Tuesday, 28 November 2017

लप्रेक : राजस्थान विश्वविद्यालय - एक भूली बिसरी याद .

विश्वविद्यालय में वो दिन............ #लप्रेक साझा Manju Pandya


आज एक पुराना प्रसंग याद हो आया , मैं राजस्थान विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग में पढ़ रहा था , जिस विशेष ग्रुप का मैंने वरण किया था वह था गवर्नमेंट एंड पॉलिटिक्स । इस ग्रुप का एक पेपर था " गवर्नमेंट एण्ड पॉलिटिक्स ऑफ़ साउथ एशिया " , मिस जेकब ये पेपर पढ़ातीं थीं । कक्षा की संरचना कुछ ऐसी थी कि नौ लडकियां साथ पढ़ती थीं , मैडम पढ़ाने वाली थीं , लड़का प्रजाति का मैं गरीब अकेला था । डिपार्टमेन्ट के भूगोल में रत्नानी बाबू के दफ्तर के कमरे के अंदर से जाकर पीछे एक कमरा था ,उसमे क्लास होती थी । उस दिन मुझे क्या पता था ,कि आगे जाकर मैं एक लड़कियों की शिक्षा के लिए बनी संस्था से ही जुडूंगा ।  

      

उस दिन की बात पर आवूं , मैडम अपनी फिएट कार बाहर खड़ी कर क्लास में चली गयीं , उन्हें जाते हुए मैंने देख लिया , मैडम ने भी मुझे बाहर खड़े देख ही लिया होगा जहां मैं और लड़कों के साथ बातों में मशगूल था ये लडके दूसरे ग्रुप और विषय समूहों के थे जिनसे परिसर की गतिविधियों से जुड़ी एक पत्रिका के संपादक मंडल में होने के नाते मैं जुड़ा हुआ था । नौ की नौ लड़कियां क्लास में पहुंच गयीं , मैडम अपनी सीट पर पहुंच गईं पर मैं नहीँ पहुंचा । यहां मेरी बाते ही पूरी नहीं हो के दे रहीं थीं । उधर मैडम क्लास शुरू नहीं कर रही थीं और मुझे बुलाने को बार बार किसी न किसी लड़की को भेज रही थीं । मैडम बुला रही हैं , मैडम बुला रही हैं , ऐसा मुझे बार बार सुनने को मिला । शायद मैडम का भी वहीँ हिन्दुस्तानी सोच था कि लड़की का तो क्या है , जो होना है हो ही जाएगा , लड़का कुछ पढ़ लिख जाएगा तो कमा खायेगा । जैसे अदालत पहली बार सम्मन भेजती है दूसरी बार वारेंट और तीसरी बार में गिरफ्तारी वारेंट भेज देती है , मैडम ने भी मुझे बुला भेजा था । मुझे उनके सामने जाकर बैठना पड़ा । मैं गया और छात्रा समूह के साथ बैठ गया । तब जो संवाद शुरु हुआ वह कहता हूँ :


~ क्लास में आने का विचार नहीं था तुम्हारा ...?


*जी मैडम ...एन आर एस सी जाना चाहता था......चाय पीने ।


~ तो फिर गए क्यों नहीं , ... यहां क्यों आये ?


* जी मैडम कोई साथ देने वाला नहीं था ... और फिर आपने बुलाया था तो मुझे आना पड़ा ।


~ अब चले जाओ ..... इनमें से किसी को साथ ले जाओ ।


     अजीब सी असमंजस की स्थिति थी मेरे लिए , मुझे बुलाया भी और जाने को भी कह दिया पर मैडम के

चहरे पर कोई नाराजगी भी नहीं दीख रही थी । मैं अनायास कह बैठा :


* तो फिर मैडम जैतून @ को भेज दीजिये ।

         (@बदला हुआ नाम )


जैतून और मैडम की निगाहें मिली , और मैडम ने कहा :


~ जाओ ।


     लड़की उठ खड़ी हुई और हम दोनों चाय पीने चले गए । बाकी बची आठ लडकियां और मैडम ,उस दिन इसके बाद क्लास में हमारे जाने के बाद क्या हुआ या क्या हुआ होगा यह हमारी चिंता का विषय नहीं था । दो मुख्य पात्रों को तो मैडम बाहर भेज देने को स्वयं वचनबद्ध थीं ।


मैं समझ रहा था कि बात हो गई ....आई गई हो गई पर नहीं बातें तो चलती रहती हैं । शायद उसी दिन शाम किसी विशेष निमित्त से आयोजित सभा में विभाग के

  थियेटर में एक पर्ची हाथों हाथ घूम रही थी :


There wil be a party tomorrow at N R S C to commemorate the increasing friendship between so & so & so & so ..........


