Friday, 10 March 2017

ओ हो हो : जयपुर डायरी .

ओ हो हो ! 😊 #sumantpandya -----------    “ बुआ जी ! ये जो फेसबुक पर आपका खाता है , उसमें आप लिखती हो क फूफाजी लिखते हैं ? “ हर्षिता पूछती है जीवन संगिनी से .  और वो सही बात पूछती है क्योंकि ऐसा भी होता है , होता ही है कई मामलों में . पत्नी के नाम से फेसबुक खाता खोल लेते हैं लोग और अपनी भड़ास उसी खाते पर निकालते रहते हैं , अपने ख़ास मिलने वालों तक में मैंने ये बात देखी है गए दिनों . खैर जाने दीजिए उस बारे में अभी बात करना अभीष्ट नहीं है . अभी वो ही हर्षिता की पूछी बात . मैंने पूछा के तुझे क्या लगता है हर्षिता ? तो उसने तो वही बात दोहरा दी के आप ही लिख देते होओगे करके . पर जवाब मैंने नहीं हर्षिता की बुआ ने ही दिया फूफू तो खड़े देखते रहे खाली . “ मेरे फेसबुक खाते पर मैं खुद लिखती हूं और नहीं तो क्या ? “ ऐसी हुई बात उस दिन ब्रह्मपुरी में बुआ भतीजी के बीच . चलो ये तो हिसाब साफ . जीवन संगिनी अपनी मर्जी की मालिक हैं , वैसे ये बात दीगर है कि अधिकतर मामलों में हमारी दोनों की राय एक जैसी बनती है और चीजों को कम्पोज करने में एक दूसरे के मददगार भी होते हैं . पलड़ा भारी तो जीवन संगिनी का ही होता है क्योंकि उनको मेरे निजी सेंसर बोर्ड का दर्जा भी अलग से प्राप्त है . हर्षिता - बुआ संवाद के बहाने बन गई आज की पोस्ट और मैं सत्यापित करता हूं कि सब बात सही सही कही गई है . जो बात हर्षिता को बताई उस बात से आप सब भी सूचित होवें . सुप्रभात . सेंसर बोर्ड :Manju Pandya ------- सुमन्त पंड्या . @ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .   शुक्रवार 11 मार्च 2016. #स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी  फिर होवे चर्चा आज दिन ११ मार्च २०१७ . जयपुर डायरी ब्लॉग पर प्रकाशित  ११ मार्च २०१७ . -----------------------------------------

कँवर साब। 

Sumant Mama, flanked by two healthy Kanwars, you look great... Vasudha Nanawati आरोग्य पर्यटन के लिए आए इन दो कँवर साब के साथ कल मेरी ये फ़ोटो वाट्सएप ग्रुप पर डाली थी जो ली थी जीवन संगिनी मंजु पंड़्या ने , भाणजी ने तारीफ़ कर दी तो अब इसे फ़ेसबुक पर साझा किए दे रहा हूं । पात्र परिचय : मेरे इधर हैं जय वर्धन J.r. Bhatt पर्यावरण मंत्रालय में वरिष्ठ वैज्ञानिक जिन्हें राष्ट्रपति सम्मानित कर चुके हैं . साथ ही बताता चलूं कि मेरी भाणजी Neeraja Bhatt दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाती है . दूसरी तरफ़ हैं भूषण जी याने भारत भूषण नानावटी साब जो भारतीय राजस्व सेवा के उच्च अधिकारी रहे हैं और उधर भाणजी वसुधा आजकल ओ एन जी सी की मेक्सिको की कंट्री हैड़ है . ये लोग आए तो बड़ा अच्छा लगा , मेरे क़िस्सों और ब्लॉग के मुरीद हुए ये लोग और मेरे लेखन को प्रोत्साहित किया , मैंने भी आत्म प्रचार के लिए कई लिंक दे दिए , ख़ैर . स्थान : ये स्थान है अपोलो स्पेकट्रा , जयपुर अस्पताल जो वही है पंड़्या हॉस्पिटल नाम से जाना जाता रहा है । आज भी इसकीपहचान डाक्टर रोहित पंड़्या और डाक्टर रेणुका पंड़्या के नाम से है  ये दिग्गज तो सोशल मीडिया पर आने की ज्यादा फुरसत नहीं निकाल पाते पर और लोगों की तो निगाह में आएगी ये फोटो तो जरूर कहेंगे : " क्या बात , क्या बात !! " 😊 ---------- दोनों भाणजियों की तारीफ़ पाकर अब ये साहस हुआ कि इसे अपने ब्लॉग पर जोड़ रहा हूं . सुमन्त पंड़्या  गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर . १० मार्च २०१७ . -------------------------------- जयपुर डायरी

