Sunday, 7 May 2017

विशाल की बाबत :  बाप बेटे का संवाद  

गोल्डन हाईट्स में किप्पर के साथ ये तो है मेरी फ़ोटो और अब जोड़ता हूं  विशाल के बाबत एक क़िस्सा ।

विशाल की बाबत  : बाप बेटे की बात ।

आज की चर्चा का नायक विशाल * है . पेरिस का फेरा लगा आना उसकी ड्यूटी का पार्ट है , फ्रांसीसी पर्यटक उसके भरोसे भारत भ्रमण करते हैं . गजब की शायरी लिखता है , जयपुर शहर से प्यार करता है पर मैं याद करता हूं पुरानी बातें जब वो पढ़ता था और शहर में रहता था .


विशाल रहता था मिस्त्रीखाने के रास्ते में और आता जाता रहता था हमारे शहर वाले घर में हिमांशु के पास . दोनों राजस्थान विश्वविद्यालय से एम ए कर रहे थे . अम्मा का प्यार और फटकार दोनों को बराबर हासिल थे .

विशाल तब भी बड़े बढ़िया शेर लिखता था और अब भी लिखता है .


उन दिनों घरों में बी एस एन एल के लैंड लाइन फोन हुआ करते थे . विशाल के घर में भी फोन था और हमारे घर में भी फोन लग चुका था . अम्मा समाचार की उम्मीद में अक्सर फोन के पास जा बैठती थी , उस बारे में फिर कभी बताऊंगा अभी बात विशाल की चल रही है वही बताता हूं .


ये एक टेलीफोन संवाद है जो मैं आज सार्वजनिक कर रहा हूं तनिक संकोच के साथ . मैं बनस्थली से चलकर जयपुर आया ही था कि विशाल का फोन आया हिमांशु को पूछने को . मैं तो उसकी आवाज पहचान गया पर जाहिर है वो मेरी आवाज नहीं पहचान पाया फिर जो कुछ हुआ वो संवाद से स्पष्ट है :

विशाल -"....हैलो...अरे हिमांशु."

इधर से _" नहीं है ..."

विशाल_ " कौन...उदय ?"

इधर से_'" नहीं है ."

विशाल _" जय ?"

इधर से_" नहीं...है ."

विशाल __"कौन..छुटकू ?"

इधर से _" नहीं है ."


याने इस घर में जो जो उपलब्ध हो सकते थे विशाल ने सब के ही तो नाम लेकर पूछा पर कोई भी तो नहीं मिला और आखिर में उसने एक बहुत ही सीधा सवाल पूछ लिया :


"...तो फिर कौन बोल रहा है ...?"


और अब जो मैं बोला वो मुझे आज तक याद है :


" विशाल कपूर *......तुम्हारे बाप बोल रहे हैं ."


बच्चा शायद थोड़ा चमका ये जवाब सुनकर पर तुरंत सहज हो गया और बोला:

" अरे...अंकल आप कब आए ..?"

पर शायद उस दिन आखिरी बार विशाल मुझे ' अंकल ' बोला . उसके बाद से वो मुझे "पापा" ही कहता है और जीवन संगिनी को " मम्मी" कहता है . 

अब ये बात आप लोग जान ही गए कि फेस बुक पर अपने जन्म देने वाले माता पिता के समकक्ष इन माता पिता को कब से और क्यों रखने लगा है विशाल ?

कुछ और बातें जो जीवन संगिनी इस बाबत जुड़वाना चाहती थीं वो इस पोस्ट में नहीं आ पाई वो फिर आगे कभी आ जाएंगी .

आज ही हिमांशु ** की भी एक पोस्ट देख रहा हूँ , नायक उस का भी विशाल ही है , अजब संयोग है .

इस किस्से को सार्वजनिक करने को विशाल बुरा नहीं मानेगा इस उम्मीद के साथ प्रातःकालीन सभा स्थगित .

इति.


सुप्रभात .

सहयोग और समर्थन : मंजु पंड़्या ।


सुमन्त

आशियाना आंगन, भिवाड़ी .

