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Monday, 5 November 2018

Nostalgia : How innocent !

Nostalgia - How innocent !


पुरानी बातें याद आ जाती हैं ।बाते छोटी छोटी हैं पर बताने का मन करता है तो सोचा साझा कर दूं ।

हम लोग उदयपुर में थे । ओझा साब काकाजी ( हमारे पिता जी ) के विभाग में थे और जब आते तो भूपालपुरा में हमारे घर आकर ठहरते । पुराने जयपुर में सब लोग सब लोगों को जानते थे । ओझा साब के साथ बाई जी, उनकी जीवन संगिनी भी आतीं । बाई जी काकाजी के मित्र नारायण जी ज्योतिषी की बेटी थीं । 

    ओझा साब कई कई दिन तक आडिट पार्टी के मुखिया के रूप में जनजातीय क्षेत्र में रह कर आते । वहां के अनुभव बताते । एक दौर पूरा होता तो उदयपुर आते ।उदयपुर उनका मुख्यालय था ।


एक भोला ग्रामीण उन्हें दूध लाकर देता । वे सेर भर दूध लेते । कभी दूध सेर होता कभी सेर से कम । यह उसके पास दूध की उपलब्धता पर निर्भर था । अंत में हिसाब के समय वह चाहता कि पूरा एक सेर प्रतिदिन के हिसाब से ही उसे भुगतान मिले । उसका तर्क होता :


डोबो दूध न दे तो मूं कांई करूं ? पया तो लूं हीज । अर्थात् पशु दूध न दे तो मैं क्या कर सकता हूं ? पैसे तो लूंगा ही ।

और इस सादगी पर ओझा साब निहाल हो जाते ।


उदयपुर डायरी का ये संस्मरण जब मैंने पहली बार बताया तो प्रियंकर पालीवाल जो बोले वो मुझे बहुत अच्छा लगा , वो बोले :

" सही बात ! अब जानवर को तो कुछ नहीं कह सकते पर आदमी को तो समझाया जा सकता है . भले और भोलेपन के अपने तर्क होते हैं . और भले लोग ही इन तर्कों को समझ सकते हैं . अच्छा लगा यह प्रसंग ."


Friday, 27 July 2018

घोड़े बेचकर सोया : उदयपुर डायरी .

घोड़े बेचकर सोया ?


  बड़ा सीधा सा कार्य कारण सिद्धांत है , रात देर से सोया सुबह देर से उठा और ऐसे सुबह पोस्ट लिखने का समय बीत गया .

अभी एक दोस्त को बताया है जो चिंता कर रहे थे कि नित्य नियम में क्या बाधा आ गई . उन्हें बताया कि सब ठीक है .

फिर जीवन संगिनी से पूछा कि कोई आइडिया देवें , जो प्रसंग उन्होंने सुझाया उसी पर आ रहा हूं .

एक बार बनस्थली में घोड़े बेचकर सोया वो बात तो एक पोस्ट में बता ही चुका हूं ऐसा ही एक और प्रसंग बताए देता हूं . पहले कुछ फुटकर बातें फिर मुख्य बात जो आज बताने की है .

चौधरी के भाई के विवाह में बरात में गया था . वहां निकासी के दौरान दुल्हन के चाचा मुझसे बोले :


" बरात के साथ पंडित जी तो आप ही हो ?"

 वो भी सही बोले जब वो लगन लेकर आए थे तो लगन मैंने ही झिलाया था . 

उनको तो मैं क्या बोला अब याद नहीं मगर सावधान जरूर हो गया कि अब ये तो मुझे रात भर जगाने का मीजान बना रहे हैं . मैंने किया ये कि डिनर के फ़ौरन बाद उस गहमा गहमी को छोड़ छत पर जाकर सो गया और मेरी नींद तो अगले दिन सुबह तभी खुली जब वर वधू ने आकर मेरे पांव छुए . 


मैं तो अपने विवाह में भी रात भर नहीं जागा था तो मैंने वहां भी अपना टाइम टेबिल ठीक ही रक्खा. पर हमेश ऐसे नहीं हो पाता वो ही आगे बताता हूं . अपने विवाह में क्यों रात भर नहीं जागा वो तो बात ऐसी थी कि तब इस प्रकार के समारोह दो दिन चला करते थे . बीच की रात लोकाचार स्थगित हो जाया करते थे .

 आज कल दोनों ही प्रकार के प्रतिमान देखे जाते हैं उन पर अभी मैं कोई टीका नहीं कर रहा .

1984 की बात .

     जीजी के बेटे सुधीर का विवाह था उदयपुर में. दिसंबर का महीना था. सभी स्वजन इकठ्ठा हुए थे . आस पास ही वर पक्ष और वधू पक्ष के आवास थे . आस पास परिचितों के घरों में मेहमानों के ठहरने का इंतजाम था . मामा सम्प्रदाय के लिए किसी स्वजन का पूरा खाली मकान जीजी जीजाजी ने उपलब्ध कराया था जहां हम लोग ठहरे हुए थे .

अपवाद रूप में उस दिन मैं विवाह की रात को रात भर जागा आखिर जीजी के घर का एक मांगलिक कार्य होने जा रहा था .


