Friday, 29 December 2017

आइंदा ऐसा मत करना : बनस्थली डायरी

 बनस्थली डायरी : “आइन्दा ऐसा मत करना ! “

 ये बनस्थली की बातें हैं , पुराने जमाने की बातें हैं जब मोबाइल फोन तो दूर की बात हमारे घरों में लैंड लाइन फोन भी नहीं हुआ करते थे . लोगों में आत्मीयता हुआ करती थी , जिंदगी मशीनी नहीं हुई थी बनस्थली में आज की सी चक्राकार सड़कें नहीं बनी थीं . एक ही सीधा सपाट राज मार्ग था , वही जनपथ था , सब कोई उस सड़क पर पैदल चलते मिल जाते थे , विशिष्ट व्यक्ति से मिलने के लिए अपॉइंटमेंट लेना नहीं पड़ता था , कभी भी जाकर मिल सकते थे . आज के जमाने की तरह बहुत सी सवारियां नहीं दौडती थीं , पैदल चलने का रिवाज था . उस दौर का ये वाक्य मुझे बार बार याद आ जाता है आज उस की ही कुछ बात बताता हूं .

हुआ क्या था ?

शाम का समय था मैं बनस्थली विद्यापीठ परिसर की उसी मुख्य सड़क पर घूमने निकला था , रास्ते में कोई कोई साथी मिल गए और बाते करते जा रहे थे . सामने से आ रहे बुजुर्गवार ने मुझे रास्ते में रोका और दोस्तों के साथ हूं जानकर बिना अधिक समय लिए एक ही नसीहत दी :

“ सुमन्त .. आइन्दा ऐसा मत करना . “

मैं भला और क्या कहता, ये ही बोला:

“ जी ध्यान रखूंगा ..””

और बुजुर्गवार चले गए .

मेरे दोस्तों के लिए तो यही एक सवाल खड़ा हो गया कि आखिर मैंने ऐसा क्या कर दिया जिसकी बाबत बुजुर्गवार ये नसीहत दे गए और मैंने वो बात झेल भी ली . न बताता तो साथियों को पेट दर्द हो जाता . जो उनको बताई वो फिर बताता हूं कि बात क्या थी और और उस दिन हुए इस संवाद का निहितार्थ क्या था .

बात ये थी कि एक दिन उन्होंने शाम चार बजे मुझे मिलने के लिए बुलाया था , उनका बात करने का उपयुक्त समय भी प्रायः यही होता था और वे दोपहर के भोजन के बाद विश्राम कर चुके होते थे . अपना आलम ये था कि उन दिनों मैं घर में अकेला था और उस दिन दोपहर की क्लास पढ़ाकर आया था . चार बजे में समय बाकी जान थोड़ी देर को बिस्तर पर लेट गया और आंख लग गई . आंख खुली तो छह बजे थे और मैं उनकी हाजिरी में नहीं पहुंचा . उसी बात का वो उलाहना दे रहे थे बिना कोई कैफियत मांगे .

कितनी आत्मीयता थी उस जमाने के लोगों में वही बता रहा हूं इस संस्मरण के माध्यम से .

इसी लिए तो ये बात याद आ जाती है :

“ आइन्दा ऐसा मत करना !”


Tuesday, 19 December 2017

“सो यू हैव ऑल्सो ज्वाइंड सुमन्त ?”:जयपुर डायरी

“ सो यू हैव आल्सो ज्वाइंड सुमन्त ?”:मेरे विद्यार्थी जीवन की वो याद .

  

 आज उस घडी को याद करता हूं तो भाव विभोर हो जाता हूं जब मैं राजस्थान विश्वविद्यालय के राजनीतिशास्त्र विभाग में पढ़ने गया था .जुलाई 1968 :मैंने विभाग में एम ए में दाखिला ले लिया था और विभिन्न कक्षाओं में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने लगा था . बी ए कक्षाओं में पढ़ते हुए इस विभाग में भी मेरा आना जाना रहा था उसी का परिणाम और प्रभाव बताता हूं जो इस प्रश्न वाक्य में परिलक्षित होता है .