8 मई 2015 .

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आज का अपडेट जयपुर से दिनांक 8 मई 2016 .

------ गए बरस भिवाड़ी में थे तब लिखी थी ये पोस्ट इसमे आए संवाद देखने लायक हैं 

आज फिर भिवाड़ी जाने की ही बात हो रही है . सब कुछ चाहा जैसा हो गया तो शाम को चले ही जाएंगे भिवाड़ी और कल से प्रातःकालीन सभा वहीँ से संचालित होगी .

आज तो ये विशाल का किस्सा फिर से देख लीजिए , आजकल पड़ोस में ही गोल्डन हाइट्स पर रहता है और हम वहां कभी भी चेक इन कर सकते हैं पैदल पैदल जाकर भी .

अब फिर कोई ये मत पूछना के कौन है विशाल कपूर .

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सुप्रभात


सुमन्त पंड्या .

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

रविवार 8 मई 2016 .

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आज दिन दिल्ली से ब्लॉग पर प्रकाशित जयपुर डायरी का ये प्रसंग ।

सोमवार ८ मई २०१७ ।

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विशाल के घर हम लोग । फ़ाइल चित्र ।

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गुरु शिष्य संवाद : नहले पर दहला । ✅

गुरु - शिष्य संवाद : 😊😊 कल की बात . 

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     #जयपुरडायरी #sumantpandya


 कल सुबह अनायास जनता स्टोर पर स्टेशनर की दूकान पर खड़े दिखे प्रोफ़ेसर रमाकांत . मेरे गुरु , बच्चों तुम्हारे दादा गुरु . इन्होंने मुझे मेरे विषय का पहला पाठ पढ़ाया जब मैं राजस्थान कालेज पढने गया . ऐसे थोड़े ही तो लोग हैं जिन्हें मैं पैरों में झुक कर प्रणाम करता हूं .

अल्प उपलब्ध समय में बहुत थोड़ी तो बात हुई पर हो गई बात 

“ सर , प्रणाम करता हूं .” मैं बोला .

मुझे आवाज से पहचान कर पीछे मुड़े गुरुदेव बोले :

“ आ हा सुमन्त कैसे हो ? “

“ सर आपके यहां आना चाहकर भी आ नहीं पा रहा हूं , कुछ मुसीबत से घिरा हूं .”


संवाद में नुक्ता ये भी है कि रमाकांत सर पार्क व्यू अपार्टमेंट्स में चौथी मंजिल पर रहते हैं , उनके चेले भी अब सीनियर सिटीजन हैं तो आप नुक्ता समझ सकते हैं .


अब सुनिए गुरु की बात :

“ ऐसा करो सुमन्त , मुसीबत के साथ आ जाओ ! “ 😊😊

और तब मैं बोला :

“ सर अभी हाल मुसीबत को सीढ़ी चढ़ना मने है . ये भी तो दिक्कत है . “


पर गुरु की उदारता देखिए , गुरु गुरु ही रहेंगे , दिया नहले पर दहला और बोले , वो बोले :


“ कोई बात नहीं सुमन्त , मुसीबत से मिलने मैं नीचे आ जाऊंगा “

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सुप्रभात . 

सुमन्त पंड्या .

सह अभिवादन : मंजु पंड़्या  ।

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

रविवार 8 मई 2016 .

आज दिन दिल्ली से प्रकाशित ये ब्लॉग पोस्ट 

सोमवार ८ मई २०१७ ।

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Saturday, 6 May 2017

पापा वाली सब्ज़ी : बनस्थली डायरी 

छोटा वाला मेरे थक्के 😊😊 बनस्थली डायरी 


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ये तब की बात है जब बनस्थली में थे , जीवन संगिनी किसी कारण बाहर थी और घर में हम दो - बाप बेटे ही थे , मैं और छोटा वाला . दोनों के भोजन की व्यवस्था मेरे ही जिम्मे थी . बच्चे को लगातार साथ रखना और अपना पढने पढ़ाने का काम भी करना . उसी बाबत छोटी छोटी बातें हैं :


बात दोपहर के भोजन की :

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 सब्जी के नामपर खूब सारे मटर भिगो कर गया था . जब दोपहर का खाना बनाने की बारी आई तो कुकर में वो ही मटर उबाले गए , अल्प मात्रा में थोड़े टमाटर और भांति भांति के मसालों के साथ शोरबे वाली सब्जी छोंक कर तैयार कर दी और बना डाली अपनी जरूरत की रोटियां .

