Saturday, 2 December 2017

पोरंपरा  है ... एक : बनस्थली डायरी .

पोरम्परा है : भाग एक . मर्दाना धोती की बात : बनस्थली डायरी .


कहा गया शब्द वास्तव में परम्परा है पर इसे ऊपर इस प्रकार इसलिए लिखा गया है ताकि यह लगे कि यह किसी बांग्ला भाषी द्वारा कहा गया है । इस परम्परा को बताने के लिए पहले मैं आपको अपनी कहानी सुनाऊं । मैं और मेरा छोटा भाई विनोद  हवामहल के नीचे कैंची और चाकुओं पर धार लगवाने गए हुए थे जो ऐसे उपकरणों से लगाईं जाती है जो फौलाद की बनी चीजों को भी पैना कर देते हैं । ये वो कारीगर था जो कभी तलवारों को धार लगाता था , अब घरेलू उपकरणों पर धार लगाने लगा था जो बरतते बरतते भोंथरे हो जाते हैं । इस काम की लागत की बात चली , जमाने की बात चली ,रुपये पैसे की बात चली तो एक रोचक संवाद हो गया । उसने एक सुन्दर और लठ्ठ जनता धोती पहन रखी थी । उसका एक सिरा झोली की तरह फैलाकर वो बोला :

   “    या म्हारी बीस रिप्या की धोती छै , ईं मैं मैं धोण भर नाज बांध अर ल्या सकूं छूं ।”

अर्थात ये मेरी बीस रुपये की धोती है ,इसमें मैं आधा मण याने बीस सेर अनाज बांध कर ला सकता हूं ।


इसके बाद उसने मेरी पतलून का एक पायचा नींचे से पकड़ कर एक झटका दिया और बोला :

 “    या थां की कित्ताक की होली ? याने ये आपकी किस कीमत की है ? “ 

     मैं जवाब में पतलून की लागत बोला । जो कुछ भी मैं जवाब में बोला उसे तो जाने दीजिये , बल्कि मुझे याद भी नहीं कि तब पतलून कितने में बन जाती थी पर इतना याद है कि उसकी धोती की लागत और मेरी पतलून की लागत में जमीन आसमान का अन्तर था , और उसने जो पूछा वो मुझे आज तक याद है :

   

“ ईं मैं कित्तोक नाज बांध ल्यावोला .......? “

अर्थात : इसमें कितनाक अनाज बांध लावोगे.....?


        मुझे इस कारीगर ने निरुत्तर कर दिया था । धोती के प्रति आसक्ति शुरू हो गई थी । धोती के महत्त्व को कारीगर ने बहुत अच्छे से समझा दिया था । वे मेरे जयपुर प्रवास के दिन थे । मैं सारे जयपुर में धोती ही पहन कर घूमता । यह और सब को भी मैंने सुनाया , अनुयायी भी बनाये । उस समय के अध्ययन में विवेकानंद के लेख ' मॉडर्न इण्डिया ' और अरविन्द ( sri Aurobindo ) की कृति फाउंडेशन्स ऑफ़ इन्डियन कल्चर ने भी मेरी इस धारणा को मजबूत किया कि धोती के भारतीय पहनावे का कोई मुकाबला नहीं । बनस्थली लौटा तो भी धोती पहनने की अपनी आदत और प्रतिष्ठा साथ लेकर लौटा । ऊपर जिन कृतियों का उल्लेख आया है उनकी कुछ बात भी बताऊंगा और आज की पोस्ट को जो शीर्षक दिया है उसके साथ न्याय करने का भी प्रयास करूंगा । पर अभी के लिए ये एक भूमिका तो बन ही गई है । सेव करना मुझे आता नहीं इसलिए मैं इसे आपकी नजर के लिए पोस्ट करता हूँ।.......... 

     पिक्चर अभी बाकी है .... यह केवल अंतराल है..........

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ब्लॉग पर प्रकाशित . 

जयपुर

   रविवार ३ दिसम्बर  २०१७ .

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पोरंपरा ... आगे की बात : बनस्थली डायरी .

पोरम्परा : मरदाना धोती की बात ~~ आगे की कहानी  


 अन्य बातों में उलझकर कहीं ये प्रसंग पहले से छेड़ा हुआ है , भूल में न पड़ जाए , छूट न जाय इसी लिए इस पर आज बात .....

