Thursday, 19 July 2018

लेफ़्ट हैंडर : भिवाड़ी डायरी 

लेफ्ट हैण्डर :

समय कम है . आज बात की शुरुआत ही करे लेते हैं.

उस दिन जब जयपुर में शिवाड़ एरिया के छोर पर होमियोपैथी दवा की दूकान के नीचे मैं दवा खरीदने को खड़ा था तो मुझे देखकर एक नवयुवक काउंटर से एक सीढ़ी उतर कर आया और मुझे ऊपर ले लेने को उसने अपना हाथ बढ़ाया . ये उसका बांया हाथ था .

 ये मरी * आर्थराइटीज के चलते कभी कभी सामने वाले को लग जाता है कि सीढ़ी चड़ने के लिए 

इसे सपोर्ट की जरूरत है . यही उस दिन भी हुआ . कुछ कुछ अंदाज तो पहले ही लग गया था पर जब उसी युवक ने बांये हाथ से कलम पकड़ कर दवा का बिल भी बनाया तब तो पक्का ही हो गया कि वो भी मेरी तरह लैफ्ट हैण्डर ही है और इस तरह एक अपनत्व बन गया मेरे और उस बमुश्किल बीस साल के युवक के बीच . 

मैंने उससे पूछा :

" अरे तू भी लैफ्ट हैण्डर है ?

तुझे किसी ने सताया तो नहीं इस बात पर कि तू बांये हाथ से लिखता है ?

ये सारी दुनिया दांए हाथ वालों की है !"

उत्तर मुझे चोंकाने वाला था . वो बोला :

" सताया न अंकल , सबसे पहले तो बचपन में ही घर वालों ने दांये हाथ से लिखने पर जोर डाला , स्कूल में भी वही सब कुछ हुआ . कुछ एक काम मैं दांए हाथ से भी करने लगा पर बांए हाथ से लिखने की मेरी आदत न छूटी . "

इस दुनियां में ये लैफ्ट राइट डिवाइड बड़ी जबरदस्त है .

इसके चलते तो एक बार बनस्थली में संरक्षक के रूप में मैंने पेशी भी झेली और मैं " नॉट गिल्टी " प्लीड नहीं कर पाया वो कहानी रोचक भी है और भावुक कर देने वाली भी पर आज समय कम है , बहुत से सूत्र पिरोने पड़ेंगे . बात थोड़ी लंबी चलेगी .

प्रातःकालीन सभा अनायास स्थगित ........

* मरी ही कहा है मेरी नहीं .

सुप्रभात .

सह अभिवादन : Manju Pandya.

भिवाड़ी . राजस्थान .

20 जुलाई 2015

ब्लॉग पर प्रकाशन और लोकार्पण   २० -०७-२०१८ .

Edit


Tuesday, 17 July 2018

कहो तो सही कहां जाना है : भिवाड़ी डायरी 

मैं मूर्ख हूं :


  आज की पोस्ट वास्तव में पूरक पोस्ट है , वो क्या कहते हैं सप्लीमेंट्री पोस्ट कह लीजिए . पिछली एक पोस्ट में इस प्रसंग को बीच में छोड़ना पड़ा था क्योंकि बात की दिशा तब कुछ और थी और ये बताने लगता तो ट्रैक बदल जाता . तो आज सही . प्राइवेट कॉफी हो चुकी और अब ये बात .

हुआ क्या था ?

             - मैं लिफ्ट में अकेला था . ग्राउंड फ्लोर पर दरवाजा ज्यों ही खुला मेरी ही उमर के से एक सज्जन अंदर आए और मुझे जल्दी थी ये बताने की कि मैं तो मूर्ख हूं जो मैं ने उन्हें बताकर जी हल्का किया . जल्दी से बात को स्पष्ट किया कि माजरा क्या था क्योंकि संवाद लंबा चलाने के लिए अधिक समय न उनके पास था और न ही मेरे पास . फिर भी भलमनसाहत उनकी कि ये बात वो मानने को तैयार ही नहीं थे और मेरे बरअक्स मुझे ही डिफेंड कर रहे थे , बोले :

" मैं समझा , लिफ्ट ऊपर से आई है और आप भी ऊपर से ही आ रहे हो."