विभाग का थियेटर नंबर वन : थियेटर की बैठक व्यवस्था कुछ इस प्रकार की थी कि किसी भी पेपर की क्लास में सबसे आगे की बैंच को छोड़ कर अगली तीन बेंचें तो लड़कियों से भरी होती थीं , ऐसी लड़कियां जो मुख्य रूप से जयपुर के महारानी कालेज और कानोड़िया से पढ़कर आई हुई होती थीं और उसके बाद की बैंचों पर लड़कों का नंबर आता . ये लडके मुख्य रूप से राजस्थान कालेज , जो आर्ट्स के लिए जाना जाता था और अन्य जिलों के कॉलेजों से पढकर आए हुए होते बैठते इन्हीं में मेरा भी स्थान था . इतना मुझे याद आता है कि इनमें लड़कियों का अनुपात ज्यादा ही होता था . लड़कों के लिए तब तक साइंस पढ़ने का चलन ज्यादा था .फिर भी काफी कुछ संख्या लड़कों की भी होती थी इनमें बाहर गांव से शहर में पढने आए लड़के भी होते थे . तब आज की तरह छोटी छोटी जगहों पर पी जी कॉलेज नहीं होते थे .

ये वो दिन था जब सब दाखिले मुकम्मल हो जाने के बाद राजनीतिशास्त्र विभाग के संस्थापक विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर एस पी वर्मा क्लास पढ़ाने आए थे और एम ए प्रीवियस में दाखिल विद्यार्थियों के नाम अपने हाजिरी रजिस्टर में दर्ज कर रहे थे . मुझे बताया गया था कि किसी जमाने में तो वो ये काम नहीं करते थे उनके लिए पहले आकर रत्नानी बाबू ये हाजिरी का काम कर जाया करता था . पर अब तो सब लड़का लड़की से परिचय पूछकर वर्मा साब खुद नाम दर्ज कर रहे थे . बारी बारी से सब कोई अपना नाम लिखवा रहे थे . ऐसे में कोई तीसरी चौथी पंक्ति पर वर्मा साब की निगाह पहुंची तो मेरी भी बारी आई और मेरे तमाम सहपाठी ये देखकर चकित थे कि वर्मा साब ने मुझसे कोई सवाल नाम , गाँव बाबत नहीं पूछा और वो बोले :

   “ सो , यू हैव आलसो ज्वाइंड सुमन्त . .? “

 मानो मेरे यहां पढ़ने आने की तो उन्हें बाट ही थी .

मेरे सहपाठी इस बाबत रश्क करने लगे कि मेरे विभाग में आने के पहले से ही वर्मा साब मुझे इतने अच्छे से कैसे जानते थे . 

इसकी भी एक लंबी कहानी है जो अगली किसी कड़ी में लिखूंगा .


Monday, 11 December 2017

गांव के स्कूल में : बतर्ज भास्कर

देखा सुना : गांव के स्कूल का किस्सा : बतर्ज भास्कर .

गांव के स्कूल का परीक्षा कक्ष:

माट साब कस्बे से चल कर परीक्षा में ड्यूटी करने आए है  स्कूल में  . हो गई कक्ष में परीक्षा शुरु . कापी पेपर बांट दिए और अब कमरे के दरवाजे के पास कुर्सी लगाकर डटे बैठे हैं माट साब . दरवाजे के पास कुछ हवा तो लगे , कमरे में तो कोई पंखा भी नहीं है . छोरे कर रहे हैं अपना काम सुविधा देखकर . अगर कोई सामग्री साथ लाए हैं तो उसको भी बरत रहे हैं  अब माट साब तो अपनी जगह से उठकर आने से रहे  , छोरे माट साब की इज्जत भी करते हैं और लिबर्टी भी लेते हैं . अब एक छोरे ने जब काफी कुछ सामग्री बरत ली तो माट साब हरकत में आए और बोले :

 “ छोरा ! करै  मन्नै ! न त रै देख आवूं छूं देख ! Q“

छोरा  , इत्ते कहे से कब  मानने वाला था  छोरा वो भी जिद्दी , करता रहा अपनी मन मानी  और माट साब को झुल्ला देता रहा :

” माट साब ! थोड़ो सो और कल्लेबा द्यो ! अजी माट साब .”

थोड़ी देर और हो  गई , फिर लगाई हांक माट साब ने  और फिर बोले :

” देख छोरा करै मन्नै  ! न त रै देख आवूं छूं देख ! “

अब आप पूछे बिना न मानोगे ,” फिर क्या हुआ ? “

होना क्या था  , माट साब ने उठ के जाने का श्रम नहीं किया , छोरा माना नहीं  , और छोरों को लाइसेंस और मिल गया .

ऐसे ही  चली परीक्षा.

Saturday, 9 December 2017

विदाउट परमीशन  : बनस्थली डायरी .

