Tuesday, 10 July 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ८.

नानगा द ग्रेट : आठवीं कड़ी .


6 जुलाई को नानगा बाबत सातवीं कड़ी लिखकर पोस्ट की थी उसके बाद पोस्ट तो मैंने लिखी पर इस श्रृंखला का क्रम स्थगित हो गया . आज उसे आगे बढ़ाने का प्रयास करता हूं .


सुधीर ने तो मुझे पहले ही कहा था कि उसके नानगा मामा की कहानी वास्तव में हमारे घर की कहानी है . ये कहानी कैसे भला पूरी हो सकती है . पोस्ट पूरी हो सकती है कहानी पूरी नहीं हो सकती . इतनी तो बातें हैं बताने को कि कहां तक बताई जाएं . काकाजी से नानगा ने इतना कुछ सीखा जो शायद हम संतानों ने भी उतने अच्छे से न सीखा कभी .


जीजी ने मुझे फोन कर बताया कि जीजी के विवाह में नानगा ने सोने की अंगूठी उपहार में दी थी . जीजी नियमित रूप से नानगा और शेठाणी के लिए राखी भेजा करती थी इत्यादि .

भाई साब ने और बातों के अलावा नानगा का ये गुण रेखांकित किया कि सब कुछ अपने लिए नहीं , अपने उपभोग के लिए नहीं कुछ आगे की पीढ़ियों के लिए भी बचाओ , उनके लिए भी छोड़ो . ये सन्देश तो वास्तव में किसी व्यक्ति के लिए नहीं वरन अखिल मानवता के लिए है .


खैर अभी हाल नानगा के जीवन दर्शन और अर्थशास्त्र को छोड़कर वहीँ चलूं जहां सातवीं कड़ी छोड़ी थी .....

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राज भवन में नानगा :

  बात आई थी कि नानगा ने तीतर उड़ा दिया .

गया तीतर , आकाश में उड़ गया . रसोइए ने ये बात बनाई कि तीतर तो बीमार लग रहा हैं , एक आध बार बगीचे और पिंजरे के चक्कर लगाए और ये आ बताया कि तीतर तो मर गया . और इस तरह तीतर की बात , तीतर प्रसंग ख़तम हुआ . जबकि तीतर तो कभी का परिंदों के आकाश में चला ही गया था . बाकी कहानी आप को विदित ही है . उन वीभत्स बारीकियों में मैं अब नहीं जाऊंगा .


नानगा का तबादला :

    नानगा राजभवन में नाखुश था , नौकरी छोड़ना चाहता था . काकाजी ने उसे रोका था और वो दिन गिन रहा था .

जब तक जयपुर महाराजा राज प्रमुख रहे काकाजी भी राज प्रमुख के हिज हाईनेस हाउसहोल्ड में रहे . ठाकुर मोहब्बत सिंह जी के इस्तीफे के बाद काकाजी वहां अकाउंट्स आफिसर बन गए थे . 


पर राज प्रमुख का पद समाप्त होने के बाद उनकी सेवाएं भी तब राज्य सरकार में विलीन हुईं और उन्हें चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग में काम मिला . उनकी हैसियत वर्तमान एफ ओ के समतुल्य थी और तब की व्यवस्था में एक चपरासी और साइकिल सवार की नियुक्ति या तबादला करना या करा लेना उनके हाथ की बात थी . और इस प्रकार नानगा का बड़ी आसानी से तबादला हो गया नानगा मेडिकल डिपार्टमेंट में आ गया .

जैसा कि राज्य सरकार की सेवा में होता है काकाजी के तो डिपार्टमेंट भी बदले , जयपुर शहर के बाहर भी तबादले हुए पर नानगा उसी मेडिकल डिपाटमेंट में रहा और शहर में ही रहा जहां उसे नियुक्ति मिली थी .

