Friday, 20 October 2017

पोस्ट आफिस का लोप : ठेकेदारी का उभार -- शेष भाग .

पोस्ट ऑफिस का लोप : ठेकेदारी का उभार ~ भाग तीन .

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#पोस्ट_ऑफिस_का_लोप


     इस शीर्षक से पहली और दूसरी पोस्ट में मैंने ये बताने का प्रयास किया था कि बापू नगर के जनता स्टोर परिसर से पोस्ट ऑफिस को नदारद देखकर मुझे अटपटा लगा था और मैं वहीँ के कूरियर सेवा एजेंट कैलाशजी के पास पहुंचा था इस लोप के बाबत जानने को . चूंकि कैलाश जी के साथ बैठकर थोड़ी देर में बहुत सी बातें हुई थीं तो उनका भी उल्लेख करूंग और डाक तार विभाग से अपने पुराने वास्ते का भी .


क्या क्या बात हुई :

------------------ बहुतेरी बातें हुईं जिनमें से कुछ एक बताता हूं .

 मैं ने कहा कि जिस जगह पोस्ट ऑफिस था इमारत थी तो बहुत जर्जर अवस्था में पर मरम्मत हो जाती और चलता रहता पोस्ट ऑफिस तो बढ़िया रहता . इस पर कैलाश जी बताने लगे :

" मकान मालिक और सरकार के बीच मुक़दमा चल रहा था सर , सरकार हार गई और मालिक मकान जीत गया इसलिए खाली करना पड़ा पोस्ट ऑफिस को यहां . "

 कैलाश जी ये भी बोले :

" मेरा भी खाता था इस पोस्ट ऑफिस में , आप यूनिवर्सिटी चले जाओ अगर अपना खाता संभालना है तो , वहां के इंचार्ज पोस्ट मास्टर भी बहुत अच्छे हैं . आपका काम हो जाएगा . " 

अब उनसे अपनी बाते साझा करना मुझे सहज लगा , मुझे लगा हम एक ही कश्ती में सवार हैं .

मैंने उनको बताया कि गाढ़े वक्त के लिए रुपल्ली दुपल्ली इस पोस्ट ऑफिस में रख छोड़ी थी अब जवाहर लाल नेहरू मार्ग जैसी व्यस्त सड़क पार करके जावूं वहां पर , जाने साबुत वन पीस में पहुंचूं के नहीं . इस पर कैलाश जी कहने लगे कि आगे के लिए गांधीनगर पोस्ट ऑफिस में खाता ले आना बेहतर रहेगा .

हम भी तो उस जमाने के लोग हैं जो पोस्ट ऑफिस की जमा को ज्यादा सुरक्षित मानते आए हैं और पोस्ट मास्टरों के पुराने हिमायती हैं . बैंकों का कारोबार जरा और तरह का होता है . पोस्ट ऑफिस तो बैंकों वाला काम करने के अलावा और बहुत से काम करते आए हैं .

अब पोस्ट ऑफिस तो यहां से गया ही मान लिया गया पर ये बात तो अभी और चलेगी ....

प्रातःकालीन सभास्थगित ...

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सुप्रभात .

सह अभिवादन : Manju Pandya

सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया, बापू नगर , जयपुर .

20 अक्टूबर 2015 .

आज  ब्लॉग पर प्रकाशित 

जयपुर  २० अक्टूबर २०१७ .

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Wednesday, 18 October 2017

उस दिन कहना भूल न जाना 

भूल न जाना उस दिन कहना 😃😃


हुआ क्या था कि पिछले दिनों भिवाड़ी में विक्रम संवत की तिथि के अनुसार मेरा जन्मदिन मनाया गया और उसी दिन शाम को दोस्तों और बच्चों ने मिलकर धूम धड़ाका भी करवा दिया . उस दिन से मित्रगणों की ओर से मेरी फ़ेसबुक टाइम लाइन पर बधाई संदेश आ रहे हैं और मैं यथा सम्भव आभार भी व्यक्त कर रहा हूं .


अब और क्या ?


वो बात इत्ती सी है कि अब ईसवी सन के हिसाब से २७ ( सत्ताईस ) अक्टूबर को मेरा जन्मदिन पड़ेगा , उस दिन हैप्पी बर्थ डे कहना आप भूल न जाना .

