Monday, 30 July 2018

जिसकी तलाश थी वो मिल गया : तकिया कलाम की कहानी

जिसकी तलाश थी वो मिल गया …..! : तकिया कलाम  की कहानी

अक्सर ये बात मैं बड़ा गहक के कह दिया करता हूं :

" जिसकी तलाश थी वो मिल गया ."

ऐसे ही मेरे और भी तकिया कलाम हैं , जैसे :
१.
ये तो बार की बात छै माट साब  .. फेर तो थे जाणो !
और
२.
प्यारे मोहन जी नै ने जाणो ..?

मेरे हर तकिया कलाम का कोई न कोई विशिष्ट ऐतिहासिक संदर्भ होता है और मुझे वो सीन याद आने लगता है जब किसी न किसी ने ये बात कही थी और आगे के लिए वो बात मेरे हाथ लग गई .
ख़ैर किस्सगोई के दौरान तकिया कलाम के ये मणके  मैं पिरोता भी रहता हूं और बताता हूं कि बात आईं क़हां से . ख़ैर अभी तो उस शीर्षक पर ही बात करें जो आज की पोस्ट के लिए दिया गया है :

" जिसकी तलाश थी वो मिल गया ."

अपने आप से बात :
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" किसकी तलाश थी ?"

इसी बात को स्पष्ट करने का प्रयास करूंग़ा .

" ये किसी व्यक्ति , वस्तु   या विचार किसी की भी तलाश हो सकती है जिसके पूरा होने पर मैं ऐसा कह बैठता हूं और अब तो ये वाक्य बोलना मेरी आदत में शामिल हो चुका है ."

" पर पहली बार ऐसा कहा किसने था ? "

" हां वही बताने का प्रयास है आज , ये  विशिष्ट व्यक्ति  की कही बात है जो आज तक मेरी ज़ुबान पर है . "
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अब आगे : फिर वो ही बात .

विशिष्ट अतिथि आए हुए थे , रवीन्द्र निवास में  ठहरे थे और इस बाबत दो एपिसोड मैंने अपने ब्लॉग और फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल पर लिखे भी थे . तीसरा एपिसोड जो अभी लिखा जाना बाक़ी है उसमें ही आता है ये प्रसंग  .

प्रसंग ये है कि स्नान के बाद जब वे धुले  और प्रेस  किए हुए कपड़े पहनने लगे तो पाया कि   पतलून में कमर का क्लिप पिचका हुआ है और उसे दुरुस्त किए बिना पतलून पहनना सम्भव नहीं था .
वो बौद्ध दर्शन में एक विचार आता है न  " अर्थ क्रिया कारित्व " वही सूझ रहा है मुझे तो यहां इस स्थिति के लिए . ख़ैर  बात आगे …

समस्या समाधान की वो बात सोच ही रहे होंगे कि उनका ध्यान अलमारी के ऊपर के खण की ओर गया  और वो अचानक बोल पड़े :

" जिसकी तलाश थी वो मिल गया ."
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वहां रखा एक पेचकस उठाकर वो ये बात बोले थे . पिचके क्लिप को दुरुस्त करने के लिए ये उपयुक्त उपकरण था जो उन्हें यहां मिल गया था .

वैसे इस पूरे प्रसंग का तीसरा एपिसोड जब आएगा तो ये बात और स्पष्ट  होएगी  कि आख़िर वो क्लिप पिचका हुआ था क्यों .
आज मैंने पूरी बात बताई कि ये तकियाकलाम  मैंने सीखा क़हां से था .

नमस्कार 🙏

सुमन्त पंड़्या
@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी
शनिवार ३१ दिसम्बर २०१६ .
#स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी #sumantpandya

कांई जात छै ? : बनस्थली डायरी .

कांई जात छै .......?

ये बात बनस्थली की है .
तब विद्यामंदिर में यू को बैंक का एक एक्सटेंशन काउंटर हुआ करता था और एक युवा बैंक अधिकारी वहां बैठता था . इस अधिकारी का नाम था प्रशांत निहलानी .
एक दिन की बात छात्रावास की दो परिचारिकाएं अपने खाते से रुपए निकालने आईं थीं और वहां बैठी थीं  . ये मेरे सामने की बात है कि उन दो में से किसी एक ने इस युवक से बड़ा सहज प्रश्न कर लिया :

" भाया , थारी कांई जात छै ?"
( भैया, तुम्हारी जाति क्या है ?")