खाने बैठे चौक वाले बरामदे में , यहां दोपहर को घूप आ जाया करती थी जो सर्दी के मौसम में बड़ी अच्छी लगती थी . मौसम भी सर्दी का ही था .

भूख भी जोर की लगी थी दोनों को . खाने बैठे तो सिलसिला शुरु हुआ .


सब्जी कैसी लगी ? मैंने पूछा.

बहुत स्वादिष्ट है पापा . बेटा बोला .


असल में भूख में भोज्य पदार्थ स्वादिष्ट ही लगता है पर था भी सब कुछ संतुलित ये बात भी सही है . मेरा खाना बनाना उस बखत सफल हो गया लगा जब भोजन के दौरान बेटा बोला :


" पापा थोड़ा शोरबा और मिल सकता है क्या ?"

मैं बोला ," खूब सारा ले , अपन को खा कर ख़तम ही करना है ये सब कुछ ."

 फिर तो आगे भी बेटे ने मां को बताया कि मैंने उस दिन उसके लिए सब्जी बड़ी बढ़िया बनाई थी .

आगे आगे यह भी हुआ कि वो मटर की शोरबे वाली सब्जी घर में पापा वाली सब्जी कहलाई और जीवन संगिनी ने भी ये सब्जी बनाने का प्रभार कई एक बार मुझ पर ये कह कर डाल दिया , " पापा वाली सब्जी तो पापा ही बनाएंगे ."

आज वो छोटा वाला पाक कला में पारंगत हो गया , उसके बनाए भरवां टिंडों की दिल्ली में चर्चा होती है , पर मुझे तो उसका ये ही भोला सा कथन याद आ जाता है :


"पापा, थोड़ा शोरबा और मिल सकता है क्या ?"


धन्य जीवन संगिनी जो ये कहकर रसोई से बाहर हो जाएं कि,


"अब पापा वाली सब्जी तो पापा ही बनाएंगे ."

जय हो . जीवन संगिनी   मंजु पंड़्या ।


सुप्रभात .


सुमन्त पंड्या .

(Sumant Pandya)

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

7 मई 2015 .

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😊😊

आज फिर अपडेट जयपुर से -

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दिनांक 7 मई 2016 .

ये बातें फिर फिर याद करना बहुत अच्छा लगता है .

इसे सहेजना है और बनस्थलीडायरी के अंतर्गत प्रकाशित करना है ब्लॉग पर भी और प्रोफाइल पर भी .

कहने की आवश्यकता नहीं कि इस लेख से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वो टिप्पणियां जो इस बाबत आप लोगों ने अंकित की .

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सुमन्त पंड्या .

@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर 

शनिवार 7 मई 2016 .

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दो बरस पहले भिवाड़ी में थे तब लिखी थी ये पोस्ट । गए बरस जयपुर में थे आज के दिन तब इस पोस्ट को दोहराया भी था । आज के दिन इत्तफ़ाक़ से जब छोटे वाले के पास दिल्ली आए हुए हैं तो फ़ेसबुक ने ये बात फिर याद दिलाई है तारीख़ के हिसाब से । अब इसे ब्लॉग पर पोस्ट किए देता हूं ।

दिल्ली  

रविवार ७ मई २०१७ ।

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लड़का लड़की भेदाभेद : भिवाड़ी डायरी ✍🏼

लड़का लड़की भेदाभेद : भिवाड़ी और बनस्थली से स्मृतियों के चलचित्र 

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कल की पोस्ट में बात महिमा को लेकर शुरु हुई थी , उसी पर रात तक बात चली . सभी सोचने वाली बातें हैं इन में से कोई निर्णायक अंतिम सत्य नहीं है . सवाल यही है कि घर परिवार , समाज में हम बच्चों को कैसे तैयार करते हैं इसी से उनका नजरिया बनता है और उनकी भूमिका तैयार होती है .