विदाउट परमीशन : बनस्थली डायरी 

-------------------------------------

बनस्थली के स्वर्णिम इतिहास में एक काकाजी नाम के व्यक्ति थे आज उनके ही जलाल के बारे में है ये पोस्ट . उनकी सुदीर्घ सेवाओं के बारे में एक शिलालेख भी लगा हुआ है विद्या मंदिर में अब तो , बस उनकी ही बात है . आज के लोगों की जानकारी के लिए बताऊँ कि वर्तमान में बनस्थली के सीनियर सेकेण्डरी स्कूल की प्रिंसिपल सुकेश जी उन्हीं काकाजी की बेटी हैं . काफ़ी समय से मेरा विचार बन रहा था कि ये संस्मरण उन्हीं सुकेश जी की दीवार पर लिखूंग पर ऐसा हो न सका क्योंकि मैं अभी सुक़ेश जी की मित्र सूची में सम्मिलित नहीं हो पाया हूं . वैसे सुकेश जी हमारे ही विषय ( राजनीति शास्त्र ) की हैं और उनसे मेरा दीर्घ अवधि से परिचय है इसकी सब तस्दीक़ करेंगे .


काकाजी विद्यापीठ में मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हुआ करते थे और तामीर और सुरक्षा प्रबंध से लगाकर रोज़मर्रा के अनेक प्रशासनिक काम काज उनके अधीन आते थे . विद्यापीठ के स्वागत द्वार के सुरक्षा प्रहरी भी उनके ही मातहद काम करते थे . ये तो बीते ज़माने की बातें हैं . दो बरस पहले स्वागत द्वार पर बैठे छोरे छापरों ने जब मुझे ही अंदर जाने से रोका था और मेरी पहचान पूछी थी तब मुझे भी काकाजी की याद आई थी , पर ख़ैर अभी वो बात रहने देवें , अभी काकाजी के ज़माने की बात :


ऐसा माना जाता था कि परिसर में पत्ता भी खड़कता है तो काकाजी की परमीशन से . भृत्य वर्ग में काकाजी का ख़ौफ़ रहता था , दरवाज़ा उनकी परमीशन से खुलता या बंद होता था . कोई नई गतिविधि होती तो या देखी जाती तो उसकी सूचना काकाजी को दी जाती थी . मेरे काकाजी से कैसे पारिवारिक सम्बंध थे वो अलग से क़हूंगा वरना आज का क़िस्सा छूट जाएगा तो अभी चलें आगे .


क़िस्सा ख़ास :

------------- हम्मा तुम्मा ने तो यहां तक वहम पाल लिया था कि काकाजी गेट खुलवा दें तो परिसर में मेह आ बरसे न तो मेह न बरस पावे . मैं तो महावीर जी के ज़रिए सुक़ेश जी तक बात पहुँचाया करता था कि वो काकाजी से गेट खुलवाने की सिफ़ारिश कर देवें तो और मेह बरस जावे , ख़ैर .


सच्ची बात :

----------- एक दिन की बात रोडवेज़ की सुबह जयपुर से बनस्थली आने वाली बस अपने नियत रूट पर बनस्थली की ओर आ रही थी उसमें यू को बैंक का अधिकारी प्रशांत निहलानी भी रोज़ की तरह आ रहा था जो रोज़ाना आया जाया करता था . 

इत्तफ़ाक़ की बात उस दिन अपनी जीप से काकाजी जयपुर जा रहे थे और उनकी जीप सामने से आकर बग़ल से निकली , ये चाकसू के आस पास की बात है , तो ठहाका लगाकर हंसा निहलानी :


“ ओ हो आज तो मेह को परमीशन की ज़रूरत ही नहीं है “


और ल्यो जी महाराज , चाकसू पर आकाश साफ़ था पर थोड़ी देर बाद जब बस परिसर में आकर रुकी तो झमाझम मेह बरस रहा था , उतरने वाले भीग गए .

अनायास कही गई निहलानी की बात सच हो गई उस दिन तो .


काकाजी का पुण्य स्मरण , बनस्थली के अच्छे दिनों को याद करते हुए .


-सुमन्त पंड़्या .

.................................

क़िस्सा आज ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर

रविवार  १० दिसम्बर २०१७ .

****************************************


Friday, 8 December 2017

हम भी ब्लॉगर तुम भी ब्लॉगर : जयपुर डायरी .

