Friday, 10 March 2017
ओ हो हो : जयपुर डायरी .
कँवर साब।
Thursday, 9 March 2017
बच्चे कब बड़े हो जाते हैं पता ही नहीं चलता ... #जयपुरडायरी .
Wednesday, 8 March 2017
बाबू लाल ' माट साब ' : बनस्थली डायरी
ओहदे में बाबू और कहावें माट साब * : बनस्थलीडायरी
बनस्थली में मेरे सेवाकाल के अंतिम दशक में फैकल्टी का दफ्तर वाणी मंदिर में हुआ करता था . दफ्तर में मुझे भी अपनी हाजरी दर्ज करने तो जाना ही होता था . दफ्तर बाबू लोगों से ही आबाद रहता था और सच कहूं तो मेरा भी उन बाबू लोगों से अच्छा याराना था . ऐसा लगता था जैसे अपनी क्लास के आगे पीछे एक एक्सट्रा क्लास बाबू लोगों की भी मेरे जिम्मे है . उसी दौर का एक बहुत छोटा सा प्रसंग आज याद आ रहा है , वही सुनाता हूं .
वाणी मंदिर दफ्तर में बाबू लाल नाम के एक बाबू काम करते थे , बड़े अच्छे कम्प्यूटर टाइपिस्ट इन बाबू लाल को साथ के दूसरे बाबू 'माट साब' बुलाते थे . यह सम्बोधन मुझे थोड़ा अटपटा इसलिए लगता कि मैं इसे अपने लिए आरक्षित मानता था . आखिर मेरा यार राम निवास जो प्रायः तांबे का रामझारा लिए घूमता था और साधिकार मुझे पानी पिलाने चला आता था वह माट साब ही तो कहता था .
एक दिन मैंने उन बाबू लोगों से पूछा कि आप लोग इनको माट साब क्यों कहते हो . वे सब लोग बताने लगे कि हम लोगों में ये अकेले ऐसे बाबू हैं जिन्होंने टीचर ट्रेनिंग ली है . उनकी सूचना के अनुसार , यदि मुझे ठीक से याद है तो कुछ समय बाबू लाल ने पढ़ाने का काम भी किया पर शायद स्थाई नियुक्ति नहीं मिल पाई .
यह जानकर कि बाबूलाल एक ट्रेंड टीचर हैं मैंने सहज प्रश्न कर लिया :
" आप ने टीचर ट्रेनिंग ली थी तो फिर आप दफ्तर के बाबू क्यों बन गए ?"
ये सुनकर एक और बाबू जो बोले वो ही इस किस्से का उपसंहार कहा जा सकता है :
" ये भी क्या करते सर , ये मजबूर थे , घर वालों ने नाम भी तो बाबू लाल रख दिया था ."
एक प्रकार से बाबू बनाने की बिसात तो बचपन में ही बिछ गई थी .
बाबू लाल अध्यापक बनना चाहते थे पर दफ़्तर का काम करने को मजबूर हुए .
मैंने भी इस मौके पर कहा कि भाई नसीब वाले होते हैं वो बनते हैं
'माट साब'.
आज की पोस्ट तो मैं अपने यार बाबू लोगों को ही समर्पित करता हूं .
अनायास ही राम निवास का ज़िक्र आ गया है , पूसवाड़ी के रामनिवास पर अलग से कोई पोस्ट लिखूंगा और एक अलग पोस्ट लिखूंगा गोपाल नायक पर जो मेरे समय में वहां गार्डन सुप्रिन्डेंटेन्ट हुआ करते थे ,कल उड़ीसा दिवस पर वो बहुत याद आए .
अंग्रेजों के जमाने से ही ये बाबू ओहदा बड़ा ओहदा रहा है , इसी लिए तो आज भी अपने बड़ों को 'बाबू जी' कहने का रिवाज चला आया है . आज की पोस्ट इसी लिए बाबू लोगों को समर्पित करता हूं .
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समर्थन और समीक्षा : मंजु पंड्या .
सुप्रभात .
Good morning .
सुमन्त पंड्या .
आशियाना आंगन , भिवाड़ी .
2 अप्रेल 2015 .
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कोई दो बरस पुरानी पोस्ट है , आज इसे ब्लॉग पर पोस्ट किए देता हूं , आशा है आप सराहेंगे .
सुमन्त पंड्या
@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .
गुरूवार ९ मार्च २०१७.
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स्थानापन्न - शिक्षा महाविद्यालय 🔔🔔
स्थानापन्न : शिक्षा महाविद्यालय में .
बनस्थली में नया नया पढ़ाने लगा था , राजनीतिशास्त्र मेरा विषय भी था और विभाग का नाम भी . उम्र और अनुभव में सबसे छोटा था . छोटे को काम बता दो तो लपक कर करता है ये तो मानी बात है पर एक ऐसा भी प्रसंग आया जो मुझे असमंजस में डालने वाला था आज वही कहता हूं .
आई बी वर्मा साब वहां के शिक्षा महाविद्यालय के प्रिंसिपल थे उन्होंने तय किया कि प्रशिक्षु अध्यापिकाओं को कुछ सब्जेक्ट कंटेंट भी पढ़ाया जाना चाहिए , शायद इसे पाठ्यक्रम का भाग भी बनाया गया और सहोदर महा विद्यालय से मुझपर आन पड़ी ये जिम्मेदारी कि बी एड कक्षाओं को मैं नागरिक शास्त्र का पाठ पढ़ाउं . यहां यह भी कहता चलूं कि तब स्कूल में नागरिक शास्त्र पढ़ाया जाता था और कालेज में राजनीति शास्त्र . ये दस जमा दो का ज़माना आने पर उस ' नागरिक शास्त्र ' विषय का तो लोप ही हो गया है और अब तो संकाय चयन के बाद राजनीति शास्त्र की ही पढ़ाई कराई जाती है , ये एक अलग बहस होगी इसे अभी छोड़ता हूं . लौटता हूं तब की ही बात पर .