मैंने पहले बताया था कि कैसे एक सीधे से हिन्दुस्तानी आदमी ने मुझे धोती का महत्व समझा दिया था और मेरे पहनावे में धोती जुड़ गई थी । अरविन्द और विवेकानंद के लेखों ने मेरे पहनावे को वैचारिक आधार दिया था । किन्हीं आर्चर महोदय के एक लेख : is indin civilized ..? के जवाब में अरविन्द ने पूरी एक किताब ठोक दी थी Foundations of Indian culture नाम से और हर बार ये सवाल पूछा था कि क्या अब भी कुछ सन्देह रहा ? विवेकानंद ने इससे पहले ही अपने लेख Modern india में उस धारणा को उठाया था कि हिंदुस्तानी लोग कमर के नीचे कपड़ा लपेट लेते हैं । ये पश्चिमी सभ्यता की ओर से खिल्ली उड़ाने वाली बात थी । विवेकानंद ने उस मखौल का जवाब देते देशवासिओं का आवाहन किया कि भारत माता के सच्चे सपूत हो तो कमर के नीचे कपड़ा लपेटो । न तो मुझे विवेकानंद बनना था न अरविन्द बहरहाल धोती मैं पहनने लगा था और सब जगह धोती ही पहनता था घर बाहर बाजार से लगाकर शासन सचिवालय तक कहीं जाने में संकोच नहीं था । 

कई एक अनुभव :

    राजीव (राजीव मेहता ) आए । धोती पहने मुझे देखकर बड़े खुश हुए और खुद भी धोती पहनना चाहा 

मैं तो लाया ही धोती जोड़ा था , एक उन्हें पहना दी । वे चाहते थे  कि अब कही चलें ! कहां चलें तो तय रहा कि दोनों के दोनों छोटे भाइयो के दफ्तर चलें , वैसे तो राजीव भी मेरा छोटा भाई ही है । एक कठिनाई थी कि राजीव एक भारी मोटर साइकिल लाया था , पर वह भी सहज हल निकल आया । एक विज्ञापन आता था जिसमें दूध वाला मोटर साइकिल पर धोती पहन कर बैठता था । विज्ञापन तो मोटर साइकिल का था पर हमारा संशय दूर हो गया । जो वो कर सकता है.... हम क्यों नहीं ? मैं और राजीव दोनों दोनों गंतव्यों पर क्रमशः गए अपोलो टायर्स के दफ्तर और शासन सचिवालय , दोनों के दोनों छोटे भाइयों के पास । दोनों जगह हम कार्टून कहलाये पर इससे न तो राजीव निरुत्साहित हुए और न मैं । राजीव उन दिनों International cooperative alliance में काम करता था और देश देशान्तरों में अब कोई एक धोती नहीं धोतियां ले गया । मुझे तो बनस्थली जाना ही था , वहां मेरा धोती का पहनावा जारी रहा......


बनस्थली का एक रोचक प्रसंग कहकर आज की बात को विराम दूं :


मैंने एक बंटवारा कर कर रखा था ।एक दिशा में पढ़ाने जाता तो खादी का सफारी पहनकर जाता ,दूसरी दिशा में मेहमान घर खाना खाने जाता तो धोती कुरता ही पहनकर जाता । मेहमान घर में जमीन में बैठकर पट्टे पर पत्तल दोने में भोजन होता । यह सब चल ही रहा था कि एक दिन कुछ दो पारियों के बीच समय की कमी के चलते इधर की पोशाक में ही उधर चला गया । देखने वाले के मन में आपकी एक प्रतिमा | इमेज बन जाती है वही कह रहा हूँ । वहां खाना बनाने वाली बाई जी उस दिन मुझे देखकर बोली :


“   भाई साब... आज तो अंग्रेजी पोशाक मैं ! “


शेष फिर कभी ...... ये पोरम्परा की कहानी जरा लंबी है .....

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ब्लॉग पर प्रकाशित 

जयपुर 

रविवार  ४ दिसम्बर २०१७ .

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बाई का फूल ... तीन : बनस्थली डायरी .

बाईं का फूल - तीन : बनस्थली डायरी 

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बात चली थी और सारा प्रसंग द टोंक सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक और उसकी विस्तार शाखा के इर्द गिर्द घूम रहा था , जिसमें लक्ष्मी नारायण का विशेष उल्लेख आया था . पहली कड़ी में ख़ास जुमला ये था कि माया मेम साब का नाम मेरे साझे में जुड़ गया था और दूसरी कड़ी में इस राजस्थानी कहावत की पुनर्स्थापना थी : “ बाई का फूल बाई कै ही लाग जायला .” इसके पीछे मेरी वही धारणा पुत्री संतान को मज़बूत बनाना . ख़ैर वो बातें हुईं , अब चूँकि बात की शुरुआत लक्ष्मी नारायण से जुड़ी है तो आज तीसरी बात कहकर इस चर्चा का समापन करूंग़ा जिसकी पूरक बातें लक्ष्मी नारायण की ही बताई हुई हैं .