" कोई ऊपर से नहीं आया साहेब , ऊपर जाने को लिफ्ट में घुसा था ,ऊपर तो पहुंचा नहीं खड़ा हूं जहां का तहां और आप आए हो तो बताए देता हूं तीसरे फ्लोर पर जाना है ,आप जाते हुए उतार जाइएगा . "

संवाद से पल भर को वो सज्जन भी खुश हुए . थोडा सा विलम्ब हुआ, वो भी ज्यादा नहीं और आ गया यथा स्थान . अपने आप से सवाल किया साठ पार ऐसे ही होता है ये तो सुना ही था , तेरे साथ भी यही होने लगा ?  

 मशीन है कहो जिस तल पर ले जाने को , अरे पर मूरख मशीन को कहो तो सही कि जाना कहां है .

जो बात इस घटना में है वही बात जीवन में है , कहो तो सही :

" कहां जाना है ?"

बात अभी घर में भी नहीं बताई थी , आपको बताई है अपने तक रखिएगा .

प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

सूचनार्थ : Manju Pandya

*******

इस पोस्ट पर आई कुछ टिप्पणियों का भी यहां उल्लेख करता हूं :

१.

प्रभात ने इसे एबसेंट माइंडेड़ होना बताया कहा इसका उम्र से कोई ताल्लुक़ नहीं .

२.

कुसुम परीक ने एक और क़िस्सा बताकर मेरी हिम्मत बढ़ाई , कहा :

" सर यह कोई उम्र वाला या भूलने वाला वाकया नही है। हम महिलाओं के संस्मरण सुनाए तो दंग रह जायेेंगे आप

एक बार मेरी एक सहेली ने बताया कि हम 3 4 जनी शादी में जा रही थीं ।

 सब लिफ्ट में घुस गए ।

सामने एक दर्पण था 🤓🤓 

फिर क्या हुआ 😇😇 

आप समझ गए होंगे ।

3 4 मिनट तक लिफ्ट हिली ही नही और उनका सँवरना पूरा हुआ तो ध्यान आया कि हम कहाँ है? 

देखा तो जस के तस खड़े है।🙏😍😂😂😂😂😂 "

३.

प्रियंकर जी ने इसे एक दार्शनिक प्रश्न से जोड़ा और मेरा उत्साह बढ़ाया :

" काश ! कहां जाना है यह ठीक-ठीक पता होता . काश ! वहां ले जाने वाली लिफ्ट हुआ करती . :) "

४.

चुन्ना भाई नवीन भट्ट ने मेरी इस प्रकार सराहना की :

" विधाता की लिफ्ट भी निरन्तर चल रही है ,कभी ऊपर कभी नीचे ,लिफ्ट के माध्यम से आपने बड़ी गहन दार्शनिक बात कहदी ---- सुंदर पोस्ट "

५.

पल्लव ने तो पूछ ही लिया :

" मुसाफ़िर जाएगा क़हां ?"

६.

और जीजी ने एक दार्शनिक बात कह दी इसी पोस्ट पर :

" उम्र बीत गई गन्तव्य नहीं पासकी  यही अफ़सोस है । ---------जीजी

******

ब्लॉग पोस्ट का प्रकाशन और लोकार्पण :

जयपुर  : गुरुवार १९ जुलाई २०१८.




Monday, 16 July 2018

मेरा स्टेटस .

मेरा स्टेटस :


जब भी फेस बुक खोलता हूं एक ही बात :

" वाट इज इन योअर माइंड ?"

इसी के जवाब में कभी कबार बल्कि रोज बरोज कुछ न कुछ मांड देता हूं .

ये ही है आज की दुनिया के साथ संचार की कहानी .

कुछ बातें मेरे अपने जानने वालों तक पहुंचती हैं , कुछ पहले से अनजान लोगों तक पहुंचती हैं और वो मेरे जानने वाले बन जाते हैं . कुछ बातें पुराने जानने वालों तक पहुंचती हैं और वो नए सिरे से जुड़ जाते हैं . कुछ बातें बट्टे खाते में भी जाती होंगी ही जिसके लिए ये ही कहा जाएगा कि इन बातों को यहां दर्ज करने की जरूरत ही क्या थी . सेंसर बोर्ड की इस बारे में लगातार चेतावनी भी मिलती है जिसे मैं ख़ुशी से झेलता हूं .