इधर एक अपनी फ़ोटो और एक ब्लॉग पोस्ट का लिंक भी यहां जोड़ने का प्रयास करता हूं .


बुधवार १८ अक्टूबर २०१७ .


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http://ravindraniwassegulmohar.blogspot.in/2017/01/blog-post.html

Monday, 16 October 2017

पोस्ट आफिस का लोप : ठेकेदारी का उभार .

पोस्ट ऑफिस का लोप : ठेकेदारी का उभार .

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#पोस्टऑफिस_का_लोप

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पिछले दिनों बापू नगर के जनता स्टोर चौक में ये कोना देखकर बहुत आघात लगा मन को . जितनी बातें मन में आई गईँ वो ही आपसे साझा करने की गरज से ये स्टेटस मांड रहा हूं .


              वैसे गया कोई और काम से था पर जब इधर देखा तो बड़ा अटपटा लगा , अरे यहां तो पोस्ट ऑफिस हुआ करता था . दिन में लोग यहां डाक सम्बन्धी काम से लगाकर बचत खातों के लेन देन तक के लिए आया जाया करते थे और अब देखो पोस्ट ऑफिस का तो बोर्ड ही नदारद है और यहां कोई सूचना भी लगी हुई नहीं है . क्या पोस्ट ऑफिस भी आए दिन कारोबार बंद कर भाग लेने वाली फाइनेंस कंपनियों की तरह भाग लिया यहां से ? मेरी उत्सुकता जागी , क्या करूं किससे पूछूं , आसपास के कारोबारी दूकानदार अपने अपने कार्य व्यापार में लगे हुए उन्हें अपने ग्राहकों से मतलब या मेरी जिज्ञासा से . पर मुझे तो पता करना ही करना कि आखिर पोस्ट ऑफिस का क्या हुआ . हालांकि और दूकानदारों से भी मैं अपनी ' राहुल के ताऊ ' हैसियत के दम पर अटक ही सकता था पर मैं सोचने लगा कोई भला व्यक्ति और उसका स्थान देखकर बैठकर बात करूं कि आखिर पोस्ट ऑफिस का लोप क्योंकर हुआ .

इसी चर्चा और पोस्ट ऑफिस संबंधी विस्तृत शोध आधारित स्टेटस की एक सिरीज बनेगी पर अब समय नहीं है अतः चर्चा को विराम देना पड़ेगा .

ये चर्चा पोस्ट ऑफिस और उससे जुड़े सामाजिक सरोकारों तक जाएगी पर थोड़ा समय तो मिले .


क्या कहा ," ये राहुल के ताऊ का क्या चक्कर है ?"


 नहीं नहीं वो भी बताऊंगा अगर आपको पहले से पता नहीं है . न तो पुरानी पोस्ट फिर साझा कर दूंगा पर अभी हाल इजाजत दीजिए .

प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

सुप्रभात .

सह अभिवादन : Manju Pandya

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सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर . जयपुर .

16 अक्टूबर 2015 .

आज ब्लॉग पर प्रकाशित  भाग एक 

जयपुर 

१७ अक्टूबर २०१७ .

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पोस्ट ऑफिस का लोप : ठेकेदारी का उभार ~ भाग दो .

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#पोस्ट_ऑफिस_का_लोप

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      कल भोर में इस बाबत लिखना शुरु किया था पर बात अधूरी छोड़नी पड़ी मजबूरी थी इसलिए . पर कुल मिलाकर अच्छा ही हुआ . आगे की बात यों तो टिप्पणियों में आ गई . उजली तस्वीर मेरे दोस्त सुभाष ने बता दी और और यहां पोस्ट ऑफिस की इमारत की क्या हालत थी ये बात मेरे भतीजे चक्रपाणि ने बता दी . ये पोस्ट ऑफिस यूनिवर्सिटी के पोस्ट ऑफिस में जा मिला ये बात तो आपको पता लग ही गई अब इसमें बताने को भला क्या बचा . महिमा ने भी तत्काल पूछा था कि फिर पोस्ट ऑफिस गया कहां तो उसको पता लग ही गया होगा .