३.

एक बार की बात द टोंक सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक के एम डी साब बनस्थली दौरे पर आए साथ में उनकी पत्नी भी आई हुई थी . एक तीर से दो शिकार , सरकारी दौरा भी हो जाएगा और ये लोग विद्यापीठ भी देख जाएँगे ये विचार रहा होगा . जब वे प्रधान शाखा में आकर बैठे उसके बाद उन्होंने मेरा नामोल्लेख किया और इच्छा प्रकट की कि वो मुझसे भी मिलना चाहेंगे , बैंक का दौरा तो ख़ैर अपनी जगह था ही .

उधर कच्चे क्वार्टर की तरफ़ थी तब बैंक की प्रधान शाखा , मैनेजर गुप्ता साब और लक्ष्मी नारायण दोनों ने ही सुनी थी एम ड़ी साब की बात पर बात सुनकर लक्ष्मी नारायण ने कुछ ज़्यादा ही फुर्ती दिखाई और वो टेबिल पर से स्कूटर की चाबी उठाकर बाहर जाने लगा . पूछा एम ड़ी साब ने तो बोला :

“ साब को यहीं लियाता हूं .”

तब बोले एम ड़ी साब :

“ मैंने कहा क्या उनको लेकर आने के लिए ? न न मुझे उनके घर जाकर मिलना है .”


ख़ैर वो हो गई बात बैंक से फ़ारिग़ होकर ये टीम चवालीस रवीन्द्र निवास आई और प्रोटोकाल में दोनों बैंक अधिकारी भी साथ आए . एक बात और हुई इस आने में कि साब ने सरकारी गाड़ी घर से दूर खड़ी करवा दी और बोले :

“ …..आगे पैदल पैदल ही ज़ाएंगे उन के घर के बाहर .”

ये सब बात लक्ष्मी नारायण ने ही बताई मुझे क्योंकि उस दिन उसे लगा कि ‘ माट साब ‘ का ओहदा ‘ एम डी साब ‘ से ऊँचा है .


कौन थे एम डी साब ? 


ये बात भी आएगी पर अब बज गई घंटी ।🔔🔔

प्रातःक़ालीन सभा स्थगित …..

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ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

रविवार  ३ दिसम्बर  २०१७ .

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बाई का फूल ... दो : बनस्थली डायरी .

बाई का फूल : भाग दो 🌹: बनस्थली डायरी 


इस शीर्षक से रविवार को पोस्ट लिखना शुरु की थी . बात पूरी होने तक बैठ न सका अतः उस दिन बात अधूरी रही . आज बढ़ाता हूं बात आगे . पोस्ट भी करूंग़ा , ब्लॉग पर भी जोड़ूँगा . बात का सिरा टोंक सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक की बनस्थली विद्यापीठ शाखा से जुड़ा हुआ है . हो सका तो दो बातें छेड़ूँगा आज . एक बात तो पहली कड़ी में आ गई थी बहरहाल . अब दूसरी बात :


२.

  बात आई थी एफ ड़ी कराने की और उसमें दर्ज नाम के इंदराज की , वो तो हो गई बात . माया का नाम आया था उसमें . आप साथियों ने सराहा उस प्रसंग को . यादवेंद्र का कहना कि माया से कौण बच पाया महाराज और प्रभात का कहना कि लो बोलो माया का ही नाम हटा दिया बहुत भाए , और सब के साथ .

ये शीर्षक क्यों दिया वो बताता हूं आज . वो क्या था कि बनस्थली में हम जैसे गृहस्थ स्टाफ़ की गिनती में कम होने लगे थे और पढ़ाने के काम में लड़कियों , युवतियों की गिनती बढ़ने लगी थी . इन लड़कियों में एक बड़ा वर्ग वहीं हमारी पढ़ाई लड़कियों का हुआ करता था . किसी को बुरा न लगे पर लोक भाषा में इन्हें हम कहते छोरी - छापरियाँ .