बहुत सी बातों को भूलना चाहता हूं पर भूल नहीं पाता , बहुत सी बातों को याद करने की कोशिश करता हूं पर उनमें कोई कोई ख़ास नुक्ता याद ही नहीं आता . पता नहीं ये मेरे साथ ही होता है या सब के साथ होता है . वस्तुस्थिति क्या है ये तो आप बताएंगे , मैं कैसे बताऊंगा .

एक और झंझट है -- एक बात देखकर दो बात याद आ जाती है . करूं क्या मैं उन बातों का ? उन बातों को दर्ज कर देता हूं . फिर चाहे तो वो बातें जाए बट्टे खाते में .अपने आप से कहता हूं " दर्ज कर और भूल जा."

बुद्धिमान लोग बताते हैं कि प्रायः साठ के पार ऐसा ही होता है . बहरहाल मैं तो मूर्ख हूं इस स्थापना को कल सुबह की पोस्ट में स्पष्ट करूंगा . 

अभी कुछ एक बातें कहे देता हूं :

मैं कोई किस्सा गढ़ता नहीं , आप बीती और आँखों देखी प्रामाणिक बातें ही कहता हूं .

भरपूर कोशिश करता हूं कि कोई किसी को आहत करने वाली बात मेरी ओर से दर्ज न होवे . फिर भी ऐसा हो जाता है कि लोग आहत हो जाते हैं . उसका भी स्पष्टीकरण और समाधान करता हूं . इतना अवश्य है कि भली कही बात को पढ़ने सुनने वाले एक जैसा नहीं समझते . तभी तो नीलम शर्मा बार बार दोहराया करती हैं ,' आप कैसे देखते हैं ? '

 तो आज मैं भी उसी सवाल के साथ प्रातःकालीन सभा स्थगित करता हूं ............' आप कैसे देखते हैं? '

अभी हाल तो ये ही है स्टेटस .


सुप्रभात . ☀️

समीक्षा : Manju Pandya.



Sunday, 15 July 2018

बनस्थली की रेल यात्रा : शाम वाली गाड़ी में .

बनस्थली की रेल यात्रा : शाम वाली गाड़ी में .


    जयपुर आना होता प्रायः मंगलवार के छुट्टी के दिन . शाम को लौटने के बखत जयपुर स्टेशन पर जाकर गाड़ी पकड़ते जो छह बजे के आस पास जयपुर से निकलती थी .

बनस्थली जाने वाली रोडवेज की आख़िरी बस तो पांच बजे ही रवाना हो चुकी होती अतः थोड़ा अधिक समय मिल जाता इसलिए गाड़ी पकड़ते .

वही लोहारू सवाई माधोपुर रूट की शाम की सवारी गाड़ी , इससे ही बम्बई जाने वाले मुसाफिर भी सवाई माधोपुर जाया करते थे , हमें तो खैर बनस्थली - निवाई स्टेशन तक ही जाना होता था . उसी यात्रा की एक बार की बात आज बताता हूं , पहले गाड़ी के माहौल का दृश्य बयान कर दूं .

सवारी गाड़ी की हालत :

       इस गाड़ी में जबरदस्त भीड़ तो होती ही थी , ऊपर से तुर्रा ये कि ट्रेन के करीब आधे डिब्बों में रोशनी भी नहीं होती . सर्दियों में तो निवाई पहुंचने तक अंधेरा होने लगता इसलिए अगर बच्चे साथ होते तो प्रायः टॉर्च भी साथ रखते जिससे सामान और बच्चों को ठीक से उतार सकें अपना स्टेशन आने पर .

टिकिट खिड़की पर भी भीड़ होती , मैं तो शहर में वैस्टर्न रेल्वे आउट एजेंसी से पहले ही जाकर टिकिट खरीद लाता तब फिर स्टेशन की राह पकड़ता .

अब एक बार की बात :

       यही गाड़ी पकड़ने को मैं जयपुर के रेल्वे प्लेटफार्म पर जाकर खड़ा हुआ तो वहां सहयात्री के रूप में संगीत के प्रोफ़ेसर नाडकर्णी मिल गए . मैं तो उस दिन अकेला ही था , साथ मिल गया , एक से दो होगए . बहरहाल दोनों ही सामान के थैलों से संपन्न थे .