अब अच्छा तो ये होता 

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कि ये जनता स्टोर का पोस्ट ऑफिस जिस पोस्ट ऑफिस में खप गया वहां हो आता , वहां की भी तस्वीर उतार कर लाता और तब आगे की पोस्ट लिखता तो बेहतर होता , पर वो संभव नहीं हुआ और इस रंबाद को छेड़ा है तो आज भी कुछ बात तो बनानी है इस लिए उस घड़ी की ही बात करता हूं जब मैं जनता स्टोर के उस कोने में था जहां से हुआ पोस्ट ऑफिस का लदान मुझे बुरा लग रहा था . पोस्ट ऑफिस की शाखाएं बढ़नी चाहिए या कि सिमटनी चाहिए सवाल तो ये है ,खैर गया यहां से पोस्ट ऑफिस और अब यहां आने का नहीं , इससे वरिष्ठ नागरिकों को सुविधा थी उसकी बात तो खैर जाने दीजिए .


नए ठेकेदार :

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पते की बात ये है कि डाक विभाग जिस काम के लिए जाना और सराहा जाता था , कहीं कहीं आज भी सराहा जाता है उसका पैसाव नगर सभ्यता में कम होता जा रहा है और जो नए ठेकेदार गली गली में दिखाई देने लगे हैं वो हैं कूरियर कंपनियों के एजेंट . जिस कोने की तस्वीर मैंने कल चस्पां की थी उसमें इस हाथ को पोस्ट आफिस की त्यागी हुई दूकान है और उस हाथ को एक फोटोस्टेट और कूरियर सेवा की दूकान है . पोस्ट ऑफिस के लोप बाबत मेरी शोध वहीँ से प्रारम्भ हुई . बात वहीँ से शुरु हुई 


संवाद ज्यों का त्यों :

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   आप इस दूकान में कर्मचारी हैं या मालिक हैं ?


   जी मालिक हूं .


  आप से एक बात पूछनी थी , ये पड़ोस में जो आपके दुश्मन थे वो दूकान 

   बंद करके कहां चले गए ?


   आप पोस्ट ऑफिस की बात कर रहे है साब तो वो तो यूनिवर्सिटी कैम्पस में चला गया .


  अस्थाई रूप से गया या हमेशा के लिए चला गया ?


  उसमे मर्ज हो गया साब .

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 इस प्रकार बात शुरु हुई कैलाश जी से और परिचय हुआ तो पता चला इनकी तो बनस्थली में ससुराल भी है और आपणो रेडियो के दफ्तर में इनके साले आज भी काम करते हैं .

कहां कहां मिल जाते हैं अपने लोग बशर्ते आप उन्हें अपना मानें ....


बहुत बात हुई उनसे .....


अनायास समयाभाव के चलते प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

बातें और भी बताऊंगा . क्रमशः ....

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पात्र उल्लेख :

चक्रपाणि : Chakrapani Sharma

सुभाष : Subhash Mathur

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सुप्रभात.

सह अभिवादन : Manju Pandya


सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

17 अक्टूबर 2015 .

आज ब्लॉग पर प्रकाशित 

जयपुर 

१७ अक्टूबर २०१७ .

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Wednesday, 11 October 2017

हजामत की ज़रूरत : भिवाड़ी डायरी .

सुबह उठा तो ऐसी सूरत . आईने में सूरत देखने का मन न करे . गर्दन पर हाथ फ़ेरूं तो इत्ते बाल टटोलने में आवें या तो बाल कुछ जल्दी बढ़ गए या फिर पिछले वाले हज्जाम ने ज़्यादा अच्छे से काटे ही नहीं और तो क्या ?

अब मुझे तो एक ही बात सूझी फिर चलो बाम्बे हेयर कट के यहां और क्या ? 

पहुंचे , बैठे कुर्सी पर और आख़िरकार बण गई हजामत .

सूरत प्रमाण के लिए इमरान के साथ एक सेल्फ़ी भी ली जो जोडूंग़ा आगे .

लो जी अब निर्मल शर्मा टोकते हैं के अभी “ रूप चतुर्दशी “ में तो एक सप्ताह की देर है .