Thursday, 9 March 2017

बच्चे कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता ... #जयपुरडायरी .

बच्चे कब बड़े हो जाते है पता ही नहीं चलता . #जयपुरडायरी . -------------------------------------------- कल की अपनी पोस्ट में मैंने राम अवतार जी का जिक्र किया जो अस्सी के दशक से नाहर गढ़ की सड़क पर रैक्स टेलर्स के नाम से दर्जी की दूकान किया करते थे . उन दिनों की ही एक बात बताता हूं . मेरी पैंट सिलने के वो चालीस रुपए लेते और बेटे की पैंट के बीस . चलता रहा यही क्रम . एक बार की बात हिसाब करते हुए उन्होंने बेटे की पैंट के भी चालीस जोड़ दिए . मैं बोला ," आपने तो बच्चे की पैंट की सिलाई भी पूरी लगा दी राम अवतार जी ?"  उन्होंने तुरन्त काउंटर पर मेरी और बेटे की पैंटें साथ साथ फैला दीं , नापने की गरज से और बोले : "भाई साब थोड़ा गौर करो , आपकी पैंट से थोड़ी ज्यादा ही लंबी है , कम नहीं है . अब तो पूरी ही सिलाई दीजिए . "  अब भला मुझे क्या ऐतराज हो सकता था . पर मुझे ध्यान ही नहीं था कि बेटे का कद मुझसे लंबा होता जा रहा है . माता पिता की तो हमेशा यही चाहत होती है कि संतान का कद लंबा हो . अम्मा ने मुझे ये कायदा भी बताया था कि बेटा नाटा रह जाय तो भी मां से लंबा ही निकलता है . स्पष्टीकरण : आज की इस पोस्ट को किसी भी प्रकार पुत्र संतान मोह , या पुत्री संतान की उपेक्षा रूप में न देखा जाए . दुर्भाग्य से ऐसी बातें आजकल सोशल मीडिया में चल जो रही हैं . पुत्री संतान के बाबत अलग से पोस्ट लिखूंगा तो यह बात और अधिक स्पष्ट हो जाएगी . समर्थन : सुप्रभात . Good morning. सुमन्त  (Sumant Pandya ) आशियाना आंगन . भिवाड़ी . 4 मई 2015 . -------------------------- कल बेटे ने मुझे एक फ़ोटो एफ बी पर साझा करने का सुझाव दिया तो अनायास ये एक पुरानी पोस्ट याद आ गई , आज इस पोस्ट को ब्लॉग पर दर्ज करता हूं और इसका लिंक डालता हूं एफ बी की अपनी दीवार पर । चाहत ये है कि मेरे ब्लॉग का कलेवर बढ़े और बढ़े मेरे सम्पर्क का दायरा । जीवन संगिनी का जो अपार सहयोग इस मामले में इन दिनों मिल रहा है उसे भी मैं यहां सार्वजनिक रूप से स्वीकार करता हूं .  Good morning and private coffee done @ गुलमोहर ☕.  नियमित पोस्ट अलग से लिखूंग़ा , उसमें कोताही नहीं होगी एक बार मोती पार्क हो आवें वहां भी साथी बाट जोहते हैं . सुमन्त पंड़्या  गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर . शुक्रवार १० मार्च २०१७ . ------------------------------- जयपुर डायरी