ये वो ज़माना था जब जे टी सी और एस टी सी की सनद लेकर भी स्कूल अध्यापक अध्यापिका बन जाया करते थे और सेवा में रहते स्टडी लीव लेकर बी एड किया करते थे जो एक बड़ी डिग्री मानी जाती थी . मुझे ऐसी ही क्लास मिली थी जिसे ' कंटेंट ' पढ़ाने की जिम्मेदारी मुझे मिली थी .
कक्षा का स्वरूप : आयु और अनुभव में मुझसे कमतर तो शायद ही कोई प्रशिक्षु अध्यापिका थी हां मुझसे दोनों तरह से बड़ी तो कई एक थीं जिनमें से केवल तीन का ज़िक्र यहां करूंगा , जम्मू कश्मीर राज्य से आयीं कोई डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स थीं , अरुणा तिवारी थीं जो बनस्थली के ही स्कूल की अध्यापिका थीं और थी राजस्थान विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग में मेरी सीनियर रही लेखा . ये पात्र परिचय तो मुझे आज तक याद है .
मेरा द्वंद्व यह था कि ये अध्यापिकाएं जो कंटेंट पढकर ही आई हैं अब प्रक्षिक्षण लेने तो मैं इन्हें पढ़ाकर क्या सूर्य को दीपक दिखाऊंगा .
अपने इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए मैंने छाना सर गोपीनाथ पुरोहित पुस्तकालय के रैक को और एक किताब ढूंढ लाया जो उन किताबों से इतर थी जो मैंने विद्यार्थी के रूप में पढ़ी थी . ये थी :
Gurumukh Nihaal Singh : The changing concept of citizenship .
मुझे एक सहारा ये मिल गया कि कुछ तो इतर बताऊं इनको जो पहले की पढ़ाई में न आया हो .
जैसे तैसे बन गई बात और हो गया मेरा जिम्मा पूरा . सत्रांत में जब बी एड की प्रशिक्षुअध्यापिकाएं आपस में विदा होने को पार्टी करने लगीं तो मैं भी वहां आमंत्रित था .
महिला दिवस की बधाई .
सहयोग : Manju Pandya
सुप्रभात .
सुमन्त
गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर . जयपुर .
8 मार्च 2015 .
#बनस्थलीडायरी
#शिक्षमहाविद्यालय
Tuesday, 7 March 2017
झूठ बोले कौवा काटे : जयपुर डायरी
Monday, 6 March 2017
मेरा स्कूल बंद : जयपुरडायरी
#बनस्थलीडायरी : शिक्षा के आचार्यों से संवाद . ----------------------------------------------- बहुत पुरानी बात हो गई ये तो पिछली शताब्दी की बात है और तब की बात है जब बनस्थली विद्यापीठ विश्वविद्यालय बना भी नहीं था , राजस्थान विश्वविद्यालय के ही अंतर्गत आता था , इसी विश्वविद्यालय के अधीन स्वायत्तता अर्जित करने की बातें चल रही थीं . फिर जो कुछ हुआ वो पुराने लोग जानते हैं वो बातें अभी मेरा अभीष्ट नहीं है . उस समय दो प्रीमियर कॉलेज थे विद्यापीठ में 1. ज्ञान विज्ञान महाविद्यालय , जिसमें मैं भी था समय समय पर कई नामी लोग यहां आए जिनकी बड़ी इज्जत थी . 2 . शिक्षा महाविद्यालय , जिसकी बड़ी महत्ता थी . आज की तरह बहुत से बी एड की डिग्री दिलाने वाले कॉलेज प्रांत में नहीं थे , यहां तक कि राजस्थान विश्वविद्यालय का मौजूदा शिक्षा संकाय भी जन्मा नहीं था . तब के बनस्थली के प्रिंसिपल एल के ओड साब ही इस विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ एजूकेशन के डीन हुआ करते थे और भी अच्छे शिक्षा विशेषज्ञ थे कॉलेज में . आगे जो कहने जा रहा हूं उसी जमाने की बात है आशा है बात के मायने ठीक समझे जाएंगे , वरना तो आजकल लोग जाने क्या
शेर ख़ातिर गज़नवी का है और इसे पूरा याद करने में मेरी मदद को हिमांशु आया है . (हिमांशु उल हक़ }
वो चलते चलते इस बात को भी स्वीकारूं कि बौद्धिक विमर्श में संतान और और अपनी छात्राओं से परास्त होना मुझे भी अच्छा ही लगता है . जो लोग हिसा की भाषा बोलते हैं मैं उनकी निंदा करता हूँ सुप्रभात . 🌻 सुमन्त पंड्या . समर्थन : Manju Pandya @ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर . सोमवार 7 फरवरी 2016 . -------- आज का अपडेट ************#स्मृतियोंकेचलचित्र #जयपुरडायरी #बनस्थलीडायरी
गुलमोहर कैम्प जयपुर से सुप्रभात 🔔🔔
Good morning & private coffee done ☕. आज इस पोस्ट को अपने ब्लॉग पर जोड़ता हूं . मंगलवार ७ मार्च २०१७ . संलग्न मेरी उस ज़माने की तस्वीर जब मैं स्कूल में पढ़ा करता था . एक और तस्वीर ब्लॉग से जोड़ने की कोशिश है जो बाद की है . ये बनस्थली में सेवाकाल के अंतिम दशक की है . इसका श्रेय मिहिर को .