अंजनी कुमार आ गए टहलते हुए हमारे पास . मैंने कहा ," आ जाओ ."

वो मिले पर वापस लौट गए , उनका तो फर्स्ट क्लास में रिजर्वेशन था . उन्हें बम्बई जाना था . कोई पांच सात सूट केस और उनकी वाइफ नियत स्थान पर दीख रहे थे जिधर उन्होंने इंगित किया . उनका और हमारा साथ तो जयपुर के प्लेटफार्म तक गाड़ी आने के पहले तक ही रहा .

बच गए मैं और प्रोफ़ेसर नाडकर्णी जो गाड़ी आने पर जस तस मय सामान के सवार हुए और थोड़ी थोड़ी जगह पाकर सीट पर बैठ गए .

हम आपस में बातें करने लगे . साथ बैठकर बात करते हमारी यात्रा की ये घंटे दो घंटे की अवधि बीत जानी थी पर ज़माना कहां चैन लेने देता है . 

क्या हुआ वही बताता हूं :


टंटे की शुरुआत :

          रवाना होते समय ही हमारे कम्पार्टमेंट में भी सवारियों का दबाव काफी बढ़ गया था . इसी क्रम में कुछ निहायत लफंगे किस्म के नौजवान लड़के कीचड़ में सने जूते पहने पहने ही ऊपर की सीटों पर आ चढ़े और ताश खेलने में मशगूल हो गए थे . इस पर भी हमें क्या ऐतराज हो सकता था अगरचे वो शान्ति पूर्वक रहते . पर वे शान्ति से कहां रहने वाले थे . थोड़ी ही देर में खेल के साथ धींगा मुश्ती शुरु हो गई और उनके जूतों से मिट्टी हम पर झड़ने लगी .

" ए भाई जरा तमीज से बैठो , नीचे भी इंसान बैठे हैं ."

 फ्रोफेसर नाडकर्णी ने थोडा तेज आवाज में उनको समझाइश का प्रयास किया . उनको बात समझ में कहां आने वाली थी , उलटे वो हम से संगठित रूप से उलझने लगे . मुझे उस समय लगा कि अब ये लोग नीचे उतरकर हमसे गुत्थमगुत्था और होंगे और हमारे लिए कठिन स्थिति उत्पन्न हो रही है .

आपात सहायता :

    हमारा तो उस ओर घ्यान भी नहीं था . पुलिस की वर्दी में एक थानेदार हमारी ही सीट पर खिड़की के पास चुपचाप बैठे थे . बाद में पता चला वो जयपुर के किसी थाने में अपनी ड्यूटी ख़तम कर अपने गांव जा रहे थे , वे अचानक हमारी हिमायत में उठ खड़े हुए और कड़क कर कुछ इस प्रकार बोले :


" फ्रोफेसर साब समझा रहे हैं और तुमको बात ही समझ में नहीं आ रही ?

मैं अच्छी तरह समझाऊं क्या तुमको ... ?"


उन्होंने अपने पुलिसिया अंदाज में एक की बांह मरोड़ी और एक बारी तो धमकाने को उनका हाथ कमर में लटकी पिस्तौल पर भी चला गया बोले शूट कर दूंगा . फिर उन्होंने उन लफंगों को वहां से हटाकर ही दम लिया .

विपत्ति आई पर इस प्रकार दूर भी चली गई . हम कौन हैं इस बात का अंदाज हमारे तारणहार को शायद हमारी आपसी बात चीत से ही लगा वरना परिचय तो उनके इस हस्तक्षेप के बाद ही हुआ था .


आज प्रोफ़ेसर नाडकर्णी तो रहे नहीं इस वाकये की तस्दीक करने को मुझे ये घटना याद है जो मैंने दर्ज की .

ऐसी अनेक यादें हैं जो बनस्थली की यात्राओं से ही जुड़ी है , आगे फिर कभी बताऊंगा .

अंजनी कुमार की बात भी अधूरी रह गई . वो भी आगे कभी ...


प्रोफ़ेसर नाडकर्णी को याद करते हुए .  

प्रातःकालीन सभा स्थगित .

समीक्षा : Manju Pandya.


Saturday, 14 July 2018

चोरंग्या  : स्मार्टफ़ोन का करतब .