 वो प्रस्तावित पार्टी तो परवान नहीं चढ़ पायी , पर हां उस दिन मेरे रुपये दो रुपये जरूर से खर्च हो गए थे जब चाय पीने गया था ।

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आज ये कहानी   ( लप्रेक )  भी ब्लॉग पर प्रकाशित .

जयपुर 

बुधवार  २९ नवम्बर २०१७ .

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अच्छे दिनों की सौग़ात : भिवाड़ी डायरी - क़तारबद्ध देश .

ये गए बरस की बात है —

अच्छे दिनों की सौगात लेने को कतारबद्ध है सारा देश .


उधर ट्रॉल्स हैं कि पिले पड़े हैं , कह रहे हैं आम जन का आत्मविश्वास लौटेगा . इत्ते दिन तो हो गए कैसे लौटेगा ' आत्म विशवास ' ?


ऐसे भब्भड़ में सीनियर सिटीजन अपनी मट्टी कुटवाए ?


आशियाना से सुप्रभात  🌹 नमस्कार 🙏 .

आप जाणो देश तो बदल ही रहा है .


तरकीब से बताऊं : 

ये लोग सुबह से सत्यनारायण की कथा का प्रसाद लेने को खड़े हुए हैं . देखें कुछ जुगत बण जाय .

पट जब खुलेंगे तब खुलेंगे !


- सुमन्त पंड्या .

  मंगलवार 29 नवम्बर 2016 .

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व्यथा कथा आज ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

बुधवार २९ नवम्बर २०१७ .

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Monday, 27 November 2017

देबू जी महाराज की जय  :  बनस्थली डायरी .

कल दोपहर शिवाड़ एरिया में .......बनस्थलीडायरी के अंतर्गत समाविष्ट चर्चा  .


आजकल राम स्वरूप जी एक वैन में सब्जी बेचने इधर आते हैं , उणियारा के मूल निवासी राम स्वरूप जी घर बैठे जरूरत की सब्जी और फल दे जाते हैं मेरे घर के बाहर भी आकर रुकते हैं , सब्जी भी ले लेता हूं इतनी देर में दो बात भी होती है । परसों कुछ ऐसा हुआ कि मैं किसी काम से बाहर चला गया , जीवन संगिनी नहाने चली गयी और राम स्वरूप जी ’ सब्जीईईईई ." की आवाज लगाकर चले गए । कल भी जीवन संगिनी लगभग उसी समय बाजार चली गयी जब उनका आना हुआ । सारा दारोमदार मुझपर ही था । कहीं आज भी मेरी गैर हाजिरी न लग जाए इसलिए मैं थोड़ा सतर्क रहा ।


  राम स्वरूप जी बाबत और भी बताता चलूं , वे बातें यही कह देना ठीक रहेगा । वे पहले घोड़ा गाड़ी लेकर आते थे । घोड़ों से मेरा लगाव मेरे बनस्थली के सेवाकाल से रहा है , जो कई एक प्रसंगों में मेरी याद में आ ही जाता है । @ भगवान देव नारायण उनके देवता हैं । देबूजी महाराज का मंदिर मेरे सेवा क्षेत्र के निकट ही है । बहरहाल उणियारा और बनस्थली एक ही जिले के भाग हैं । 

     जब राम स्वरूप जी घोड़ा गाड़ी लेकर आते तो यहां होने पर श्रद्धा की बेटी उर्वी घोड़े पर जरूर बैठती । उस पर बैठकर फ़ोटो भी खिंचवाती । ये बदलाव तब आया जब उनका घोड़ा मर गया । अब तो मैं भी देबू जी के स्थान और घुड़सवारी मैदान वाले परिसर से थोड़ा दूर आ बसा हूँ ।


   कल की बात पर लौटूं । राम स्वरूप जी की आवाज दो मकानों की दूरी पर खड़े विद्या अपार्टमेंट्स के बाहर से कुछ बुलंद स्वर में  