पर अपण ने तो आज ही बणवा ली हजामत .

गई कुछ दिनों की .


संध्या वंदन के साथ सायंकालीन सभा स्थगित …..


१२ अक्टूबर २०१७ .

 सुबह उठा तो ऐसी सूरत . आईने में सूरत देखने का मन न करे . गर्दन पर हाथ फ़ेरूं तो इत्ते बाल टटोलने में आवें या तो बाल कुछ जल्दी बढ़ गए या फिर पिछले वाले हज्जाम ने ज़्यादा अच्छे से काटे ही नहीं और तो क्या ?

अब मुझे तो एक ही बात सूझी फिर चलो बाम्बे हेयर कट के यहां और क्या ? 

पहुंचे , बैठे कुर्सी पर और आख़िरकार बण गई हजामत .

सूरत प्रमाण के लिए इमरान के साथ एक सेल्फ़ी भी ली जो जोडूंग़ा आगे .

लो जी अब निर्मल शर्मा टोकते हैं के अभी “ रूप चतुर्दशी “ में तो एक सप्ताह की देर है .

पर अपण ने तो आज ही बणवा ली हजामत .

गई कुछ दिनों की .


संध्या वंदन के साथ सायंकालीन सभा स्थगित …..


१२ अक्टूबर २०१७ .

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बनस्थली डायरी --  निकोबार की लड़कियां .

बनस्थलीडायरी  : निकोबार की लड़कियां  💐💐💐💐

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#sumantpandya #स्मृतियोंकेचलचित्र  #बनस्थलीडायरी

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ये गई शताब्दी की बनस्थली की बातें हैं  , अभी थोड़ा सा लिखने का समय मिला है तो वो बातें  दर्ज करके बताने की कोशिश करता हूं  , देखते हैं कितना संभव हो पाता है .

ये कुछ ऐसा समय था जब निकोबार द्वीप समूह से अहिन्दीभाषी लड़कियों का बनस्थली आने का सिलसिला शुरु हुआ था . इनमें से कॉलेज तक पढ़ने आई लड़कियों के नाम आज भी मुझे  याद आते हैं , इनमें एस्थर , एग्नेस , मारग्रेट , एलिजाबेथ  साल दर साल मेरे पास पढ़ने आईं और अपनी  उच्च शिक्षा पूरी करके निकोबार द्वीप समूह को लौटीं  . भला हो फेसबुक का कि इनमें कोई कोई बाहैसियत अब मेरे संपर्क में आई हैं  और गए बरस एग्नेस को पुलिस अधिकारी की वर्दी में देखकर तो  मुझे कित्ती ख़ुशी हुई है आपको क्या बताऊं .

ये सिलसिला क्यों और कैसे शुरु हुआ ये तो फिर कभी सुनाऊंगा , वो एक अलग कहानी बन जाएगी  वरना , पर इन लड़कियों बाबत थोड़ा कुछ आज कहने की कोशिश करता हूं .

इसे मेरा सौभाग्य ही कहूंगा कि अपनी उच्च शिक्षा पूरी करते करते इनका मुझसे संपर्क तो मेरे  और साथियों के मुकाबले अधिकतम हुआ करता था बनस्थली में . इसका एक कारण शायद ये  भी था कि इनकी हिंदी सामान्य लड़कियों के मुकाबले प्रायः कमजोर होती थी और अध्यापक को विषय की  शिक्षा देने के साथ साथ भाषा की शिक्षा भी देनी होती थी . इधर मुझे निकोबार द्वीप समूह के जन जीवन और समाज - परिवार के बारे में जानने का अवसर मिलता था इनसे बात करके . जन जातियों के जीवन के बारे में इनसे अनोखी बातें मुझे जानने को मिली थीं उस दौरान जब  ये लडकियां  एम फिल शोध प्रबंध तैयार करने बाबत मेरे पास आतीं .