पिछली सारी रात तो जागा ही था अगले दिन सुबह भी देर तक समारोह की विभिन्न गतिविधियां चल रही थीं . ठहरने के स्थान से सब लोग नहा धो कर तैयार होकर जीजी के घर अभ्युदय पहुंचने लगे . आखिर में मैं बच गया जिसे तैयार होकर जाना था . इस डेरे के सब लोग जब चले गए तो मैं अकेला था . मैंने आदत के मुताबिक़ पहले हजामत बनाई और फिर नहाया . चूंकि घर में अकेला था इसलिए सब ओर के दरवाजे मैंने बंद कर लिए और ये विचार कर के लेट गया कि पांच मिनिट को आराम करता हूं और फिर चलता हूं , फिर अभ्युदय पहुंच कर भोजन करूंगा . बस वहीँ गड़बड़ हो गई , मेरी आंख लग गई . कितनी देर हो गई मुझे कुछ पता नहीं .

उधर क्या हुआ ?

---------------- भोजन के लिए जब मैं नहीं पहुंचा तो मेरी ढूंढ मची . जीवन संगिनी सबसे पहले आईं और यहां आकर उन्होंने घंटी बजाई और बहुतेरा दरवाजा खटखटाया पर नतीजा कुछ न निकला . जब आधा घंटा बीत गया तो वो बाहर बैठकर रोने लगीं . उधर से और लोग भी आने लगे और ये चिंता का विषय बन गया . सारा माजरा भांप कर विनोद ने घर के चारों ओर चक्कर लगाया और ये तय किया कि सबसे कमजोर दरवाजा कौनसा है . पीछे का दरवाजा कुछ ढीला लगा वहीँ प्रहार किया और सांकल तोड़ दी .

विनोद ने तो आकर मुझे उठाकर बैठा ही कर दिया और मुझे बात ही समझ नहीं आ रही थी . मैंने तो यही पूछा:


" तुम अंदर कैसे आए ? मैं तो दरवाजा बंद करके आया था. "


मुझे अंदाज ही नहीं था कि इस बीच क्या कुछ हो गया और कितना समय हो गया . तब तक तो फिर खुद जीजी भी वहां आ गई और जीवन संगिनी की भी जान में जान आई .

जीजी ने आकर सब जानकर पूछा कि दरवाजा तो नहीं टूटा ? आखिर उन्होंने किसी परिचित का मकान मांग कर लिया था . और विनोद ने कहा:


" आप को दरवाजे की पड़ी है यहां तो ......."

नोट:

ये पोस्ट दिन में बनाना शुरु किया था , किश्तों में समय निकाल निकाल कर लिखते फिर रात हो गई . अब स्थगित करता हूं रात्रि कालीन सभा .

शुभ रात्रि.

सुझाव : Manju Pandya


आशियाना  आँगन, भिवाड़ी .

29 जुलाई 2015.

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण    जुलाई  २०१८.


Wednesday, 8 November 2017

लंबरदार स्कूल की याद — भाग पांच — उदयपुरडायरी 

लम्बरदार स्कूल की याद : भाग पांच ~ प्रधान मंत्री की विदाई . ..#लम्बरदार_स्कूल_की_याद

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विगत अक्टूबर माह में मैंने सत्र 1962 -63 की अपनी स्कूली शिक्षा के संस्मरणों पर आधारित पोस्ट लिखना प्रारम्भ किया था . केवल मोटा मोटी कुछ बातें ही बताई थीं चार कड़ियों के अंतर्गत और फिर वो क्रम छूट गया था . दीपावली आते आते घरेलू व्यस्तताएं बहुत बढ़ गई थीं और पुराने काल खंड के बारे में सोचने का समय ही नहीं था .


   इस प्रसंग में बहुत सी छोटी छोटी बातें हैं बताने लायक , दिखाने लायक . उस बाबत बहुत सी सामग्री मेरे तीर्थ ( मेरे जन्म स्थान , पैतृक आवास ) में रखी है . अगली तीर्थ यात्रा के बाद वो भी यहां फेसबुक पर जोड़ूंगा , आप को दिखाऊंगा , अभी यहां भिवाड़ी में बैठे एक प्रसंग के बारे में सोच पा रहा हूं और वो ही बताने जा रहा हूं .