 ऐसी सुनाई दी मानों वो गुलमोहर * के बाहर ही आ गए हैं । आवाज सुनकर मैं बाहर चला आया । लेकिन राम स्वरूप जी तो वो ही दो मकान की दूरी पर थे , याने विद्या अपार्टमेंट्स के बाहर । मैं यहां खड़ा न रहकर वहां तक चला गया । गलती शायद वहीँ कर बैठा , दो प्रकार से 1 झोला मेरे पास नहीं था जो एक ऐसा उपकरण है जो मेरे कंधे पर लटक जाता है और मेरा काम काज का बांया हाथ खाली रहता है । 2 मैं वहां तक गया ही क्यों , जबकि राम स्वरूप जी तो यहीं आने वाले थे । पर होनी को कौन टाल सकता है , बलवान होनहार मुझे वहां ले गयी ।

~ बाबूजी यहां तक क्यों आये , मैं तो वहीँ आ रहा था । वे बोले ।

~ कल मैं घर नहीं था , ऐसा न हो कि आप सीधे निकल जाओ मैं बोला ।


~खैर , अब यहीं सही ।


          गोभी, मटर जैसी निरापद सब्जियां थोड़ी तादाद में ले ली गईं । संतरा , सेव और अमरूद भी ले लिए गए । आदतन धनिया भी उन्होंने डाल दिया । मेरी आवश्यकता न होते हुए मिर्ची भी डाल दी । छोटी बड़ी दो थैलियां उन्होंने मुझे पकड़ा दीं । बहुत भारी सामान होता तो वे कमलेश को भेज देते या मेरे घर के बाहर से निकलते हुए उतार जाते पर उन्होंने मुझे वहां से सुरक्षित रवाना कर दिया और मैं इधर आने को चल दिया । अपने सब्जी खरीद अभियान की सफलता से मन ही मन प्रसन्न मैं विद्या अपरमेंट्स की ओर से गुलमोहर की दिशा में चला आ रहा था कि एक अप्रत्याशित परिघटना हुई जिसकी मुझे दूर दूर तक आशंका नहीं थी ।


   रामेश्वरम ( किक्की भाई साब का आवास ) के बाहर तक आते आते न जाने कैसे एक काली मोटी गाय का निशाना मैं बन गया । गाय की हमारे घर में अम्मा के जमाने से पूजा होती आई है , जीवन संगिनी आज भी गाय की पूजा करती है पर गौ माता एक बार बनस्थली में आक्रामक होकर उनकी ओर ऐसी बढ़ी थी कि उन्हें धराशायी करके ही वापस लौटी थी । मैं पहुंचा पर बचा नहीं पाया , मुझे बहुत आत्मग्लानि भी हुई थी कि इनकी तो रक्षा का मैंने शुक्ल जी के सामने वचन दिया था , उस वचन का क्या हुआ ? गाय थी कि मुझपर झपट रही थी । इधर शिवाड़ एरिया में दो जमाने साथ साथ चल रहे हैं । कुछ पचास साठ साल पहले से रह रहे लोग अभी भी कई कई गायें पालते हैं और दुग्ध व्यवसाय करते हैं । ये लोग गायों को दिन में खुला छोड़ देते हैं , उन्हीं में से किसी की ये गाय रही होगी । आसन्न संकट को भांपकर मैंने दोनों थैलियों सहित दोनों हाथ विश्राम की मुद्रा में पीछे की ओर किये तो गौ माता मेरी परिक्रमा करने लगी । अब मैं चक्कर लगाने लगा , लगा कि या तो मैं चककर आने से गिर पडूंगा या ये गौ माता मुझे वैसे ही धराशाई कर के मानेगी जैसे उस दिन इसकी बहन जीवन संगिनी को बनस्थली में धराशाई कर गई थी । उस दिन इनकी रक्षा मैं न कर पाया था , शायद इसी का दंड मुझे मिलने जा रहा है ।


परिवेश का विवरण और परिदृश्य :  