अनुदान मिलने में देरी और अन्यान्य कारणों से खाते में वेतन चढ़ने में देर अवेर हो ही जाती और उसी दौर की ये बात बताता हूं कि हम्मा तुम्मा तो लक्ष्मी नारायण से ये पूछने जाते कि खाते में वेतन चढ़ गया के नहीं और उधर ये छोरी छापरियाँ पहुँचती एफ डी बनवाने और रिन्यू करवाने . फरक बड़ा साफ़ था . दाल रोटी तो हमारी भी चल जाती थी पर वैसी इफ़रात नहीं होती थी . ख़ैर उसी दौर में मैंने इस राजस्थानी कहावत को पुनर्स्थापित किया था :

“ बाई का फूल बाई कै ही लाग जायला .”


अभी भी अधूरी रही बात पर बातें तो चलती ही रहेंगी ….

संध्या वंदन .

नमस्कार 🙏


सुमन्त पंड़्या 

आज ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

शनिवार २  दिसम्बर  २०१७ .

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सी डी के विशेषज्ञ  : बनस्थली डायरी  📕

सी डी के विशेषज्ञ  💐


बनस्थली की वह शाम रवीन्द्र निवास में ..........


बनस्थली में वह परिवर्तन का दौर था । विभागों का विस्तार हो  रहा था  । इसी विस्तार के तहत होम सायन्स में पहला एम एस सी कोर्स शुरू हुआ था । पेड़ के  नीचे से स्टाफ रूम उस कक्ष में आ गया था  जो कभी प्रिंसिपल का कक्ष  हुआ करता था । होम सायन्स में कभी बी एस सी तक की ही पढ़ाई होती थी  , अब आगे की पढ़ाई होने को थी । सुधा नारायणन  सन्यास लेकर चली गयी थीं और नई नई प्राध्यापिकाएं  आ गयी थीं । एम एस सी की पढ़ाई के लिए अधिक स्टाफ जो चाहिए था । मेरा विभाग  बहुत पहले से था । ब्रदर डॉक्टर शिव बिहारी माथुर  हमारे सिरमौर थे ,  मैं उनके वहां पहुंचने से पांच वर्ष बाद इस विभाग , राजनीति शास्त्र , से जुड़ा था । अरुणा वत्स और पांच वर्ष बाद  इस विभाग से जुड़ी थीं  ।   बहरहाल जो बात हमें जोड़ने वाली थी वह ये कि हम तीनों एक ही जगह के प्रोडक्ट थे  , राजस्थान विश्वविद्यालय राजनीतिशास्त्र विभाग ।  दो विभागों का काम चलाऊ परिचय हो गया , अब आगे की बात :


      दोपहर का समय मैं स्टाफ रूम में बैठा था  और  सामने होम सायन्स की एक टीचर बैठी थी  जिसने बमुश्किल पढाना शुरु किया  होगा यह अवस्था देखकर लगता था । युवती से परिचय हुआ  , उसने अपना सुन्दर सा नाम भी  बताया जिसे मैं यहां दोहराऊंगा नहीं । थोड़ी सी देर बातचीत हुयी  , कक्षा का समय हो गया दोनों अपने अपने गन्तव्य को चले गए  । जो थोड़ी सी बात हुई वो इस प्रकार -------


~ आपका स्पेशलाइजेशन क्या है  ?


*    सी . डी .


~  मायने बताइये ?


*    चाइल्ड   डेवलपमेंट  ( बाल विकास ).


~ साइंस सब्जेक्ट है तो  इसमे प्रैक्टीकल भी करवाते होंगे  ?


*  जी हां  वो भी होता है  ।


~  तब  अब  आप मुझे  जरा सा ये बताइये कि  सी डी की विशेषज्ञ आप हैं  या मैं हूं   ?

   विभाग में किसी का भी लगन नहीं हुआ , बच्चे बड़े करने का  कोई  अनुभव नहीं  और आप लोग सी डी के विशेषज्ञ  कहलाते हैं ।  मैंने दो बड़े कर दिए  , खड़े कर दिए सो  कोई बात ही नहीं .... स्पेशलिस्ट तो आप हैं । मैं समझा बात हो गयी  , पर ये तो इंटरेक्शन की शुरुआत थी ये बात आगे तक गई  जो मैं अगली बैठक में  जोड़ूंगा..........


शुभ प्रभात


good morning .