अगला सत्र :

~~~~~~~ अगला सत्र उन्नीस सौ तिरेसठ चोंसठ प्रारम्भ हो गया , नए सत्र में संसद और मंत्रिमंडल का नए सिरे से चुनाव होता इस से पहले ही एक नई परिस्थिति उत्पन्न हो गई जिसके चलते मेरा स्कूल छोड़ना लाजमी हो गया अन्यथा मेरे रहते प्रधान मंत्री पद का कोई अन्य दावेदार नहीं था .

स्कूल प्रशासन में शीर्ष पर भी महत्वपूर्ण बदलाव ये हुआ था कि श्री गोपाल लाल शर्मा , हैड मास्टर साहब का तबादला हो गया था उनका विदाई समारोह आयोजित करने का जिम्मा मैंने ही निभाया था . नए हैड मास्टर साहब श्री बी पी जोशी आए थे , जिन्हें उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उसी वर्ष राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला था . जोशी जी की भी पुराने हैड मास्टर साब की तरह मुझपर वैसी ही छत्र छाया थी .


काकाजी ( हमारे पिताजी ) का ट्रांसफर अजमेर का हो गया . परिवार को अजमेर जाना था और इस लिए मेरे टी सी के लिए स्कूल में आवेदन दिया गया . ये बात मेरे लिए सुखद नहीं थी और न ही सुखद थी मेरे अध्यापकों और साथियों के लिए . हैड मास्टर साहब को अध्यापकों और साथियों की ओर से ये सुझाव मिला कि प्रधान मंत्री की विदाई पार्टी आयोजित होनी चाहिए और उसे उन्होंने मान लिया .

आखिर जिस दिन मुझे परिवार के साथ अजमेर जाना था उसके पहले दिन उधर काकाजी अपने ट्रेजरी ऑफिस विदाई पार्टी के लिए गए और मैं अपने स्कूल गया विदा होने . 

मेरे समझ कितनी थी इसका अनुमान आज मैं स्वयं लगा सकता हूं . विदाई पार्टी में मेरे एक अध्यापक एक मुहावरा बोले थे और मैंने घर आकर उसका अर्थ अपने घर वालों से पूछा था . मुहावरा था,” होनहार बिरवान के होत चीकने पात .” अब आप भी अनुमान लगा लीजिए .

बहरहाल मुझे साथियों ने और अध्यापकों ने भाव विभोर कर दिया था . इतनी मालाओं से मुझे लाद दिया था कि अगर उस दिन स्कूल सायकल न ले गया होता तो घर भी कैसे लेकर आता . मेरे घर वाले सब ये देखकर चकित थे कि जितनी मालाएं ट्रेजरी से लौटने पर काकाजी की सायकल के हैंडिल पर टंगी थी लगभग उतनी ही मालाएं स्कूल से लौटने पर मेरे साथ थीं .

 मेरा स्कूल छूटने के साथ ही प्रधान मंत्री के रूप में कार्यकाल भी समाप्त हो गया था . वो एक ऐसा शैक्षिक सत्र रहा जिसके दौरान मैं एक एक कर तीन शहरों के तीन स्कूलों में पढ़ने गया था .

पहले अजमेर और उसके कुछ महीनों बाद जयपुर पहुंचने के बाद भी लम्बरदार स्कूल के छात्र साथियों से मेरा पत्र व्यवहार और संपर्क रहा .

मेरे ही मंत्रिमंडल का एक साथी नेमुद्दीन मेरे बाद प्रधान मंत्री बना ये भी एक साथी ने मुझे पत्र में लिखा था .

अभी हाल के लिए बचपन के उन सुनहरे दिनों को याद करते हुए 

प्रातःकालीन सभा स्थगित ….

सुप्रभात .

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सुमन्त पंड्या  

सह अभिवादन Manju Pandya


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@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी

   1 दिसंबर 2015.


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आज का अपडेट : बुधवार 9 नवम्बर 2016 .


गए बरस इस संस्मरण की जो पांच कड़ियां मैंने लिखी थी उनमें ये आखिरी कड़ी है . चर्चा में तारतम्य बना रहे इस नाते आज इसे फिर से प्रकाश में लाने का प्रयास कर रहा हूं .

और बहुत कुछ है बचपन के उन दिनों के बारे में बताए जाने लायक पर उसके लिए अलग पोस्ट ही बनेगी .


सुप्रभात  🌹


सुमन्त पंड्या 

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

  बुधवार 9 नवम्बर 2016 .


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लंबरदार स्कूल विषयक इस संस्मरण की पाँचवीं कड़ी आज ब्लॉग पर प्रकाशित -

जयपुर 

गुरुवार  ९ नवम्बर  २०१७ .

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Tuesday, 7 November 2017

लंबरदार स्कूल की याद - भाग चार -  उदयपुर डायरी 

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#लम्बरदार_स्कूल_की_याद : भाग चार .

------------------------------------------ पिछली तीन पोस्ट में बात यहां तक पहुंची थी कि मैं उदयपुर के लम्बरदार हायर सैकेण्डरी स्कूल का प्रधान मंत्री चुन लिया गया . तीसरी पोस्ट के अंत में मैं यह कह बैठा था कि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी था और कि ‘ पिक्चर अभी बाकी है ….’ आज उसी बात को आगे बढ़ाने का प्रयास करता हूं .


वैधानिक प्रावधान ~

~~~~~~~~~~~ मैं प्रधान मंत्री तो चुन लिया गया , साथ ही विधान में ये भी प्रावधान था कि प्रधान मंत्री पद के लिए चुनाव हारने वाले उम्मीदवार को विरोधी दल के नेता का दर्जा दिया जाएगा .

प्रावधान के अनुसार ये अवसर जॉन फ्रांसिस को मिलना चाहिए था चाहे उसे एक ही वोट मिला हो . आखिर वो प्रधान मंत्री पद के लिए चुनाव हारा था . इस प्रसंग में हैड मास्टर साब ने ये फैसला किया कि हमारे स्कूल में कोई विरोध की राजनीति नहीं होगी इस लिए कोई विरोधी दल का नेता भी नहीं होगा . 