Wednesday, 8 March 2017

बाबू लाल ' माट साब ' : बनस्थली डायरी

       ओहदे में बाबू और कहावें माट साब * : बनस्थलीडायरी

बनस्थली में मेरे सेवाकाल के अंतिम दशक में फैकल्टी का दफ्तर वाणी मंदिर में हुआ करता था . दफ्तर में मुझे भी अपनी हाजरी दर्ज करने तो जाना ही होता था .  दफ्तर बाबू लोगों से ही आबाद रहता था और सच कहूं तो मेरा भी उन बाबू लोगों से अच्छा याराना था . ऐसा लगता था जैसे अपनी क्लास के आगे पीछे एक एक्सट्रा क्लास बाबू लोगों की भी मेरे जिम्मे है . उसी दौर का एक बहुत छोटा सा प्रसंग आज याद आ रहा है , वही सुनाता हूं .

वाणी मंदिर दफ्तर में बाबू लाल नाम के एक बाबू काम करते थे , बड़े अच्छे  कम्प्यूटर टाइपिस्ट इन बाबू लाल को साथ के दूसरे बाबू 'माट साब' बुलाते थे . यह सम्बोधन मुझे थोड़ा अटपटा इसलिए लगता कि मैं इसे अपने लिए आरक्षित मानता था . आखिर मेरा यार राम निवास जो प्रायः तांबे का रामझारा लिए  घूमता था और साधिकार मुझे पानी पिलाने चला आता था वह माट साब ही तो कहता था .

एक दिन मैंने उन बाबू लोगों से पूछा कि आप लोग इनको माट साब क्यों कहते हो  . वे सब लोग बताने लगे कि हम लोगों में ये अकेले ऐसे बाबू हैं जिन्होंने टीचर ट्रेनिंग ली है . उनकी सूचना के अनुसार , यदि मुझे ठीक से याद है तो कुछ समय बाबू लाल ने पढ़ाने का काम भी किया पर शायद स्थाई नियुक्ति नहीं मिल पाई .

यह जानकर कि बाबूलाल एक ट्रेंड टीचर हैं मैंने सहज प्रश्न कर लिया :

" आप ने टीचर ट्रेनिंग ली थी तो फिर आप दफ्तर के बाबू क्यों बन गए ?"

ये सुनकर एक और बाबू जो बोले वो ही इस किस्से का उपसंहार कहा जा सकता है :

" ये भी क्या करते सर , ये मजबूर थे , घर वालों ने नाम भी तो बाबू लाल रख दिया था ."

एक प्रकार से बाबू बनाने की बिसात तो बचपन में ही बिछ गई थी .

बाबू लाल अध्यापक बनना चाहते थे पर दफ़्तर का  काम करने को मजबूर हुए .

मैंने भी इस मौके पर कहा कि भाई नसीब वाले होते हैं वो बनते हैं

'माट साब'.

आज की पोस्ट तो मैं अपने यार बाबू लोगों को ही समर्पित करता हूं .

  अनायास ही राम निवास का ज़िक्र आ गया है  ,  पूसवाड़ी के रामनिवास पर अलग से कोई पोस्ट लिखूंगा और एक अलग पोस्ट लिखूंगा गोपाल नायक पर जो मेरे समय में वहां गार्डन सुप्रिन्डेंटेन्ट हुआ करते थे ,कल उड़ीसा दिवस पर वो  बहुत याद आए .

अंग्रेजों के जमाने से ही ये बाबू ओहदा बड़ा ओहदा रहा है , इसी लिए तो आज भी अपने बड़ों को 'बाबू जी' कहने का रिवाज चला आया है . आज की पोस्ट इसी लिए बाबू लोगों को समर्पित करता हूं .

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समर्थन और समीक्षा : मंजु पंड्या .

सुप्रभात .

Good morning .

सुमन्त पंड्या .

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

2 अप्रेल  2015 .