दूसरी पारी :


जो बात स्टाफ रूम में हुई थी  वह वहां खतम नहीं हुई  , बात  दूसरे विभाग से होते हुए  कार्यशील  महिला आवास तक चली गई  और उसका जो परिणाम  निकला  :


  उसके लिए मेरी तैयारी बहुत कमजोर थी  जो आगे मैं बताने जा ही रहा हूं  ।   हमारे विभाग , राजनीतिशास्त्र , में साधना अस्थाई नियुक्ति पर  काम कर रही थी और कार्यशील महिला आवास में ही रह रही थी ।  साधना जो कि दयालबाग , आगरा  से आई थी उसका अन्य विभागों की शिक्षिकाओं से  सह आवास के कारण संपर्क था  और विभाग में हम लोगों से तो खैर संपर्क था ही । साधना के  माध्यम से सूचना आई कि कार्यशील महिला आवास  में रहने वाली छह   प्राध्यापिकाएं मुझसे मेरे घर आकर मिलना चाहती हैं  । मेरे लिए अजीब संकट  न समय दूं तो  घमंडी कहलावूं  और समय दूं तो झेलूं कैसे ?  हालात ने मुझे अकेला रख छोड़ा था । जीवन संगिनी का साथ हो तो मैं बरात झेल लूं  , और आगे  ऎसा हुआ भी पर उस दिन , या यों कहें कि उन दिनों तो घर की हालत ये थी  कि एक कमरा तो मय कुर्सियों के बन्द पड़ा था उसमे धूल भरी थी  । सारा जरूरत  का सामान मय किताबों कागजों के मेरे बिस्तर के इर्द गिर्द आ गया था  । आगंतुकों के लिए बहुत जगह नहीं थी । खैर अब समय तो देना  ही था , हालांकि ये भी  लग रहा था कि एक को चुनौती दी , जवाब  देने को छह आ  रही हैं  । मैंने साधना के ही  जरिए समय  दे दिया  । हारे के हरिनाम  विभाग में  उन दोनों से मदद मांगी जिनका ऊपर ज़िक्र किया है   । ब्रदर ने कहा ,  तुमको उस होम सायन्स वाली   से अटकने की क्या जरूरत थी ?   

ब्रदर अब तो हो गया  , आप  शाम को आ जाना  और सभा की अध्यक्षता करना ,  मैं बोला । खैर वो आये थे और स्थिति को सम्हाला शाम को । 


अरुणा जी को भी कहा , वे हमेशा  की तरह मेरे दुःख सुख में साथी थीं  और उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया कि उनका पूरा सहयोग  मुझे मिलेगा ।  तत्काल मैं 44 नम्बर को बैठने लायक बनाने में जुट गया । जब शाम आई और मेहमान आये तब तक मैं गुजराती ढोकला    बना चुका था  और अरुणा जी मसाले दार  मूंगफली तैयार कर लायीं थीं   जो  वो हमेशा बहुत बढिया बनाती थीं  । हम लोगों ने उन सब का ख़ुशी से स्वागत किया , जब कॉफी बनाने की बारी आई तो  इन मेहमानो  ने हम तीनो को न उठने दिया ।  हालांकि ब्रदर ने आदतन यह भी कहा : मेहमां  जो हमारा होता है वो जान से प्यारा होता है  ।  पर साब अब तो  मेरी रसोई उनके हवाले थी । बहुत बढ़िया   कॉफी  उनलोगों ने बनाकर पिलाई ।


मुख्या बात तो  छूट ही गई उन लोगों के आने से बाल मनो विज्ञान और बाल व्यवहार पर  लंबी चर्चा हुई । शास्त्र सम्मत  बातें  हमें भी जानने को मिलीं  , जीवन अनुभव की बातें मैंने भी कहीं । लंबी बैठक तब तक चली जब तक कार्यशील  महिला    आवास     के दरवाजे  रात भर के लिए बंद हो जाने का समय  नजदीक न आ     गया    जब मेहमान चले गए तो ब्रदर बोले :  देखो सब की सब ऐसे  तैयार होकर आईं थीं जैसे किसी पार्टी में आई हों !


#स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी #sumantpandyaसी डी के विशेषज्ञ  💐


बनस्थली की वह शाम रवीन्द्र निवास में ..........