कल दोपहर तो कमाल हो गया . जय और प्रेरिता लिवा लाए और ये लोग यहां आ गए . भाई कमाल ये भी ब्लॉगर निकले . कल तो जीवन संगिनी ने कहकर ये तस्वीर लिवाई . ये अपने जीवन अनुभव लिखे जा रहे हैं डच भाषा में . अनुवाद के उपकरण से भाषा की दूरी को पाट डाला है . कल शाम ही मेरे ब्लॉग की एकआध पोस्ट पढ़ भी ली इन्होंने और अपनी टिप्पणी लिखी अपनी भाषा में . अपण ही रहे अनाड़ी उनकी भाषा समझने की कोई जुगत नहीं भिड़ा सके . पर फिर भी बेल्ज़ियम के इस जोड़े से जो मेलमिलाप रहा है कल और आज में उसके क्या कहने . तो कुल मिलाकर दो बात मुकम्मल हुई :

१ .

अन्तर्राष्ट्रीय मैत्री एक अलग महाद्वीप के लोगों के साथ .

२.

ये अहसास कि तुम भी ब्लॉगर और हम भी ब्लॉगर और दोनों लिखें अपनी अपनी ज़ुबान में फिर भी जानें एक दूसरे का लिखा और संवाद करें .

गुलमोहर कैम्प , जयपुर से सुप्रभात .

शनिवार  ९ दिसम्बर २०१७ । 

और ये आज सुबह का शिखर सम्मेलन :

चाय पर चर्चा *

...................................................

Thursday, 7 December 2017

कैश क्रंच में पंडिताई  : भिवाड़ी डायरी .

कैश क्रंच में पंडिताई 🌻


नमस्कार 🙏


मैं सोच रहा था आज कल पंडितों की पंडिताई कैसी चल रही होगी , वैसे ठीक ही चल रही है ख़ैर , पर वो बात ऐसी कि हर संकल्प में मुद्रा धराते हैं और आजकल नक़दी का है टोटा जिससे ये सवाल आया और ये बात ध्यान में आई . पर मुझे अभी बतानी एक और ही बात वो आएगी आगे . बस एक बार बाहर का चक्कर लगाकर लौटता हूं .


हां अब बात आगे : ये बात है जुलाई २०१० की जब अनुज - महिमा ने आशियाना में घर ले लिया था और यहां आ बसने की योजना बन रही थी . ये तय किया गया कि अच्छा दिन देखकर गृह प्रवेश कर लिया जाए और आगे मय सामान के आ जाने की सुविधा देखें . तब का ठीड़ा गुड़गाँव था वहाँ से आना था भिवाड़ी जो ख़ैर आए और सब काम ठीक से हो भी गया पर उससे ही जुड़ी और और बातें हैं जो बताने लायक हैं .


पास के ही टावर में सोनी जी ने भी मकान लिया था उन लोगों को भी साथ आना था और यही शगुन करना था जो कि साथ आए भी और ये शुभ आयोजन पारस्परिक सहयोग से सम्भव हुआ भी .


कैश क्रंच की बात :

------------- नया मकान बनाने या लेने वाले जन के पास प्रायः नक़दी का टोटा हो जाता है और वो बरकत की जुगत सोचता है वही सोच सोनी जी का था वो बोले :


" यहां से एक ही पंडित ले चलते हैं , दोनों जगह पूजा करा देगा , बचत रहेगी ."


इस बात पर महिमा ने कहा 


" हमारे पापा हैं न पंडित जी वो करा देंगे पूजा ."


" तब हमारे ...? " सोनी जी ने पूछा .


और महिमा ने कहा : " आपके यहाँ भी करा देंगे किसी और पंडित की ज़रूरत नहीं ."


ऐसे बन गई योजना और ये अभियान दल संयुक्त रूप से चला आया भिवाड़ी ये एक छोटा सा शिष्टमंडल था जो तब आया था भिवाड़ी .


अब आगे की बात :

------------ हमारे अश्वनी भाई बड़े दूरदर्शी आदमी हैं वो तो मेरी सीमा जानते थे और इसलिए एक मंत्र पुस्तिका भी साथ लेते आए थे ताकि ये लीक से हटकर काम में हमारी मदद रहे और वक़्त ज़रूरत का कोई मंत्र छूटे नहीं .


ख़ैर सांब हो गई पूजा , हो गया गृह प्रवेश यहीं दूध गरम हुआ , नाश्ता भी हुआ और भोजन भी और अब हम पंडित द्वय पहुंचे सोनी जी जोड़े के साथ उनके नए आवास का गृह प्रवेश करवाने . और वहाँ भी हमें अपेक्षित सफलता मिली पर वहाँ एक रोचक घटना हुई जो बताने लायक है .