सरकारी स्कूलों बाबत चर्चा बहुत रोचक रही , इस बाबत अलग से पोस्ट लिखूंगा अपने उन अनुभवों को आधार बनाकर जो मैंने छात्र बनकर जुटाए थे. 

पिछले हफ्ते दोहितों के लिए आशियाना के स्टोर में ' किंडर जॉय ' खरीदने गया था , मैं बोला :


" दो किंडर जॉय दे देना "


अभि जो काउंटर पर बैठता है और मुझे जानता है , कुछ ऐसे बोला:


" अभी तो लड़कियों वाले हैं , लड़कों वाले शाम को आएंगे तब आपको दूंगा अंकल ."


मेरे लिए यह भी एक नई बात थी कि खाने खेलने की चीजों में भी ये जेंडर भेद है . जाने उसे कैसे पता था कि मुझे कौनसे किंडर जॉय चाहियेंगे .

बाजार भी वही भुनाने में लगा है जो लड़का लड़की भेद हमारे समाज में पाया जाता है .

अब आप ये मत पूछना कि ये "किंडर जॉय" क्या होता है वरना ये वैसा ही सवाल होगा :

"प्यारे मोहन जी नै नी जाणो ?" 

मेरी पिछली एक पोस्ट में आया था ये सवाल .


जीवन संगिनी बनस्थली के दिनों को याद कर रही थी तब कुछ बातें याद आईं . मैंने कह दिया था कि हम लोगों के लिए लड़का तो ' तड़ी पार' प्रजाति हुआ करता था , लड़की साथ रहती थी वहीँ पढ़ती थी . अब मैं ऐसे कहता हूं कि लड़का ' एक्सपोर्ट क्वालिटी ' का बनाया जाता था उसे परिसर से बाहर भेजना ही पड़ता था . उसी दौर का एक प्रसंग .


लड़कों के चक्कर में जीवन संगिनी बाहर चली गईं , शायद उदयपुर , घर में रह गए बाप बेटी . उन्हें चिंता थी कैसे पार पड़ेगी . पर सब कुछ ठीक रहा , जो बेटी अपनी मां के सामने कोई काम नहीं करती थी अब मेरी अम्मा बन गई थी . अरी वाह री महिमा * अम्मा की लाड़ली .


समय आने पर ऐसी परीक्षा लड़कों ने भी उत्तीर्ण की ये भी कहना पड़ेगा .

पर वो फिर कभी.....

* Mahima Pandya.


प्रातःकालीन सभास्थगित ,

इति .

समर्थन : Manju Pandya.

सुप्रभात .


सुमन्त

(Sumant Pandya )

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

6 मई 2015 .

दो बरस पुरानी पोस्ट है , आज इसे कर रहे हैं ब्लॉग पर साझा ।

काका नगर , दिल्ली ।  शनिवार ६ मई २०१७ ।

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Thursday, 4 May 2017

अनायास मिले जीवन सिंह जी : स्मृतियों के चलचित्र 

अनायास भेंट हुई जीवन सिंह जी से .

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😊😊


" आप जीवन सिंह जी हैं ?"


मेरा सवाल सुनकर उनके चेहरे पर चमक आ जाती है , मान जाते हैं कि वो जीवन सिंह जी हैं , कैसे नहीं मानते मैंने सही पहचाना था . और मैं अपना परिचय थोप देता हूं भले वो मुझे न जान पाए हों पहले प्रयास में 


" मैं सुमन्त पंड्या हूं ."