मुझे याद आता है कि एक बरस तो अकेली एस्थर के लिए ही एम फिल  - राजनीति शास्त्र का कोर्स चलाया गया क्योंकि एल जी साब की ख़ास सिफारिश थी कि उसकी अनवरत  शिक्षा अभी स्थगित न होवे  . एल जी इन्हें छोड़ने और लेने को हर साल एक जिम्मेदार शिक्षा अधिकारी  केंद्र शाशित प्रदेश से बनस्थली भेजते और  सत्र पर्यन्त ये लड़कियां बनस्थली में ही रहतीं  . सत्रांत में  आये अधिकारी एस्कोर्ट के साथ ये लडकियां अपने घरों को लौटती थीं .

ये बात इन लड़कियों के संपर्क में आने से मैं बहुत अच्छे से जाना कि इनके समाज में मातृ सत्तात्मक परिवार  होते आए हैं और मेरी ये लडकियां अब  अपने समाज में लौटकर घर  गृहस्थी और परिवार की मुखिया हैं . ये बात इधर मुख्यभूमि भारत में हम्मा  तुम्मा को अभी मुश्किल से स्वीकार हो सकती है .  यहां आजकल महिला सशक्तिकरण की बातें   बहुत प्रासंगिक मानी जाती हैं  और तमाम रूढ़िवादी शक्तियां भी बात में बात मिलाती हैं ताकि  आधुनिक कहा सकें . उधर निकोबार द्वीप समूह में मेरी ये ख़ास लड़कियां  हैं ही शक्तिशाली  , कम से कम मुझे तो

ये देखकर बड़ा अच्छा लगता है . कहने की आवश्यकता नहीं कि शिक्षा ने इन्हें और अधिक शक्तिशाली बनाया है .

एक बार की बात  :

------------------      सत्रांत का समय था  और उस दिन जब मैं स्टाफ रूम में पहुंचा तो निकोबार की छोटी लडकियां मुझे आकर बताने लगीं कि कोई कुलदीप मैडम मुझे ढूंढते हुए थोड़ी देर पहले वहां आयी थी   , मुझे वहां न पाकर कहीं और चली गई .

“ कौन हैं कुलदीप मैडम ? “   मुझे बताया गया कि  पोर्ट ब्लेयर से इन्हें लेने आई कोई शिक्षा अधिकारी हैं .  मुझे लगा कि एलिजाबेथ की पढ़ाई में रह रही कचाई  के लिए जरूर से मुझे उलाहना देना चाहती  रही होगी , खैर उस समय बात आई गई हो गई और मैं घर आ गया .

शाम को  ये कुलदीप मैडम दफ्तर से पता कर  मुझसे मिलने घर पर आयीं  और तब मुझे पता लगा वो कोई उलाहना देने के लिए मुझे नहीं खोज रही थी  , वो तो बरसों पहले मेरे पास पढ़के गई हुई  मेरी लड़की थी और  आभार ज्ञापन के लिए मिलने आई थी .

उसके साथ एक और महिला थी जो बनस्थली देखने के लिए ही साथ आई थी  . बरसों बाद अपनी छात्रा से मिलकर हमको ( मैं और जीवन संगिनी )  बहुत ख़ुशी हुई . वो हमें पोर्ट ब्लेयर आने का निमंत्रण भी देकर गई , हालांकि हमारा उधर जाना कभी हो नहीं पाया .

बता रहे हैं आज इंटरनेशनल गर्ल्स डे है .  अब वैसे तो मेरा वास्ता लड़कियों से ही ख़ास रहा है , अपनी सभी लड़कियां मुझे प्रिय हैं , पर  उनमें भी  ख़ास हैं मेरे लिए निकोबार की लडकियां  और अधिक अब क्या बताऊं .

अभी बुखार से  उठा हूं  पर अब ठीक हो गया हूं . आज के लिए ये पोस्ट  एग्नेस की पुलिस वर्दी में में एक फोटो के साथ जारी करता हूं .

इंटरनेशनल गर्ल्स डे की बधाई . 💐

नमस्कार .

सुमन्त पंड्या .

गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

मंगलवार 11 अक्टूबर 2016 .

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ब्लॉग पर प्रकाशित .

१२ अक्टूबर २०१७ .