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कोई दो बरस पुरानी पोस्ट है , आज इसे ब्लॉग पर पोस्ट किए देता हूं , आशा है आप सराहेंगे .

सुमन्त पंड्या

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

गुरूवार ९ मार्च २०१७.

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स्थानापन्न - शिक्षा महाविद्यालय 🔔🔔

       स्थानापन्न : शिक्षा महाविद्यालय में .

बनस्थली में नया नया पढ़ाने लगा था , राजनीतिशास्त्र मेरा विषय भी था और विभाग का नाम भी . उम्र और अनुभव में सबसे छोटा था . छोटे को काम बता दो तो लपक कर करता है ये तो मानी बात है पर एक ऐसा भी प्रसंग आया जो  मुझे असमंजस में डालने वाला था आज वही कहता हूं .

आई बी वर्मा साब वहां के शिक्षा महाविद्यालय के प्रिंसिपल थे उन्होंने तय किया कि प्रशिक्षु  अध्यापिकाओं को कुछ सब्जेक्ट कंटेंट भी पढ़ाया जाना चाहिए , शायद इसे पाठ्यक्रम का भाग भी बनाया गया और सहोदर  महा विद्यालय से मुझपर आन पड़ी ये जिम्मेदारी कि बी एड कक्षाओं को मैं  नागरिक शास्त्र का पाठ पढ़ाउं . यहां यह भी कहता चलूं कि तब स्कूल में नागरिक शास्त्र पढ़ाया जाता था और कालेज में राजनीति शास्त्र . ये दस जमा दो का ज़माना आने पर उस ' नागरिक शास्त्र ' विषय का तो लोप ही हो गया है और अब तो संकाय चयन के बाद राजनीति शास्त्र की  ही पढ़ाई कराई जाती है , ये एक अलग बहस होगी इसे अभी छोड़ता हूं . लौटता हूं तब की ही बात पर .

ये वो ज़माना था जब जे टी सी  और  एस टी सी की सनद लेकर भी स्कूल अध्यापक अध्यापिका बन जाया करते थे  और सेवा में रहते  स्टडी लीव लेकर बी एड किया करते थे जो एक बड़ी डिग्री मानी जाती थी . मुझे ऐसी ही क्लास मिली थी जिसे ' कंटेंट ' पढ़ाने की जिम्मेदारी मुझे  मिली थी .
कक्षा का स्वरूप : आयु और अनुभव में मुझसे कमतर तो शायद ही कोई प्रशिक्षु अध्यापिका थी   हां मुझसे दोनों तरह से बड़ी तो कई एक थीं जिनमें से केवल तीन का ज़िक्र यहां करूंगा , जम्मू कश्मीर राज्य से आयीं कोई  डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स थीं , अरुणा तिवारी थीं जो बनस्थली के ही स्कूल की अध्यापिका थीं और थी   राजस्थान विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग  में मेरी सीनियर रही लेखा  . ये पात्र परिचय तो मुझे आज तक याद है .
मेरा द्वंद्व  यह  था कि ये  अध्यापिकाएं जो कंटेंट पढकर ही आई हैं  अब प्रक्षिक्षण लेने तो मैं इन्हें पढ़ाकर क्या सूर्य को दीपक दिखाऊंगा .
अपने इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए मैंने छाना सर गोपीनाथ पुरोहित पुस्तकालय  के रैक को  और एक किताब ढूंढ लाया जो उन किताबों से इतर थी जो मैंने विद्यार्थी के रूप में पढ़ी थी . ये थी :
Gurumukh Nihaal Singh : The changing concept of citizenship .
मुझे एक सहारा ये मिल गया कि कुछ तो इतर बताऊं इनको जो पहले की पढ़ाई में न आया हो .
जैसे तैसे बन गई बात और हो गया मेरा जिम्मा पूरा . सत्रांत में जब बी एड की प्रशिक्षुअध्यापिकाएं आपस में विदा होने को पार्टी करने लगीं तो मैं भी वहां आमंत्रित था .
महिला दिवस की बधाई .
सहयोग : Manju Pandya

सुप्रभात .