नानगा बाबत एक ख़ास टिप्पणी भाई साब नरेंद्र पंड़्या की -

" नानगा के बाबत मैं ये कहूँगा कि खून के रिश्तों के इतर भी कोई रिश्ते खून के रिश्तो से भी बढ़कर हो सकते हैं, वे नानगा के और हम लोगो के रिश्ते थे शायद हमारे देश में पाए जाने वाले ऐसे ही रिश्तो पर ही हमारे देश की बुनियाद टिकी है और ये ही रिश्ते हमारे देश भारत को भारत बनाये हुए है पता नहीं क्यों लोग इस देश को बाटने और बर्बाद करने की व्यर्थ कोशिश करते है इंसानी रिश्ते धर्मं ,प्रान्त,सम्प्रदाय औरभाषा सेऊपर है."

ऐसे ही एक टिप्पणी मित्रवर गोविंद राम केजरीवाल की भी यहां जोड़ता हूं जिन्होंने ये संस्मरण लिखते हुए मेरा बहुत उत्साह वर्धन किया , वे कहते हैं :

“ बहुत ही सुंदर श्री सुमंतजी.. आपके स्मृतियों के चलचित्र भी इतने सुहावने और स्फूरतिदायक हैं कि मन प्रसन्न हो जाता है जैसे "मुगले आॅजम" फिर से रिलीज हो गई है.. “

कथाक्रम जारी रहेगा........

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

सुप्रभात .

समर्थन और सहयोग : Manju Pandya.


सुमन्त पंड्या .

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

11 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित    जुलाई २०१८ .

यहां फिर मेरी जुगलबंदी नानगा के बड़े बेटे शंकर के साथ .



Monday, 9 July 2018

ल्याओ खीर : स्मृतियों के चलचित्र 

लाओ खीर .....


बरसों पहले माता पिता के साथ मेहसाणा , गुजरात की यात्रा कर रहा था तब की एक बात याद आ गई .

एक कोई सौदागर यात्रा के दौरान बोली के जरिए तरह तरह की चीजें बेच रहा था . लंबी दूरी की यात्रा से ऊबे मुसाफिरों का इस सौदेबाजी से मनोरंजन भी हो रहा था और सौदागर का माल भी बिक रहा था इस तरह से .

भांत भांत के आयटम थे उसके पास बेचने को . जो सबसे ऊंची बोली लगाता वो उस बिक्री के आयटम को खरीदता . पर एक बात और भी थी कि कभी कभी सबसे ऊंची बोली लगाने वाले का भी सौदा नहीं पटता . सौदागर ये जताता कि उसे माल की वाज़िब कीमत नहीं मिल रही और वो बजाय आयटम देने के ऊंची बोली लगाने वाले को कोई गिफ्ट दे देता बजाय सौदा मुकम्मल करने के .

ये गिफ्ट देने वाला आइडिया ही वो सूत्र है जो मुझे आज की पोस्ट की तरफ धकेल रहा है . जो श्रृंखलाएं चल रही हैं अगर विचार मंथन के अभाव में कुछ रुकी हैं तो मेरे पाठक / श्रोता क्यों निराश हों और मुझे टोकें कि आज की पोस्ट क्योंकर नहीं आई . क्यों न स्मृतियों की चित्रशाला से कोई एक छोटा प्रसंग कह डालूं , सुना डालूं . श्रृंखला की पोस्ट मुकम्मल नहीं तो ये गिफ्ट ही सही इस बीच .

तो आज बल्ला काकाजी के बारे में :

     - बल्ला काका काकाजी (हमारे पिता )के मामा के बेटे भाई थे और क्रॉनिक बैचलर थे . नाम तो वैसे उनका लक्ष्मी नारायण था पर घर के नाम " बल्ला" से ही पुकारे जाते थे . जीवन भर वे भारतीय रेल की सेवा में रहे . तबीअत के रईस थे . उनका एक स्टाइल था . पहली तारीख को वेतन मिलता तो वो जयपुर के जौहरी बाजार स्थित एल एम बी होटल में खाना खाने अनिवार्यतः जाते . तब का तो बेहतरीन शाकाहारी होटल और रेस्टोरेंट वही था . आज भी नाम है ही उस होटल का .