Friday, 22 September 2017

पतरी पतरी पापरी ....: संध्या वंदन

संध्या  वंदन 🌷🌷
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#स्मृतियोंकेचलचित्र  #sumantpandya #जयपुरडायरी

आज जो बात बताने जा रहा हूं वो तो दुब्बी नामक एक छोटे से गांव के एक किसान की बरसों पहले कही बात है जो उसके सूक्ष्म निरीक्षण पर आधारित खरी बात थी  और किसी भी सुनने वाले को  मुस्कुरा देने को बाध्य कर देने जैसी बात  कहलाएगी आज भी . इस बात को बताने से पहले मुझे इस बात की  पृष्ठभूमि बतानी पड़ेगी सौ साल  पीछे  लौटकर . वही प्रयास करता हूं , बहुत सी बातें बताऊंग तब आप समझ पाएंगे उस भोले ग्रामीण की बात . इसमें मेरी , इसकी , उसकी  , सब की बात जुड़ेगी तब होगी बात साफ़ .
गए दिनों अपने अभिन्न  मित्र श्री गोविन्द राम  केजरीवाल को एक शाम मैंने टिप्पणी में कहा था कि अगली पोस्ट “ संध्या वंदन “ शीर्षक से ही होगी , उस वायदे का निर्वाह भी इस पोस्ट से हो जाएगा .
गए दिनों हम दिल्ली में थे  मैं घर  की बालकॉनी में खड़े खड़े सूर्यास्त का फोटो खींचकर  आपको भेजता और संध्या वंदन लिख देता  वो नई सभ्यता में गुड ईवनिंग कहने  का देशी चलन बनाया  , यहां गुलमोहर में आकर भी मैं सोशल मीडिया पर ,” अभी तो हम हैं “  ऐसा जताने को ऐसा कर देता हूं . पर सौ साल पहले जब हमारे घर में ये नई सभ्यता घुसी नहीं थी तब संध्या वंदन का एक विशिष्ट अभिप्राय था  वो था पूजा पाठ वैदिक ऋचाओं  का उच्चारण साथ में .
सम्प्रति पितृ पक्ष में इस प्रसंग को याद करके मैं  अपने पूर्वजों को भी याद करता हूं और उनकी जीवन शैली का भी अल्प उल्लेख आज करता हूं . देशी राज्यों का ज़माना था ये लोग अपने पांडित्य , ज्योतिष ज्ञान , आयुर्वेदिक चिकित्सा और ऐसे ही ब्राह्मणोचित लक्षणों के कारण जाने जाते थे . अतिराम जी के वंशज , मेरे पूर्वज  किस प्रकार  गुजरात से चलकर  राजस्थान आए वो कहानी  जैसी मैंने सुनी  वो अपने मिलने वालों को मैं यदा कदा सुनाया करता हूं  ,उस कथा के विस्तार में अभी मैं  नहीं जाऊंगा .
ये लोग अपना भोजन खुद तैयार करते थे और जैसा आज भी गुजरातियों की पतली पतली रोटी होती हैं  वैसी ही रोटी बनाते खाते थे . ऐसे ही एक पूर्वज के बारे में किस्सा है जो दुब्बी गांव गया था जो राज्य के द्वारा  अनुदान के रूप में उसे मिला था .

रोटी रोटी का फरक
******************   कृषक ग्रामीण की रोटी तो मोटी रोटी  होती है  और वो भी तब तो मोटे या  मिश्रित अनाज की  हुआ करती थी जिसे आप टिक्कड़ कह सकते हैं  . इसके विपरीत इस गुजराती मूल के व्यक्ति की रोटियां छोटी और  पतली पतली रही होंगी   जिनका उल्लेख आएगा ही अभी जब बात पूरी होने को आएगी . उस ग्रामीण ने इन महाराज की रोटियां भी देखीं और सायंकालीन गतिविधि भी देखी उसपर ही बात है .