सुमन्त
गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर . जयपुर .
8 मार्च 2015 .
#बनस्थलीडायरी

#शिक्षमहाविद्यालय

Tuesday, 7 March 2017

झूठ बोले कौवा काटे : जयपुर डायरी 

झूठ बोले कौआ काटे : #जयपुरडायरी #sumantpandya ----------------------------------------- अभी कोई दो एक दिन पहले की ही बात है , दिन में राम स्वरूप जी सब्जी वालों की वैन घर के बाहर आई नहीं और वक्त जरूरत के हिसाब से बापू नगर के जनता स्टोर चौक में मुझे सब्जी लेने जाना पड़ा वहीँ की एक छोटी सी बात आज बताता हूं . उस दिन भी गहक के मिले ये लडके लोग और बोले ,’ बाबूजी आ गए ‘ सच कहूं इनसे मिलना भी मुझे बड़ा अच्छा लगता है , एक बारी तो मुझे ऐसा भी लगा था कि डेरी वाले राहुल की तरज़ पर ये मुझे ताऊजी ही कह रहे हैं पर फिर बात साफ़ हुई कि वो ‘ बाउजी ‘ कह रहे थे और मैं ताउजी सुन रहा था . खैर , अभी और बात . मैं नीचे खड़ा था कि दूकान में कुछ हुज्जत होती सुनी , मामला ये कि सब्जी वाले पिछली बार का कुछ बकाया भुगतान मांग रहे थे और ग्राहक का कहना था कि मिलती जुलती शकल का कोई और ग्राहक रहा होगा और के मैं तो आई ए एस ऑफिसर हूं . जाने दीजिए मामला जल्दी ही सुलझ गया पर मेरे कान खड़े हो गए कि सब्जी खरीदते भी किसी को आई डी बतानी पड़े क्या बखत आ गया . जब सब्जी खरीदते ग्राहक नीचे आ ही गए तो मैंने भी अपनी वय का लाभ उठाते हुए उनके कंधे पर हाथ रखकर एक ही सवाल पूछा ,” कौन साब हैं आप ? “ . खैर उन्होने अपना नाम , महकमा , घर का पता , रहवास और बहुत कुछ बताया और बदले में मुझसे भी परिचय पूछा जो बताया मैंने . बहर हाल वो जो अपना पता बता रहे थे वहां के ही मेरे एक दोस्त का का मैंने उल्लेख किया पर वो वाकिफ नहीं निकले , कुछ शक हुआ मुझे कि ऐसा कैसे ? खैर . मेरे घर के पते की जो बात चली वो होते हवाते छोटे भाई के नाम तक आ गई , जो मेरे दुबारा जयपुर आकर बसने के बहुत पहले से इस इलाके में रह रहा है . भाई ने शासन सचिवालय में लंबे अरसे तक काम किया था , उसे तो वो साब भी जानते निकले . और आगे मुझसे उन्होंने वही पूछा जो लोग पूछते हैं कि बापू नगर में आ बसने से पहले कहां था , क्या काम करता था . मैंने बनस्थली का जिक्र किया वो वाकिफ थे . खैर इस सब को छोड़ें अब वो बात जो मेरे मन में थी कौन सही