ये तो पचास के दशक की बात है . उन्हें भर पेट भोजन के शायद पचास रुपए चुकाने होते थे , मेरी स्मृति में दर्ज आंकड़ा कुछ भिन्न भी हो सकता है पर उससे क्या ? बात तो ये है बताने की कि उन्हें भर पेट भोजन करना था और एक मुश्त भुगतान करना था .

सवाल ये था कि ग्राहक सेवा की शर्तें होटल की हों या ग्राहक की ? साथ ही एटीकेटी की बात .


अब आता है किस्से का क्लाइमैक्स :

    - डेजर्ट के नाम पर छोटो छोटी कटोरियों में बहुत गरम खीर लेकर बैरा आवे और "ल्यो खीर ...ल्यो खीर " कहकर चिड़ावे ग्राहकों को . ग्राहक चम्मचों से सिपड़ सिपड़ करें और खीर को उस ताप पर खा न पावें .

बल्ला काका , भरतपुर के मूल निवासी , मिठाई के शौक़ीन उनको ये स्थिति स्वीकार नहीं थी . काहे का एटीकेट उन्होंने बाजी पलट दी , वही आज बताता हूं जो मुझे आज तक याद है .

वो लट्टू सी छोटी कटोरियाँ बजाय एक के चार लेते वेटर से, थाली में उलटते और ठंडी करके खाते खीर .

थोड़ी देर पहले वेटर की बारी थी : "ल्यो खीर...ल्यो खीर..."

( लो खीर...लो खीर ...)

अब बल्ला काका की बारी थी : " ल्याओ खीर ....ल्याओ ..खीर..."

( लाओ खीर...लाओ खीर...)

ब्लॉग पर प्रकाशित  : जुलाई २०१८.

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आपका किस्सागो    सुमन्त ।

Sunday, 8 July 2018

घोड़े बेचकर सोया : बातें बनस्थली की 

घोड़े बेचकर सोया : बातें बनस्थली की .


    क्षमा कीजिएगा ' नानगा द ग्रेट ' श्रृंखला की एक कड़ी में लिखते लिखते बात आई थी कि नानागा छत पर बिस्तर बिछाता था और मैं जाकर सो जाता था . उस श्रृंखला की तो शायद सात कड़ियां लिख चुका उसे आगे लिखूंगा ही उस बात से ये बातें याद आने लगीं वही आज बताता हूं .

जयपुर में हमारे शहर वाले घर में तो धीरे धीरे छत पर जाके सोने का चलन कम हो गया था पर गर्मियों में 44 रवींद्रनिवास की छत पर जाकर सोना बदस्तूर जारी था . ये बात बनस्थली की है . बच्चे इकठ्ठा होते तो रात को छत पर जाकर सोने का आनंद सब अनुभव करते .

जय भैया रोज रात को सोने से पहले 'चार दोस्तों' वाली कहानी सुनता .

जय को और कोई पास न सुलाता , कौन झेले उसकी लात जो वो नींद में चलाता. मैं उसे अपने पास जगह देता . एक तरफ दीवार होती जय के और दूसरी तरफ मैं होता . मैं भी घोड़े बेचकर सोता इसलिए मुझे उसकी लात की कोई परवाह नहीं होती . याद करता हूं तो हंसी आ जाती है . जय कहता , " जयपुर जाऊंगा तो ये छत अपने साथ ले जाऊंगा ."


मेरी नींद के भी कई किस्से हैं , वो किस्सा जब दरवाजा तोड़ने की नौबत आ गई थी सुनाऊंगा तो तो जुलुम हो जाएगा . आज वो नहीं , आज तो बनस्थली की यादों से जुडी दो बात बताकर समाप्त करूंगा .