हां , जॉन फ्रांसिस ने चुनाव लड़ा था और इस लिए इस सर्वानुमति की राजनीति में उसे भी कोई पद अवश्य मिलना चाहिए . सोहन लाल जी माट साब ने हैड माट साब की ये इच्छा मुझ तक पहुंचाई कि जैसा विधान में प्रावधान था, एक संसदीय सचिव की नियुक्ति होनी थी , प्रधान मंत्री पद ग्रहण करने के बाद इस पद पर नियुक्ति के लिए मैं फ्रांसिस के नाम की सिफारिश कर दूं . ऐसा ही हुआ और पदेन अध्यक्ष के नाते हैड माट साब ने जॉन फ्रांसिस को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया . सर्वानुमति और वैचारिक मामलों में समन्वय की सीख मुझे वहीँ से मिली .

अब जो कुछ विरोध था वो मंत्रिमंडल में ही समाहित था , उसकी गूंज संसद तक नहीं पहुंच रही थी , संसद के समक्ष पूरा मंत्रिमंडल एकजुट था .

इस प्रकार सत्र उन्नीस सौ बासठ - तिरेसठ के दौरान लम्बरदार स्कूल की तमाम मंचीय गतिविधियों में मैं लिप्त रहा. धूम धाम से वार्षिकोत्सव मना. 

पारस्परिक सहयोग कैसे आयोजन को सफल बनाता है इसका एक उदाहरण याद आता है . मैं चिंतित था कि शहर भर में वार्षिकोत्सव के निमन्त्रण पत्र बटेंगे कैसे . सोहन लाल जी माट साब ने इसका सहज समाधान कर दिया . वे पते लिखे हुए निमंत्रण पत्र प्रत्येक विद्यार्थी को पांच -पांच सौंपने लगे इस निर्देश के साथ कि पता लिखे स्थान पर पहुंचा कर आवें और इस प्रकार शहर भर में निमंत्रण पत्र सहज बंट गए .


इस सन्दर्भ और उस समय के बारे में बहुत कुछ कहना अभी भी बाकी है पर प्रातःकालीन सभा के लिए उपलब्ध समय सीमा समाप्त हो रही है .

क्षमा प्रार्थना के साथ प्रातःकालीन सभा स्थगित ..

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सुप्रभात .

सहज अनुमति और समीक्षा: Manju Pandya

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सुमन्त पंड्या.

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर . जयपुर .

12 नवम्बर 2015 .


अपडेट आज का : 8 नवम्बर 2016 .

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आज इस संस्मरण की चौथी कड़ी फिर से प्रकाश में लाने का प्रयास है जिससे क्रम बना रहे .

#स्मृतियोंकेचलचित्र #उदयपुरडायरी #sumantpandya


सुमन्त पंड्या 

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

मंगलवार 8 नवम्बर 2016 .


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आज संस्मरण की चौथी कड़ी ब्लॉग पर प्रकाशित  —

बुधवार  ८  नवम्बर  २०१७ .

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Monday, 6 November 2017

लंबरदार स्कूल की याद — भाग तीन — उदयपुर डायरी .

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   #लम्बरदार_स्कूल_की_याद : भाग तीन 

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विगत दो कड़ियों में मैंने उदयपुर के ऐतिहासिक लम्बरदार स्कूल में अपने अनुभवों पर आधारित संस्मरणों को अंकित किया है जिनमें मुख्य रूप से ये बात आई कि हैड मास्टर साब ने पहले तो मुझे कमजोर देखकर फिर से नवें दर्जे में दाखिल करवाने की बात कही पर फिर वो मान गए . और दूसरे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर मुझे बोलता हुआ देख सुनकर वो बहुत खुश हुए . उन्होंने मुझे स्टेज से उतरते हुए रोका और मेरी पीठ पर हाथ रख दिया . मानों मुझसे वो कह रहे हों कि इस स्कूल में रहते बार बार मुझे स्टेज पर ही देखना चाहते हैं . आगे के घटनाक्रम ने स्पष्ट किया कि हैड माट साब ने उस दिन क्या कुछ सोच लिया होगा ….

“ मंच अधिग्रहण “ ये जुमला मैंने तब ही सीखा था और गाहे ब गाहे ये तब से मेरी आदतों में शुमार हो गया .


अगले दिनों का घटनाक्रम :

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शिक्षा निदेशालय से स्कूलों में छात्र संघ के लिए नया विधान बनकर आया था और उसके अनुसार वैस्टमिन्स्टर मॉडल को अपनाया गया था . इस विधान के अंतर्गत प्रधानाध्यापक पदेन अध्यक्ष और अन्य छात्र प्रतिनिधि चुने जाने थे .

देश में उस समय जवाहरलाल नेहरू प्रधान मंत्री थे और शायद डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद का कार्यकाल पूरा हो गया था तथा डाक्टर राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने थे . इसी प्रणाली की सीख विद्यार्थियों को दी जानी थी . इंग्लैण्ड में जैसे राष्ट्राध्यक्ष निर्वाचित नहीं होता वैसे ही प्रधानाध्यापक जी को ये दर्जा पदेन दिया गया था . कक्षा प्रतिनिधियों और मंत्रिमण्डल का निर्वाचन होना था . अनुशासन बना रहे इस नाते अध्यक्ष पद प्रधानाध्यापक को दिया गया था . सब बातों की एक बात ये कि निर्वाचित छात्र संघ / छात्र संसद में सब से चमकदार पद प्रधान मंत्री का था .