  और अब संध्या वंदन 💐
------------------------       जब ये सज्जन , मेरे पूर्वज संध्या वंदन माने पूजा पाठ कर रहे थे तो उस प्रक्रिया के दौरान  विधान के अनुसार आचमन  की भी  क्रिया हुई . आचमन के अंतर्गत  उन्होंने एक आध चम्मच पानी भी मुंह में फेंका  और इस दृष्य को अपनी आंखों से देखकर वो भोला ग्रामीण  ठगा रह गया  . और फिर वो  जो बोला वो ही आज  इस किस्से का  मार्मिक वाक्य है  . ये एक मौलिक अभिवक्ति है जो इतिहास में दर्ज होने लायक है . कोई अनुवाद इस खूबसूरती से अभिव्यक्त शायद न कर पावे .
वो भोला कृषक बोला :

“ जब तो पतरी पतरी  पापरी न नै खाबे करो , खाबे करो  
अब चुच्ची न तै  पानी पी रो है . “ 😊

याने तब तो पतली पतली रोटियों को खाए गया  , खाए गया और अब चम्मचों से पानी पी रहा है .  याने इसने पानी के लिए भी जगह खाली न छोड़ी .

अब उस भोले किसान को संध्या वंदन और उसमें आचमन से क्या  लेना देना . वो जैसा समझा वैसा उसने कहा .

वे दिन और वे लोग ….
इति . 💐

संध्या वंदन 💐
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सुमन्त पंड्या .
@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .
गुरूवार 22 सितम्बर 2016 .

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ब्लॉग पर प्रकाशित
भिवाड़ी
22 सितंबर 2017 .

Monday, 28 August 2017

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी और दिल्ली डायरी का संस्मरण .

गोकुल यात्रा : बनस्थली डायरी  .🌷🌷

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#sumantpandya #स्मृतियोंकेचलचित्र #बनस्थलीडायरी

कभी कभी जीवन में ऐसा भी होता है कि व्यक्ति को निराशा घेर लेती है और ये निराशा यदि लंबी अवधि तक बनी रहे तो घातक भी हो सकती है . लेकिन … लेकिन ये योगायोग की बात है कि कुछ अलौकिक घटनाएं ऐसी होती हैं कि निराशा अचानक छूमंतर हो जाती है और जीवनी शक्ति लौट आती है . ऐसे अनुभव सब के जीवन के होते हैं , घटनाओं के प्रभाव हर व्यक्ति के लिए उसके स्वभाव और प्रकृति के अनुसार अलग अलग होते हैं / हो सकते हैं .

 मैं तो अपनी बात बताता हूं जो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन से याद आ रही है , कई दिन से बताने का मन था पर एक तो उपकरण और संचार तंत्र ने कुछ साथ नहीं दिया और दूसरे दिल्ली में दो पारिवारिक शिखर सम्मेलनों में व्यस्त रहा जिसके चलते ये पोस्ट नहीं बन पा रही थी . देखते हैं अगर आज ये बात कुछ हद तक पूरी हो जाती है तो फेसबुक पर अपलोड कर देवूंगा . फिर आएगा शिखर सम्मेलनों की गतिविधियों का विवरण जो अलग पोस्ट का कलेवर बनेगा , देखिएगा जरूर .


दो महत्वपूर्ण व्रत : 🌷🌷

मेरे घर में दो व्रत शायद पीढ़ियों से चले आ रहे हैं और महत्त्वपूर्ण हैं - श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और शिवरात्रि जिनमें छोटे छोटे बच्चे भी यथा शक्ति सम्मिलित होते रहे , बिना किसी दबाव के , स्वेच्छा से .

कोई कठोर व्रत नहीं होते थे व्रत के बहुत उदार नियम होते थे इन की सीख मैं जैसे घर में बच्चों को देता वैसे ही अपनी विद्यार्थियों को भी देता और इसका बनस्थली परिसर में भी सर्वत्र निर्वाह होता . जहां तक मेरे घर की विरासत का सवाल है मेरे घर में वैष्णव भक्ति की परम्परा और मेरे ननिहाल में शिव भक्ति की चली आयी परंपरा से इसका सम्बन्ध रहा हो , उसकी तफसील में मुझे अभी नहीं जाना .

अब ये और और बातें बंद कर मैं मुद्दे की बात पर आवूं जो कहने का आज विचार बनाया है …


वर्ष 2003 ईस्वी .