अब वो मुझे क्या जाने पर फिर भी जब कोई अटकने को बेताब हो तो गहक के मिलना लाजिमी हो जाता है , वही उनके साथ हुआ मिले पर एक प्रश्न के साथ :


" आप ने मुझे पहचाना कैसे ? "

मैं कहने लगा 

" आप को तो मैं दूर से ही देखकर पहचान गया था क्योंकि मैं आपको 2005 से जानता हूं जब आप बनस्थली आए थे , तब प्रोफ़ेसर नवल किशोर भी वहां आए थे और मैं उनकी हाजरी में था , आप भी साथ थे उस आयोजन में , प्रेमचंद की सवा सौ वीं जयंती का आयोजन था हिंदी विभाग वालों का और मेरा कई प्रकार से रिश्ता है हिंदी वालों से ......"


बात के लिए समय बहुत कम था अतः मैंने उनकी फोटो खींची और देखो नए जमाने का चलन उन्होंने भी मोबाइल फोन निकाला और मेरी उतार ले गए .


अभी मुलाक़ात से जुडी और कई बातें छूट रही हैं पर मुझे उठने का नोटिस मिल गया है अतः प्रातःकालीन सभा स्थगित ....

आगे देखेंगे कैसे क्या करना है .

फोटो प्रकाशित करते हुए

सुमन्त पंड्या .

गए बरस की बात है । पहले फ़ेसबुक पर दर्ज किया । आज इसे दर्ज कर रहा हूं दिल्ली में  बैठ कर ब्लॉग पर ।

तकनीकी सहयोग के लिए अक्षर भट्ट की विशेष सराहाना ।

आज एक विशेष निमित्त से दिल्ली में हैं । कुछ उल्लेख आया है और लिखूंग़ा समय निकालकर ।

दिल्ली से सुप्रभात 🌻

शुक्रवार ५ मई २०१७ ।

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Tuesday, 2 May 2017

बज्जी बज्जी चले ज़ाएंगे : बाल गीत 👫

" बाजा देखने जाएंगे 

सीटी बजाते जाएंगे 

हल्ला करते जाएंगे

गुल्ला करते जाएंगे

उर्वी को ले जाएंगे

नूनू को ले जाएंगे..."

और आगे कहता है हिमांशु :

मुझे तो यह सीटी वाली लाइन ही सबसे अच्छी लगती थी/है क्योंकि इसमें बच्चे की मस्ती पर कोई रोक टोक नहीं है, इच्छा हो तो सीटी बजाओ , जो चाहे करो.

ये बात बाल गीत पर आई टिप्पणियों में से ली है और अब आएगी मूल पोस्ट वार्षिक संशोधनों के साथ :

बज्जी बज्जी चले जाएंगे ..... 

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कितने बच्चे गए तीस सालों में बड़े हो गए मेरा बनाया ये बाल गीत सुनकर :

" सूट का कपड़ा लाएंगे .

और रैक्स के सिलवाएंगे ,

पहन के बज्जी * जाएंगे .

बाजा देखने जाएंगे ,

छुटकू को ले जाएंगे ,

जय को ले जाएंगे ...

बाजा देखने जाएंगे ,

बज्जी बज्जी चले जाएंगे ...., "

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*बज्जी माने बाजार .


पीढ़ियां बदल गईं पर ये प्रयाण गीत बाल गोपालों के लिए प्रचलित रहा है मेरे घर में . आज केवल रैक्स टेलर का उल्लेख .

नाहर गढ़ की सड़क , जयपुर में राम अवतार जी ने दूकान खोली . कुशल दर्जी होते हुए भी ज्यादा काम अभी आता नहीं था उनके पास . मस्कट में काम कर के आए थे पर स्वास्थ्य कारणों से स्वदेश लौट आए थे और कारोबार जमाने की कोशिश कर रहे थे . मैं खादी का ब्राउन सूट का कपड़ा लेकर पहुंचा था . बोला था :

"माट साब , मेरा सूट सिल दोगे क्या ?

"जुरूर " वो बोले .

और इस प्रकार मैं सूट सिलवाने वाला पहला ग्राहक बन गया . 


मैंने राम अवतार जी को यह भी सुझाव दिया कि दो हफ्ते तक मेरा सूट शो केस में टांकें ताकि ये देखकर और ग्राहक आकर्षित और प्रेरित हों .