जिस से मैं चकित हुआ :

~~~~~~~~~~~~~~~ छात्र संघ के चुनावों के बारे में मैंने नोटिस बोर्ड पर नोटिस तो देखा था पर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया था . मेरी कोई निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी . ऐसी महत्वाकांक्षा न तब थी और न आज दिन तक कोई है . पर हालात मुझे ठाला बैठने नहीं दे रहे थे .


एक दिन सोहन लाल जी माट साब , जो हमें नागरिक शास्त्र पढ़ाया करते थे और छात्र संघ का भी काम देखते थे , मुझे अलग बुलाकर ले गए और ये बोले कि हैड मास्टर साब मुझे प्रधान मंत्री पद पर देखना चाहते हैं . इस पर मैंने अपनी अनिच्छा यह कहकर जताई कि मैं अभी स्कूल में नया नया हूं और कोई चुनाव लड़ने का इच्छुक इसलिए नहीं हूं कि मुझे जानने वाले छात्र भी अधिक नहीं हैं . पर हैड माट साब की इच्छा , जो सोहन लाल जी माट साब के माध्यम से ही व्यक्त हुई थी , के समक्ष मुझे झुकना पड़ा . मैंने नामांकन पत्र पर अपनी ओर से सहमति के हस्ताक्षर कर दिए .

आगे मुझे तो ये भी पता नहीं था कि मेरा प्रस्तावक कौन बना और कौन बना समर्थक .

मेरा यह अभिमत कि मेरी कोई ज्यादा जान पहचान भी नहीं है तिस पर माट साब का कहना था ,” उस दिन बोले थे न तुम , तुम को सब जानते हैं .”

मैंने अपनी ओर से माट साब को यह स्पष्ट कर दिया था कि मैं किसी से वोट मांगने नहीं जाऊंगा , कोई चुनाव प्रचार नहीं करूंगा .

इस सब के बावजूद जो परिणाम आया वो था आश्चर्यजनक .


आगे का हाल ~

~~~~~~~~ आखिर छात्रप्रतिनिधियों ने मंत्रिमंडल चुनने के लिए मतदान किया और मतगणना हुई . मैं भी मतगणना के समय उपस्थित रहने को बुलाया गया . 

जहां तक प्रधान मंत्री पद का सवाल था एक नामांकन पत्र और दाखिल हुआ था और वो था मेरी ही क्लास के , लेकिन स्कूल के पुराने छात्र , जॉन फ्रांसिस का . मत गणना के परिणाम आश्चर्यजनक थे .

निर्वाचक मंडल के कुल पच्चीस में से चौबीस वोट मुझे मिले और एक वोट मिला जॉन फ्रांसिस को .

मैं निर्वाचित घोषित कर दिया गया . 

यह पदभार मुझे मिला पर अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी था .

  पिक्चर अभी भी बाकी है ……

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प्रातःकालीन सभा स्थगित.. 

सुप्रभात.

सहयोग : Manju Pandya

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सुमन्त पंड्या

@आशियाना आंगन , भिवाड़ी


#स्मृतियोंकेचलचित्र #उदयपुरडायरी #sumantpandya


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  7 नवम्बर 2015 

संस्मरण की तीसरी कड़ी आज ब्लॉग पर प्रकाशित —

जयपुर 

मंगलवार  ७ नवम्बर २०१७ .

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Sunday, 5 November 2017

लम्बरदार स्कूल की याद -- भाग दो -- उदयपुर डायरी .

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#लम्बरदार_स्कूल_की_याद : भाग दो .


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कल मैंने अपने स्कूल की यादों का सिलसिला शुरु किया था , आज इसे आगे बढ़ाता हूं .

दाखिले की पृष्ठभूमि :


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काकाजी * का ट्रान्सफर  उदयपुर का हो गया था , वो उदयपुर के ट्रेजरी ऑफिसर बनाए गए थे . जीजी जीजाजी और उनके दो बच्चे पहले से ही उदयपुर में थे . बीते सत्र में हम तीन भाई अम्मा के साथ जयपुर में रहकर पढ़ रहे थे , बदले हालात में पूरे परिवार के उदयपुर में जा बसने का निर्णय लिया गया . इसी क्रम में मेरी पांती में उदयपुर का लम्बरदार हायर सैकेण्डरी स्कूल आया दाखिले के लिए , आखिर पढ़ाई तो आगे जारी रहनी ही थी . छोटा भाई पड़ोस के मिडिल स्कूल में भर्ती करवाया गया और बड़े भाई कालेज में .


काकाजी दफ्तर में व्यस्त थे और इसलिए जीजाजी मुझे स्कूल में भर्ती करवाने गए थे . उस समय जीजाजी एम बी कॉलेज में प्राध्यापक थे और जीजी मीरां गर्ल्स कॉलेज में .

लम्बरदार स्कूल की बात :


---------------------------  यह स्कूल हाई स्कूल से हायर सैकेंडरी स्कूल बनाया जा रहा था . नए कोर्स के हिसाब से तीन वर्ष के हायर सैकेंडरी कोर्स की दसवीं कक्षा के लिए मेरा प्रवेश आवेदन पत्र था जो हैड माट साब के विचाराधीन था .

दो प्रकार की दसवीं क्लास .