‘ अच्छा है ना सर! चाळे लगे रहते हैं आप ।’

तीन बरस पहले सज्जन * ने तो ऐसे कह दिया था जब मैंने अपनी ये दुविधा यहां दर्ज की थी . आज उठाकर इसे ब्लॉग पोस्ट बणा दिया , देखो तो सही .

* Sajjan Poswal.


सुप्रभात ☀️

नमस्कार 🙏 

जयपुर १५ जुलाई २०१८ .

*****

     ये स्मार्टफोन ने तो बजाय स्मार्ट बनाने के चोरंग्या कर दिया .

क्या कहा , " चोरंग्या " क्या होता है ?

मतलब होता है जिसका चारों तरफ ध्यान भटकता हो . ये शब्द मैंने बनस्थली में घरों में काम करने वाली बाइयों से सुना और सीखा था .

चारो तरफ से , विभिन्न उपकरणों और माध्यमों से चले सन्देश सुबह ,दोपहर ,शाम और रात आते जाते हैं कि आदमी इससे अटका रहता है , भटका रहता है .

कोई तदनुभूति वाले और हों तो मैदान में आओ और हिम्मत बंधाओ न स तो अपन तो बन गए चोरंग्या .


फोटो क्रेडिट : Manju Pandya



२०१५ की रचना .

दुविधा ब्लॉग पर प्रकाशित  जुलाई २०१८. 

Friday, 13 July 2018

बच्चों को कहा रेज़गारी : फ़ेसबुक डायरी .

बच्चों को रेज़गारी कह देते ...   

शीर्ष नोट :

  छोटा सा किस्सा थोड़े संकोच के साथ लिख रहा हूं . अगर सेंसर बोर्ड को ये वल्गर लगा तो पोस्ट हटाई भी जा सकती है .


ये पिछली शताब्दी के उस काल खंड की बातें हैं जब रुपए का मोल आज से बहुत बेहतर था . उसी के अनुरूप कहावतें और शब्दावली का समाज में प्रचलन भी था .

समय का चित्रण .

          मुझे अच्छी तरह याद है नाहर गढ़ की सड़क पर मोहन हलवाई अपनी दूकान खोलता जब सुबह सुबह तो चवन्नी , अठन्नी की ढेरियां बनाता और इससे आगे लेन देन करता . गो कि तब रेजगी या रेजगारी का बड़ा महत्त्व हुआ करता था . रुपए की तो बड़ी कदर थी ही छोटे सिक्के भी खूब प्रचलन में थे . रुपया भुनाने पर रेजगारी मिल जाया करती थी . नए पुराने दोनों ही प्रकार के छोटे सिक्के प्रचलन में थे .

जो ' चवन्नी चलती थी ' वो भी अब तो शासन ने प्रचलन से हटा ली , अठन्नी वैध तो है पर लेता देता कोई नहीं अतएव प्रचलन से बाहर ही है .

खैर .जाने दीजिए ..

उसी काल खंड में हलके फुल्के मजाहिया बातचीत में बच्चों को रेजगारी कह दिया जाता था.


उस युग का एक संवाद :

        एक बस में एक कस्बाई अल्प शिक्षित युवती सवार हुई जिसके साथ दो तीन छोटे बच्चे भी थे - एक गोद में और कुछ एक साथ . वो एक सीट पर जा बैठी और साथ बच्चे तो थे ही .

उसी के पास एक नई रौशनी की युवती भी आई और वहां बैठी . बच्चे तो बच्चे हैं उस ' टच मी नॉट ' युवती से भी अटक लिए . हालांकि सब कोई तो बच्चों से ऐसे परहेज नहीं करता पर शायद ये नई आई सवारी कुछ थी ही तुनक मिजाज उसने कस्बाई युवती से कह दिया :


" हटाओ अपनी ये रेजगारी ."


मां की भूमिका में जो युवती थी उसने बच्चे तो अपने से सटा लिए लेकिन एक कौतुक प्रश्न भी इस सम वयस्क युवती से पूछ लिया बाई द वे :


" बहन...आपका रुपया अभी भुना के नहीं ? "


क्या कहती ये युवती , मुहावरा उसी जमाने का था !


प्रातःकालीन सभा स्थगित.

सेंसर बोर्ड : 

Manju Pandya 

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

15 जुलाई 2015.

ब्लॉग पर प्रकाशित : जुलाई २०१८ .

