सामान को उतार चुके तो अनुज ने कहा :

" पापा , इनकी फोटो खींचना चाहोगे आप ?"

मैंने तुरंत हां कहा . मुझे भी लग रहा था मानों किसी अपने से बिछड़ रहा हूं . मैंने तस्वीर ले लेने की अनुमति चाही तो श्याम जी ने अनुमति के साथ ही लगभग मेरी ही शैली में जवाब दिया :

" फोटो तो ले लो साहेब , और कुछ भी करना पर पुलिस में मत दे देना , अभी बेटियों की शादी बाकी है ."

मुझे लगातार ही उनका बात करने का अंदाज तो लुभा ही रहा था . यहां तो मेरा ," सपोर्ट फॉर द गर्ल चाइल्ड " का सतत विचार भी आ गया था .

मैं फोटो खींचने का प्रयास कर रहा था पर अस्त हो रहे सूरज की रौशनी दूसरी ओर से आ रही थी इस लिए मैं फोटो ठीक से खींच नहीं पा रहा था , आखिर दूसरी ओर जाकर अनुज ने ही खेंची ये फोटो .

जीवन संगिनी ने इस हड़बड़ी में भी फोटो लेने की अनुमति दे दी थी और वहां खड़े दूसरी मोटरों के ड्राइवर यह कहकर मजे ले रहे थे :

" हमने पहली बार देखा है कि सवारी उतर कर किसी ड्राइवर की फोटो लेवे ."

मैत्री का संक्षिप्त इतिहास :

__________________ कई एक बार तुरता फुरती में मोटर रुकवाई जो दो बच्चों को यात्रा में उबकाई , उल्टी की शिकायत से निबटने के लिए जरूरी हो गया था. बड़ी मादद की श्याम जी ने , हिम्मत बंधाते हुए उतार पर ले आए . एक मौके पर मैंने पूछा :

" आपका नाम क्या है ?"

मुझे ड्राइवर साब कहने के बजाय नाम बोलना ही अच्छा लगता है , इस लिए पूछा था , मैंने तो . पर उन्होंने कहा :

" नाम बताऊंगा भी और दिखाऊंगा भी , "

तुरंत ही उन्होंने अपने नाम का बैज निकाला जिस पर ' श्याम मोहन ' नाम और लाइसेंस नंबर लिखा था . ऐसे सप्रमाण बात रखने का अंदाज मुझे पसंद आया हालांकि मुझे तो केवल संबोधित करने को ही उनका नाम जानना था. पर वो बोले कि उनके लिए तो यह जरूरी है . ये प्रमाण साथ न हो तो पुलिस हजार रूपए का चालान वसूल लेवे .

थोड़ा आगे चलकर श्याम जी ने पूछा कि क्या चाय के लिए किसी स्थान पर रुका जाए . मैं उस समय उनके पास ही बैठा था पर निर्णय लेने में असमर्थ था क्योंकि आम राय ये थी कि अभी बच्चे सो रहे हैं न रुका जाय और थोड़ा और रास्ता तय हो जाय .

ऐसे में मैंने कहा :

" मैं चाय पीने के पक्ष में तो हूं पर अल्प मत में हूं इस लिए ये फैसला नहीं हो सकता ."

तब बोले श्याम जी :

" पर मैं भी तो चाय पीना चाहता हूं , मैं हूं न आपके साथ ."

और बन गई बात मैंने कह दिया :

" अरे फिर कहां दिक्कत है , जब स्टीयरिंग व्हील आपके हाथ में है . हम दोनों तो रुकेंगे ही चाय पीने को और जो कोई सहमत हो आए हमारे साथ ."

और इस प्रकार अल्प मत की बात सर्वानुमति में बदल गई . और इस प्रकार हुआ हमारा चाय के लिए ठहराव .

फिर तो वहां रुके भी , चिप्स की भी खरीद हो गई और बैठने की जगह का बदलाव भी हो गया सवारियों का . फिर हुआ पहाड़ी बंदरों का साक्षात्कार पर इस जगह वो पेड़ों पर चढ़े हुए ही देखे गए ....

लंबी बातचीत के चलते श्याम मोहन इतने अपने हो गए कि बिछुड़ते हुए मैं उनकी तस्वीर ले लेने का लोभ संवरण न कर पाया .

सुप्रभात .

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

समीक्षा :


सुमन्त

Sumant Pandya.

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

15 जून 2015 .


Friday, 14 July 2017

सांगानेर में किस्सागोई  

सांगानेर में किस्सागोई .