----------------------------- दसवीं क्लास के भी कई सैक्शन थे उनमें वो भी थे जो पिछली मैट्रिक परीक्षा में फेल विद्यार्थी थे और पुराने पाठ्यक्रम से ही फिर पढ़ाई कर रहे थे . इनमें कुछ एक बहुत अच्छे खिलाड़ी भी थे और वो भी स्कूल के लिए कीमती थे . उनका डील डोल ही हैड माट साब के ध्यान में था और इसलिए वो मुझे एक कमजोर लड़का मान रहे थे .

कैसे माने हैड माट साब ..


~~~~~~~~~~~~~~  जब हैड माट साब ने मुझे फिर से नवें दर्जे में भर्ती करवाने की बात की तो जीजाजी ने एडमिशन फॉर्म के साथ नत्थी नवें दर्जे की मार्कलिस्ट को उनके सामने रखा जिसमे प्रथम श्रेणी , कक्षा में पहला स्थान और अधिकांश विषयों में विशेष योग्यता का उल्लेख था .


आखिर हैड माट साब मान गए और मेरा दाखिला हो गया . मैं अपनी पढ़ाई में लग गया . मेरी ज्यादा  कोई जान पहचान नहीं थी मैं स्कूल में नया नया था , लेकिन तभी एक अवसर आया , ऐसा आया कि लोग मुझे जानने लगे . क्या था  वो अवसर वही  बताने जा रहा हूं . ये केवल तब की बात नहीं है ये तो अब की भी बात है कि कोई कारण बन जाता है ऐसा कि अनायास बहुत से लोगों से जान पहचान हो जाती है .

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी .


-------------------- ये ही कोई अगस्त का महीना रहा होगा . भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को  लम्बरदार स्कूल में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाने वाला था और मैं भी उसमें भाग लेने के लिए घर से  निकला था और यह विचार करता जा रहा था कि इस उत्सव में मेरी भागीदारी क्या हो .


हम लोग तब भूपालपुरा में बाबूजी बोहत लाल धाकड़ के मकान में किराए पर रहा करते थे , वहां से चेटक सर्किल के पास स्कूल पहुंचने के लिए मीरां  गर्ल्स कालेज याने रेजीडेन्सी के अहाते से होकर भी सीधा रास्ता जाता था ,मेरा  मन किया और मैं उसी रास्ते से गया . इसी परिसर के अहाते में स्टाफ क्वार्टर भी थे जिनमें जीजी जीजाजी रहा करते थे  . स्कूल जाते हुए मैं उनके पास पहुंचा और ये इच्छा प्रगट की कि मैं स्कूल के इस आयोजन में एक भाषण देवूं .


सुबब सुबह का समय था , जीजी जीजाजी दोनों ही मुझे भाषण के लिए  बिंदु बताने लगे और विभिन्न सुझाव देने लगे . श्री कृष्ण की बाल लीला, उनका सखा रूप , उनकी रास लीला और अलौकिक प्रेम , उनका दार्शनिक रूप , उनका राजनीतिज्ञ रूप इन सब के उदाहरण भी बताए और इस प्रकार भाषण की रूपरेखा सुझा दी दोनों ने मिलकर .


पूरा भाषण लिखने बांचने का तो समय नहीं था लेकिन बातें मुझे कहने लायक समझ में आ गई थीं . मैं स्कूल चला गया और उत्सव में भाषण देने के लिए अपना नाम दर्ज करवा दिया .

उत्सव का परिदृश्य :


~~~~~~~~~~~~ लम्बरदार स्कूल परिसर में एक बड़ा बगीचा था जिसमें एक पक्की स्टेज बनी हुई थी .आयोजक  और विशिष्ट व्यक्ति स्टेज पर बैठे थे और सारा विद्यार्थी समुदाय बाग़ में बिछायात पर , इसी समुदाय का मैं भी एक हिस्सा था . संगीत के लिए साज और माइक का भी इंतजाम था , मुख्य रूप से भजन गए जा रहे थे .


  मैं भी इस आयोजन के दौरान स्टेज पर बुलाए जाने का इंतज़ार कर रहा था . आखिर मेरा भी नाम पुकारा गया और मैं माइक के पास पहुंचा . पैरों में थोड़ी कंपकंपी थी पर मैंने उसपर जल्द काबू पा लिया और जो विचार मेरे ध्यान में  थोड़ी देर पहले कायम हुए थे उनके आधार पर  अवसर के अनुकूल भाषण दे डाला . अपनी भूमिका पूरी हुई जानकार स्टेज से उतरने के लिए सीढ़ियों की ओर बढ़ने लगा . वहां  मंचस्थ व्यक्तियों में बीचों बीच हैड माट साब बैठे हुए थे , उन्होंने मुझे रोका और मेरी पीठ पर हाथ रख दिया .


मैंने अपने जीवन में उस दिन पहला एक्सटेम्पोर भाषण दिया था .


ऊपर भूमिका पूरी होने की बात आई है , मुझे उस दिन सुबह पता नहीं था कि वास्तव में भूमिका तो उस दिन नए सिरे से प्रारम्भ हो रही थी .


बचपन की इन मीठी यादों को सहेजते हुए .


~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~  * काकाजी ~ हमारे पिता जी .


सुप्रभात .


प्रातःकालीन सभा स्थगित ….


विशेष उल्लेख : Manju Pandya


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सुमन्त पंड्या.


@ आशियाना आंगन , भिवाड़ी.


6 नवम्बर 2015.