     जब गौ माता की गिरफ्त में ही आ गया तो मैं इस दृष्टि से चारों ओर झांका कि आपात सहायता कहां से मिल सकती है ? राम स्वरूप जी और उनके सहायक कमलेश को तो मैं इतना पीछे छोड़ आया था कि वो दोनों या उनमें कोई एक भी मौक़ा ए वारदात तक पहुंच ही नहीं सकता था । सामने यादव जी के घर के बाहर कई एक लड़कियां खड़ी खड़ी बातें कर रही थीं , जिनमें से कुछ की निगाह इधर भी थी । वे मेरी दुर्दशा की गवाह तो थीं पर मेरी कोई सहायता कर सकेंगी ऐसा मुझे नहीं लगा । यादव जी के घर में केवल लड़कियों के लिए छात्रावास जैसा है । इसी कारण यह लड़कियों का एक छोटा समूह वहां था । इतने में मैं क्या देखता हूँ कि एक मोटर साइकिल पर सवार लड़का भी वहां किसी प्रतीक्षा में खड़ा है । मरता क्या न करता , मैंने उसी से सहायता चाही :


           अरे मोटर साइकिल वाले लडके आ और मुझे गाय से बचा ।


  लड़का परिस्थिति को भांपकर मेरी आवाज सुनकर ही इधर मुड़ा था वरना तो वो दूसरी तरफ देख रहा था और परिस्थिति से पूरी तरह अनभिज्ञ था । लडके ने बैठे बैठे ही अपनी सवारी मोटर साइकिल की दिशा बदली और पलटकर आगे बढ़कर मोटर साइकिल को गाय की ओर बढ़ाने का उपक्रम करते मेरे और गाय के बीच जगह बना ली । मय अपनी सवारी के यह लड़का मेरी सुरक्षा के लिए ऐसे खड़ा हो गया जैसे मैं किसी दुर्ग में खड़ा हूं । मैं अपनी सुरक्षा के लिए आश्वस्त होकर गुलमोहर * की रैम्प तक सुरक्षित आ गया । फाटक खोल कर अंदर आ गया । हाथ खाली कर मैं उस लडके का आभार व्यक्त करने को दरवाजे के बाहर फिर गया , पर तब तक वो जा चुका था ।


    मैं तो यही कहूं कि साक्षात् भगवान देव नारायण आये आज के ज़माने के इस मशीनी घोड़े पर सवार होकर और उस घड़ी मेरे सुरक्षा प्रहरी बन गए ।


* मेरा जयपुर आवास ।


इति प्रातःकालीन सभा के लिए ।


शुभ प्रभात


Good morning !


नोट : ये मरखनी गाय की कहानी और भी पहले से मेरे जीवन में आई हुई है जिस पर अलग से पोस्ट लिखूंगा । आज इतना ही समय मिल पाया कि कल का तात्कालिक अनुभव ही लिखा । समयाभाव के चलते रही कमी के लिए क्षमा प्रार्थी हूं ।#Debuji_maharaj.


28 नवम्बर 2015 

--------------------- विगत वर्ष की इस पोस्ट को साझा करने की गरज से फिर से जारी करने का प्रयास कर रहा हूं .


अपडेट :

आशियाना 28 नवम्बर 2016 .


बोलो :

देबू जी महाराज की जय 👍

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आज के लिए ये पोस्ट ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर  

मंगलवार  २८ नवम्बर २०१७ .

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Sunday, 26 November 2017

बोर नहीं होते आप ?

“ बोर नहीं होते आप ?”

“ आपका मन कैसे लग जाता है ? “

“ दिनभर क्या करते रहते हो ?”


ये कुछ ऐसे स्टीरियोटाइप सवाल हैं जो सेवाकाल समाप्त होने के समय से लोग मुझसे पूछते रहे हैं . पूछें साब , कोई हर्ज नहीं इसी बहाने मुझे आत्माभिव्यक्ति का अवसर मिलता है . पूछे जाने पर कोई आपत्ति नहीं 

दो एक दिन पहले एक देवी जी ने ऐसे क़ई एक सवाल अपनी आत्मकथा \ आत्मव्यथा कहते कहते बीच में मुझसे फिर से पूछ लिए तो उनका मन रखने को थोड़ी देर के लिए मैं बोला पर अभी भी बहुत कुछ कहना बाक़ी रह गया , सोचा इसी मुद्दे पर गुड मॉर्निंग पोस्ट बणा देवूं .


तो अब मेरी सुनिए और अपनी कहिए :

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सिलसिलेवार जवाब .

१.

मेरा बोर होने का स्वभाव नहीं है . मेरी सोहबत में बोर होने के रोग से ग्रसित लोग भी प्रायः ख़ुश हो जाते हैं .

२.