मैंने एक बात प्रचारित कर रखी थी कि काकाजी परेशान रहते हैं कि मैं तो नए नए घोड़े खरीदवाता हूं और पंड्या जी बेच देते हैं . 

बाहरी लोगों के लिए बताता चलूं कि और सब बातोँ के अलावा ये काकाजी नाम के व्यक्ति जीवन पर्यन्त मुख्य प्रशासन अधिकारी रहे और घुड़ सवारी मैदान में वो घोड़ों का परफार्मेंस देखने आते थे और मैं मेहमानों की अगवानी के लिए खड़ा होता था . उन्हें दिल्लगी की बातों में बहुत रुचि होती थी सो एक बात मैंने अपनी नींद से भी जोड़ रखी थी .


अब घर की छत की बात :

    एक रात की बात . शाम से ही छोटे वाले को बुखार की शिकायत थी . हम दोनों लोग आदतन घर की छत पर बच्चों के साथ जाकर सो गए थे . अब ये तो मानी हुई बात है कि बच्चे को बुखार हो तो मा तो निश्चिन्त होकर नहीं सो सकती और बाप चाहे तो सो जाए . वही हुआ उस दिन भी . आधी रात के बाद किसी समय छोटे वाले का बुखार तेज हो गया , शायद नाप भी लिया गया . जरूरत आन पड़ी कि उसे गोली दी जाए . मुझे जगाया जीवन संगिनी ने और कहा :


" उठो, छुटकू नै गोळी आपवी छै."

( उठो , छुटकू को गोली देनी है .)

उन्होंने मान लिया कि मैं उठ गया और जो बताया वो करने को चल पड़ा हूं . यहीं गड़बड़ हो गई . मैं चला तो सही , पर कहां चला अलमारी समझकर जीने की ओर चल दिया और अगला पैर नीचे उतरने की कोई चौथी सीढ़ी पर टिका . धमाका सुन जीवन संगिनी भी चौंकी. कोई बड़ी दुर्घटना नहीं हुई पर चेत होने से पहले तो मुझे दिन रात और स्थान का भी ठीक से पता नहीं था . अलमारी समझकर जीने की ओर जा रहा था .

फिर तो सब कुछ ठीक ठाक हो गया और मैंने अपना आगे का कर्तव्य भी निभाया . पर उस दिन हम दोनों ने संयुक्त रूप से निर्णय लिया कि जब तक जीवन संगिनी पूरी तरह आश्वस्त न हो जाएं कि मैं पूरी तरह जाग गया हूं मेरी बात पर कत्तई भरोसा न करें और मुझे ढीला न छोडें .

उस दिन ऐसे में तो मैं दवा भी क्या दे बैठता, क्या भरोसा ?


तो ये था सिर्फ एक किस्सा घोड़े बेचकर सोने वाली नींद का ...


प्रातःकालीन सभा स्थगित..   

सुप्रभात .

सह अभिवादन :

Manju Pandya

सुमन्त पंड्या .

आशियाना आँगन, भिवाड़ी .

9 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८.



Wednesday, 4 July 2018

बनस्थली की रेल यात्रा : चाकसू स्टेशन .

बनस्थली यात्रा :एक आध प्रसंग याद आ गए .


                                                  ये उस जमाने की बातें हैं जब बीकानेर एक्सप्रेस से पहले छोटी लाइन की गाडियां लोहारू से सवाई माधोपुर जाया करती थीं . हम लोग भी उस जमाने में बनस्थली निवाई स्टेशन जाने को इस रुट की गाड़ी कभी कभार पकड़ा करते थे .