Thursday, 12 July 2018

नानगा द ग्रेट : स्मृतियों के चलचित्र ९.

नानगा द ग्रेट : नौवीं कड़ी 


आज की कड़ी लिखने से पहले दो लोगों का विशेष आभार व्यक्त करता हूं . एक बनस्थली के श्याम जी और दूसरा अलवर का लोकेश . श्याम जी मुझे लगातार कहा करते थे :


" भाई साब , अब काईं न काईं लिखो . अब देबा को बखत आगो ." 

अर्थात भाई साब अब कुछ न कुछ लिखो , अब देने का समय आ गया .


लोकेश और रेणु जयपुर आए थे और तब लोकेश ने मुझे कहा था :


"मौसा जी , आप कोई पोस्ट नानगा के बारे में भी लिखो . उसका व्यक्तित्व ऐसा रहा है कि वो डिजर्व करता है एक पोस्ट ."


इन्हीं लोगों की प्रेरणा मानता हूं कि आठ कड़ी पहले लिख चुका हूं और आज नौवीं कड़ी लिखने जा रहा हूं . आगे बात बढ़ाने में मेरे परिवार जनों और इष्ट मित्रों , जो भी मेरा परिवार ही हैं , ने अभूतपूर्व योगदान दिया जिससे ये श्रृंखला बन पड़ी है , इसमें मेरा कुछ नहीं है . रहीम के शब्दों में: 


" देनदार कोउ और है , देत रहत दिन रैन ।

लोग भरम हम पै धरैं , यातें नीचे नैन ।।"


पहले राजस्थानी की एक लोक प्रचलित कहावत :


" जैपर चाल्यां सै सिद्ध हो जासी.

थाळी ठीकरो हो जासी .

रूपयो - पीसो हो जासी .

टाबर टोळी हो जासी। "


ये उस मनोदशा को इंगित करने वाली कहावत है जो किसी ग्रामीण को नगर की दिशा में प्रयाण के लिए प्रेरित करती है , जैसे प्रेमचंद की कहानी में गोबर नगर चला आता है , नानगा भी जयपुर नगर में आया था पर वो ऐसा आया कि नगर का ही विस्तार वहां तक हो गया जहां जाकर नानगा ने अपने गांव में खुरपी जा गाड़ी .


 नानगा की मसखरी की मुझे चक्रपाणि ने याद दिलाई . नानगा किसी हास्य सम्राट से कमतर नहीं था . आज उसकी केवल एक बानगी बताता हूं . नानगा मुझे कहता:


" रजाई क्यूं बणवावो छो भाया जी , थांकै तो कन्नै ही नुवाई छै ."


अर्थात भाया जी रजाई क्यों बनवाते हो ? आपके तो पास ही निवाई है .

स्थानीय भूगोल के जानकार समझते हैं कि निवाई टाउन बनस्थली के पास ही तो है . निवाई का शब्दार्थ होता है गरमाहट . तो जो निवाई की ओट में रहता हो उसे रजाई ओढ़ने की क्या जरूरत .

जीजी ने भी नानगा बाबत कई बातें बताई , जैसे :

" नानगा की मसखरी का एक किस्सा मैं भी बतातीं हूं  ।एकबार हम उदयपुर आरहे थे ।नानगा से पूछा तुम्हारे लिये उदयपुर से क्या लावें तो उसका जवाब था ।मेरे लिये दो पैसे का उदयपुर ले आना ।ऐसा ही एक वाकया और ,देखिये ।उसने हमारा लेजाने का बिस्तर बांध दिया तब मैंने कहा नानगा थैंक्यू ।उसने प्रत्युत्तर दिया , " क्या फेंक दूं ? " ऐसा था हमारा नानगा । "

एक आध बात भाई साब टिप्पणी में जोड़ेंगे ही मुझे भरोसा है , न तो मैं वो बातें जोड़ूंगा जो उन्होंने बताई हैं अब तक .


नानगा की मसखरी की इन्हीं बातों को आगे भी बताऊंगा पर अभी हाल प्रातःकालीन सभा स्थगित .....

सुप्रभात :

सह अभिवादन : Manju Pandya

आशियाना आंगन, भिवाड़ी .

14 जुलाई 2015 .

ब्लॉग पर प्रकाशित : जुलाई २०१८.