हालांकि वो जिस काम से आई थीं उसमें इस  बात का कोई औचित्य नहीं था पर उन्होंने पूछ ही लिया और क्यूं पूछा ये भी बताता हूं . असल में जयपुर में जन्मा और पला , बड़ा हुआ प्रशांत निहलानी  ढूंढारी बोली बड़ी बढ़िया बोलता था और उसने इसी बोली में उन दोनों से बात की थी . अपना सा लगा तो उन्होंने पूछ लिया .

अब जानिए कि निहलानी क्या बोला :

" माजी , म्हे सिंधी  छां ." वो बोला.
(मां जी , हम सिंधी हैं.)

और वे दोनों प्रश्नकर्ता इस उत्तर से संतुष्ट थीं .
वो दोनों तो चली गईं रह गए मैं और निहलानी . मैं ने निहलानी से कहा कि जो सवाल था उसका ये जवाब तो पर्याप्त नहीं था . सिंधियों में भी तो जात बिरादरी होती है . मेरे जिस एक सिंधी परिवार से बड़े आत्मीय सम्बन्ध हैं वे ब्राह्मण हैं  और जिन यजमान के यहां वो कोई पूजन करवाने जयपुर आए थे ,और हमारे घर ठहरे थे , वो माहेश्वरी बनिया हैं .  पर हां विभाजन के बाद जो सिंधी इधर भारत में आ बसे उनकी जात बिरादरी के नाते पहचान से ज्यादा बड़ी पहचान ये बन गई कि वे सिंधी हैं . जात बिरादरी की बात गौण हो गई .
भारत में आ बसे बहुसंख्य सिंधी हिन्दू हैं और इसकी वजह सब को मालूम है , मुझे बताने की कोई आवश्यकता नहीं है .

और बहुत सी ऐसी ही बातें हैं बताने की , इसी बहाने चर्चा करने की .


प्रातःकालीन सभा स्थगित.
इति.

सह अभिवादन : Manju Pandya

सुमन्त पंड्या .
आशियाना आँगन, भिवाड़ी .
31 जुलाई 2015 .


क़िस्से का प्रकाशन  और लोकार्पण जुलाई २०१८.

Saturday, 28 July 2018

आप भी झेलो : भिवाड़ी डायरी .

सोने से पहले आज की पोस्ट :


सच क़हूं सब तरफ़ अथाह ज्ञान बिखरा पड़ा है और लोग सोशल मीडिया पर विभिन्न उपक्रमों को माध्यम बनाकर आई गई चीज़ को इधर उधर ठेलने में लगे हैं ।   

लोग बग़ैर कुछ देखे परखे संदेशों को अग्रप्रेषित करते रहते हैं । मेरे लिए तो इन आए संदेशों को झेलना मुश्किल होता जा रहा है । सयाने लोग एक से ज़्यादा फ़ोन नम्बर रखते हैं और वाट्सएप नम्बर हर किसी को देते भी नहीं । मूर्खों के सम्प्रदाय , याने मेरे संप्रदाय , में ऐसा नहीं होता । जिसे नम्बर मिल गया वो अपना बचा क़ुचा ड़ेटा जाने क्यों मुझपर ही न्योछावर कर देता है ।  

जो देखो जो कोई ग्रुप बना लेता है और महाराज ज़माने भर के चले संदेश इधर आ धमकते हैं । कुछ मामलों में तो मुझे यहां तक शक होता है कि मेजने वाले ने इसे ख़ुद भी बाँचा है के नहीं ।


अब सोशल मीडिया पर बने रहना है तो ये सब तो उसके साथ जुड़ा हुआ नफ़ा नुक़सान दोनों है जैसा भी आप समझो ।

और आगे करेंगे बात इस बाबत , अब इस मामले में कुछ न कुछ तो करना ही है ।


भिवाड़ी

२८ जुलाई २०१७ ।

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण : २८ जुलाई २०१८.

Friday, 27 July 2018

घोड़े बेचकर सोया : उदयपुर डायरी .

घोड़े बेचकर सोया ?


  बड़ा सीधा सा कार्य कारण सिद्धांत है , रात देर से सोया सुबह देर से उठा और ऐसे सुबह पोस्ट लिखने का समय बीत गया .

अभी एक दोस्त को बताया है जो चिंता कर रहे थे कि नित्य नियम में क्या बाधा आ गई . उन्हें बताया कि सब ठीक है .

फिर जीवन संगिनी से पूछा कि कोई आइडिया देवें , जो प्रसंग उन्होंने सुझाया उसी पर आ रहा हूं .