------------------ अचानक ये पता लगा कि मेरा शरीर डायबिटीज की गिरफ्त में है और अब आगे से चिकित्सक की निगरानी में पथ्य और परहेज से रहना होगा . क्या खाया जाय क्या न खाया जाय ये भी डाक्टर और डाइटीशियन तय करने लगे . ये सब तो स्वाभाविक था पर इससे अधिक जो बताने लायक है वो ये कि मुझे दुःस्वप्न सताने लगे . मुझे अपने वो सब निकट रिश्तेदार याद आने लगे जो जीवन के अंत समय में या तो आंख की रौशनी गंवा बैठे थे या डाइबिटिक फुट के रोग के चलते एक एक पैर कटा बैठे थे .

ये केवल इस बात को बताने के लिए दोहरा रहा हूं कि जीवन में कैसी निराशा ने मुझे घेर लिया था और इसके कारण अपने कमिटमेंट भी पूरे करने में मैं आनाकानी करता था . भोजन में मिठास लुप्त हो गया था और यों भोजन में रुचि भी कम हो गई थी . ऐसे समय में उसी वर्ष गोकुल यात्रा ने मेरी सोच किस प्रकार बदल दी वही बताता हूं .


गोकुल यात्रा : निमित्त और अनुभूति 🌷

 --------------------------------------- इसे मैं एक सुखद संयोग ही कहूंगा कि हमारे साथी सुरेन्द्रपाल मिश्रा के बेटे प्रदीप का विवाह नियत हुआ था और बरात गोकुल जानी थी . मेरा विवाह में जाना पहले से तय था पर अब अपने बारे में नए रहस्योद्घाटन के बाद मैं साथ जाने में आनाकानी कर रहा था . मिश्रा जी मानने को कत्तई तैयार नहीं थे और आखिरकार साथ ले जाकर ही माने और इस प्रकार संभव हुई गोकुल यात्रा .

वैसे बृज प्रदेश की यात्रा मैंने पहले भी की थी अपने दोनों भाइयों के साथ पर इस बार साक्षात गोकुल पहुंचा था जो कृष्ण का गांव था और एक मांगलिक अवसर जिसमें अपने साथियों का साथ मिला था .

उस रात की बात याद करता हूं जब भोजन में अरुचि के चलते मैं जनवासे में अनमना सा लेटा था और सुरेन्द्र मिश्रा मेरी खोज खबर लेने आए थे , आखिर वो अपनी जिम्मेदारी पर मुझे साथ लिवा ले गए थे . वो वर के पिता थे , नेगचार के बीच भी समय निकाल कर आये थे मैंने कुछ नहीं खाया जानकर मुझे भवन के ऊपरी तल पर लिवा ले गए . वहां कढ़ाव में दूध ओट रहा था जो कुल्हड़ भर कर मुझे पीने को दिया गया . बगैर चीनी के भी गोकुल की गायों का दूध कितना स्वादिष्ट हो सकता था ये मैं उस रात ही जाना .

गोकुल की सडकों गलियों में मैं बारात के साथ भी घूमा और अगले दिन रवानगी के पहले भी . भवन , भित्तिचित्र , लोक व्यवहार और परस्पर अभिवादब में भी मैंने भगवान् श्रीकृष्ण को वहां लगातार उपस्थित पाया .

अधिक विस्तार में न जाकर मैं तो यही कहूंगा कि प्रदीप का विवाह और मिश्रा जी का साथ चलने का आग्रह निमित्त बन गए थे वास्तव में मेरा मन बदलने को मेरी सोच सकारात्मक बनाने को भगवान श्रीकृष्ण ने ही मुझे गोकुल बुलाया था उस बार .


मैं नहीं जानता कृष्ण इतिहास का विषय हैं या कवियों का घड़ा हुआ मिथक हैं पर गोकुल जाकर मैंने तो कृष्ण के रूप में एक वास्तविकता को अनुभव किया था .

बनस्थली के समय और साथियों को याद करते हुए ….

गोकुल यात्रा को याद करते हुए ..

सायंकालीन सभा स्थगित .।


संध्या वंदन 🌷

सुमन्त पंड्या 

सोमवार 29 अगस्त 2016 .

आज ये संस्मरण ब्लॉग पर प्रकाशित कर रहा हूं  .

भिवाड़ी   २९ अगस्त २०१७ .