एक बार की बात मैं बनस्थली जाने को ट्रेन से यात्रा कर रहा था . मैं तो उस दिन अकेला था , परिवार या कोई साथी नहीं था साथ में . सहयात्री परिवार शायद लंबी दूरी की यात्रा करने वाला था . उन दिनों दिल्ली - बम्बई रूट की फ्रंटियर और जनता नाम की गाड़ियों में लोग इसी गाड़ी से सवाई माधोपुर जाकर सवार होते थे . सहयात्री परिवार को भी शायद बम्बई ( आज का मुम्बई ) जाना था . कंपार्टमेंट में काफी जगह खाली थी , सब बड़ी सुविधा से बैठे थे . इस परिवार का बहुमत था , मैं था अकेला अल्प मत लोक सभा में राष्ट्रपति के नामजद सदस्य की मानिंद , मेरी पटरी बहुमत परिवार से भी ठीक बैठ रही थी , थोड़ी बात चीत भी हुई थी सब कुछ ठीक ठाक .


चाकसू स्टेशन आ गया :

   - स्टेशन आने से पहले सहयात्री परिवार के मुखिया कम्पार्टमेंट के दोनों ओर के दरवाजे इस तरह से बंद कर आए कि कोई आगंतुक बाहर से न खोल सके और स्टेशन से ट्रेन आगे बढ़ जाए . इन की आगे की यात्रा इसी शांति और आनंद के साथ संपन्न हो . मुझे उनकी इस हरकत में " हाई सोसाइटी सिंड्रोम " की बू आ रही थी .

थोड़ी ही देर को गाड़ी स्टेशन पर रुकती थी . गाड़ी रुकी , प्लेटफार्म पर भीड़ भाड़ थी .लोग इस डब्बे में भी आने को इच्छुक थे .


अपनी कहूं , मेरी पटरी ऐसे लोगों से भी सही बैठ जाती है जो अभिजन ग्रंथि से ग्रसित होते हैं पर ग्रामीणों से और बढ़िया बैठती है . मेरा मन कैसे माने कि लोग तो आना चाहें और इस डब्बे के दरवाजे बंद रहें .

मैं उठा और प्लेटफार्म की ओर के दरवाजे की दोनों सटकनी हौले से खोल कर आवागमन सहज बना दिया . ऊपर से सह यात्रियों को ये और कहा : 

" मेरे मिलने वाले हैं ."

अब इस प्रकार के लोग आ गए थे कम्पार्टमेंट में जिनके साथ मैं अधिक सहज अनुभव कर सकता था हालांकि मेरे सहयात्री नहीं . 

जाने क्यों लोग अपनी सुविधा के लिए अन्य लोगों की यात्रा को बाधित कर बैठते हैं , ये मानसिकता प्रायः देखी जाती है .

खैर उस दिन तो चाकसू स्टेशन के बाद मैं अपने जनवाद के विचार के साथ बहुमत स्थापित करने में सफल हो ही गया था .

शीर्षक में एक आध प्रसंग कहा था. ये तो एक ही प्रसंग हो पाया. 

आगे कुछ एक प्रसंग और भी बताऊंगा पर अभी प्रातःकालीन सभा स्थगित ....


सुप्रभात .

समर्थन और समीक्षा :Manju Pandy.

आशियाना आंगन , भिवाड़ी.

7 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८.



Monday, 2 July 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ७.

नानगा द ग्रेट : सातवीं कड़ी .


     नानगा गवर्नर हाउस याने राज भवन में त्रस्त था और नौकरी छोड़ने पर आमादा था . जैसी खान पान की सामग्री उसे बाजार से लेकर आनी होती थी उसे अच्छा नहीं लगता था . राज भवन में भी उसके काम काज का तरीका निराला था . निरक्षर व्यक्ति दुनियां भर में डाक बांट आता आखिर वो साइकिल सवार था , कैसे छटनी करता कैसे यथा स्थान पहुंचाता उसका अपना ढंग था . 

वहां रहते भी वो अपनी करनी से बाज नहीं आता .

तीतर उड़ाया .