बनस्थली में वह परिवर्तन का दौर था । विभागों का विस्तार हो  रहा था  । इसी विस्तार के तहत होम सायन्स में पहला एम एस सी कोर्स शुरू हुआ था । पेड़ के  नीचे से स्टाफ रूम उस कक्ष में आ गया था  जो कभी प्रिंसिपल का कक्ष  हुआ करता था । होम सायन्स में कभी बी एस सी तक की ही पढ़ाई होती थी  , अब आगे की पढ़ाई होने को थी । सुधा नारायणन  सन्यास लेकर चली गयी थीं और नई नई प्राध्यापिकाएं  आ गयी थीं । एम एस सी की पढ़ाई के लिए अधिक स्टाफ जो चाहिए था । मेरा विभाग  बहुत पहले से था । ब्रदर डॉक्टर शिव बिहारी माथुर  हमारे सिरमौर थे ,  मैं उनके वहां पहुंचने से पांच वर्ष बाद इस विभाग , राजनीति शास्त्र , से जुड़ा था । अरुणा वत्स और पांच वर्ष बाद  इस विभाग से जुड़ी थीं  ।   बहरहाल जो बात हमें जोड़ने वाली थी वह ये कि हम तीनों एक ही जगह के प्रोडक्ट थे  , राजस्थान विश्वविद्यालय राजनीतिशास्त्र विभाग ।  दो विभागों का काम चलाऊ परिचय हो गया , अब आगे की बात :


      दोपहर का समय मैं स्टाफ रूम में बैठा था  और  सामने होम सायन्स की एक टीचर बैठी थी  जिसने बमुश्किल पढाना शुरु किया  होगा यह अवस्था देखकर लगता था । युवती से परिचय हुआ  , उसने अपना सुन्दर सा नाम भी  बताया जिसे मैं यहां दोहराऊंगा नहीं । थोड़ी सी देर बातचीत हुयी  , कक्षा का समय हो गया दोनों अपने अपने गन्तव्य को चले गए  । जो थोड़ी सी बात हुई वो इस प्रकार -------


~ आपका स्पेशलाइजेशन क्या है  ?


*    सी . डी .


~  मायने बताइये ?


*    चाइल्ड   डेवलपमेंट  ( बाल विकास ).


~ साइंस सब्जेक्ट है तो  इसमे प्रैक्टीकल भी करवाते होंगे  ?


*  जी हां  वो भी होता है  ।


~  तब  अब  आप मुझे  जरा सा ये बताइये कि  सी डी की विशेषज्ञ आप हैं  या मैं हूं   ?

   विभाग में किसी का भी लगन नहीं हुआ , बच्चे बड़े करने का  कोई  अनुभव नहीं  और आप लोग सी डी के विशेषज्ञ  कहलाते हैं ।  मैंने दो बड़े कर दिए  , खड़े कर दिए सो  कोई बात ही नहीं .... स्पेशलिस्ट तो आप हैं । मैं समझा बात हो गयी  , पर ये तो इंटरेक्शन की शुरुआत थी ये बात आगे तक गई  जो मैं अगली बैठक में  जोड़ूंगा..........


शुभ प्रभात


good morning .

दूसरी पारी :


जो बात स्टाफ रूम में हुई थी  वह वहां खतम नहीं हुई  , बात  दूसरे विभाग से होते हुए  कार्यशील  महिला आवास तक चली गई  और उसका जो परिणाम  निकला  :


  उसके लिए मेरी तैयारी बहुत कमजोर थी  जो आगे मैं बताने जा ही रहा हूं  ।   हमारे विभाग , राजनीतिशास्त्र , में साधना अस्थाई नियुक्ति पर  काम कर रही थी और कार्यशील महिला आवास में ही रह रही थी ।  साधना जो कि दयालबाग , आगरा  से आई थी उसका अन्य विभागों की शिक्षिकाओं से  सह आवास के कारण संपर्क था  और विभाग में हम लोगों से तो खैर संपर्क था ही । साधना के  माध्यम से सूचना आई कि कार्यशील महिला आवास  में रहने वाली छह   प्राध्यापिकाएं मुझसे मेरे घर आकर मिलना चाहती हैं  । मेरे लिए अजीब संकट  न समय दूं तो  घमंडी कहलावूं  और समय दूं तो झेलूं कैसे ?  हालात ने मुझे अकेला रख छोड़ा था । जीवन संगिनी का साथ हो तो मैं बरात झेल लूं  , और आगे  ऎसा हुआ भी पर उस दिन , या यों कहें कि उन दिनों तो घर की हालत ये थी  कि एक कमरा तो मय कुर्सियों के बन्द पड़ा था उसमे धूल भरी थी  । सारा जरूरत  का सामान मय किताबों कागजों के मेरे बिस्तर के इर्द गिर्द आ गया था  । आगंतुकों के लिए बहुत जगह नहीं थी । खैर अब समय तो देना  ही था , हालांकि ये भी  लग रहा था कि एक को चुनौती दी , जवाब  देने को छह आ  रही हैं  । मैंने साधना के ही  जरिए समय  दे दिया  । हारे के हरिनाम  विभाग में  उन दोनों से मदद मांगी जिनका ऊपर ज़िक्र किया है   । ब्रदर ने कहा ,  तुमको उस होम सायन्स वाली   से अटकने की क्या जरूरत थी ?   