वैसे तो मन बच्चों के साथ लगता है ये सच बात है . साल भर में आधा समय बच्चों के साथ ही बीतता है . इसके अलावा भी मन लग जाता है . कभी कहता हूं हम दो हैं , कभी कहता हूं हम छह हैं . अपने वय के लोग ढूँढ ही लेता हूं जहाँ भी जाता हूं . 

थोड़ी बहुत देश की चिंता जरूर है उस निमित्त लोक शिक्षण का काम करता हूं .

मन लग जाता है .

३.

दिन भर में घर बैठकर करने के , बाहर जाकर करने के हज़ार काम होते हैं . 

कभी अपनी एक दिन की दिनचर्या पर पूरी इबारत लिखूंग़ा तो ये बात बहुत अच्छे से स्पष्ट होवेगी .


आज के लिए चलताऊ पोस्ट तैयार हो गई . बस इतना कहकर विराम लूँ कि कोई मुझे फ़ालतू न समझे .


नमस्कार .🙏


गुलमोहर कैम्प , जयपुर .

सोमवार २७ नवम्बर २०१७ .

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ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

२७ नवम्बर २०१७ .

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Saturday, 25 November 2017

पोरंपरा  - मर्दाना धोती की बात - भाग तीन : बनस्थली डायरी .

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        #बनस्थलीडायरी #पोरम्परा: मर्दाना धोती की बात ~ भाग तीन .

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       बनस्थली का दीक्षांत समारोह : साझा Banasthali Pariwar


           ये सारा का सारा मर्दाना धोती प्रसंग बनस्थली विद्यापीठ के प्रतिवर्ष होने वाले दीक्षांत समारोह से जुड़ गया और इसे पोरम्परा का नाम दिया सेठ जी ने आज प्रयास करूंगा कि इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई ये बताऊं .

दीक्षांत समारोह की तैयारी :

----------------------------- जब अस्सी के दशक में विद्यापीठ को विश्वविद्यालय का दर्जा मिला और प्रतिवर्ष उपाधि वितरण के लिए दीक्षांत समारोह आयोजित किए जाने लगे तो डिग्री लेने वाली छात्राओं के लिए ड्रेस कोड भी निर्धारित किया गया . अलग अलग संकाय के लिए समान बॉर्डर वाली साड़ियां तैयार करवाई गईं और आगे चलकर एक सुन्दर दृष्य उत्पन्न हुआ प्रतिवर्ष आयोजित ऐसे समारोह में . यहां एक नुक्ता बचा हुआ था . उसी की बात बताऊंगा .


उन दिनों तिवारी जी ( श्री विद्याधर तिवारी ) विद्यापीठ में प्रिंसीपल की भूमिका से रिटायर होने के बाद विद्या मंदिर में ओ एस डी के रूप में कार्यरत थे और एकेडेमिक सेक्शन का काम भी देखते थे . मुझे याद आता है है कि हम में से कुछ लोगों ने उनके सामने ये प्रश्न उठाया था कि और सब कोई डिग्री लेने वाली तो लड़कियां - महिलाएं ही होंगी और साड़ी / जनाना धोती का ड्रैस कोड उनके लिए उचित होगा पर पी एच डी डिग्री पाने वाला तो कोई पुरुष दीक्षार्थी भी होवेगा उस के लिए साडी का ड्रैस कोड कैसे अनुकूल होगा . तिवारी जी ने हमारा सुझाव मानते हुए एक दुप्पट्टे / उत्तरीय का ड्रैस कोड इस कटेगरी के लिए निर्धारित कर दिया और शेष पोशाक का प्रश्न खुला रहा . कुल बात ये कि पी एच डी का दीक्षार्थी एक ख़ास दुपट्टा लगा कर मंच पर डिग्री लेने आएगा .


और वो दिन आ गया :

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मेरी जानकारी के अनुसार बनस्थली विद्यापीठ के विश्वविद्यालय बनने के बाद पहले पी एच डी के पुरुष दीक्षार्थी शिक्षा संकाय ( एज्यूकेशन फैकेल्टी ) के श्री गोपीनाथ शर्मा थे . समारोह के दिन उन्हें दुपट्टा मिल गया और वो एकेमेडेमिक सेक्शन के डिप्टी रजिस्ट्रार भंवर लाल जी से पूछने गए कि और वस्त्र क्या धारण कर के आवें . भंवर लाल जी ने जो तजवीज बताई उसी से एक परम्परा का श्री गणेश हो गया . भंवर लाल जी बोले :

“ धोती कुर्ता पहन कर आइए , उसी के साथ दुपट्टे का मेल बढ़िया रहेगा .”