#स्मृतियोंकेचलचित्र    #उदयपुडायरी  #sumantPandya

संस्मरण  की। ये दूसरी कड़ी आज ब्लॉग पर प्रकाशित -

जयपुर 

  सोमवार   ६  नवम्बर  २०१७ .

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Saturday, 4 November 2017

लंबरदार स्कूल की याद  — भाग एक —उदयपुर डायरी .

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     #लम्बरदार_स्कूल_की_याद : भाग एक .#स्मृतियोंकेचलचित्र #उदयपुरडायरी #sumantpandya

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बचपन में कक्षा दस और थोड़े समय कक्षा ग्यारह में मैं उदयपुर के ऐतिहासिक लम्बरदार हायर सैकेण्डरी स्कूल में पढने गया , जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो उस दौर की एक एक बात याद आती है . किस तरह वहां मेरा दाखिला हुआ और कैसे वो स्कूल मुझे अगले सत्र के बीच में छोड़ना पड़ा उस बारे में एक एक बात याद आती है और कुछ बातें याद करके तो मुझे आज दिन तक आश्चर्य होता है . उस दौर के सहपाठी दोस्तों को मैं आज दिन तक याद करता हूं . उस दौर के साथियों में से एक स्कूल की पढ़ाई के कोई एक दशक बाद फिर मिले थे जो अब भी मेरे संपर्क में हैं , वो खुद ही मेरी समझ से बोल पड़ेंगे जब ये यादगार सिलसिला आगे बढ़ेगा .

उस दौर के मेरे अध्यापकों और प्रधानाध्यापकों को आज दिन तक याद करता हूं , कुछ एक से बाद में मिलना भी हुआ . कैसे अलग थे वो लोग , किस मिट्टी के बने थे वो लोग , आज स्कूल शिक्षा और ख़ास तौर से सरकारी स्कूलों के हाल बेहाल देखकर मुझे बरबस वे दिन और वे लोग याद आ जाते हैं .


और भी संस्मरण हैं बताने लायक : पर अभी नहीं .

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किस तरह मैं राजनीतिशास्त्र विभाग में पढ़ने गया वो भी कोई कम रोचक कहानी नहीं है पर वो अगले दौर में आ ही जाएगी , अभी तो लम्बरदार स्कूल की ही बात करते हैं , उस दौर की स्कूल शिक्षा की ही बात करते हैं .


वर्ष उन्नीस सौ बासठ की बात ~

--------------------------------- कुछ दिनों पहले मैंने अपनी वो तस्वीर अपनी फेसबुक दीवार पर इस आशय से टांकी थी कि स्कूल के जमाने के मेमोयर्स लिखूंगा, वो तस्वीर जो पहली बार बोर्ड परीक्षा के फार्म में चिपकाई गई थी . पर शायद वो फजूल की लगाईं उसमें तो मैंने कोट पहना हुआ है और उस बात की कोई विशेष पुष्टि नहीं होती जो मैं बताने जा रहा हूं . जब वो बात खुलेगी तो आप भी बोलोगे ,” ऐसा भी होता है !”

उदयपुर के लम्बरदार स्कूल में दाखिले की नौबत क्यों आई ये भी बताना पड़ेगा पर अभी हाल सीधे हैड मास्टर साब के कमरे की घटना पर आ जाते हैं . बात सत्रारम्भ जुलाई उन्नीस सौ बासठ की है ~~~~


प्रवेश आवेदन ~

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तत्कालीन लम्बरदार हायर सैकेंडरी स्कूल के बड़े से प्रवेश द्वार में घुसते ही दायें हाथ को ऊंचे से लंबे चबूतरे पर पहला ही कमरा हैड मास्टर साब का था , श्री गोपाल लाल शर्मा हैड मास्टर थे , जीजाजी मुझे स्कूल में दाखिल करवाने गए थे . कक्षा नौ की अंकतालिका और कक्षा दस में दाखिले का फ़ार्म हैड मास्टर साब की टेबिल पर था . मैं हैड मास्टर साब की टेबिल के नजदीक एक स्टूल पर बैठा , एकदम जैसे डाक्टर को दिखाने के लिए मरीज बैठता है . उन्होंने फ़ार्म देखा और मुझपर नजर डाली और एक बार को जो निर्णय सुना दिया उससे तो मेरा उत्साह ही ठंडा पड़ गया . हैड माट साब बोले :


“ इसे मैं नवें दर्जे में ही दाखिला दे पाऊंगा , इतना कमजोर बच्चा दसवें दर्जे की पढ़ाई कैसे कर पाएगा …. .? “


असल में दसवें की पढ़ाई के लिए लडके को जैसा हृष्टपुष्ट होना चाहिए था उस मानक से मैं तो बहुत दूर था .

बात थोड़ी लंबी चली हैड माट साब और जीजाजी के बीच और कैसे पसीजे हैड माट साब ये भी बताऊंगा , असल में उस समय उस स्कूल में दसवां दर्जा भी तो दो तरह का होता था तो डील डौल में तो दसवें दर्जे लायक लड़कों में मैं कहां ठहरता इसलिए हैड माट साब जो बोले वो समझ में आता है .


वे दिन और वे लोग बहुत याद आते हैं . उन दिनों को याद करते हुए..

प्रातःकालीन सभा स्थगित…

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  सुमन्त पंड्या   

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  आप की सुविधा के लिए साझा करने का प्रयास जीवन संगिनी 

 Manju Pandya #मंजु


   @ आशियाना आंगन, भिवाड़ी .