ब्रदर अब तो हो गया  , आप  शाम को आ जाना  और सभा की अध्यक्षता करना ,  मैं बोला । खैर वो आये थे और स्थिति को सम्हाला शाम को । 


अरुणा जी को भी कहा , वे हमेशा  की तरह मेरे दुःख सुख में साथी थीं  और उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया कि उनका पूरा सहयोग  मुझे मिलेगा ।  तत्काल मैं 44 नम्बर को बैठने लायक बनाने में जुट गया । जब शाम आई और मेहमान आये तब तक मैं गुजराती ढोकला    बना चुका था  और अरुणा जी मसाले दार  मूंगफली तैयार कर लायीं थीं   जो  वो हमेशा बहुत बढिया बनाती थीं  । हम लोगों ने उन सब का ख़ुशी से स्वागत किया , जब कॉफी बनाने की बारी आई तो  इन मेहमानो  ने हम तीनो को न उठने दिया ।  हालांकि ब्रदर ने आदतन यह भी कहा : मेहमां  जो हमारा होता है वो जान से प्यारा होता है  ।  पर साब अब तो  मेरी रसोई उनके हवाले थी । बहुत बढ़िया   कॉफी  उनलोगों ने बनाकर पिलाई ।


मुख्या बात तो  छूट ही गई उन लोगों के आने से बाल मनो विज्ञान और बाल व्यवहार पर  लंबी चर्चा हुई । शास्त्र सम्मत  बातें  हमें भी जानने को मिलीं  , जीवन अनुभव की बातें मैंने भी कहीं । लंबी बैठक तब तक चली जब तक कार्यशील  महिला    आवास     के दरवाजे  रात भर के लिए बंद हो जाने का समय  नजदीक न आ     गया    जब मेहमान चले गए तो ब्रदर बोले :  देखो सब की सब ऐसे  तैयार होकर आईं थीं जैसे किसी पार्टी में आई हों !


#स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी #sumantpandya

Friday, 1 December 2017

बावळी की कहानी : बनस्थली डायरी .

बावळी ...बावळी : बनस्थलीडायरी 💐

यह राजस्थानी या शायद गुजराती  का  भी एक ऐसा शब्द है जो अत्यंत प्रेमाभिव्यक्ति में ही कहा जाता है  । अगर आप एक अक्षर नहीं  पहचानते हैं तो बावली कह लीजिये  पर वो बात ऐसा कहने में समझ न आएगी । खैर एक संवाद सुनिए :

     ~  सर , ये तीन बजे वाली बस कित्ते बजे जाती है  ?

            आमना  सामना होने पर उसने पूछा ,  मुझसे ही पूछा ।

    मैं बोला  आप मुझसे पूछ  रही हो या   मुझे बता रही हो  बस का टाइम ।

     खैर सवाल से ही साफ़ होता है कि सवाल पूछने वाली को आप क्या  मानेंगे ,  क्या कहेंगे  , वही तो मैं कह बैठा था उस दिन जब वो बनस्थली में  मेरे घर  की और आ रही थी  और मैं  बाहर बैठा था ।

   अरे ये बावळी कहां से आ गई  !     मैं बोला और शायद उसने सुन भी लिया । उस समय  तो वो यह कहकर चली गयी कि  मुझे  सब पता है लोग क्या बात कर रहे हैं । पड़ोस में आई थी पड़ोस से लौट गई  ।  पर अगली बार  मुझे पुस्तकालय के काउंटर पर अटकाया और  लगी सवाल पर सवाल करने उस दिन की बात पर  अब बात हो गई सो हो गई  पर एक तूफ़ान खड़ा  हो गया उस शांत क्षेत्र में । मेरे बचाव में पुस्तकालय स्टाफ के कई एक लोग भी आगये और उससे कहा कि इनकी बेटी के बराबर हो इसी लिए कह दिया होगा । कहा गया शब्द कोई अपशब्द नहीं  है यह  भी समझाया । मैं तो माफ़ी भी मांगने को तत्पर हो  गया  , तभी वो बोली  :