पंडित जी ने भंवर लाल जी की बात मान ली . धोती , कुर्ता और दुपट्टा धारण कर उपाधि लेने गए और समारोह की शोभा बढ़ाई


अब तो यह निर्धारित हो गया कि पुरुष पी एच डी दीक्षार्थी का ड्रैस कोड होगा ~ धोती , कुर्ता और दुपट्टा . पंडित जी के पास ये पहनावा उपलब्ध था और उनके लिए सहज था . उन्होंने पहना और डिग्री हासिल की .

एक परम्परा की स्थापना यहीं से हो गई .


संयोग से अगले समारोह में शिक्षा संकाय के ही मेरे अभिन्न मित्र श्री विनोद जोशी को पी एच डी की डिग्री मिलने वाली थी और समारोह की पूर्व संध्या को वो मेरे पास आए थे . तब से मैं इस समारोह के पुरुष वस्त्र विन्यास से कुछ ऐसा जुड़ा मानो धोती पहनाना मेरा ही परमाधिकार हो . कई एक विभूतियां 44 रवीन्द्र निवास में आईं जिनमें से कुछ एक का मैं विशेष नामोल्लेख करना चाहूंगा .

आम तौर पर कुर्ते तो सब कोई के पास होते हैं पर धोती हर कोई के पास नहीं होती इसी लिए जोशी जी मुझसे धोती लेने आए थे उस दिन तो .

अपनी कहूं तो उन दिनों मेरी अवस्था के लोगों में परिसर में धोती कुर्ता पहनने वालों में मेरी भी पहचान थी . और बड़ी अवस्था के लोगों में तो धोती का चलन था पर मेरी पीढ़ी में तो नहीं के बराबर था .

 मैंने अपना धोतियों का संग्रह जोशी जी के सामने ला दिया और वे अपनी पसंद की धोती ले गए . अगले दिन समारोह से पहले जोशी जी 44 रवीन्द्र निवास में ही धोती पहनने आए तो पता लगा कि उनको घर ले जाकर धोती को फिर से धोना सुखाना और प्रेस करना पड़ा क्योंकि धोती में नील लगी होने के कारण कुर्ता धोती का रंग आपस में मेल नहीं खा रहा था . उन दिनों मैं औरों की देखा देखी सफ़ेद सूती खादी के कपड़ों में रॉबिन लिक्विड नील का प्रयोग किया करता था . खैर ये तो एक इतर बात थी जो मुझे यों ही याद रही . ख़ास बात ये कि उस दिन जोशी जी 44 रवीन्द्र निवास से ही तैयार होकर डिग्री लेने गए , धोती उन्हें मैंने ही पहनाई .


इस बार से यह स्थापित हो गया कि पी एच डी का दीक्षार्थी यदि कोई पुरुष है तो समारोह के लिए उसे धोती मैं ही पहनाता हूं .


अगली बार एक समारोह के दिन गणित विभाग के सोमानी जी रवीन्द्र निवास में हमारे घर की ओर आते हुए दिखाई दिए . सोमानी वैसे तो बनस्थली से कहीं बाहर चले गए थे , मेरा उनसे परिचय जब यहां काम करते थे तब का था पर कभी घर नहीं आए थे . उस दिन उन के हाथ में एक मर्दाना धोती देख कर सहज प्रश्न किया :


“ क्यों सोमानी जी , पी एच डी की डिग्री मिलने वाली है ?”

उन्होंने स्वीकृति में सर हिलाया और मैं बोला :

“ वाह , बहुत खुशी की बात , आ जाओ आप को तैयार कर देते हैं .”


शाम को हमारे पड़ोस के नवाल जी ने बताया कि उनके संपर्क में आए थे सोमानी जी , लेखानुभाग में एस ओ थे नवाल जी अतः उनको सब कोई लोग जानते ही थे . और उन्होंने ही बताया कि वो मेरे घर की दिशा इंगित कर बोले थे :

“ उनके पास जाइए , वो पहनाएंगे आप को धोती .”


सच कहूं उन दिनों 44 रवीन्द्र निवास किसी रूप में ग्रीन रूम से कम नहीं लगता था जहां से रेसिपिएंट्स ऑफ डिग्री बन संवर कर जाया करते थे .