एक बार बनस्थली में घोड़े बेचकर सोया वो बात तो एक पोस्ट में बता ही चुका हूं ऐसा ही एक और प्रसंग बताए देता हूं . पहले कुछ फुटकर बातें फिर मुख्य बात जो आज बताने की है .

चौधरी के भाई के विवाह में बरात में गया था . वहां निकासी के दौरान दुल्हन के चाचा मुझसे बोले :


" बरात के साथ पंडित जी तो आप ही हो ?"

 वो भी सही बोले जब वो लगन लेकर आए थे तो लगन मैंने ही झिलाया था . 

उनको तो मैं क्या बोला अब याद नहीं मगर सावधान जरूर हो गया कि अब ये तो मुझे रात भर जगाने का मीजान बना रहे हैं . मैंने किया ये कि डिनर के फ़ौरन बाद उस गहमा गहमी को छोड़ छत पर जाकर सो गया और मेरी नींद तो अगले दिन सुबह तभी खुली जब वर वधू ने आकर मेरे पांव छुए . 


मैं तो अपने विवाह में भी रात भर नहीं जागा था तो मैंने वहां भी अपना टाइम टेबिल ठीक ही रक्खा. पर हमेश ऐसे नहीं हो पाता वो ही आगे बताता हूं . अपने विवाह में क्यों रात भर नहीं जागा वो तो बात ऐसी थी कि तब इस प्रकार के समारोह दो दिन चला करते थे . बीच की रात लोकाचार स्थगित हो जाया करते थे .

 आज कल दोनों ही प्रकार के प्रतिमान देखे जाते हैं उन पर अभी मैं कोई टीका नहीं कर रहा .

1984 की बात .

     जीजी के बेटे सुधीर का विवाह था उदयपुर में. दिसंबर का महीना था. सभी स्वजन इकठ्ठा हुए थे . आस पास ही वर पक्ष और वधू पक्ष के आवास थे . आस पास परिचितों के घरों में मेहमानों के ठहरने का इंतजाम था . मामा सम्प्रदाय के लिए किसी स्वजन का पूरा खाली मकान जीजी जीजाजी ने उपलब्ध कराया था जहां हम लोग ठहरे हुए थे .

अपवाद रूप में उस दिन मैं विवाह की रात को रात भर जागा आखिर जीजी के घर का एक मांगलिक कार्य होने जा रहा था .


पिछली सारी रात तो जागा ही था अगले दिन सुबह भी देर तक समारोह की विभिन्न गतिविधियां चल रही थीं . ठहरने के स्थान से सब लोग नहा धो कर तैयार होकर जीजी के घर अभ्युदय पहुंचने लगे . आखिर में मैं बच गया जिसे तैयार होकर जाना था . इस डेरे के सब लोग जब चले गए तो मैं अकेला था . मैंने आदत के मुताबिक़ पहले हजामत बनाई और फिर नहाया . चूंकि घर में अकेला था इसलिए सब ओर के दरवाजे मैंने बंद कर लिए और ये विचार कर के लेट गया कि पांच मिनिट को आराम करता हूं और फिर चलता हूं , फिर अभ्युदय पहुंच कर भोजन करूंगा . बस वहीँ गड़बड़ हो गई , मेरी आंख लग गई . कितनी देर हो गई मुझे कुछ पता नहीं .

उधर क्या हुआ ?

---------------- भोजन के लिए जब मैं नहीं पहुंचा तो मेरी ढूंढ मची . जीवन संगिनी सबसे पहले आईं और यहां आकर उन्होंने घंटी बजाई और बहुतेरा दरवाजा खटखटाया पर नतीजा कुछ न निकला . जब आधा घंटा बीत गया तो वो बाहर बैठकर रोने लगीं . उधर से और लोग भी आने लगे और ये चिंता का विषय बन गया . सारा माजरा भांप कर विनोद ने घर के चारों ओर चक्कर लगाया और ये तय किया कि सबसे कमजोर दरवाजा कौनसा है . पीछे का दरवाजा कुछ ढीला लगा वहीँ प्रहार किया और सांकल तोड़ दी .

विनोद ने तो आकर मुझे उठाकर बैठा ही कर दिया और मुझे बात ही समझ नहीं आ रही थी . मैंने तो यही पूछा:


" तुम अंदर कैसे आए ? मैं तो दरवाजा बंद करके आया था. "


मुझे अंदाज ही नहीं था कि इस बीच क्या कुछ हो गया और कितना समय हो गया . तब तक तो फिर खुद जीजी भी वहां आ गई और जीवन संगिनी की भी जान में जान आई .