दूसरा गृह प्रवेश :

.................. पूजा और गृह प्रवेश के बाद सोनी जी प्रथानुसार दक्षिणा सोंपणा चाहते थे पर हम कैसे लेते हम तो स्थानापन्न पंडित थे , उल्टे अश्विनी भाई ने उन्हें याद दिलाया :

" पूजा करके उठे हो , अब बड़े बुज़ुर्गों का आशीर्वाद भी लेओ .🙏 "


सोनी जी ने झुककर हम दोनों का आशीर्वाद लिया और हमने अलग अलग शतक सम्मान से उन्हें पुरस्कृत भी किया .

सोनी जी ख़ुश हो गए . 


मुझे याद आता है मैंने रोहित के विवाह में गणेश स्थापना करवाई थी क्योंकि भाभी ने ऐसा कहा था , चौधरी के घर लगन झिलवाया था क्योंकि परिस्थिति की माँग ही ऐसी थी और ये आशियाना में गृह प्रवेश करवाया जहाँ हम लोग अभी ठहरे हैं .

जय हो प्रभु 🙏 

मुझे ऐसे भरोसे लायक सामर्थ्य देते रहना .


प्रातःक़ालीन सभा इसी संस्मरण के साथ स्थगित .......


सुमन्त पंड़्या 

@ आशियाना आँगन , भिवाड़ी .

 गुरुवार ८ दिसम्बर २०१६ .

*********************

गए बरस लिखा था ये संस्मरण , इसमें आगे पीछे की कई बातों का ज़िक्र आया है .

आज इस क़िस्से का पुनः लोकार्पण .

आज ब्लॉग पर प्रकाशित .

जयपुर 

शुक्रवार  ८ दिसम्बर २०१७ .

********************************************************

Tuesday, 5 December 2017

“ लगन झिलवाओ  “  : बनस्थली डायरी .

दोस्त की खातिर 

वही बनस्थली की बातें


दोस्त अपने छोटे भाई का विवाह करने चले थे , घर से कोई बड़ा बुजुर्ग आया नहीं था वे ही उस समय शायद सबसे बड़े थे वहां उपस्थित घर के लोगों में । उस दिन मेरे घर आये , वही 44 रवीन्द्र निवास पर । मैं थोड़ी ही देर पहले पढ़ाने का काम पूरा कर घर लौटा था। बोले:


~ यार सुमन्त जी वो लड़की वाले आ गए एक बस भर के और कह रहे हैं , लगन झिलवाओ , यार ये कैसे होगा ? 


* श्रीमान , वो लगन नहीं है सम्मन है , झेलना तो पड़ेगा , नहीं झेला तो मैं आपके घर के बाहर चिपकवा दूंगा और दो की गवाही करवा दूंगा , खैर, चिंता मत करो , घर जाओ और कुछ पूजन सामग्री इकट्ठा कर लो , पड़ोस की महिलाओं को मंगल गायन के लिए बुला लो , कह दो पंडित जी अभी आते हैं । ये मैं बोला।


दोस्त अपने घर को लौटे , मैं अंदर जाकर पंडित जी बनने लगा । धोती , कुर्ता दुपट्टा धारण कर दोस्त के घर पहुंचा तब तक वहां उत्सव का सा वातावरण बन चुका था और लोग किन्हीं पंडित जी की प्रतीक्षा कर रहे थे जो भूमिका बहर हाल मुझे ही निभानी थी । वहां पहुंचकर मैंने संकल्प ग्रहण करवाया और आवश्यक पूजा पाठ करवाकर उस कथित लगन को उन लोगो को निरावृत अवस्था में थमा दिया और समझा दिया कि वास्तव में यह और कुछ नहीं एक प्रकार का निमंत्रणपत्र है जिसे कोई बड़ा बुजुर्ग यहां पढ़कर सुनावै

 

~ हमारे यहां तो हमेशा से लगन पंडित जी ही पढ़ते हैं । वे लोग बोले ।

मैं बोला , " कारण ये होगा कि गांव में शायद पंडित ही पढना जानता रहा होगा इसलिए ये रिवाज बन गया । खैर , लाओ मैं पढ़ देता हूं लगन ! "

और मैंने जस तस लगन भी पढ़कर सुना दिया , मंगल गायन तेज हो गया लड्डू बंट गए । 

 लगन क्या झिल गया था सम्मन तामील हो गया था जैसा मैंने उसे वैकल्पिक नाम दिया था ।


इति प्रातः कालीन सभा 

.................................

आज ब्लॉग पर प्रकाशित :

जयपुर ६ दिसम्बर २०१७ .

******************************************