जो और कुछ बातें याद आ गईं तो वो भी बताऊंगा वरना यों तो बात हो ही गई है लगभग पूरी .

पिछली शताब्दी के इष्ट मित्रों को याद करते हुए ..

सायंकालीन सभा स्थगित .

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शुभ संध्या .

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सुमन्त पंड्या 


लेखन अनुमति : Manju Pandya


@आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

26 नवम्बर 2015 .

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आज दो बरस बाद ये संस्मरण ब्लॉग पर प्रकाशित और चर्चा के लिए प्रसारित .

जयपुर

रविवार २६ नवम्बर २०१७ .

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Friday, 24 November 2017

बोध कथा :  “ होयली तो अब “

बोध कथा : " ....होयली तो अब ! "

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भिवाड़ी से नमस्कार 🙏🌻


आज एक राजस्थानी बोध कथा का उल्लेख करता हूं और इसकी व्याख्या के अधिकार सार्वजनिक करता हूं , वैसे भी किसी लोक कथा पर मैं कौनसा एकाधिकार जता सकता हूं .


मैं एकाधिकारवादी सोच का अनुयायी नहीं हूं , आप तो जानते ही हैं .


कथा प्रारम्भ :

********* कथा एक तांत्रिक की है जो श्मशान में जाकर जाने क्या क्या विचित्र साधना किया करता था और उसकी स्त्री इन सब गतिविधियों से दुखी रहा करती थी जो बड़ी स्वाभाविक सी बात है .


यहां तक तो बात बड़ी तार्किक है , ऐसे विचित्र लोग होते हैं और ऐसे में दुखियारी स्त्रियां होती हैं , समझ में आने वाली बात है .


तर्क से न समझ में आने वाली बात आगे आएगी वही बताने का प्रयास करता हूं .


क्या हुआ आगे ?

----------------- एक दिन तांत्रिक को श्मशान में एक खोपड़ी मिली जिसके भाल - कपाल पर ये अंकित था :


      " हुई तो कांई छै होयली तो अब ! "

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( अर्थात् अभी तो क्या हुआ है , होगा तो अब )


वैसे तो हिन्दू अंतिम संस्कार में खोपड़ी की कपाल क्रिया कर ही देते हैं , खोपड़ी साबुत बचती ही नहीं . आश्चर्य था कि खोपड़ी साबुत थी . पर ऐसा भी खैर हो सकता है .


तांत्रिक को कौतुक हुआ कि अब आगे की होनहार क्या है ? और इसी कौतुहल के चलते वो तांत्रिक उस खोपड़ी को अपने साथ घर ले आया और एक ऊंचे आले पर रख दिया .


ऐसे जोड़े में गृह कलह तो स्वाभाविक है . आदमी तंतर - मंतर करता हो तो औरत कैसे सुखी रहेगी भला ?


एक दिन की बात : क्लाइमैक्स ऑफ द स्टोरी 💐

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औरत घर की कुछ साफ़ सफाई कर रही थी और उसी दौरान उसे ऊंचे आले पर रखी वो खोपड़ी मिल गई . अब उसका भी क्रोध जागृत हो गया . उसके क्रोध की वजह साफ़ थी कि अब तक तो ये आदमी श्मशान में जाकर ही तंत्र साधना किया करता था , अब जब उसने ये खोपड़ी घर ला रखी है तो वो अवश्य ही घर की स्त्री पर कोई तंत्र आजमाएगा .


क्यों आजमाए वो घर की स्त्री पर तंत्र ?


उस स्त्री ने अपने ढंग से आसन्न संकट का समाधान कर दिया .

उसने इमाम दस्ते से कूट पीट कर उस खोपड़ी का चूरा कर दिया और उसे तारत में फेंक आयी .

बिधना के लेख को कौन टाल पाया है .😢


राजस्थानी बोध कथा के लोकार्पण के साथ ही  

प्रातःकालीन सभा स्थगित .....


नोट : कुछ डिस्क्लेमर जोड़े जाने हैं जो अगले संशोधन में जोडूँग .


- सुमन्त पंड्या .

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

    शुक्रवार 25 नवम्बर 2016 .

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गए बरस भिवाड़ी में थे तब लिखी थी ये राजस्थानी बोध कथा . आज इसका ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण किए देता हूं .

जयपुर 

शनिवार २५ नवम्बर २०१७ .