जीजी ने आकर सब जानकर पूछा कि दरवाजा तो नहीं टूटा ? आखिर उन्होंने किसी परिचित का मकान मांग कर लिया था . और विनोद ने कहा:


" आप को दरवाजे की पड़ी है यहां तो ......."

नोट:

ये पोस्ट दिन में बनाना शुरु किया था , किश्तों में समय निकाल निकाल कर लिखते फिर रात हो गई . अब स्थगित करता हूं रात्रि कालीन सभा .

शुभ रात्रि.

सुझाव : Manju Pandya


आशियाना  आँगन, भिवाड़ी .

29 जुलाई 2015.

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण    जुलाई  २०१८.


Thursday, 26 July 2018

आओ बूंदी चलें : स्मृतियों के चलचित्र .

आओ बूंदी चलें :


      पिछले दिनों अनिल ने बूंदी नगर की एक सुन्दर तस्वीर फेसबुक पर साझा की तब से मुझे भी जब तब बूंदी की याद आ जाती है . एक साल मैंने भी वहां बिताया था . तब के सहपाठी दोस्त याद आ जाते हैं . वहां लौटकर जाना फिर कभी नहीं हुआ पर यादें हैं जो जब तब वहां ले ही जाती हैं .

वर्ष 1961 - मैं ने न्यूं मिडिल स्कूल, बूंदी से स्कूल की कक्षा आठ पास कर ली थी . जब सबसे बड़ी कक्षा पास कर ली तो वहां से टी सी तो लेना ही था . काकाजी* टी सी लेने गए थे और मैं साथ था . दीनानाथ जी हैड माट साब ने टी सी देते हुए काकाजी से जो पूछा और अपनी कही वही बात बताता हूं . पहले एक बात और बताऊं जाने क्यों हैड माट साब को लोग और बच्चे भी पीछे से ' धुनची जी ' कहते थे और उनका बेटा गणपत भी हम लोगों का सहपाठी था उसने भी उसी वर्ष आठवीं कक्षा पास की थी .


हैड माट साब पूछने लगे :

" टी ओ साब, बेटे को क्या सब्जेक्ट्स दिलाओगे ? "

तब कक्षा नौ में ही फैकल्टी और विषयों का चयन हो जाया करता था .

बाद तक भी यही सिलसिला चला . ये तो बहुत बाद में हुआ है कि यह चयन ऊंची क्लासों में जाकर होने लगा . बेहतर अंक लाने वाले विद्यार्थी साइंस पढ़ने के लायक माने जाते थे और पड़े गिरे पास हुए आर्ट्स पढ़ने को शापित होते थे . एक बार आर्ट्स में दाखिला लेने वाले आगे आर्ट्स में ही रहते थे . जिन दुखियारों से साइंस नहीं निभ पाती वो बड़ी क्लासों में इधर आ जाते पर इधर से उधर जा पाने की सुविधा नहीं होती थी .


" ये तो आर्ट्स पढ़ेगा . और आपका भी तो बेटा है , सुमन्त बता रहा था, उसके बारे में क्या तय किया हैड माट साब ?" काकाजी बोले.


काकाजी का उत्तर उन्हें चौंकाने वाला था , क्योंकि मेरी मार्क लिस्ट से तो साइंस पढ़ने की लायकी सिद्ध जो हो रही थी . ऐसे ही सवाल जवाब आगे तब भी हुए जब काकाजी मुझे जयपुर में दरबार मल्टी परपज हायर सकेंडरी स्कूल में कक्षा नौ में में दाखिला करवाने गए .


तब मुझे कहां भान था कि आगे जाकर साइंस पढूंगा , ऐसा वैसा साइंस नहीं - मास्टर साइंस . 

खैर अभी तो बात बूंदी की चल रही है वहीँ लौटते हैं .


माता पिता के सपने :

 तब माता पिता बच्चों के लिए कैसे सपने देखते थे उसका उदाहरण है वो जो तब हैड माट साब ने कहा था . काकाजी को अपने बेटे के बाबत वो बोले :


" वो ही इंजीनेरी के सब्जेक्ट - साइंस मैथेमेटिक्स ."