था , सब्जी वाले लडके जो बकाया मांग रहे थे या वो साहब जो ग्राहक थे और किसी मिलती जुलती शकल वाले पर इल्जाम मढ़ रहे थे . कल को ये लड़के लोग मुझसे भी तो ऐसे ही पुराना बकाया मांग बैठेंगे तो क्या करूंगा , अब याददाश्त भी तो धोका देती है . खैर यही सोचता विचारता घर चला आया था पर प्रश्न बराबर मन में था कि सचाई क्या थी . घर आकर भाई को भी बताया कि अमुक विभाग के अमुक नाम के सज्जन मिले थे और जनता स्टोर के सब्जी वालों के पास क्या बात हो रही थी वो अपने को आई ए एस आफिसर बता रहे थे .और भाई ने वो बात ही ये कहकर रद्द कर दी कि उस विभाग में कही गई हैसियत का कोई आई ए एस है ही नहीं . और भी पड़ताल करवाई मैंने और मैं अभी हाल के लिए इस नतीजे पर पहुंचा कि सब्जी वाले लडके ही शायद सही थे और कल को वो मुझसे भी बिना बात पुराना बकाया नाम पर कोई रकम मांग बैठेंगे ये चिंता करने की कोई भी जरूरत नहीं है . एक प्रीमियर सेवा का नाम यहां किस इत्तफाक से आया है उसके अतिरिक्त स्पष्टीकरण की मैं आवश्यकता नहीं समझता . किसी को बदनाम करने की गरज से ये पोस्ट नहीं है इस लिए पड़ताल और पहचान मैंने छिपाई है . फोटो इस घटना के दिन की नहीं है ये भी कहे देता हूं . वो तो इत्तफाक से मेरे मोबाइल कैमरा में तब आ गई थी जब ये लडके बोले थे , “ बाबूजी हमारी भी फोटो खींचो .” मेरे इस पोस्ट में घटना विशेष के उल्लेख से कोई आहत हुआ हो तो क्षमा चाहूंगा , मैंने तो जो हुआ वो लिखा . मैंने कोई शाश्वत सत्य नहीं कहा है यहां केवल एक अंतरिम निष्कर्ष निकाला है . पता नहीं आज कल मेरे लिखे का बुरा बहुत मान जाते हैं लोग . इसीलिए तो थोड़े दिनों पहले मैंने लिखा था कि फेस बुक पर होना भी जंजाल हो गया . क्या कहा शीर्षक के रूप में फ़िल्मी गाने की पंक्ति क्यों ? अच्छा सवाल है आपका , बात ये है कि आजकल ऐसा चलन है . ~~~~ सुप्रभात . सुमन्त पंड्या .  समर्थन अपेक्षित : Manju Pandya @ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .    मंगलवार 8 मार्च 2016 . ******** #स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी गुलमोहर कैम्प , जयपुर से सुप्रभात 🔔🔔 आज इस किस्से को थोड़ा एडिट कर ब्लॉग पर प्रकाशित करूंगा . - सुमन्त पंड्या  ८ मार्च २०१७ . -------------------------------------------------