और इस प्रकार राम अवतार जी मेरे ड्रैस डिजाइनर बने उन दिनों . गर्मी के लिए कई एक सफारी सूट भी उन्होंने ही सिले .


अब तो उनका बेटा पुलिस अधिकारी बन गया . राम अवतार जी ने भी शायद अवकाश ले लिया . 

बाल प्रयाण गीत की शीर्ष पंक्तियों का ये है छोटा सा इतिहास .

अब इसमें धीरे धीरे भागीगार पात्र बदलते जा रहे हैं , गीत वही चला आ रहा है :


" उर्वी को ले जाएंगे , रघु *को ले जाएंगे .

चिंटू को ले जाएंगे , चिंकू को ले जाएंगे .

नूनू को ले जाएंगे , सैमू को ले जाएंगे .

उन्नी को ले जाएंगे , बज्जी बज्जी जाएंगे ."

"विभू **को ले जाएंगे , मानू को ले जाएंगे ."

मुन्नू पप्पू बन जाएंगे , बज्जी बज्जी चले जाएंगे ."


इस प्रकार ये एक समावेशी गीत है .

ये है दावते शीराज .

हमसफ़र मिलते गए और कारवां बनता गया .


नोट : 

कल की पोस्ट में गोपाल टेलर का विशेष उल्लेख था ,तिस पर अनुजAnuj Bhatthatt) का सुझाव आया कि अगली पोस्ट रैक्स टेलर पर बनाई जानी चाहिए आखिर वह हमारे बाल गीत में गाए जाते हैं .


विशेष आभार अनुज आज की पोस्ट के सन्दर्भ के लिए .

बालक वृन्द भी सराहेंगे यह आशा है Raghu BhatthattVibhu Dixitixit.


सुप्रभात .

सह गायन : मंजु पंड़्या  ।

सुमन्त पंड्याSumant Pandyandya)

अशियाना आँगन , भिवाड़ी .

3 मई 2015 .

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😊😊 अपडेट 3 मई 2016 जयपुर .

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आज एक वर्ष बाद फेसबुक ने जब इस बाल गीत संबंधी पोस्ट की बात याद दिलाई तो मेरा यह विचार बना कि इस स्टेटस पर फिर से चर्चा चलाई जाए .

एक सुखद संयोग गए बरस यह भी रहा था कि इसी दिन संज्ञा की बाल गीत संबंधी पोस्ट भी प्रकाशित हुई थी जिसमें बताया गया था कि उनके घर में भी प्रातःकालीन सभा में मित्रवर उपाध्याय जी के बनाए बाल गीत पुनः गए गए , दोहराए गए और बचपन को याद किया गया . हिमांशु ने बाल प्रयाण गीत में ," सीटी बजाते जाएंगे " " हल्ला मचाते जाएंगे " " गुल्ला मचाते जाएंगे जैसी बातें जोड़कर गीत को खूबसूरती से अपडेट किया .

उर्वी जैसे बच्चों ने तो मुझे ही बज्जी नाना कहना शुरु कर दिया था ये बात भी आई थी .


प्रमोद जो बाल गीतों का एक उल्लेखनीय रचयिता है उसने तो नूनू - सैमू के लिए बालगीत भेज दिए थे , कित्ता अच्छा लगा था उस दिन .

अब आज मैं फिर से चाहूंगा कि संज्ञा भी यहां अपनी उस पोस्ट को साझा कर देवें जिसका संकेत फेसबुक दे रहा है .


रैक्स टेलर को फिर से याद करते हुए आज फिर से ये पोस्ट चर्चा के लिए जारी .



समस्त बाल गोपालों को हम दोनों , किसी के नाना - नानी और किसी के बाबा अम्मा के आशीर्वाद .

😊😊

सुप्रभात 

सुमन्त पंड्या . Sumantpandya

मंजु पंड्या . 


@ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

      मंगलवार 3 मई 2016 .