    5 नवम्बर 2015 .

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आज ब्लॉग पर प्रकाशित —

जयपुर 

रविवार ५ नवम्बर  २०१७ .

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Monday, 10 April 2017

बेदला से उदयपुर  : मूं  वेंड्यो कशान   ...  ?

बेदला से उदयपुर 😊😊

  #sumantpandya #उदयपुरडायरी


         😊😊बेदला से उदयपुर : “ मूं वेंड्यो कशान ? “ 👍👍

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   भोले ग्रामीण और उनके अनोखे तर्क , उनकी विशिष्ट अभिव्यक्ति मुझे बचपन से आकर्षित करती आई है . 

 ऐसी ही कई एक बातें उस दौर की याद आ जाती हैं जब 1962 - 63 के दौरान हम लोग उदयपुर में रह रहे थे . 

अधिकांश समय हम लोग रहे भूपालपुरा में जे रोड पर बाबूजी बोहत लाल जी धाकड़ के मकान में , अब तो बाबूजी और बाई जी दोनों ही स्मृति शेष हैं ,हमारे काकाजी और अम्मा भी नहीं रहे पर वहां की उस समय की कई बातें हैं , उदयपुर समय समय पर जाना हुआ तो भूपालपुरा में घूमते हुए बचपन बहुत याद आया .

एक दिन की बात :

**************** एक भोला ग्रामीण जो बेदला से सर पर एक खाट लादकर आया था , या कहिए खाट लादकर लाया था , आया और उसने खाट बाई जी को सुपर्द की , अब वो थोड़ा विश्राम करना चाहता था , खाट बेदला से बाबूजी के काको सा ने भिजवाई थी . 

उधर बाई जी अम्मा को बताने लगी :

 “ काको सा चालता आदमी हूं काम करावै .

  अरै तू उदयपुर जई रियो है कांई ?

 म्हारो मांचो परो लेई जा . “

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अर्थात :

    अरे तू उदयपुर जा रहा है क्या ?

 जा रहा है तो मेरी खाट वहां ले जा , पंहुचा दे .

इस प्रकार काको सा राह चलते आदमी को काम सौंप देते हैं .

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खैर खाट तो आ गई , डिलीवरी हो गई भूपालपुरा में और ये ग्रामीण बाई जी से बोला :

  “ वाहदे दे द्यो , वाहदे ! “

अभिप्राय था उसे बीड़ी सुलगाने को आग चाहिए थी . बाई जी ने अंगीठी से निकाल कर एक अंगारा उसे दे दिया चिमटे से उठाकर . बीड़ी तो उसने सुलगा ली पर बजाय एक तरफ करने के अंगारा फर्श पर ही छोड़ दिया और लगा बीड़ी पीने . इस बीच आते जाते उसी अंगारे पर बाई जी का पैर पड़ गया , पड़ गया फफोला और उसकी फर्स्ट एड करनी पड़ी . इस ग्रामीण को बाई जी बोलीं :

😊 “थां वेंड्या ही रह्या बा सा ! “

और इसके जवाब में बोला ये ग्रामीण :

😊 “ मूं वेंड्यो कशान ? मगरा मांय सार ( चार ) तो अंग्रेजी साय ( चाय ) पीन आयो हूं . “

माने वो मार्ग में चार अंग्रेजी चाय पीकर आया है तो भला पगला कैसे हुआ ?

बहुत याद आते हैं वे दिन और वे लोग .

अगला किस्सा होगा : " वेंड्यो ही रह्यो परताप सिंह " अगली किसी पोस्ट में .

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सुप्रभात .

सुमन्त पंड्या 

 @ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

 सोमवार 11 अप्रेल 2016 .

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जय भोले नाथ ।🔔🔔  गुलमोहर कैम्प से सुप्रभात 🌻

गए बरस आज के दिन भोले ग्रामीण की ये कहानी लिखी थी  । आज इसे ब्लॉग पर दर्ज कर रहा हूं , देखिएगा ।

अब अगला पड़ाव होगा नेहरू गार्डन में ...

शिवाड़ एरिया में भोर की सभा स्थगित .....

जयपुर 

मंगलवार ११ अप्रेल २०१७ .

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Tuesday, 21 March 2017

#स्मृतियोंकेचलचित्र :उदयपुर डायरी .

Good morning & private coffee done @ Gulmohar camp , Jaipur . सुप्रभात ! बचपन की स्मृतियों के संग्रहागार से एक तस्वीर आज जारी किए देता हूं . पूरे पत्ते कल परसों में खोलूंगा . सोशल मीडिया पर उन लोगों को खोजने का प्रयास करूंगा जो इस तस्वीर में दिखाई देते हैं . अभी ये कहते हुए भोर की सभा स्थगित करता हूं कि शाबाश विनोद * जो ये फोटो ढूंढ दी और भला हो जीवन संगिनी Manju Pandya जो आप ने टोका नहीं इस बाबत न तो आप ही तो मेरा निजी सेंसर बोर्ड हो . * Vinod Pandya ~~~~ जयपुर 22 मार्च 2016. ------------------------ नमस्कार 🙏 गए बरस जो फ़ोटो मिली थी आज उसे ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूं । २२ मार्च २०१७ .