    एक दिन नानगा को लगा कि रात के भोजन में एक तीतर भोज्य बनने वाला है . आखिर नॉन वैज खाने वालों को तो वो सुस्वादु लगता है ऐसा मैंने समझदार लोगों से सुना ही है . नानगा को तीतर पर दया आ गई और उसने तीतर उड़ा दिया . खुले आकाश में उड़ने वाला पक्षी चला गया आकाश में . रसोइया चाहे नॉन वैज बनाता रहा हो नानगा की शाकाहारी विचारधारा का भी तो आदर करता था . 

डिनर के लिए काटे जाने को तीतर उपलब्ध नहीं रहा . क्या हुआ उसके बाद आपकी जानने की उत्सुकता होगी पर ये बात आ पाएगी अगली कड़ी में ही . 

अनायास प्रातःकालीन सभा स्थगित 

(कथाक्रम आगे जारी रहेगा ....)

सुप्रभात .

सहयोग और समीक्षा : Manju Pandya .

सुमन्त पंड्य 

आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

6 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८ .

फोटो में शंकर के साथ मेरी जुगलबंदी .


Sunday, 1 July 2018

नानगा द ग्रेट  : स्मृतियों के चलचित्र ६ .

नानगा द ग्रेट : छठी कड़ी


                                   मैंने पिछली कड़ी में लिखा था ,लिखा क्या था बल्कि कहा था कि नानगा ने जयपुर शहर से दूर सुक्या गांव में अपनी खुरपी गाड़ी थी , शहर में तो वो जीवन निर्वाह के लिए आश्रय और रोजगार की तलाश में आया था . मैंने वादा किया था कि इसे समझने के लिए नानगा का अर्थशास्त्र भी बताऊंगा . इस के साथ ही नानगा के केरियर में आए बदलाव भी तो बताने हैं , एक एक कर दोनों ही बातें बताता हूं . पहले अर्थशास्त्र को ही ले लेते हैं , इस बाबात जानने की उत्सुकता ज्यादा रहती है .


नानगा का अर्थशास्त्र :

  नानगा को यदि पांच रूपए महीना काकाजी से मिलता था तो वो यहीं अपने रुपयों को घर के बिस्तरों में दबाकर रख छोड़ता था . दस महीनों की इस प्रकार इकठ्ठा बचत से सस्ते जमाने में एक सोने की मोहर खरीदी जा सकती थी और नानगा वही करता . सोने की खरीद में उसके मददगार होते मुनीम साब जो एक सर्राफा व्यपारी सेठ के विश्वास पात्र मुनीम हुआ करते थे . नानगा ने अपनी मेहनत की कमाई को सोने में बदला और इस काम में कभी नहीं ठगाया . हमारे ही घर के एक सुरक्षित कमरे में नानगा का एक ट्रंक रखा रहता था . उस ट्रंक में मोहरें होंगी किसी को पता नहीं था बहुत बाद तक भी पता नहीं था . वही नानगा का बैंक था , वही स्ट्रांग रूम वही ट्रेजरी ।


आगे चलकर इसी स्वर्ण धन से उसने आज के सुखपुरिया और तब के सुक्या गांव में खेती की जमीन खरीदने की शुरुआत की जिसके लिए मैंने कहा है कि नानगा ने खुरपी गाड़ी . बहुत समय वहां खेती का काम हुआ लेकिन नगर विस्तार के चलते वहां तक तो आज शहर चला गया . रूपांतरण के बाद जमीन के भाव तो अप्रत्याशित बढ़ गए . नानगा के बाद नानगा के बेटों ने अवाप्ति के चलते अगर पांच बीघा जमीन बेचीं तो आवक से अठ्ठाईस बीघा जमीन और खरीदी . इस तरह वो योगः क्षेम की नीति पर चले . जो था उसका संवर्धन ही किया .


पर अब नानगा के केरियर की बात .