________________ ये पिछली शताब्दी के उन दिनों की बात है जब जयपुर सवाई माधोपुर रेलवे रूट पर छोटी लाइन थी और तदनुरूप ही गाड़ियां चला करती थीं . जयपुर स्टेशन पर कुछ स्थानाभाव के चलते बीकानेर एक्सप्रेस का सवाई माधोपुर तक विस्तार कर दिया गया था और वापसी में यह गाड़ी जब जयपुर लौटती तो सप्ताहान्त में जयपुर आने को हम लोग भी बनस्थली निवाई रेलवे स्टेशन पर ये गाड़ी पकड़ा करते थे . थोड़ा बहुत समय निवाई स्टेशन के बाहर बीतता , भंवर नाम का एक युवक मेरी निजी आवश्यकता को जानता था और मुझे अच्छे से पहचानता था . वो एक पान का बीड़ा लगाकर देता और मैं भी यार दोस्तों के साथ उस गाडी में सवार हो जाता . उसी गाड़ी में कई एक लोग सवाई माधोपुर जयपुर की दूरी रोजाना नापने वाले भी मिल जाते जिन का आधा सफ़र तय हो चुका होता , किस्सागोई के चलते उन लोगों से भी अपना याराना था उन दिनों तो . मैं तब तक ही चुप रहता जब तक भंवर का खिलाया बीड़ा मेरे मुंह में पिघल न जाता और फिर सवारियों से संवाद शुरु हो जाता . इस संवाद में धीरे धीरे सभी प्रकार के लोग भागीदार बनते .


एक बार की बात :

____________ सांगानेर जंक्शन पर बीकानेर एक्सप्रेस आकर खड़ी हो गई और चलने का नाम न लेवे . पता लगा इंजन फेल हो गया और अब गाडी आगे चलने में समय लगेगा . कुछ उत्साही लोग प्लेटफार्म पर उतर कर जानकारी भी ले आए पर समाचार कोई उत्साह जनक नहीं थे . रख रखाव की कमी के चलते छोटी लाइन के इंजनों की हालत ऐसी ही थी कि इस इंजन को तो लोको तक घसीटने की ही नौबत आ गई थी उस दिन .

सारा माजरा भांपकर कोई कोई लोग ट्रेन छोड़ कर सड़क मार्ग से कोई सवारी पकड़ने को उतर भी लिए थे . मैं उन में से नहीं था , एक तो मुझे वहां के भूगोल और सड़क मार्ग से दूरी का अंदाज था और दूसरे अन्य सह यात्रिओं का साथ था जिसे छोड़ने का मन नहीं था .

अब बीच बीच में सूचनाओं के रूप में होने वाले हस्तक्षेप को छोड़कर बाकी समय चर्चा के लिए उपलब्ध था . मैंने आदतन किस्सागोई शुरु की , कुछ लोग ख़ुशी से और कुछ मजबूरी में मुझे सुन रहे थे , कोई अन्य विकल्प न होने से अधिकांश लोग चर्चा में भागीदार बने और ये पता भी न चला कि कब रात के बारह बज गए और तारीख बदल गई .

उस दिन परिसंवाद का सांगानेर चैप्टर कुछ ऐसा रहा कि कई एक सहयात्री मुझे ऐसे जानने लगे कि वे आगे भी संपर्क में आए .

जयपुर पहुंचने में देर हुई , घर पर चिंता हुई ये सब तो ठीक पर जब जयपुर से गए दूसरे इंजन की मदद से गाड़ी जयपुर आई , यात्रा पूरी हुई तो मैंने तो इसे भारतीय रेल की और से अपने को मिला पुरस्कार ही माना वरना जीवन के विविध क्षेत्रों से आए इतने लोग एक साथ ऑडिएंस के रूप में मुझे कैसे मिलते .

उस दिन की किस्सागोई से मेरा जी बहुत हल्का हुआ था .

उन अच्छे दिनों को याद करते हुए .

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

इति .

सुप्रभात .

समीक्षा और समर्थन :


सुमन्त पंड्या

Sumant Pandya .

आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

16 जून 2015 .

ब्लॉग पर पुनः प्रकाशित 

१५ जुलाई २०१७ ।

Wednesday, 28 June 2017

अतरा मनख जीम्या ..अतरा मनख जीम्या ... अठी तो .....

अतरा मनख जीम्या , अतरा मनख जीम्या , अठी तो खेरो ही नी आयो …। 


(१)


किसी ज़माने की मधुबन , उदयपर की बात है वही बताता हूं और ये बात क्यों याद आई ये भी ।


दलाल सदन में किसी रात बड़ी भारी दावत हुई , बहुत सारे लोग आए और देर रात तक चली दावत ।

अगले दिन सुबह का परिदृष्य ये था कि रात हुई दावत के प्रमाण घर के अहाते में बिखरे पड़े थे और बराबर के घर के अहाते में खड़े बुज़ुर्गवार ये बड़बड़ाते हुए सुने गए थे :


“ अतरा मनख जीम्या , अतरा मनख जीम्या …. अठी तो खेरो ही नी आयो !”