सर  और सब तो मुझे ऐसे कहते ही हैं  पर मुझे आपने भी ऐसे कह दिया  । रेखांकित शब्द आपने ।

    उसने मुझे यह अहसास करा दिया कि  उसे मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं थी ।

अब बारी मेरी थी ,   मैंने उसे  भरोसा  दिलाते   हुए  कहा   :

"  हो तो तुम बावळी ही पर  पर मैं आगे से ऐसा नहीं कहूंगा ।"

#स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी .

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बावळी की हिमायत में सबसे बढ़िया टिप्पणी मिहिर की रही वो भी यहां जोड़ता हूं , उसने कहा :

  " बावली सुनकर धोखे में ना अाएं। "तीन बजे वाली" बस का सवाल सच में वाजिब सवाल हुअा करता था बनस्थली में। रोडवेज़ बसों को उनके समय से जाना जाता था − दस, साड़े ग्यारह, साड़े बारह, दो, तीन, चार अौर सवा पाँच। लेकिन उनका चलना इस पर निर्भर होता था कि वे अाई कितने बजे हैं। देर से अाएंगी कैम्पस में तो जायेंगी भी देर से। इसलिए, ज़रूरी नहीं कि तीन बजे वाली बस तीन बजे निकल ही जाए। होशियार लोग बस के अाने के समय अौर उसमें हुई देरी से जाने का समय भांप लिया करते थे। "

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आज ये किस्सा ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

शनिवार २ दिसंबर २०१७ .

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बाई का फूल ... एक :  बनस्थली डायरी .


कबाड़ में जा रही थी ये पोस्ट , सहेजने को ब्लॉग पर दर्ज कर रहा हूं . 

आज शुरुआत है  , बात और आगे चलेंगीं .

बाई का फूल ...भाग एक : बनस्थली डायरी 


बाई का फूल …। : बनस्थली डायरी

---------------- ----------------- ये पिछली शताब्दी की बनस्थली की बातें हैं जब टोंक सेंट्रल कोआपरेटिव बैंक की विद्या मंदिर विस्तार शाखा में हमारा महीने का वेतन चढ़ता था . वहां लक्ष्मी नारायण नाम का एक युवा अधिकारी बैठता था लैज़र और कैश लेकर . मुझ पर बहुत भरोसा करता उसकी एक बानगी :

“ साब आप बैठे हो थोड़ी देर , मैं थोड़ी देर बाहर हो आवूं ? “

अपना बिखरा कैश मेरे भरोसे छोड़कर चला जाता . ख़ैर , उस बख़त की एक आध छुटपुट बातें बताता हूं आज .


१. 

कोई दस बीस हज़ार की एफ डी करवाई मैंने और अगले दिन लक्ष्मी नारायण ने एफ डी रसीद बनाकर दे दी , निर्देश रहे “ पेएबल टू आइदर ऑर सरवाइवर “ . जीवन संगिनी का नाम साथ में .

रसीद घर भी ले गया . ध्यान से देखा तो पाया कि जीवन संगिनी का नाम लिखा था ‘ माया पंड़्या ‘.

वापिस गया विस्तार शाखा में और ग़लती सुधारने को बोला . लक्ष्मी नारायण क्या कहता है :

“ साब , क्या फरक पड़ता है ? “

और मैं बोला :

“ तेरे तो कोई फरक नहीं पड़ता , मेरे तो पड़ता है , घर पर सवाल नहीं उठेगा ये महा ठगिनी म’ माया ‘ कौण आ। गई बीच में ?”

और मैं बोला आगे :

“ रद्द कर इस रसीद को और ठीक से नई बना के दे .”

ख़ैर अपनी ग़लती सुधारी उस दिन लक्ष्मी नारायण ने …

जैसा शीर्षक दिया था वो बात तो आगे आएगी पर वो कल आएगी .

समयाभाव ..🔔

प्रातःक़ालीन सभा स्थगित 


आशियाना आँगन से नमस्कार 🙏 


सुमन्त पंड़्या 

@ भिवाड़ी 

रविवार १९ फ़रवरी २०१७ .

#स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी

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आज क़िस्सा ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर 

शुक्रवार १ दिसम्बर २०१७ .

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