नानगा राज प्रमुख के दफ्तर में :

 राजस्थान के निर्माण के बाद जयपुर महाराजा नई व्यवस्था में राज प्रमुख बने और पद पर रहे तब तक नानागा उस दफ्तर में साइकिल सवार रहा .


विलक्षण बुद्धि थी उसकी . उसे ढेरों निमंत्रण पत्र दे दिए जाते जिनपर अंग्रेजी में नाम पते लिखे होते मगर मजाल जो कोई कार्ड इधर उधर हो जाता . हर एक कार्ड पर वो अपनी समझ से कोई निशान बना लेता और सब को यथा स्थान पहुंचा आता .


राज भवन में नानगा :

  1956 में एक परिवर्तन हुआ . राज प्रमुख का पद समाप्त हो गया और राज्यपाल का पद सृजित हुआ . राज प्रमुख के स्टाफ के ये लोग याने हिज हाइनेस हाउसहोल्ड के लोग राज भवन का स्टाफ बनाकर भेज दिए गए . नानगा भी उनमें से एक था .


नानगा को वहां बड़ा कष्ट था और एक बार तो वो नौकरी छोड़ने पर ही आमादा हो गया था , काकाजी ने उसे समझा बुझाकर यह कहकर रोका था कि मिली मिलाई सरकारी नौकरी ऐसे न छोड़े उसका और कहीं तबादला ही करवा देंगे और ये कष्ट मिट जाएगा .


नानगा के शाकाहारी स्वभाव को ये मंजूर नहीं था कि वो मुर्गी के अंडे पोल्ट्री से लेकर आए .

तात्कालिक समाधान ये निकाला गया कि वो रसोइए को कहता कि उसकी साइकिल के हैंडिल पर वो अपना थैला टांक देवे . विक्रेता से कहवे कि वो थैला उतार कर उसमे अंडे भर देवे और फिर टांक देवे . लौट कर रसोइए से थैला उतरवा देवे . गरज ये कि उसे अण्डों को हाथ न लगाना पड़े .


ऐसा था नानगा द ग्रेट .......


कथाक्रम जारी रहेगा.......


सायंकालीन सभा स्थगित .


समर्थन और सहयोग :

Manju Pandya

Himanshu Pandya


नमस्कार .


सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर . जयपुर .

3 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित   जुलाई  २०१८. 



 लड़ो मन्नै   : जयपुर डायरी 

" लड़ो मन्नै !"

       जयपुर डायरी 


 पुरानी बात याद आ गई . नाहर गढ़ की सड़क पर घोषी समुदाय का पपैया पहलवान कबूतर पालता था , बड़ा सुन्दर बांस का मचान था उसके घर " पपैया मंजिल " की छत पर , उस पर भांत भांत के कबूतर बैठे रहते . इनमें कई एक सफ़ेद कबूतर भी होते मुझे लगता ये ठंडे मुल्कों से आए हुए हैं . इन कबूतरों से जुडी हुई कई एक यादें हैं , बताऊंगा और अभी क्यों बात याद आई वो भी बताऊंगा .

ये कबूतर खुले आकाश में खूब उड़ते और लौट कर अपने घर के मचान पर आ बैठते बड़ा ही सुन्दर दृष्य होता . बाकी उनके लिए घर की नीचे की मंजिल में , पोळी में , जालीदार घर भी बने थे जहां ज्वार के चुग्गे का भरपूर इंतजाम होता था . पोळी में एक साथ चुग्गा डाल दिया जाता और कबूतरों की घुटर घूं - शुरु हो जाती . घूम घूम कर सारे कबूतर चुग्गे के पास भी आते , दाना भी चुगते और लड़ते भी .