इतना ही नहीं उन्होंने ये भी बताया था कि वो इस बात का भी प्रयास करेंगे कि आगे उनका तबादला जोधपुर का हो जाए ताकि वो बेटे को इंजीनियरी की पढ़ाई करवा सकें . तब ले दे के एक जोधपुर में ही सरकारी इंजीनियरिंग कालेज हुआ करता था , मंगनी राम बांगड़ मेमोरियल इंजीनियरिंग कालेज .


मुझे आगे का हाल तो नहीं मालूम कि हैड माट साब अपनी योजना में सफल किस हद तक हुए पर कुछ सूत्र बूंदी से तब जुड़े जब बनस्थली में मेरे काम करते हुए एक चित्रकार मित्र बूंदी से आए और मिले और चूंकि वो भी उसी मिडिल स्कूल के पढ़े हुए थे इसलिए स्कूल की यादें ताजा हो गईं , कुछ और दोस्तों के बारे में भी उन से ही पता चला .


बहरहाल लौटकर वहां जाना नहीं हुआ . जाऊं भी तो उस समय का कौन मिले वहां ?


उसी पुराने समय को याद करते हुए...

प्रातःकालीन सभा स्थगित .


* काकाजी हमारे पिता जो तब बूंदी में ट्रेजरी ऑफिसर थे .


साझा लेखन : Manju Pandya

आशियाना आँगन, भिवाड़ी .

27 जुलाई 2015 .


ब्लॉग पर पुनः प्रकाशन और लोकार्पण  २७ जुलाई २०१८.


Tuesday, 24 July 2018

ये फ़ेसबुक की दोस्ती ? कल और आज .

ये फेसबुक की दोस्ती ?

     कुछ समय पहले एक मनोविद् को टी वी पर बोलते सुना था कि कुछ एक मनोरोगों के कारणों और लक्षणों में से एक आज के समय में ये " फेसबुक" भी गिनाया जा सकता है .

बहुत हद तक सही तो कह रहे थे मनोविद् . आप उन्हें साइकेट्रिस्ट के रूप में जानते हैं , उस नाम से जान लीजिए .

सर्वथा निजी अनुभव :

        जब से मैंने फेसबुक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है मुझे दोनों ही तरह के अनुभव हुए हैं . बहुत से अनजान लोग मिले और वो ऐसे बन गए कि लगा ही नहीं ये तय भी हो गया कि उनको तो मैं बहुत पहले से जानता हूं . यहां कुछ के नाम मैं नहीं गिनाऊंगा क्योंकि इससे दूसरों का मोल मैं कम नहीं करना चाहता . इस मंच पर लगता है कि हम लगातार साथ साथ हैं . हमें एक दूसरे की गतिविधि का पता रहता है और ये अच्छा है . 

पर ऐसा कर के जमाने भर को हम वो सब बताए दे रहे हैं जिसे सब कोई को बताने की कोई जुरूरत नहीं है . हमारी सारी सूचनाएं विश्व डेटा बाजार में बिकाऊ हैं , मजे की बात ये है कि इन्हीं सूचनाओं को पाकर ठग हमें ठगने के उपाय कर रहे हैं हम उतने जागरूक नहीं हैं जितना हमें होना चाहिए .


भोले दोस्तों के बारे में :

इस बारे में अभी भी स्पष्ट नहीं हूं कि दोस्ती के इस दायरे के बारे में क्या निर्णय लेवूं . क्या इसे आगे बढ़ने दूं ? क्या इसे यही रोकूं ? या कि छटनी कर डालूं , और घटाऊं इस दायरे को ? लौह आवरण की नीति का ही हिमायती होता तो बच्चों के सिखाए से फेसबुक पर आता ही क्यूं ?


सवाल का सबब :

      - बहुत कुछ प्रोफाइल देखकर दोस्ती कबूल करूं . वो भोले लोग जब तब चैट पर आ जावें और मुझसे वो ही , वो ही सवाल पूछें जिनके उत्तर मेरी प्रोफाइल पर दर्ज हैं . तभी तो मैं नें " चोरंग्या" कांसेप्ट पर पोस्ट लिखी थी .

अधिकांशतः फेसबुक के माध्यम से मिले दोस्तों से दोस्ती के साथ साथ मुझे वरिष्ठ नागरिक सम्मान भी मिला बोनस के रूप में लेकिन कोई कोई भोले और नादान मुझे मुझे अपना सा ही समझ लेवें . उनसे तो मैं यही कहूंगा :

" भाई मेरे, मेरी प्रोफाइल फोटो तो देख ली होती . क्या मैं आपको बराबर का लगता हूं?"