वे शायद बीती रात की दावत में आमन्त्रित नहीं थे , शायद ये ही खिन्नता का कारण रहा हो । ख़ैर , जो भी रही हो बात , मुझे तो कहन याद आ गई वो ही दोहराई है ।


(२)


एक और कहन है गोस्वामी तुलसी दास की , वो इस प्रकार :


“ सकल पदारथ हैं जग मांही। करमहीन नर पावत नाहीं ।।”


बातें याद क्यों आयीं ? वही बताता हूं ।


जयपुर के जवाहर कलाकेंद्र स्थित इंडियन काफ़ी हाउस में गए हुए थे घर के सब लोग और सब के लिए विभिन्न भोज़्य पदार्थ उपलब्ध थे जो सब के सब मौज शौक़ से खा रहे थे पर मैं उन में से एक के लिए भी अधिकृत नहीं था । मेरे लिए तो घर से रोटियाँ ले जाईं गईं थी मैंने वो ही खाईं । ये सब स्वास्थ्य कारणों से परहेज़ बरतने के कारण , ख़ैर मेरा पेट भर गया , कोई ख़ास बात भी नहीं वैसे ।

ऊपर से सब ने मँगाकर शरबत भी पीया मेरे लिए तो वो भी निषिद्ध था ।

ले देकर हारे के हरिनाम एक काफी ही बच रही थी जो मैं पी सकता था पर वो भी तो आती सी आवे । जब सब लोग शरबत का पूरा पूरा मज़ा ले चुके तब उसके बाद आई काफ़ी जिसमें तो ख़ैर और लोग भी मेरे साथ शामिल हुए ।


काफ़ी का ऐतिहासिक और सम सामयिक महत्व 

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बनस्थली में सेवाकाल के अंतिम दशक से लगाकर गए दिनों यहां और अन्यत्र रहने के दौरान भी मेरी भोर में काफ़ी बनाकर पीने की आदत ही रही । “ प्राइवेट काफ़ी डन “ ये भोर की जगार की एक स्टेटस रहती आई है । कुछ तकनीकी कारणों से ये गतिविधि भी गए कुछ दिनों से स्थगित रही , ये भी एक बात है ।

जब भी इंडियन काफ़ी हाउस गया , चाहे विद्यार्थी जीवन नें चाहे बाद में , काफ़ी पीने का तो शौक़ रहा ही था ।

ऐसे में जब उस दिन काफ़ी का प्याला एक अंतराल के बाद सामने आया तो उसकी फ़ोटो ये कहते हुए अपलोड की थी कि इस बाबत इबारत बाद में लिखूंग़ा ।

ये हुई आज वो बक़ाया इबारत पूरी ।

सुप्रभात 

नमस्कार 

सुमन्त पंड़्या 

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर ।

गुरुवार २९ जून २०१७ ।

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Sunday, 25 June 2017

बोका की मां आवै ही छी ए  ..   : राजस्थानी बोध कथा :

राजस्थानी बोध कथा :


राजनीति में शिखर पुरुष की डेमोक्रेसी देखकर ही ये बोध कथा याद आई ।

क्या है बोधकथा ?

लीजिए ----


सासू मां का राज पाट तो पहले ही छिन गया था अब उनकी उपेक्षा भी होने लगी थी । खिन्न मनस्थिति में वो घर के बाहर चबूतरे पर जा बैठी और दिन भर बाट जोहती रही कि कोई न कोई तो उनकी सुध लेगा , उन्हें मनाने आएगा ।

दिन बीत गया , कोई न आया अब अंदर वापिस भी कैसे जाएं ?

जब कोई उपाय न सूझा तो घर की बकरी , जो जंगल से चर कर लौट आ रही थी , उसके सींग में अपना पल्लू फंसाकर कुछ इस तरह बुद बुदाती हुई घर में घुसी :


" बोका की मां मैं तो आवै ही छी ए , पण म्हारो मान कौनै ! "


ऐसा लग रहा था मानो बकरी उन्हें मनाकर घर के अंदर ला रही है ।

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नमस्कार ।

संध्या वंदन ।

इसे मेरी नान पॉलिटिकल पोस्ट के रूप में स्वीकार कीजिए ।


गुलमोहर , जयपुर ।

शनिवार २४ जून २०१७ ।


ब्लॉग पर प्रकाशित 

जयपुर 

२६ जून २०१७ ।

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