एक दिन की बात 

एक कबूतर रास्ता भटक कर या पता नहीं क्यों सामने हमारे घर की दूसरी मंजिल में आ गया और वो वापिस न जा पावे . सामने के घर में पुकार कर बताया कि एक कबूतर यहां आ गया है , सुनकर पपैया पहलवान का बड़ा बेटा सिकंदर आया , उसने पास जाकर कबूतर को उठाया और अपने कंधे पर बैठा लिया और सिकंदर के कंधे पर बैठकर वो कबूतर अपने घर गया साब वैसे ही जैसे यज्ञोपवीत के दौरान बटुक मामा की गोद में चढ़कर यज्ञस्थल पर आता है . दो अलग अलग बातें हैं पर मुझे उपमा निमित्त ऐसे ही बातें याद आ जाती हैं . कबूतरों का वो ही सिलसिला कभी मचान पर कभी विश्राम और भोजन के लिए पोळी में .


और एक पुरानी याद 

ये उन दिनों की बात है जब जयपुर में टी वी प्रसारण सायंकालीन सभा में शुरु ही हुआ था . घर घर में टी वी लाए जा रहे थे और घरों की छतों पर टी वी के पुराने किस्म के एंटीना लगने लगे थे . पपैया मंजिल के कबूतरों के मचान और टी वी के एन्टीनाओं में बहुत कुछ एक जैसा था पर थोड़ा फरक भी था , मचान बांस का था और एंटीना मैटल के . हमारे घर की छत पर भी था एंटीना और जाहिर था इसका सम्बन्ध ऊपर की मंजिल में रखे टी वी से था . हुआ क्या कि मैं घर की छत पर मन बहलाव के लिए छोटी सी महिमा को लेकर गया था . बमुश्किल बोलना सीखी थी बेटी लेकिन एंटीना और मचान का फरक उसने मुझे समझाया था इस प्रकार :


" जे फूटू , जे फ़ूटू , जे फूटू , जे फूटू ना ! "


उसने अपनी जुबान में मुझे समझाया था कि बाकी सब तो टी वी एंटीना थे और कबूतरों का मचान एक अलग वर्ग था .


तब तो महिमा उस अवस्था से भी कुछ छोटी थी जित्ता अब सैम है .


आज का शीर्षक : लड़ो मन्नै . *


 एक दिन मेरे सामने की घटना , मैं पपैया के पास कुछ दूध का हिसाब करने गया था कि वहां कबूतरों के झुंड में ज्वार के दानों के आस पास कुछ लड़ाई शुरु हो गई आपस में , कुछ कबूतरों ने दादागिरी शुरु कर दी , घुटर घूं की आवाज तेज हो गई . इस गतिविधि को देखकर पपैया दो ही शब्द बोला :


" लड़ो मन्नै . "


और फिर शान्ति हो गई . कबूतर कित्ती आसानी से उस्ताद की बात समझ गए ये देखना बहुत आश्चर्य जनक था .


अभी क्यों याद आई बात 

"...... मैं उनसे लड़ी सर ,’ ये तो हमारे सर हैं , आप इनकी फ्रैंड कैसे बन गईं ??? "


दिल्ली से मेरे पास मेरी विद्यार्थी के भेजे लंबे सन्देश में से एक कतरन उद्धृत की है मैंने . कितना अपनत्व है ऐसा कहने में वही बताने को मैंने इत्ती सी बात खोली है . ऐसे अपनापन जताते सन्देश मुझे और जीवन संगिनी को बहुत भाव विभोर करते हैं और बनस्थली के दिनों की याद दिला जाते हैं .

और मैं यहीं पपैया की कही बात दोहराता हूं :

" लड़ो मन्नै . 

माने , " लड़ो मत . "

दोनों ही दोस्त बनो , मेरे और गुरु मां के आशीर्वाद दोनों को .


और चलते चलाते दुष्यंत का कहा 

" …. राम जाने किस जगह होंगे कबूतर ,

  इस इमारत में कोई गुम्बद नहीं है . " 

सुप्रभात 

Good morning

Sumantpandya

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

  शुक्रवार , 1 जुलाई 2016 .

ब्लॉग पर प्रकाशित   जुलाई २०१८.