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Thursday, 23 November 2017

उत्तरवर्ती थान कथा - भाग दो  : बनस्थली डायरी *

साझा Banasthali Pariwar & others .~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ #बनस्थलीडायरी उत्तरवर्ती थान कथा : भाग दो .

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 इस कथा के भाग एक में मैंने बताया था कि पप्पू की मार्फ़त मुझे दूसरी बार जुलाहे का बनाया देशी रेजी का थान मिला , मैंने सरगम गारमेंट्स वाले राजू और रामू की मदद से इस बार सफारी सूट बनवाया और इस प्रकार नए थान का श्री गणेश हुआ . इसी सफारी को पहनकर मैं महिमा के स्कूल में मुख्य अतिथि की भूमिका निभा आया . अभी इस थान से एक प्रीमियर प्रोडक्ट बनना बाकी था जो भी तैयार हुआ और उसकी कहानी भी सुनाने लायक है .


  सरगम गारमेंट्स के बारे में :

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 जब तक मैं बनस्थली में सेवारत रहा राजू और रामू मेरे लिए अनुकूल खादी के वस्त्र सिलवा दिया करते थे . नाप जोख का काम ये दोनों भाई या इनमें से कोई एक करता और बेहतरीन सिलाई इनके कारीगर कर देते .

ये मेरे सेवाकाल के अंतिम दौर की बात है . मेरे उधर से चले आने के बाद अब तो उन्होंने सिलाई का काम लेना बंद ही कर दिया और अब सिले सिलाए कपड़े ही बेचना शुरु कर दिया . पर मैं जब तक बनस्थली में रहा इन दोनों का बड़ा सहारा रहा . मेरे लिए तो वो कहो जो काम ओढ़ लेते वो भी बताऊंगा पर आगे वरना तो उस प्रीमियम प्रोडक्ट की बात छूट जाएगी जो आज के लिए लक्षित है .


प्रीमियाम प्रोडक्ट : ठंडी जवाहर जाकट :

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बड़ी कारीगरी से इन भाइयों ने मुझे जवाहर जाकेट तैयार करवाकर दी .

इसी तर्ज पर कुछ समय पहले पप्पू राष्ट्रपति कलाम को जाकेट तैयार कर पहना चुका था और देशी उत्पाद की सराहना पा चुका था .

मैं तो इन दो भाइयों को थान देकर आ गया था और कह आया था :

“ किसी आते जाते के साथ जाकेट भिजवा देना , जब भी तैयार होकर आवे .”

गणित वाले पांडे जी भी सरगम के ग्राहक थे , एक मंगलवार की शाम वो निवाई से आए और मुझे फोन किया कि मेरे लिए निवाई से कोई चीज लाए हैं . मैं उनके घर गया . उन्होंने मुझे पूरब दिशा की और मुखातिब होने को कहा और एक पोशाकी की तरह जाकेट पहनाई . फिर तो मैं ये वस्त्र धारण कर ख़ुशी ख़ुशी घर आया 44 रवीन्द्र निवास .

इस सन्दर्भ में एक बात और याद आती है , जब सरगम गारमेंट्स वालों ने नई नई दूकान खोली थी तो एक छुट्टी के दिन कुलश्रेष्ठ जी ने मुझे उस दूकान के पट्टे पर खड़ा किया और दोनों भाइयों से कहा :

   “ सर का एक अच्छा सा जोड़ सिल दीजिए आप को बनस्थली के बहुतेरे ग्राहक मिल जाएंगे .”

और सचमुच हुआ भी ऐसा ही कुछ .

अभी थान भी बहुतेरा बच गया था और इस वस्त्र की लोकप्रियता भी अभी और परवान चढ़नी थी पर वो आगे बता पावूंगा …  

ये प्रीमियम प्रोडक्ट तो मेरी देशी वारड्रोब का हिस्सा बन गया था .

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

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सुमन्त पंड्या .

सहयोग और आग्रह : Manju Pandya

   @ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

    24 नवम्बर 2015 .

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दो बरस पहले भिवाड़ी में लिखी थी ये पोस्ट और आप सबने बहुत सराहना की थी , आज इसे फिर से संचित ब्लॉग पोस्ट बनाया है . आप सब का बहुत आभारी हूं और ब्लॉग पोस्ट का लिंक फ़ेसबुक पर जोड़ने का प्रयास कर रहा हूं .


जयपुर 

शुक्रवार २४ नवम्बर २०१७ .

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