Monday, 6 March 2017

                                 मेरा स्कूल बंद : जयपुरडायरी

   

#बनस्थलीडायरी  : शिक्षा के आचार्यों से संवाद . -----------------------------------------------   बहुत पुरानी बात हो गई ये तो पिछली शताब्दी की बात है और तब की बात है जब बनस्थली विद्यापीठ विश्वविद्यालय बना भी नहीं था , राजस्थान विश्वविद्यालय के ही अंतर्गत आता था , इसी विश्वविद्यालय के अधीन स्वायत्तता अर्जित करने की बातें चल रही थीं . फिर जो कुछ हुआ वो पुराने लोग जानते हैं वो बातें अभी मेरा अभीष्ट नहीं है . उस समय दो प्रीमियर कॉलेज थे विद्यापीठ में 1. ज्ञान विज्ञान महाविद्यालय , जिसमें मैं भी था समय समय पर कई नामी लोग यहां आए जिनकी बड़ी इज्जत थी . 2 . शिक्षा महाविद्यालय , जिसकी बड़ी महत्ता थी . आज की तरह बहुत से बी एड की डिग्री दिलाने वाले कॉलेज प्रांत में नहीं थे , यहां तक कि राजस्थान विश्वविद्यालय का मौजूदा शिक्षा संकाय भी जन्मा नहीं था . तब के बनस्थली के प्रिंसिपल एल के ओड साब ही इस विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ एजूकेशन के डीन हुआ करते थे और भी अच्छे शिक्षा विशेषज्ञ थे कॉलेज में . आगे जो कहने जा रहा हूं उसी जमाने की बात है आशा है बात के मायने ठीक समझे जाएंगे , वरना तो आजकल लोग जाने क्या   का  क्या  समझने लगते हैं और सामान्य शिष्टाचार में भी बदलाव आ जाता है . होनहार की बात : मेरी बस यात्रा : ----------------------------------- मुझे याद है बनस्थली से जयपुर की यात्रा के लिए मैं बस में  बैठा था मेरे आगे सीट पर ओड साब भी बैठे थे और साथ में थे रवीन्द्र अग्निहोत्री और वीरेंद्र सब्बरवाल , ओड साब तब प्रिंसिपल थे और बाकी दोनों प्राध्यापक . ये लोग समय समय पर राजस्थान बोर्ड द्वारा स्कूलों के निरीक्षण के लिए भेजे जाते थे . दोनों प्राध्यापक एक स्कूल के निरीक्षण के लिए जा रहे थे , ओड साब कहां जा रहे थे ये तो मुझे पता नहीं पर ये खूब याद है कि उन्होंने अपने साथियों  से एक स्कूल के बारे में क्या कहा था . वो बोले थे कि स्कूल तो यों ही है और लड़के भी यों ही हैं . स्कूल का नाम सुनकर मेरे कान खड़े हो गए तब मेरी उमर कम थी तो ये कहना भी उचित होगा कि रोंगटे खड़े हो गए . मैंने ओड साब को पीछे झंकाया और पूछा कि आप उस स्कूल के पढ़े लडके  से मिले हो कभी ? न मिले हो तो अभी मिल लेओ . आप निरीक्षण करने जा रहे लोगों को क्यों ऐसे प्रभावित कर रहे हो . मेरी व्यथा को समझकर ओड साब ने अपनी बात वापिस ली ये बड़प्पन था उनका . आज दिन ये कोई छिपी बात नहीं है कि पुराना तोपखाना में चलने वाला दरबार मल्टी परपज हायर सैकेंडरी स्कूल ( आगे फिर नाम बदल गया ) किस खूबी से बंद कर दिया गया , कितना बड़ा खेल हुआ पैसे वालों की लॉबी का .  भू माफिया और सत्ता का गठजोड़ क्या न करवा देवे . अगर पूंजी और सत्ता का गठजोड़ ऐसा ही रहा और जो आज दीख ही रहा है , शिक्षा बाजार के हवाले ही रही तो आगे उदारवादी शिक्षा का क्या होगा ये चिंतनीय है ही . और भी कहूंगा पर अभी हाल के लिए प्रातःकालीन सभा स्थगन से पहले एक शेर कहता हूँ :   “  गो ज़रा सी बात पर बरसों के याराने गए     लेकिन इतना तो हुआ कुछ लोग पहचाने गए .”

शेर ख़ातिर गज़नवी का है और इसे पूरा याद करने में मेरी मदद को हिमांशु आया है . (हिमांशु उल हक़ }

वो चलते चलते इस बात को भी स्वीकारूं कि बौद्धिक विमर्श में संतान और और अपनी छात्राओं से परास्त होना मुझे भी अच्छा ही लगता है . जो लोग हिसा की भाषा बोलते हैं मैं उनकी निंदा करता हूँ सुप्रभात . 🌻 सुमन्त पंड्या .  समर्थन : Manju Pandya @ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .     सोमवार 7 फरवरी 2016 . -------- आज का अपडेट ************

#स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी #बनस्थलीडायरी

गुलमोहर कैम्प जयपुर से सुप्रभात 🔔🔔

Good morning & private coffee done ☕. आज इस पोस्ट को अपने ब्लॉग पर जोड़ता हूं . मंगलवार ७ मार्च २०१७ .  संलग्न मेरी उस ज़माने की तस्वीर जब मैं स्कूल में पढ़ा करता था . एक और तस्वीर ब्लॉग से  जोड़ने की कोशिश है जो बाद की है .  ये बनस्थली में सेवाकाल के अंतिम दशक की है . इसका श्रेय मिहिर को .