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#स्मृतियोंकेचलचित्र 

आज दिन डूंगरपुर से फिर से प्रसारित ये पोस्ट :

बुधवार ३ मई २०१७ ।


जय भोलेनाथ । 🔔🔔


नोट : क्या ये बाल गीत ब्लॉग पर भी जोड़ दिया जाय ? बताइए ।

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सर्वानुमति के आधार पर आज ये पोस्ट ब्लॉग पर प्रकाशित ।

बुधवार ३ मई २०१७ ।

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छींट की क़मीज़ों की कहानी : बनस्थली डायरी : स्मृतियों के चलचित्र😀




     छींट की कमीजों की कहानी . 

  #बनस्थलीडायरी #sumantpandya

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गए दिनों राजा पार्क के वीअर हाउस में कोई एक कमीज बदलवाने गए हम लोग .साइज के हिसाब से ठीक कमीज लेनी थी . कुछ ऐसी थी कमीज जैसी नेल्सन मंडेला पहने दीखते थे . बहुतेरीे कमीजें काउंटर पर बखेर कर युवक ने पूछा :

"किसके लिए चाहिए ?"

मैंने अपनी ओर इशारा किया .

युवक की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली थी . उसने एक झटके में सारी कमीज़ें काउंटर से एक ओर फेंक दी  और बोला :

" आपके लिए मैं देता हूं कमीज , आपके माफ़िक "

उसने तमाम छींट की कमीजें फेंक कर पांच कमीज सामने रख दी जो या तो चैक की थी या थी धारीदार . वो बोला :

" अंकल , ये हैं आपके लिए , देखिए ."

जीवन संगिनी* साथ थीं ही . मैंने भी कह दिया :

"इन्हीं में से एक आप छांट देओ , आखिर लड़के ने मेहनत करके ये पांच छांटी हैं ."

सर्वानुमति बन गई और एक चैक की कमीज ले ली गई .


छींट की कमीज रद्द हो गई पर एक पुरानी बात याद हो आई .

सत्तर के दशक में बातिक प्रिंट की दो कमीज मैंने बनवा ली थी - एक की लाल छींट थी , एक की काली छींट . गोपाल टेलर उन दिनों मेरे कपड़े सिल देता था . मैंने इतना कहा था:

" वो बकरी के कान जैसी कालर बना देना ."

बन गई कमीजें पहनी भी गईं पर एक दिन जब मैं क्लास में बोलने को खड़ा हुआ तो लड़कियां हंसने मुस्कराने लगीं .

तब पता चला मैं और कई एक लड़कियां यकसां छींट की कमीज पहने थे .

आखिर मेरा पहनावा कुछ तो अलग हो .

समेट कर ट्रंक में रख दी वो कमीज ये तो तब की बात है .

इस बार तो दूकान पर ही रद्द हो गई छींट की  कमीज .

ये अब की बात है .

*Manju Pandya.


प्रातःकालीन सभा स्थगित .

इति.


सुमन्त पंड़्या 

(Sumant Pandya)

आशियाना आंगन , भिवाड़ी .

2 मई 2015.

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अपडेट  

आज जयपुर से दिनांक 2 मई 2016 .

------- 😊 अब ये कोई बात हुई कि लड़का लोग तो छींट की कमीज भी पहन लेवें तो कोई हरज नहीं और अपन तो अब चैक की और न तो धारीदार कमीज ही पहनें . जब उमर थी तो मर्यादा ने बदलवा दी कमीज और अब ऐसीे कमीज पहनने की उमर नहीं रही .

सोचता हूं फिर जाऊंगा बाज़ार , लाऊंगा छींट की कमीजें और पहन के घूमूंगा शिवाड़ एरिया में , उमर का क्या है .

व्यापक विचार विमर्श के लिए फिर एक बार प्रचारित और #बनस्थलीडायरी के अंतर्गत संकलित ये पोस्ट .

😊😊

सुप्रभात 

सुमन्त पंड्या .

  @ गुलमोहर , शिवाड़ एरिया , बापू नगर , जयपुर .

     सोमवार 2 मई 2016

आज दिन पोस्ट का सचित्र प्रकाशन 

डूंगरपुर से 

मंगलवार २ मई २०१७ ।

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