 अपनी छात्राओं को संबोधित :

       आप के / तुम्हारे लिए तो ये खुला निमंत्रण है . मेरी फ्रोफाइल पर जब चाहो उपस्थिति दर्ज करवाओ जैसे मेरी क्लास में आया करती थी . बल्कि कभी कभी तो ये कहने का मन करता है :


" बाहर क्यों खड़ी हो , क्लास में आ जाओ ."

अपनी छात्राओं से तो कोई भी संवाद करना मुझे हमेश ही अच्छा लगता है .

अंत में सभा स्थगित करने से पहले यही कहूंगा :

" फेसबुक पर ठहरता हूं अभी हाल तो , बाकी आगे देखेंगे क्या करना है ."

प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

सुप्रभात .

सह अभिवादन : Manju Pandya.

 आंगन, भिवाड़ी .,26 जुलाई 2015.

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण   २६ जुलाई २०१८.

इमर्जेंसी : बनस्थली डायरी .

इमरजेंसी

  - इमर्जेंसी की बातें फिर याद आने लगी पिछले महीने . क्यों याद आने लगी उसे तो जाने दीजिए , आप बेहतर जानते हैं मुझे आज के हालात के बारे में अभी हाल कुछ नहीं कहना . मैं तो तब की थोड़ी सी बात याद आ गई और लगा कि इसे दर्ज भी कर दिया जाए तो कोई हर्ज नहीं , वही करने लगा हूं .


तब जब उन्नीस सौ पिचहत्तर - सतत्तर में इमरजेंसी का दौर था अखबार और रेडियो और बहुत कीजिए तो टेलीग्राम टेलीफोन ये ही तो संचार के साधन थे , इनका भी फैलाव आज जैसा कहां था . फिर भी बात फैलती तो थी . 


एक बात मैं अवश्य रेखांकित करूंगा उस जमाने की कि लोग आकाशवाणी के समाचारों की बनिस्पत बी बी सी के समाचारों और रेडियो प्रसारणों पर ज्यादा भरोसा करने लगे थे . ये कोई अच्छी बात तो नहीं कही जा सकती लेकिन हालात ही कुछ ऐसे थे और उन्हें हमारे ही शासन ने उत्पन्न किया था .


एक निजी अनुभव :

           एक दिन बनस्थली में आई बी के एक अधिकारी मेरे घर आए , अजब इत्तफाक था कि वो मेरे कालेज के जमाने के दोस्त निकले . दोस्तों के बीच खुलकर जैसी दुनियां जहान की बातें होती हैं वो हो गईं . 

इस दोस्त आई बी अधिकारी के पास ऐसी राज मुद्रिका थी नए जमाने की कि वो कहीं भी आ जा सकता था . मुझे तब ये अच्छी तरह पता चला था कि इन ख़ुफ़िया एजेंसियों के पास आगे से आगे कितनी सूचनाएं इकठ्ठा होती हैं . 

जाने अनजाने वो दोस्त मुझसे भी ऐसी सूचनाएं ले ही गया जो प्राप्त करना उसका पार्ट ऑफ जॉब था .

इस आई बी अधिकारी की आवक बाद में भी परिसर में देखी गई . मेरे कुछ एक नजदीकी दोस्तों की राय थी कि दोस्त था तो क्या हुआ आया तो आई बी की तरफ से था मुझे उससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए थी . मैं ऐसा कभी कर नहीं पाया . मैंने राजनीतिशास्त्र पढ़ा और पढ़ाया जरूर था पर ये पैंतरे बाजी मुझे न तब आती थी न अब आती है .

एक भले दोस्त के रूप में उसने एक राय जरूर दी थी जो बात मुझे आज भी याद आती है :

" सुमन्त , मेरी मानो तो किसी पार्टी की मेंबरशिप भूल कर भी मत लेना वरना अपना ये सोचने का तरीका गंवा बैठोगे . .. सब एक जैसे हैं ."


हम लोग कोई सरकारी नौकर नहीं थे अतः किसी राजनैतिक दल के प्रति प्रतिबद्धता निषिद्ध तो नहीं थी , पर उस दिशा में कोई महत्वाकांक्षा मैंने पाली भी नहीं थी .

ऐसे ही याद आई बाते आपसे साझा करते हुए 

प्रातःकालीन विलंबित सभा स्थगित :


सहमति और समीक्षा : Manju Pandya


आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

25 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण  जुलाई २०१८.